Scary Hindi Horror Story | Dadi Maa Ki Horror Kahani Sach Nikli

BY GOVIND BHISE

सर्दियों में गाँव की रातों का अपना अलग ही माहौल होता है। शहर में रहने वालों के लिए शायद उसे समझना थोड़ा मुश्किल हो। वहाँ रात सिर्फ अंधेरी नहीं होती, बल्कि धीरे-धीरे पूरे माहौल पर छा जाती है। उस रात भी कुछ ऐसा ही था।

घर के बाहर इतना घना कोहरा था कि आँगन में खड़ा पुराना नीम का पेड़ भी ठीक से दिखाई नहीं दे रहा था। उसकी धुंधली आकृति दूर से किसी खामोश इंसान जैसी लग रही थी। हवा भी लगभग बंद थी। सिर्फ कभी-कभार टीन की छत से आती हल्की-सी आवाज़ सुनाई दे जाती थी। Scary Hindi Horror Story

Scary Hindi Horror Story

मैं उन दिनों छुट्टियों में अपनी दादी के पास आया हुआ था। बचपन का काफी समय इसी घर में बीता था, लेकिन पढ़ाई और नौकरी की भागदौड़ में अब गाँव आना बहुत कम हो गया था।

दादी हमेशा की तरह चूल्हे के पास बैठी थीं। अंगारों की लाल रोशनी उनके चेहरे पर पड़ रही थी। उम्र बढ़ गई थी, लेकिन उनकी आदतें बिल्कुल नहीं बदली थीं।

बचपन से मैं उनसे भूत-प्रेत, चुड़ैल, प्रेतात्मा और जाने कितनी कहानियाँ सुनता आया था। फर्क सिर्फ इतना था कि पहले मैं डर जाता था, और अब उन बातों पर हँस देता था।

उस रात भी मैंने मज़ाक में कहा, “दादी, आप लोगों के ज़माने में हर दूसरे पेड़ पर भूत रहता था क्या?”

मैंने सोचा था कि वह भी हँस देंगी, लेकिन उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया।

कुछ पल तक वे चूल्हे की बुझती आग को देखती रहीं। फिर बहुत धीमी आवाज़ में बोलीं, “कुछ बातें कहानी लगती हैं, लेकिन होती कहानी नहीं हैं।”

मैंने उनकी तरफ देखा।

उनके चेहरे पर मज़ाक जैसा कुछ नहीं था।

“मतलब?”

उन्होंने गहरी साँस ली।

“मतलब यह कि हर कहानी लोगों का मनोरंजन करने के लिए नहीं सुनाई जाती। कुछ कहानियाँ इसलिए बची रहती हैं ताकि लोग वही गलती दोबारा न करें।”

पता नहीं क्यों, लेकिन उनकी बात सुनकर कमरे का माहौल अचानक बदल गया। कुछ देर पहले जो बातें मुझे मज़ाक लग रही थीं, वही अब अजीब लगने लगीं।

मैंने बात बदलने के लिए पूछा, “अच्छा, आज कौन-सी कहानी सुनाने वाली हो?”

दादी ने खिड़की के बाहर देखा।

घर के पीछे की तरफ।

उसी दिशा में जहाँ गाँव का पुराना सूखा कुआँ था।

कुछ सेकंड तक वे चुप रहीं।

फिर बोलीं, “तू उस कुएँ के बारे में जानता है?”

मैंने सिर हिलाया।

“बस इतना कि अब वहाँ कोई जाता नहीं।”

दादी ने मेरी तरफ देखा।

“लोग यूँ ही नहीं जाते। वजह है उसके पीछे।”

उनकी आवाज़ सुनकर पहली बार मेरे मन में सचमुच उत्सुकता पैदा हुई।

मैं थोड़ा और पास खिसक आया।

“कौन-सी वजह?”

