1. वह पुराना घर
Village Horror Story बरसों बाद जब आरव अपने गाँव “खिरई” लौटा, तो बारिश ऐसे गिर रही थी जैसे आसमान किसी पुराने पाप को धो देना चाहता हो।

बस स्टैंड से हवेली तक जाने वाली पगडंडी कीचड़ से भरी थी। हवा में मिट्टी की खुशबू नहीं, बल्कि किसी पुराने, सीलन भरे कमरे जैसी बदबू थी।
गाँव वैसा ही था—छोटे घर, बंद दरवाज़े, और हर खिड़की के पीछे से झाँकती डरी हुई आँखें।
लेकिन एक चीज़ बदल गई थी।
लोग आरव को देखकर खुश नहीं हुए।
वे उसे देखकर चुप हो गए।
जैसे वह कोई आदमी नहीं, बल्कि कोई warning हो।
आरव की नानी की मौत हो चुकी थी। उसी की तेरहवीं के लिए वह शहर से गाँव आया था। नानी ने अपने अंतिम दिनों में कई बार उसे फोन किया था, लेकिन हर बार बस एक ही बात कहती थीं—
“आरव… घर के पिछवाड़े वाले कुएँ के पास मत जाना… और रांजण को कभी मत खोलना।”
आरव हर बार हँस देता था।
“नानी, आप भी न… कौन-सा रांजण?”
पर नानी जवाब नहीं देती थीं।
सिर्फ रोती थीं।
2. रांजण का नाम
हवेली में कदम रखते ही आरव को अजीब-सी ठंड महसूस हुई।
बरसात बाहर थी, लेकिन ठंड भीतर थी।
दीवारों पर पुराने फोटो टंगे थे। उनमें से एक फोटो पर उसकी नज़र अटक गई।
फोटो में नानी जवान थीं। उनके साथ एक औरत खड़ी थी, चेहरा आधा घूँघट में। उसके पैरों के पास मिट्टी का एक बड़ा घड़ा रखा था।
घड़ा नहीं।
रांजण।
आरव ने फोटो को ध्यान से देखा। उस रांजण पर लाल रंग से कुछ लिखा था, लेकिन धुंधला हो चुका था।
तभी पीछे से आवाज़ आई—
“उसे मत देख।”
आरव पलटा।
दरवाज़े पर काका खड़े थे—नानी के छोटे भाई। चेहरे पर झुर्रियाँ, आँखों में डर।
“काका, ये रांजण क्या है?”
काका का चेहरा पीला पड़ गया।
“जिसका नाम नहीं लेते, उसका सवाल भी नहीं करते।”
“क्यों?”
काका धीरे से बोले—
“क्योंकि कुछ चीज़ें buried नहीं होतीं… बस इंतज़ार करती हैं।”
3. पिछवाड़े का कुआँ
रात के खाने पर अजीब सन्नाटा था।
काका, काकी, और घर के नौकर बुधिया—तीनों आरव से नज़रें चुरा रहे थे।
आधी रात के करीब बिजली चली गई।
हवेली अंधेरे में डूब गई।
आरव अपने कमरे में लेटा था, तभी उसे खिड़की के बाहर से किसी औरत के गाने की आवाज़ सुनाई दी।
धीमी।
टूटी हुई।
जैसे कोई लोरी हो।
“सो जा रे… माटी के लाल…
रांजण जागे आधी रात…”
आरव उठकर खिड़की तक गया।
बारिश रुक चुकी थी।
चाँदनी में पिछवाड़े का कुआँ साफ दिख रहा था।
कुएँ के पास कोई खड़ा था।
एक औरत।
सफेद साड़ी।
झुका हुआ सिर।
और उसके सामने मिट्टी का वही बड़ा रांजण।
आरव का दिल तेज़ धड़कने लगा।
उसने मोबाइल की flashlight ऑन की।
जैसे ही रोशनी वहाँ पड़ी—
औरत गायब।
रांजण गायब।
बस कुआँ।
और कुएँ की जगत पर ताज़ा गीली मिट्टी के निशान।
4. बंद कमरा
सुबह आरव ने काका से सब बताया।
काका ने उसे जोर से डाँटा।
“कहा था न! पिछवाड़े मत जाना!”
