मुर्दे की बारात | 2 Ghost Wedding Story

शुरुआत: रात, बारिश और एक अजीब Procession

Ghost Wedding Story

Ghost Wedding Story गाँव चंदनपुर में उस रात बारिश ऐसी हो रही थी जैसे आसमान किसी पुराने पाप का मातम मना रहा हो। कच्ची सड़कों पर कीचड़ था, पेड़ों की डालियाँ हवा में कराह रही थीं और बिजली बार-बार चमककर पूरे गाँव को एक पल के लिए सफेद कफन जैसा बना देती थी।

राघव शहर से कई साल बाद अपने गाँव लौटा था। वजह थी उसके पिता की मौत। अंतिम संस्कार दोपहर में हो चुका था, मगर घर में मातम के साथ एक अजीब-सी घबराहट भी पसरी थी।

रात के करीब बारह बजे, जब पूरा गाँव सो जाना चाहिए था, तभी बाहर से ढोल की धीमी आवाज आई।

“धम… धम… धम…”

राघव चौंककर उठा।

उसकी माँ ने उसका हाथ पकड़ लिया। चेहरा पीला पड़ चुका था।

“बाहर मत जाना,” माँ फुसफुसाई।

“क्यों? इतनी रात को बारात कौन निकाल रहा है?”

माँ की आँखें भर आईं।

“बारात नहीं… मुर्दे की वरात है।”

Haunted Village का पुराना राज

राघव को लगा माँ सदमे में अजीब बातें कर रही है। वह खिड़की की तरफ बढ़ा, मगर माँ ने लगभग चीखते हुए कहा, “मत देख!”

पर इंसान जिस चीज़ से डरता है, वही देखने की सबसे ज़्यादा इच्छा होती है।

राघव ने खिड़की का कोना थोड़ा-सा खोला।

बाहर धुंध में सफेद कपड़े पहने लोग चल रहे थे। उनके हाथों में मशालें थीं, लेकिन बारिश के बावजूद मशालें बुझ नहीं रही थीं। बीच में एक सजा हुआ घोड़ा था, जिस पर कोई दूल्हा बैठा था।

दूल्हे का चेहरा सेहरे से ढका था।

ढोल बज रहे थे, मगर ढोल बजाने वालों के हाथ हिल नहीं रहे थे।

सबसे भयानक बात यह थी कि पूरी वरात बिना आवाज़ के चल रही थी। सिर्फ ढोल सुनाई दे रहे थे।

तभी घोड़े पर बैठे दूल्हे ने धीरे से सिर घुमाया।

सीधा राघव की खिड़की की ओर।

राघव का दिल रुक गया।

सेहरे के पीछे से दो काली आँखें उसे घूर रही थीं।

Dead Groom की नज़र

माँ ने खिड़की बंद कर दी।

“तूने देख लिया?” माँ काँपते हुए बोली।

राघव कुछ बोल नहीं पाया।

“जिसे मुर्दे की वरात देख लेती है,” माँ ने कहा, “तीन रातों के भीतर उसे बुलावा आता है।”

“ये सब अंधविश्वास है,” राघव ने खुद को संभालते हुए कहा।

माँ ने धीमे से जवाब दिया, “तेरे पिता ने भी यही कहा था।”

कमरे में सन्नाटा छा गया।

राघव के पिता की मौत अचानक हुई थी। डॉक्टर ने हार्ट अटैक बताया था, मगर मरने से एक दिन पहले उन्होंने भी आधी रात में वही ढोल सुने थे।

राघव ने बात टाल दी, लेकिन उसके मन में डर का बीज पड़ चुका था।

पहला संकेत: लाल निमंत्रण

सुबह बारिश रुक चुकी थी। राघव ने सोचा रात की बात भूल जाएगा। लेकिन जब उसने दरवाज़ा खोला, दहलीज़ पर लाल रंग का एक पुराना लिफाफा पड़ा था।

उस पर काले अक्षरों में लिखा था:

“आज रात, दूसरी पहर। वरात में शामिल होना अनिवार्य है।”

नीचे नाम लिखा था—

राघव।

उसके हाथ काँप गए।

माँ ने लिफाफा देखा तो बेहोश होते-होते बची।

“अब देर हो गई,” माँ बोली, “तुझे वह पसंद कर चुका है।”

“कौन?”