दादी कुछ पल तक चुप रहीं।

फिर बोलीं—

“क्योंकि वहाँ कोई आज भी इंतज़ार कर रहा है।”

मैं हँसने वाला था, लेकिन दादी के चेहरे का भाव देखकर रुक गया।

वे मज़ाक नहीं कर रही थीं।

कमरे में कुछ देर तक सिर्फ चूल्हे में सुलगती लकड़ियों की आवाज़ सुनाई देती रही। बाहर कोहरा और घना हो चुका था। खिड़की के शीशे पर नमी जमने लगी थी।

“कौन इंतज़ार कर रहा है?” मैंने पूछा।

दादी ने तुरंत जवाब नहीं दिया।

उन्होंने पास रखे पीतल के गिलास से पानी पिया और फिर धीरे से बोलीं, “बहुत पुरानी बात है। तब मैं भी छोटी थी।”

मैं चुपचाप सुनता रहा।

“गाँव में एक लड़की रहती थी। नाम था मीरा।”

उन्होंने नाम लेते ही एक पल के लिए आँखें बंद कर लीं, जैसे कोई पुरानी तस्वीर याद आ गई हो।

“वह बाकी लड़कियों से अलग थी। कम बोलती थी, लेकिन पूरे गाँव में सब उसे जानते थे। किसी से लड़ाई नहीं, किसी से शिकायत नहीं। जहाँ जाती, लोग कहते कि घर में रौनक आ गई।”

मैंने पूछा, “फिर उसके साथ क्या हुआ?”

दादी ने सीधे मेरी तरफ देखा।

“यही तो कोई ठीक से नहीं जानता।”

बात अजीब थी।

अभी तक कहानी किसी आम गाँव की घटना जैसी लग रही थी, लेकिन दादी की आवाज़ में कुछ ऐसा था जिससे लग रहा था कि आगे कुछ ठीक नहीं होने वाला।

उन्होंने बताना शुरू किया।

मीरा की शादी तय हो चुकी थी। घर में तैयारियाँ चल रही थीं। रिश्तेदार आने लगे थे। पूरा माहौल उत्सव जैसा था।

लेकिन शादी से एक दिन पहले वह अचानक गायब हो गई।

सुबह तक किसी को कुछ पता नहीं चला।

लोगों ने सोचा शायद किसी रिश्तेदार के घर गई होगी।

दोपहर हुई।

फिर शाम।

फिर रात।

लेकिन वह वापस नहीं आई।

अगले दिन पूरा गाँव उसे ढूँढ़ने निकल पड़ा।

खेतों में तलाश हुई।

जंगल में तलाश हुई।

पास के तालाब तक देखा गया।

लेकिन उसका कोई निशान नहीं मिला।

“पुलिस?” मैंने बीच में पूछा।

दादी हल्का-सा मुस्कुराईं।

“उस समय हर बात पर पुलिस नहीं बुलाई जाती थी बेटा। पहले गाँव वाले खुद खोजते थे।”

बात सही थी।

उन्होंने आगे कहना शुरू किया।

तीन दिन बीत गए।

फिर एक रात गाँव के दो आदमी घर लौट रहे थे। जब वे उस पुराने कुएँ के पास से गुज़रे, तो उन्हें लगा जैसे किसी ने उनका नाम लेकर पुकारा हो।

पहले तो उन्होंने ध्यान नहीं दिया।

लेकिन कुछ कदम आगे बढ़ने के बाद फिर वही आवाज़ आई।

इस बार साफ़।

एक लड़की की आवाज़।

बहुत धीमी।

बहुत थकी हुई।

जैसे कोई लंबे समय से रो रहा हो।

दोनों डर गए।

उन्होंने पीछे मुड़कर देखा।

आसपास कोई नहीं था।

सिर्फ कुआँ।

और उसके ऊपर झुकी हुई धुंध।

उनमें से एक आदमी हिम्मत करके कुएँ के पास गया।

उसने अंदर झाँका।

नीचे सिर्फ अंधेरा था।

इतना गहरा अंधेरा कि टॉर्च होती तब भी शायद कुछ दिखाई न देता।

तभी नीचे से आवाज़ आई।

“मुझे बाहर निकालो…”

दादी यह कहते हुए रुक गईं।

मैंने महसूस किया कि उनकी उँगलियाँ गिलास पर कस गई थीं।

“फिर?”

“फिर वे दोनों भाग गए।”

“बस?”

“हाँ।”

“उन्होंने किसी को बताया नहीं?”