“काका, वहाँ कोई था।”
“वहाँ कोई नहीं है।”
“तो फिर गाना कौन गा रहा था?”
काका चुप हो गए।
काकी ने धीरे से कहा—
“आज तेरी नानी की तेरहवीं है। जो करना है, आज कर ले। कल सुबह शहर लौट जा।”
लेकिन आरव अब लौटने वाला नहीं था।
उसने हवेली की तलाशी लेनी शुरू की।
ऊपरी मंज़िल पर एक कमरा बंद था। दरवाज़े पर पुराना ताला। ताले पर सिंदूर लगा था।
दरवाज़े के ऊपर काले कोयले से लिखा था—
“रांजणघर”
आरव ने ताला तोड़ दिया।
कमरे से भयानक बदबू आई।
जैसे मिट्टी, खून और सड़ी हुई धूपबत्ती एक साथ रखी हो।
अंदर दीवारों पर अजीब symbols बने थे।
बीच में एक लकड़ी की चौकी थी।
और चौकी पर रखी थी नानी की पुरानी डायरी।
डायरी के पहले पन्ने पर लिखा था—
“जो यह पढ़ रहा है, वह जान ले…
रांजण खाली नहीं है।”
5. डायरी का सच
आरव ने काँपते हाथों से डायरी खोली।
नानी ने लिखा था—
“हमारे गाँव में पहले हर घर में रांजण होता था। उसमें अनाज रखा जाता था, पानी रखा जाता था, कभी-कभी सिक्के भी। लेकिन हमारे घर का रांजण अलग था। उसमें रखा गया था एक राज़।”
आरव आगे पढ़ता गया।
“साल 1978 में गाँव में अकाल पड़ा। खेत सूख गए। कुएँ खाली हो गए। बच्चे भूख से रोते थे। तभी गाँव में एक तांत्रिक आया। उसने कहा—धरती को बलि चाहिए। अगर बलि दी गई, तो बारिश आएगी।”
आरव की साँस अटक गई।
“गाँव वालों ने पहले मना किया। फिर भूख ने इंसानियत खा ली। एक रात पंचायत बैठी। तय हुआ कि बलि किसी बाहरी की दी जाएगी। लेकिन उस रात हवेली में एक गर्भवती औरत आई थी—राधा।”
राधा।
वही फोटो वाली औरत?
आरव ने पन्ना पलटा।
“राधा शरण माँग रही थी। उसका पति मर चुका था। वह मेरे कमरे में छिपी थी। मैंने उसे बचाने की कोशिश की। लेकिन बाबा ने उसे पकड़ लिया।”
आगे शब्द आँसुओं से धुंधले थे।
“राधा को कुएँ के पास ले जाया गया। तांत्रिक ने कहा—बच्चे समेत बलि होगी। तभी बारिश आएगी।”
आरव ने डायरी बंद कर दी।
उसका सिर घूम रहा था।
उसी समय कमरे के कोने से मिट्टी खिसकने की आवाज़ आई।
खर्र… खर्र…
जैसे कोई अंदर से नाखून चला रहा हो।
6. मिट्टी के भीतर से आवाज़
आरव धीरे-धीरे कोने की तरफ बढ़ा।
फर्श पर काली मिट्टी का गोल निशान था।
उसने हाथ लगाया।
मिट्टी गीली थी।
जबकि कमरा बरसों से बंद था।
तभी उसे आवाज़ सुनाई दी—
“खोल दे…”
आरव पीछे हट गया।
आवाज़ बहुत धीमी थी।
औरत की।
“मुझे बाहर निकाल दे…”
आरव भागकर कमरे से बाहर आया।
सीढ़ियों पर काका खड़े थे।
उनकी आँखें लाल थीं।
“तूने डायरी पढ़ ली?”
आरव ने कहा—
“राधा कौन थी?”
काका ने आँखें बंद कर लीं।
“तेरी नानी की सहेली।”
“उसे मारा गया था?”
काका ने कोई जवाब नहीं दिया।
“और रांजण में क्या है?”