माँ ने बहुत देर बाद कहा, “विक्रम।”

विक्रम कौन था?

गाँव के बूढ़े पुजारी हरिदास ने राघव को वह कहानी बताई जिसे घरों में धीरे बोला जाता था।

तीस साल पहले चंदनपुर में विक्रम नाम का युवक था। उसकी शादी उसी रात थी, मगर बारात निकलने से पहले उसे जिंदा दफना दिया गया।

“जिंदा?” राघव ने पूछा।

पुजारी ने सिर झुका लिया।

“उसने ठाकुर रणवीर सिंह की बेटी से प्रेम किया था। लड़की की शादी कहीं और तय थी। विक्रम ने विरोध किया। उसी रात उसे मारने की कोशिश हुई। लोग समझे मर गया, पर असल में वह सांस ले रहा था। फिर भी उसे श्मशान के पास पुराने कुएँ में फेंक दिया गया।”

“और उसकी दुल्हन?”

पुजारी की आवाज़ भारी हो गई।

“वह उसी रात गायब हो गई। कहा जाता है, विक्रम आज भी अपनी अधूरी शादी पूरी करने के लिए वरात निकालता है।”

“लेकिन मुझे क्यों?”

पुजारी ने राघव को ऐसे देखा जैसे वह जवाब जानता हो।

“क्योंकि तेरे पिता उस रात वहाँ मौजूद थे।”

Mystery गहराता गया

राघव घर लौट रहा था, तभी उसे लगा कोई पीछे चल रहा है। उसने मुड़कर देखा—सड़क खाली थी। लेकिन कीचड़ में उसके पैरों के साथ एक और जोड़ी पैरों के निशान बन रहे थे।

नंगे पैर।

ठंडे।

राघव तेज चलने लगा। निशान भी तेज हो गए।

घर पहुँचते ही उसने दरवाज़ा बंद किया। अंदर आते ही उसे दीवार पर कोयले से लिखा दिखाई दिया:

“दूल्हा आ चुका है। दुल्हन कहाँ है?”

राघव की माँ ने वह लिखा देखा और रो पड़ी।

“अब सच बताओ,” राघव गरजा, “पिताजी ने क्या किया था?”

माँ ने काँपती आवाज़ में कहा, “तेरे पिता ने विक्रम को नहीं मारा था… लेकिन उन्होंने उसे बचाया भी नहीं।”

दूसरी रात: Mirror में चेहरा

उस रात राघव ने तय किया कि वह सोएगा नहीं। कमरे में बल्ब जलाकर बैठा रहा। बाहर श्मशान की दिशा से हवा आ रही थी।

करीब दो बजे कमरे का बल्ब टिमटिमाया।

आईने पर धुंध जमने लगी।

राघव ने देखा, आईने में उसका चेहरा नहीं था।

वहाँ सेहरा पहने एक दूल्हा खड़ा था।

उसके होंठ सिले हुए थे, मगर आवाज़ कमरे में गूँजी—

“मेरी दुल्हन लौटा दो…”

राघव पीछे हट गया।

आईने में दूल्हे ने हाथ उठाया। उसकी उंगलियाँ सड़ी हुई थीं। फिर आईने पर खून से एक नाम उभरा—

“गौरी”

राघव जम गया।

गौरी उसकी माँ का नाम था।

सबसे बड़ा Shock

सुबह राघव ने माँ से पूछा, “क्या आप विक्रम को जानती थीं?”

माँ का चेहरा पत्थर हो गया।

लंबी चुप्पी के बाद वह बोली, “हाँ।”

“क्या आप वही दुल्हन थीं?”

माँ रो पड़ी।

सच सामने आने लगा।

गौरी और विक्रम प्रेम करते थे। शादी की रात दोनों भागकर मंदिर में विवाह करने वाले थे। लेकिन गाँव वालों ने विक्रम को पकड़ लिया। गौरी को घर में बंद कर दिया गया। बाद में उसकी शादी राघव के पिता से कर दी गई।

“मैंने सोचा विक्रम मर चुका है,” माँ बोली, “पर उसकी आत्मा कभी नहीं मरी।”

राघव के पैरों तले जमीन खिसक गई।

यानी मुर्दे की वरात दुल्हन माँग रही थी।

और अब वह राघव को बुला रही थी।

तीसरी रात: अंतिम बुलावा

तीसरी रात दरवाज़े पर फिर वही ढोल गूँजे।

“धम… धम… धम…”