“बताया था।”

“किसने विश्वास किया?”

मैं कुछ नहीं बोला।

सच कहूँ तो मैं भी शायद विश्वास नहीं करता।

दादी ने कहा, “अगली सुबह पूरा गाँव कुएँ के पास गया। लोगों ने रस्सी डाली। नीचे पत्थर फेंके। कई लोगों ने अंदर झाँककर देखा। लेकिन वहाँ कुछ नहीं मिला।”

“तो फिर आवाज़?”

“यही सवाल सब पूछ रहे थे।”

मैंने देखा, दादी अब खिड़की की तरफ नहीं देख रही थीं।

वे सीधे आग की तरफ देख रही थीं।

जैसे उन्हें पता हो कि कहानी का सबसे डरावना हिस्सा अभी बाकी है।

“उस रात के बाद,” उन्होंने धीमे से कहा, “गाँव में एक नियम बना दिया गया।”

“कैसा नियम?”

“सूरज डूबने के बाद कोई उस कुएँ के पास नहीं जाएगा।”

मैं फिर हँस पड़ा।

“एक आवाज़ सुनकर पूरे गाँव ने नियम बना दिया?”

दादी ने मेरी तरफ देखा।

इस बार उनके चेहरे पर मुस्कान नहीं थी।

“नियम आवाज़ की वजह से नहीं बना था।”

“तो फिर?”

उन्होंने जवाब देने से पहले लंबी साँस ली।

“क्योंकि जिन दो लोगों ने सबसे पहले वह आवाज़ सुनी थी… वे दोनों एक महीने के अंदर मर गए थे।”

कमरे में अचानक सन्नाटा छा गया।

बाहर कहीं दूर कोई कुत्ता भौंका।

फिर सब शांत हो गया।

“कैसे मरे?” मैंने पूछा।

“किसी को नहीं पता।”

“बीमारी?”

“नहीं।”

“दुर्घटना?”

“नहीं।”

“तो?”

दादी कुछ सेकंड तक चुप रहीं।

फिर बोलीं—

“मरने से पहले दोनों एक ही बात बार-बार कहते थे…”

मेरे शरीर में अनजानी बेचैनी दौड़ गई।

“क्या?”

दादी की आवाज़ फुसफुसाहट में बदल गई।

“वह अभी भी कुएँ में है।”

दादी के कमरे की बत्ती बुझ चुकी थी, लेकिन मेरी आँखों से नींद गायब थी।

मैं बिस्तर पर लेटा छत को देख रहा था। जितना कोशिश करता कि दूसरी बातों के बारे में सोचूँ, उतनी ही बार दिमाग उसी कुएँ पर जाकर अटक जाता। आखिर ऐसा क्या था उस जगह में कि इतने साल बाद भी गाँव के लोग उसका नाम लेते हुए असहज हो जाते थे?

कई बार लगा कि करवट बदलकर सो जाऊँ, लेकिन उत्सुकता लगातार सिर उठाती रही।

आखिरकार मैं उठ बैठा।

जैकेट पहनी, मोबाइल जेब में रखा और धीरे से बाहर निकल आया।

घर के बाहर कदम रखते ही ठंडी हवा चेहरे से टकराई। दूर-दूर तक फैले कोहरे ने पूरे गाँव को किसी धुंधली तस्वीर जैसा बना दिया था। जिन रास्तों पर दिनभर लोगों की आवाजाही रहती थी, वहाँ अब सन्नाटा पसरा हुआ था।

चलते-चलते मैं उस कच्चे रास्ते पर पहुँच गया जो घरों के पीछे से होते हुए पुराने कुएँ तक जाता था।

दिन में यह रास्ता बिल्कुल साधारण लगता था। बच्चे यहीं खेलते थे, लोग खेतों की तरफ इसी रास्ते से जाते थे। लेकिन रात में वही जगह अजनबी महसूस हो रही थी।

कुछ मिनट बाद कुआँ दिखाई दिया।

वह पहले से भी ज्यादा पुराना लग रहा था।

पत्थरों पर जमी काई, किनारों पर उगी जंगली घास और समय की मार से टूटे हिस्से उसे किसी भूली हुई चीज़ जैसा बना रहे थे। उसे देखकर डर कम और उदासी ज्यादा महसूस हो रही थी।