काका ने डरते हुए कहा—
“राधा की चीख।”
7. गाँव का डर
आरव ने गाँव के बुजुर्गों से बात करने की कोशिश की।
लेकिन कोई भी राधा का नाम सुनते ही दरवाज़ा बंद कर देता।
आखिरकार उसे मंदिर के बूढ़े पुजारी मिले।
वे बहुत देर तक चुप रहे, फिर बोले—
“रांजण में सिर्फ शरीर नहीं दबाया गया था, बेटा। उसमें सच दबाया गया था।”
“कौन-सा सच?”
पुजारी ने काँपती आवाज़ में कहा—
“बलि के बाद बारिश आई थी। लेकिन उसी रात गाँव के हर घर में बच्चे रोने लगे। जिन औरतों ने उस बलि को देखा था, वे बाँझ हो गईं। जिन मर्दों ने हाथ लगाया था, वे एक-एक करके कुएँ में कूद गए।”
“फिर रांजण?”
“राधा को कुएँ में नहीं फेंका गया। तांत्रिक ने कहा था—आत्मा भटकेगी। इसलिए उसके अवशेष और अजन्मे बच्चे की नाल उस रांजण में बंद कर दी गई। उसे हवेली के पिछवाड़े दबाया गया।”
आरव के मुँह से निकला—
“और अब?”
पुजारी ने उसकी आँखों में देखा।
“अब तेरी नानी मर गई। आखिरी रखवाली खत्म। रांजण फिर जाग गया।”
8. पहली मौत
उस रात हवेली में फिर वही लोरी गूँजी।
“सो जा रे… माटी के लाल…”
आरव नीचे भागा।
काका का कमरा खाली था।
दरवाज़ा खुला।
बाहर मिट्टी के पैरों के निशान थे।
वे सीधे पिछवाड़े के कुएँ तक जा रहे थे।
आरव ने flashlight जलाई।
कुएँ की जगत पर काका खड़े थे।
उनकी पीठ आरव की तरफ थी।
“काका!”
काका ने धीरे से गर्दन घुमाई।
उनके चेहरे पर आँसू थे।
“वह बुला रही है।”
“कौन?”
काका मुस्कुराए।
“जिसे हमने मारा था।”
और अगले ही पल—
काका कुएँ में कूद गए।
आरव चीखता हुआ दौड़ा।
कुएँ में झाँका।
अंदर पानी नहीं था।
सिर्फ अंधेरा था।
और अंधेरे से बच्चे के रोने की आवाज़ आ रही थी।
9. रांजण बाहर आया
काका की मौत के बाद हवेली श्मशान जैसी हो गई।
काकी पागलों की तरह रो रही थीं।
बुधिया बार-बार कह रहा था—
“अब सब मरेंगे… सब मरेंगे…”
आरव ने पुलिस बुलानी चाही, लेकिन गाँव में नेटवर्क गायब था।
रात गहरी हुई।
बारिश फिर शुरू हुई।
अचानक पिछवाड़े से ज़मीन फटने की आवाज़ आई।
धड़ाम!
जैसे कोई भारी चीज़ मिट्टी से बाहर आई हो।
आरव दौड़कर गया।
कुएँ के पास गड्ढा था।
गड्ढे के बीच वही रांजण रखा था।
काला।
गीला।
उस पर लाल रंग से लिखा था—
“राधा”
रांजण के मुँह पर कपड़ा बँधा था। कपड़े पर सूखा हुआ सिंदूर, राख और बाल चिपके थे।
काकी ने पीछे से चीखकर कहा—
“मत खोलना!”
लेकिन रांजण के अंदर से आवाज़ आई—
“आरव…”
वह जम गया।
आवाज़ नानी की थी।
“बेटा… मुझे बचा ले…”
आरव काँपते हुए रांजण के पास बैठ गया।
“नानी?”
अंदर से रोने की आवाज़ आई।
“मैं यहाँ हूँ… बहुत अंधेरा है…”
आरव ने कपड़े को छुआ।
तभी बुधिया ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“ये तेरी नानी नहीं है! ये वही है!”
