Hindi Horror Story मेरा नाम आरव है। उस रात मैं अकेला था। घर में इतनी खामोशी थी कि दीवार घड़ी की टिक-टिक भी किसी के कदमों जैसी लग रही थी।

मम्मी-पापा गांव गए थे और मैंने जिद करके घर पर रुकने का फैसला किया था। मुझे लगा था, “अब पूरी रात Netflix, gaming और late night snacks.” लेकिन रात के ठीक 2:13 बजे मेरी नींद किसी आवाज से खुली।
“खर्र… खर्र…”
आवाज मेरे कमरे से ही आ रही थी।
पहले मुझे लगा शायद खिड़की खुली होगी। लेकिन खिड़की बंद थी। पंखा चल रहा था, दरवाजा अंदर से लॉक था।
फिर वही आवाज आई।
“खर्र… खर्र…”
इस बार साफ समझ आया।
आवाज मेरे bed के नीचे से आ रही थी।
मेरी सांस रुक गई। मैं चादर के अंदर बिल्कुल स्थिर पड़ा रहा। बचपन से सुनी horror stories याद आने लगीं, लेकिन मैं खुद को समझाता रहा—“कुछ नहीं है… शायद चूहा होगा।”
तभी bed के नीचे से किसी ने बहुत धीमे से कहा—
“आरव…”
मेरे पूरे शरीर में ठंड दौड़ गई।
वो आवाज मेरी मां जैसी थी।
लेकिन मां तो गांव में थी।
मैंने कांपते हाथों से मोबाइल उठाया। स्क्रीन की रोशनी जली तो कमरे की दीवार पर मेरी परछाईं हिली। और उसी पल bed के नीचे से किसी चीज ने लकड़ी पर नाखून रगड़े।
“खच… खच… खच…”
Hindi Horror Story
मैंने मां को कॉल किया। फोन बजा।
एक रिंग।
दो रिंग।
तीसरी रिंग पर कॉल उठी।
“हेलो?” मां की आवाज आई।
मैं फुसफुसाया, “मम्मी… आप ठीक हो?”
मां बोली, “हां बेटा, क्यों?”
मेरी आंखें bed के किनारे पर जमी थीं।
तभी नीचे से फिर वही आवाज आई—
“फोन काट दे… मैं यहीं हूं…”
मैं चीखना चाहता था, पर आवाज गले में अटक गई।
मां फोन पर बोलती रही, “आरव? क्या हुआ?”
मैंने हिम्मत करके कहा, “मम्मी… मेरे bed के नीचे कोई है।”
कुछ सेकंड खामोशी रही।
फिर मां की आवाज कांपी, “बेटा, अभी कमरे से बाहर निकलो। पीछे मत देखना।”
मैं धीरे-धीरे उठने लगा। तभी bed के नीचे से एक काला, सूखा हाथ बाहर निकला और उसने मेरा पैर पकड़ लिया।
मेरी चीख निकल गई।
मैंने पूरी ताकत से पैर झटका। हाथ छूट गया। मैं दरवाजे की तरफ भागा, लेकिन दरवाजा खुल नहीं रहा था। लॉक घूम रहा था, पर दरवाजा जैसे बाहर से किसी ने पकड़ा हुआ था।
पीछे से आवाज आई—
“भाग क्यों रहा है? तूने ही तो मुझे बुलाया था…”
मैंने रोते हुए कहा, “मैंने किसी को नहीं बुलाया!”
नीचे से हंसी आई। सूखी, टूटी हुई हंसी।
“तीन दिन पहले… तूने internet पर search किया था—real ghost calling ritual.”
मुझे याद आया। मैंने दोस्तों के साथ मजाक में एक वीडियो देखा था। उसमें कहा गया था कि रात 12 बजे आईने के सामने अपना नाम उल्टा बोलो तो कोई जवाब देता है। मैंने हंसते हुए किया था।
लेकिन कोई जवाब नहीं आया था।
या शायद आया था… और मैंने सुना नहीं।
अचानक कमरे की light flicker करने लगी। मोबाइल की battery 1% पर आ गई, जबकि कुछ देर पहले 48% थी।
Bed के नीचे से अब सिर्फ आवाज नहीं आ रही थी। कोई बाहर निकलने की कोशिश कर रहा था।
पहले उंगलियां दिखीं।
फिर कलाई।
फिर एक चेहरा।
वो चेहरा मेरा ही था।
मेरी तरह आंखें। मेरी तरह बाल। मेरी तरह चेहरा।
बस उसकी मुस्कान इंसानों जैसी नहीं थी।
वो धीरे से बोला—
“मैं तेरी जगह लेने आया हूं।”
मेरे हाथ से मोबाइल गिर गया। स्क्रीन पर मां की कॉल अभी भी चालू थी। मां चिल्ला रही थी—
“आरव! दरवाजा मत खोलना! जो बाहर है, वो भी वही है!”