मैं उसके करीब पहुँचा और मोबाइल की फ्लैशलाइट जला ली।

रोशनी कुएँ की गोल दीवार पर घूमी।

कुछ खास नजर नहीं आया।

न कोई परछाईं।

न कोई रहस्यमयी आकृति।

बस एक छोड़ी हुई जगह, जिसे लोगों ने डर की कहानियों से घेर रखा था।

मेरे चेहरे पर हल्की मुस्कान आ गई।

शायद दादी की कहानी भी उन्हीं किस्सों में से एक थी जो समय के साथ बड़े होते चले गए।

मैं वापस मुड़ने ही वाला था कि अचानक ध्यान एक अजीब बात पर गया।

गाँव में रात के समय कहीं न कहीं कोई न कोई आवाज़ सुनाई देती ही रहती है। कभी कुत्ते भौंकते हैं, कभी किसी घर का दरवाज़ा हिलता है, कभी खेतों की तरफ से झींगुरों की आवाज़ आती रहती है।

लेकिन वहाँ…

कुछ भी नहीं था।

इतनी गहरी खामोशी मैंने पहले कभी महसूस नहीं की थी।

ऐसा लग रहा था जैसे आसपास की सारी आवाज़ें किसी ने खींचकर निकाल ली हों।

अनजाने में मेरी चाल धीमी हो गई।

मैंने एक बार फिर चारों तरफ नजर दौड़ाई।

कोहरा लगातार सरक रहा था। कभी किसी झाड़ी का आकार बनाता, कभी किसी इंसान जैसा भ्रम पैदा करता और अगले ही पल बिखर जाता।

उसी दौरान मेरे कानों में बहुत हल्की-सी धातु जैसी खनक पड़ी।

मैं ठिठक गया।

आवाज़ इतनी क्षणिक थी कि यकीन नहीं हुआ कि सचमुच कुछ सुना भी है या नहीं।

मैंने ध्यान लगाकर सुनने की कोशिश की।

कुछ पल बीत गए।

फिर वही खनक दोबारा सुनाई दी।

इस बार थोड़ी साफ।

जैसे किसी के पैरों में बंधी छोटी-सी धातु हिल रही हो।

मेरे दिमाग में तुरंत दादी की कहानी कौंध गई।

मैंने खुद को समझाया कि यह संयोग भी हो सकता है।

लेकिन दिल अब पहले जितना शांत नहीं था।

मैंने जेब से फोन निकाला।

उसी समय स्क्रीन हल्की-सी चमकी और फिर मंद पड़ गई।

मुझे लगा शायद बैटरी कम होगी।

लेकिन अगले ही पल पूरा फोन बंद हो गया।

मैंने पावर बटन दबाया।

कोई प्रतिक्रिया नहीं।

फिर दबाया।

फिर भी नहीं।

अब मेरे हाथ में एक बेकार पड़ा काला स्क्रीन वाला फोन था और सामने घना कोहरा।

पहली बार मन में वापस लौटने का विचार आया।

और शायद मैं लौट भी जाता…

अगर उसी क्षण कुएँ की गहराई से वह आवाज़ न सुनाई देती।

इस बार वह किसी धातु की खनक नहीं थी।

वह किसी इंसान की आवाज़ थी।

बहुत धीमी।

इतनी धीमी कि शब्द समझ नहीं आए।

लेकिन उसमें दर्द था।

ऐसा दर्द जिसे सुनकर शरीर के भीतर कहीं ठंड उतर जाए।

मैं अनायास कुएँ की तरफ देखने लगा।

दिल की धड़कन तेज हो चुकी थी।

कुछ सेकंड बाद वही आवाज़ दोबारा सुनाई दी।

इस बार थोड़ी स्पष्ट।

जैसे कोई बहुत दूर बैठा हुआ मदद माँगने की कोशिश कर रहा हो।

और तभी मुझे एहसास हुआ कि वह आवाज़ बाहर से नहीं…

कुएँ के अंदर से आ रही थी।

मेरे पैरों ने जैसे ज़मीन पकड़ ली।

मैं चाहकर भी वहाँ से हट नहीं पा रहा था।

दिमाग बार-बार कह रहा था कि तुरंत वापस घर लौट जाओ, लेकिन उत्सुकता अभी भी डर से थोड़ी बड़ी थी। शायद इसी वजह से लोग मुसीबत में फँसते हैं। उन्हें लगता है कि बस एक बार और देख लेते हैं, बस एक बार और समझने की कोशिश कर लेते हैं।

