Highway Horror Story रात के ठीक 2 बजकर 17 मिनट हो रहे थे।

मैं अपनी कार लेकर दिल्ली से अपने गाँव लौट रहा था। बाहर हल्की बारिश हो रही थी और पूरा हाईवे सुनसान पड़ा था। दूर-दूर तक कोई गाड़ी नहीं… सिर्फ मेरी कार की हेडलाइट्स और जंगलों के बीच से गुजरती काली सड़क।
माँ की तबीयत अचानक खराब हो गई थी, इसलिए मुझे रात में ही निकलना पड़ा। Google Maps ने एक “Old Highway Route” दिखाया जो करीब 40 किलोमीटर छोटा था।
मैंने बिना ज्यादा सोचे वही रास्ता चुन लिया।
शुरुआत में सब ठीक था। मोबाइल में गाने चल रहे थे, लेकिन कुछ देर बाद अचानक नेटवर्क गायब हो गया। गाना बंद हो गया। स्क्रीन फ्रीज हो गई।
अब कार के अंदर सिर्फ वाइपर की आवाज़ गूंज रही थी।
“चक… चक… चक…”
अचानक मेरी नजर सड़क किनारे बैठी एक आकृति पर पड़ी।
एक औरत।
सफेद कपड़ों में।
वो सड़क के किनारे बैठी थी… और रो रही थी।
मेरे हाथ अपने आप ब्रेक पर चले गए। कार धीरे से उसके पास जाकर रुक गई।
उसका चेहरा नीचे झुका हुआ था। लंबे काले बाल उसके चेहरे को ढक रहे थे। बारिश हो रही थी, लेकिन अजीब बात ये थी कि उसके कपड़े बिल्कुल सूखे थे।
मेरे अंदर डर और दया दोनों एक साथ पैदा हो गए।
मैंने हॉर्न बजाया।
वो नहीं हिली।
मैंने खिड़की थोड़ी नीचे की और पूछा—
“मैडम… आप ठीक हैं?”
उसकी रोने की आवाज़ और तेज हो गई।
धीरे-धीरे उसने अपना हाथ उठाया और सड़क के आगे की तरफ इशारा किया।
“वो… गिर गए हैं…”
Highway Horror Story
उसकी आवाज़ इतनी धीमी थी जैसे कोई मेरे कान के पास फुसफुसा रहा हो।
“कौन गिर गया?” मैंने पूछा।
“मेरे पति…”
मुझे लगा शायद आगे कोई Accident हुआ होगा।
मैं कार से उतरा। जैसे ही मैं उसके करीब पहुँचा, मेरे पूरे शरीर में ठंडक दौड़ गई।
उसके आसपास की हवा बाकी जगहों से कहीं ज्यादा ठंडी थी।
मैंने डरते हुए पूछा—
“आपको मदद चाहिए?”
उसने धीरे से सिर हिलाया।
फिर पहली बार उसने अपना चेहरा थोड़ा ऊपर उठाया।
मैं उसका चेहरा पूरी तरह नहीं देख पाया… लेकिन उसकी आँखें…
वो पूरी तरह काली थीं।
मेरा दिल जोर-जोर से धड़कने लगा।
मैं तुरंत पीछे हट गया।
तभी उसने कहा—
“एक बात याद रखना…”
“क्या?”
“पीछे मत देखना।”
मेरे पैरों तले जमीन खिसक गई।
मैंने बिना कुछ बोले कार स्टार्ट की और आगे बढ़ गया।
कुछ ही दूरी पर एक पुराना पुल दिखाई दिया। पुल के किनारे सच में एक टूटी हुई बाइक पड़ी थी। उसके पास एक आदमी घायल हालत में पड़ा था।
मैं तुरंत कार से उतरा और उसके पास भागा।
उसके सिर से खून बह रहा था लेकिन वो जिंदा था।
मैंने मोबाइल निकाला… नेटवर्क अब भी गायब था।
“भाई सुन रहे हो?” मैंने उसे हिलाते हुए पूछा।
उसने धीरे-धीरे आँखें खोलीं।
जैसे ही उसकी नजर मुझ पर पड़ी, उसका चेहरा डर से सफेद पड़ गया।
“त… तुम उसे छोड़कर आए हो?”
“किसे?”
“सफेद कपड़ों वाली औरत को…”
मेरे हाथ काँपने लगे।
“वो आपकी पत्नी नहीं है?”
उस आदमी की साँसें तेज हो गईं।
उसने काँपती आवाज़ में कहा—
“मेरी पत्नी की मौत तीन साल पहले इसी पुल पर हुई थी…”
मेरे पैरों से जैसे जान निकल गई।
“फिर… वो कौन थी?”