मैं जम गया।
बाहर से अचानक पापा की आवाज आई—
“आरव बेटा, दरवाजा खोलो। हम आ गए।”
मेरी आंखों से आंसू बहने लगे। पापा तो गांव में थे।
Bed के नीचे वाला मेरा हमशक्ल मुस्कुराया।
“अब बता… किससे बचेगा?”
तभी मेरी नजर कमरे के कोने में रखे छोटे मंदिर पर पड़ी। दादी की पुरानी माला वहीं रखी थी। मैं फर्श पर गिरते-पड़ते वहां पहुंचा और माला उठा ली।
जैसे ही मैंने माला हाथ में ली, कमरे में जोर की बदबू फैल गई। वो चीज चीखी। उसकी आवाज इंसानी नहीं थी।
मैंने आंखें बंद करके हनुमान चालीसा की पहली लाइन याद करने की कोशिश की। शब्द टूट रहे थे, सांस कांप रही थी, लेकिन मैंने बोलना शुरू किया।
“श्री गुरु चरन सरोज रज…”
वो चीज पीछे हटने लगी।
दरवाजे के बाहर की आवाजें तेज हो गईं। मां, पापा, मेरे दोस्त—सब एक साथ मुझे पुकार रहे थे।
“आरव… दरवाजा खोल…”
“हम बचाने आए हैं…”
“माला फेंक दे…”
मैं और जोर से पढ़ने लगा।
अचानक सब शांत हो गया।
Light बंद हो गई।
कुछ सेकंड बाद जब light वापस आई, कमरा खाली था। Bed के नीचे कुछ नहीं था।
दरवाजा अपने आप खुल गया।
मैं भागकर बाहर निकला और सुबह तक मंदिर में बैठा रहा।
सुबह मां-पापा सच में लौटे। मैंने सब बताया। पापा ने कहा, “बुरे सपने जैसा होगा।”
लेकिन मां चुप थी। बहुत देर बाद उन्होंने कहा, “तूने कमरे में जो mirror ritual किया था, वो मजाक नहीं था।”
मैंने पूछा, “आपको कैसे पता?”
मां ने मेरी तरफ देखा। उनकी आंखों में डर था।
“क्योंकि बचपन में तेरे जुड़वा भाई ने भी यही किया था।”
मैं हैरान रह गया।
“मेरा जुड़वा भाई?”
मां की आंखों से आंसू निकल आए।
“तू पैदा हुआ था… दो बच्चों में। दूसरा बच्चा जन्म के कुछ घंटे बाद मर गया था। हमने कभी तुझे नहीं बताया।”
मेरे पैरों तले जमीन खिसक गई।
मैंने धीरे से पूछा, “उसका नाम क्या था?”
मां ने कहा—
“आरव।”
मैंने कांपते हुए कहा, “लेकिन मेरा नाम भी आरव है।”
मां बोली, “नहीं बेटा… तेरा असली नाम आदित्य था। तू बचपन में बहुत बीमार रहता था, इसलिए पंडित जी ने कहा था मरे हुए बच्चे का नाम तुझे दे दो।”
कमरा घूमने लगा।
उस रात bed के नीचे जो था…
वो कोई अजनबी ghost नहीं था।
वो मेरा नाम लेने आया था।
और शायद मेरी जिंदगी भी।
उसके बाद हमने वो कमरा बंद कर दिया। Bed बेच दिया गया। Mirror तोड़कर नदी में बहा दिया गया।
सब ठीक लगने लगा।
लेकिन कल रात, कई साल बाद, मैं अपने नए घर में सो रहा था।
मेरी पत्नी मेरे बगल में थी।
रात के 2:13 बजे मेरी आंख खुली।
नीचे से वही आवाज आई—
“खर्र… खर्र…”
मैंने सांस रोक ली।
फिर bed के नीचे से एक बच्चे की आवाज आई—
“भैया… अब तो मेरी बारी है ना?”
और मेरी पत्नी नींद में मुस्कुराते हुए बोली—
“दरवाजा मत खोलना, आरव…”
लेकिन मैंने उसे कभी अपना पुराना नाम नहीं बताया था।
https://en.wikipedia.org/wiki/Ghost
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