मैं धीरे-धीरे कुएँ के किनारे तक पहुँचा।

पत्थर ठंडे थे। उन पर जमी नमी हाथ लगाते ही महसूस हो रही थी।

मैंने सावधानी से नीचे झाँका।

कोहरा ऊपर ही ऊपर तैर रहा था, लेकिन कुएँ के अंदर गहरा अंधकार जमा था। ऐसा लग रहा था जैसे नीचे रोशनी पहुँचने से पहले ही कहीं खो जाती हो।

कुछ क्षण तक कुछ सुनाई नहीं दिया।

मुझे लगा शायद मैंने जो सुना था वह भ्रम था।

लेकिन तभी वही आवाज़ फिर उभरी।

इस बार शब्द साफ थे।

“…कोई है…?”

मेरे गले में जैसे कुछ अटक गया।

आवाज़ किसी बूढ़ी औरत की नहीं थी।

किसी बच्चे की भी नहीं।

वह एक जवान लड़की की आवाज़ लग रही थी।

कमज़ोर।

थकी हुई।

और अजीब तरह से उदास।

मैंने होंठ भींच लिए।

दादी की चेतावनी याद थी।

जवाब मत देना।

किसी भी हालत में नहीं।

कुछ सेकंड बीते।

फिर कुएँ के भीतर से हल्की-सी सिसकी सुनाई दी।

उसके बाद सन्नाटा।

इतना लंबा कि मुझे लगा शायद सब खत्म हो गया।

मैंने राहत की साँस ली और पीछे हटने लगा।

उसी समय मेरे दाएँ कंधे के पास से ठंडी हवा का झोंका गुज़रा।

इतना करीब से कि मेरी गर्दन के बाल खड़े हो गए।

मैं झटके से पलटा।

पीछे कोई नहीं था।

लेकिन अब माहौल बदल चुका था।

कुछ देर पहले तक जो जगह सुनसान लग रही थी, अब वही जगह बेचैन करने लगी थी।

ऐसा महसूस हो रहा था जैसे अंधेरे में कई निगाहें मेरी हर हरकत देख रही हों।

मैंने खुद को शांत रखने की कोशिश की।

“बस बहुत हुआ,” मैंने मन ही मन कहा।

“अब घर चल।”

मैंने कदम बढ़ाया ही था कि कुएँ के अंदर से अचानक एक और आवाज़ आई।

इस बार रोने की नहीं।

हँसी की।

बहुत धीमी।

लेकिन साफ।

ऐसी हँसी जिसमें खुशी नहीं थी।

जैसे कोई बहुत पुरानी बात याद करके मुस्कुरा रहा हो।

मेरे कदम वहीं रुक गए।

उस हँसी के बाद फिर खामोशी छा गई।

फिर एक वाक्य सुनाई दिया—

“तू देर से आया…”

मेरी साँस अटक गई।

मैंने कोई जवाब नहीं दिया।

देना भी नहीं चाहता था।

लेकिन अब एक और सवाल सिर उठाने लगा था।

अगर यह सब मेरे दिमाग का भ्रम था, तो वह आवाज़ हर बार ठीक उसी समय क्यों सुनाई दे रही थी जब मैं जाने की कोशिश करता?