उसने मेरा हाथ कसकर पकड़ लिया।
“उसने तुमसे क्या कहा?”
मैंने डरते हुए जवाब दिया—
“उसने कहा… पीछे मत देखना…”
ये सुनते ही उसकी आँखें फैल गईं।
“भागो!”
“क्या?”
“भागो यहाँ से! अभी!”
तभी अचानक मेरी कार का हॉर्न बजने लगा।
एक बार।
फिर दो बार।
फिर लगातार…
मैंने धीरे-धीरे पलटकर अपनी कार की तरफ देखा।
ड्राइवर सीट पर कोई बैठा था।
वही औरत।
उसका चेहरा अब भी झुका हुआ था।
लेकिन इस बार वो रो नहीं रही थी।
वो हँस रही थी।
मेरे शरीर में जैसे करंट दौड़ गया।
मैं पीछे हटने लगा।
तभी उस घायल आदमी ने चीखते हुए कहा—
“उसकी तरफ मत देखो!”
लेकिन तब तक देर हो चुकी थी।
धीरे-धीरे उस औरत ने अपना चेहरा ऊपर उठाया।
और जो मैंने देखा…
वो इंसानी चेहरा नहीं था।
उसकी आँखों की जगह सिर्फ काला अंधेरा था। उसका मुँह कानों तक फटा हुआ था और उसमें छोटे-छोटे नुकीले दाँत भरे थे।
वो मुस्कुरा रही थी।
फिर अचानक…
वो गायब हो गई।
कार का हॉर्न बंद हो गया।
पूरा हाईवे फिर से शांत हो गया।
सिर्फ बारिश की आवाज़ बची थी।
मैंने तुरंत घायल आदमी को कार में डाला और वहाँ से निकल गया।
करीब 20 मिनट बाद हमें एक ढाबा दिखाई दिया। वहाँ पहुँचकर मैंने लोगों से मदद माँगी।
ढाबे के मालिक ने उस आदमी को देखते ही पहचान लिया।
“अरे ये फिर वहाँ चला गया?”
मैंने हैरानी से पूछा—
“मतलब?”
ढाबे वाला धीरे से बोला—
“ये आदमी हर साल उसी रात उस पुल पर जाता है…”
“क्यों?”
“क्योंकि तीन साल पहले उसकी पत्नी ने वहीं आत्महत्या की थी।”
मेरी रीढ़ में सिहरन दौड़ गई।
“लेकिन मैंने तो अभी उसकी पत्नी को देखा…”
ढाबे वाले का चेहरा गंभीर हो गया।
“तुम पहले इंसान नहीं हो जिसने उसे देखा है।”
“क्या मतलब?”
ढाबे वाले ने धीरे-धीरे कहा—
“उस हाईवे पर जो भी अकेला सफर करता है… उसे वो औरत दिखाई देती है।”
“और फिर?”
“कुछ लोग बचकर लौट आते हैं…”
“और बाकी?”
ढाबे वाला चुप हो गया।
उसकी खामोशी ही जवाब थी।
मैंने उस रात वहीं रुकने का फैसला किया।
लेकिन असली डर अभी बाकी था।
रात के करीब 4 बजे मेरी आँख अचानक खुली।
ढाबे के बाहर कोई रो रहा था।
धीरे-धीरे…
सिसक-सिसक कर।
मेरा दिल बैठ गया।
मैंने खिड़की से बाहर झाँका।
वही सफेद कपड़ों वाली औरत सड़क किनारे खड़ी थी।
इस बार वो सीधे मेरी तरफ देख रही थी।
और मुस्कुरा रही थी।
तभी मेरे मोबाइल पर अचानक नेटवर्क वापस आया।
एक Notification आई।
Unknown Number से Message था—
“तुमने पीछे क्यों देखा?”
मेरे हाथ काँपने लगे।
मैंने तुरंत नंबर कॉल किया।
फोन ढाबे के बाहर से बजने लगा।
मैंने धीरे-धीरे खिड़की से बाहर देखा।
वो औरत अपने हाथ में फोन पकड़े खड़ी थी।
और फिर…
उसने धीरे-धीरे अपना सिर 180 डिग्री घुमा दिया।
उसकी मुस्कान और बड़ी हो गई।
फोन पर सिर्फ एक आवाज़ आई—
“अब तुम्हारी बारी है…”
अगली सुबह ढाबे वालों को मेरी कार हाईवे के किनारे मिली।
दरवाजा खुला हुआ था।
मोबाइल सीट पर पड़ा था।
लेकिन मैं…
कभी नहीं मिला।
और आज भी…
जो लोग उस Old Highway Route से रात 2 बजे गुजरते हैं…
उन्हें सड़क किनारे एक आदमी दिखाई देता है…
जो बैठकर रो रहा होता है।
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