इस बार दरवाज़ा खुद-ब-खुद खुल गया।

बाहर पूरी वरात खड़ी थी।

सफेद चेहरे। खाली आँखें। बिना सांस के लोग।

घोड़े पर विक्रम बैठा था।

उसने सेहरा हटाया।

चेहरा आधा सड़ा हुआ था, मगर आँखों में दर्द था, नफरत नहीं।

“गौरी…” उसकी आवाज़ मिट्टी के नीचे से आती लगी।

माँ धीरे-धीरे बाहर आई।

“विक्रम,” उसने रोते हुए कहा, “मैं दोषी हूँ।”

विक्रम ने सिर हिलाया।

“नहीं। दोष उनका था जिन्होंने प्रेम को पाप कहा।”

तभी वरात के पीछे से कई चेहरे आगे आए। राघव ने पहचान लिया—गाँव के वही बूढ़े, जिनके नाम पिता ने मरने से पहले बड़बड़ाए थे।

वे सब असल में मर चुके थे।

विक्रम की वरात हर साल उन्हें लेने आती थी, जिन्होंने उसकी मौत में हिस्सा लिया था।

अब आखिरी गवाह बची थी—गौरी।

Ending Twist: असली मुर्दा कौन?

राघव माँ के सामने खड़ा हो गया।

“मेरी माँ को नहीं ले जाओगे।”

विक्रम ने राघव को देखा।

“मैं उसे लेने नहीं आया।”

“तो?”

विक्रम ने हाथ उठाया।

जमीन काँपी।

आँगन की मिट्टी फटने लगी। वहाँ से एक पुराना लकड़ी का संदूक निकला। राघव ने उसे खोला।

अंदर एक दुल्हन का लाल जोड़ा था… और एक कंकाल।

माँ चीख पड़ी।

“ये कौन है?” राघव ने पूछा।

विक्रम की आवाज़ आई—

“मेरी दुल्हन।”

माँ पीछे हट गई।

“नहीं… यह झूठ है…”

विक्रम ने कहा, “गौरी उस रात मरी नहीं थी। उसे भी जिंदा दफनाया गया था। जो तेरे साथ रही… वह गौरी नहीं।”

राघव ने माँ की ओर देखा।

उसका चेहरा बदलने लगा। आँखें काली हो गईं। त्वचा पर दरारें पड़ने लगीं।

“माँ…?” राघव की आवाज़ टूट गई।

वह औरत हँस पड़ी।

“मैं गौरी की छोटी बहन थी। मैंने ही सब बताया था ठाकुरों को। मुझे तेरे पिता चाहिए थे। गौरी और विक्रम रास्ते से हट गए।”

राघव स्तब्ध रह गया।

जिसे वह माँ समझता रहा, वह उसकी असली माँ नहीं थी।

विक्रम घोड़े से उतरा। दुल्हन के कंकाल के पास बैठ गया।

वरात ने पहली बार आवाज़ की।

रोने की आवाज़।

विक्रम ने कंकाल को लाल जोड़े में ढका और बोला, “अब शादी पूरी होगी।”

तभी वह नकली गौरी भागने लगी, लेकिन मृत वरात ने उसे घेर लिया।

ढोल तेज हो गए।

“धम! धम! धम!”

उसकी चीखें बारिश में डूब गईं।

सुबह जब गाँव वाले आए, आँगन खाली था।

सिर्फ मिट्टी पर लाल अक्षरों में लिखा था—

“वरात पूरी हुई।”

राघव ने संदूक में पड़े एक पुराने कागज को उठाया। वह गौरी की डायरी थी।

आखिरी पंक्ति थी:

“अगर कभी मेरा बेटा यह पढ़े, तो जान ले—मैंने उसे जन्म नहीं दिया, मगर उसे बचाने के लिए मर गई।”

राघव की आँखों से आँसू बह निकले।

दूर श्मशान की तरफ से धीमी शहनाई सुनाई दी।

इस बार वह डरावनी नहीं थी।

जैसे दो अधूरी आत्माएँ आखिरकार मुक्त हो गई हों।

लेकिन उसी रात गाँव की सीमा पर एक नया लाल लिफाफा मिला।

उस पर लिखा था—

“अगली वरात उस घर जाएगी… जहाँ सच अभी भी दफन है।”

Ghost Folklore

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