मैं तेजी से पीछे हटने लगा।

कुएँ से दूरी बढ़ने लगी।

दस कदम।

पंद्रह कदम।

बीस कदम।

और तभी…

मेरे पीछे से किसी के चलने की आहट आने लगी।

धीमी।

नपी-तुली।

जैसे कोई उसी रफ्तार से चल रहा हो जिस रफ्तार से मैं चल रहा था।

मैंने कदम रोक दिए।

आहट भी रुक गई।

मेरे सीने में धड़कनें और तेज हो गईं।

मैंने फिर चलना शुरू किया।

कुछ पल बाद वही आहट दोबारा सुनाई दी।

अब मुझे पूरा यकीन हो गया कि यह भ्रम नहीं था।

कोई था।

या कुछ था।

जो मेरे पीछे चल रहा था।

लेकिन हिम्मत करके पीछे देखने की इच्छा भी नहीं हो रही थी।

कई बार इंसान को पहले से पता होता है कि वह जो देखने वाला है, उसे देखने के बाद सब कुछ बदल जाएगा।

और उस रात मुझे पहली बार ऐसा ही महसूस हुआ।

मैंने चाल तेज कर दी।

आहट भी तेज हो गई।

अब दोनों के बीच की दूरी कम होती हुई महसूस हो रही थी।

मेरे हाथ ठंडे पड़ चुके थे।

साँसें बेकाबू हो रही थीं।

और तभी…

मेरे बिल्कुल पीछे से किसी लड़की की धीमी आवाज़ आई—

“उसे सच बता देना…”

मैं वहीं जम गया।

क्योंकि वह आवाज़ मेरे कान के इतना करीब थी कि ऐसा लगा जैसे कोई मेरे कंधे के पास खड़ा होकर बोल रहा हो।

मेरे शरीर ने जैसे खुद फैसला कर लिया।

मैं पलटा भी नहीं।

सीधे दौड़ पड़ा।

उस समय मुझे यह जानने में बिल्कुल दिलचस्पी नहीं थी कि मेरे पीछे कौन था, क्या था या सचमुच कुछ था भी या नहीं। मैं सिर्फ घर पहुँचना चाहता था।

ठंडी हवा चेहरे से टकरा रही थी। कच्चे रास्ते पर कई बार पैर फिसलते-फिसलते बचे। पीछे देखने की हिम्मत नहीं हुई।

कुछ मिनट बाद जब घर की दीवारें दिखाई दीं, तब जाकर लगा कि शायद मैं सुरक्षित हूँ।

मुख्य दरवाज़े तक पहुँचते-पहुँचते साँस फूल चुकी थी।

मैंने दरवाज़ा खोला और अंदर घुस गया।

घर वैसा ही शांत था जैसा छोड़कर गया था।

लेकिन एक चीज़ अलग थी।

दादी जाग रही थीं।

बैठक के कमरे में मिट्टी के दीये की हल्की रोशनी जल रही थी और दादी उसी के पास बैठी थीं।

ऐसा लग रहा था जैसे उन्हें पहले से पता हो कि मैं कहाँ गया था।

उन्होंने मेरी तरफ देखा।

फिर बिना कुछ पूछे बोलीं,

“उसने तुझसे क्या कहा?”

मेरे पैरों तले ज़मीन खिसक गई।

मैंने झूठ बोलने की कोशिश की।

“कौन?”

दादी ने गहरी साँस ली।

“मुझसे झूठ मत बोल।”

कमरे में कुछ सेकंड तक कोई नहीं बोला।

आखिर मैंने धीरे से कहा,

“उसने कहा… उसे सच बता देना।”

दादी का चेहरा एकदम बदल गया।

उनकी आँखें नीचे झुक गईं।

ऐसा लगा जैसे वे यही सुनने से डर रही थीं।

मैं उनके सामने बैठ गया।

“दादी, आखिर बात क्या है?”

उन्होंने जवाब नहीं दिया।

“मीरा कौन थी?”

चुप्पी।

“और गाँव वाले उस कुएँ से इतना डरते क्यों हैं?”

दादी ने दोनों हाथों से अपना चेहरा ढक लिया।

पहली बार मुझे महसूस हुआ कि यह सिर्फ किसी भूत की कहानी नहीं थी।

इसके पीछे कोई ऐसा सच था जिससे वे पचास साल बाद भी भाग रही थीं।

कुछ देर बाद उन्होंने धीरे-धीरे बोलना शुरू किया।

“मीरा मेरी बहन थी।”

मैं स्तब्ध रह गया।

इतनी देर तक कहानी सुनने के बाद भी मैंने इसकी उम्मीद नहीं की थी।

“सगी बहन?”

उन्होंने सिर हिलाया।

“हम दोनों में चार साल का फर्क था।”

उनकी आवाज़ बदल चुकी थी।

अब वह किसी कहानी सुनाने वाली बुज़ुर्ग महिला की आवाज़ नहीं थी।

वह किसी ऐसे इंसान की आवाज़ थी जो अपनी ज़िंदगी का सबसे भारी बोझ उतारने वाला हो।

“लोग कहते हैं कि वह गायब हो गई थी। लेकिन गाँव में कुछ लोगों को सच्चाई पता थी।”

मैं चुप रहा।

“मीरा शादी नहीं करना चाहती थी।”

दादी खिड़की की तरफ देखने लगीं।

“उस समय लड़कियों की मर्ज़ी पूछने का रिवाज नहीं था। घर वाले जहाँ कह दें, वहीं शादी हो जाती थी।”

मैंने धीरे से पूछा,

“क्या वह किसी और को पसंद करती थी?”

दादी ने सिर हिलाया।

“हाँ।”

कमरे में फिर सन्नाटा छा गया।

बाहर कहीं दूर से किसी उल्लू की आवाज़ सुनाई दी।

“फिर क्या हुआ?”

दादी ने कुछ क्षण आँखें बंद रखीं।

फिर बोलीं,

“शादी से एक रात पहले उसने घर छोड़ने का फैसला किया था।”

“भागने के लिए?”

“हाँ।”

“क्या वह भाग गई?”

दादी ने मेरी तरफ देखा।

उनकी आँखों में आँसू थे।

“नहीं।”

मेरे भीतर बेचैनी बढ़ने लगी।

“तो?”

दादी के होंठ काँपे।

“वह घर से निकली जरूर थी… लेकिन अपने मंज़िल तक कभी नहीं पहुँची।”

मैं अब पूरी तरह उनकी बातों में डूब चुका था।

उन्होंने आगे कहा,

“उस रात गाँव के कुछ लोगों ने उसे रास्ते में देख लिया था।”

“कौन लोग?”

“जिनके लिए इज़्ज़त इंसान की जान से बड़ी थी।”

उनके इस जवाब ने मेरी रीढ़ में ठंडक दौड़ा दी।

दादी कुछ देर चुप रहीं।

फिर बोलीं,

“अगली सुबह जब सब लोग मीरा को खोज रहे थे, तब मैं जानती थी कि कुछ बहुत बुरा हो चुका है।”

“आपने किसी को बताया नहीं?”

यह सवाल मेरे मुँह से अपने आप निकल गया।

दादी ने नज़रें झुका लीं।

“मैं सिर्फ बारह साल की थी।”

उनकी आवाज़ भर्रा गई।

“मैंने उस रात कुछ देखा था।”

मेरा दिल तेज़ी से धड़कने लगा।

“क्या देखा था?”

दादी ने जवाब देने से पहले लंबी साँस ली।

“मैंने चार लोगों को कुएँ की तरफ जाते देखा था।”

कमरे की हवा जैसे भारी हो गई।

“उनके साथ मीरा भी थी।”

“जिंदा?”

दादी ने सिर हिलाया।

“हाँ।”

“और फिर?”

उनकी आँखों से आँसू बह निकले।

“और फिर वह कभी वापस नहीं आई।”

मैं कुछ क्षण तक कुछ बोल ही नहीं पाया।

अब पहली बार मुझे समझ आने लगा था कि यह कहानी गाँव में क्यों बची रही।

यह सिर्फ डर की कहानी नहीं थी।

यह अपराध की कहानी थी।

एक ऐसा अपराध जिसे सबने समय के नीचे दबा दिया था।

लेकिन शायद…

वह पूरी तरह दबा नहीं था।

क्योंकि उसी समय घर के बाहर से बहुत हल्की-सी खनक सुनाई दी।

जैसे किसी के पैरों में बंधी पायल हिली हो।

दादी का चेहरा फक पड़ गया।

उन्होंने दरवाज़े की तरफ देखा।

फिर मेरी तरफ।

और बेहद धीमी आवाज़ में बोलीं—

“इतने साल बाद भी वह इंतज़ार कर रही है…”

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