आरव ने हाथ पीछे खींच लिया।
रांजण हिलने लगा।
धीरे-धीरे।
फिर जोर से।
जैसे अंदर कोई बंद चीज़ बाहर आने के लिए तड़प रही हो।
10. असली रहस्य
आरव ने रातभर डायरी पढ़ी।
अंतिम पन्नों में नानी ने कुछ ऐसा लिखा था जिसने सब बदल दिया।
“राधा की बलि नहीं हुई थी।”
आरव की आँखें फैल गईं।
“गाँव वालों ने जिसे मारा, वह राधा नहीं थी। वह मैं थी… मेरा डर, मेरी कायरता। मैंने राधा को बचाने के लिए उसे अपनी जगह छिपाया था। लेकिन बाबा ने अँधेरे में गलत औरत पकड़ ली।”
आरव का गला सूख गया।
“जिस औरत को बलि दी गई, वह राधा नहीं थी। वह तांत्रिक की बेटी थी, जो राधा के कपड़ों में भाग रही थी।”
आगे लिखा था—
“राधा बच गई थी। लेकिन जब उसने जाना कि उसके कारण एक निर्दोष औरत मारी गई, उसने खुद को कुएँ में फेंक दिया। उसका बच्चा वहीं जन्मा… मृत। हमने दोनों को रांजण में बंद कर दिया।”
आरव ने डायरी गिरा दी।
तो रांजण में राधा की आत्मा थी।
लेकिन बदला किससे?
गाँव वालों से?
या नानी के परिवार से?
तभी डायरी का आखिरी पन्ना अपने आप पलटा।
उस पर नए शब्द उभर रहे थे।
गीली मिट्टी जैसे अक्षर बन रहे थे।
“मैं राधा नहीं हूँ।”
आरव के शरीर में बिजली दौड़ गई।
फिर दूसरा वाक्य उभरा—
“मैं वह बच्चा हूँ… जिसे किसी ने नाम भी नहीं दिया।”
11. अजन्मा
हवेली में अचानक बच्चे के रोने की आवाज़ गूँज उठी।
लेकिन वह सामान्य रोना नहीं था।
वह रोना एक साथ कई दिशाओं से आ रहा था।
दीवारों से।
छत से।
कुएँ से।
रांजण से।
काकी ने आरव का हाथ पकड़ा।
“अब समझा? राधा बदला नहीं ले रही। उसका बच्चा माँ ढूँढ रहा है।”
“माँ?”
“हाँ। हर तेरहवीं पर वह घर की सबसे बूढ़ी औरत को ले जाता था। ताकि कोई उसे गोद में ले। तेरी नानी बचाती रहीं। लेकिन अब…”
अचानक काकी की आवाज़ बंद हो गई।
उनकी आँखें सफेद हो गईं।
वे बच्चे जैसी आवाज़ में बोलीं—
“माँ कहाँ है?”
आरव पीछे हट गया।
काकी मुस्कुराईं।
“तू शहर से आया है न? तू खून का है। तू दरवाज़ा खोल सकता है।”
“कौन-सा दरवाज़ा?”
काकी ने रांजण की तरफ उंगली उठाई।
“मुँह खोल दे… मैं जन्म लेना चाहता हूँ।”
12. अंतिम रात
आरव ने तय किया कि वह रांजण नहीं खोलेगा।
लेकिन सुबह तक रुकना भी असंभव था।
हवेली के सारे दरवाज़े खुद बंद हो चुके थे।
दीवारों से मिट्टी झर रही थी।
नानी की तस्वीरों की आँखों से काला पानी बह रहा था।
और हर कमरे में वही लोरी—
“सो जा रे… माटी के लाल…”
आरव ने रांजण को तोड़ने के लिए लोहे की रॉड उठाई।
जैसे ही उसने वार किया—
रांजण से नानी की आवाज़ आई—
“बेटा, मत तोड़! इसमें सिर्फ वह नहीं… हम सब हैं।”
आरव रुक गया।
“हम सब?”
आवाज़ बोली—
“हर वह आत्मा जिसने सच छुपाया। हर वह औरत जिसने चुप्पी ओढ़ी। हर वह आदमी जिसने पाप किया। यह रांजण कब्र नहीं… गवाह है।”
आरव की आँखों में आँसू आ गए।
“तो मैं क्या करूँ?”
नानी की आवाज़ धीमी हो गई।
“सच बोल।”
“किससे?”
“गाँव से।”
13. खुला हुआ सच
आरव ने सुबह होते ही मंदिर की घंटी बजाई।
पूरा गाँव जमा हो गया।
उसने सबके सामने डायरी पढ़ी।
कई बूढ़े रोने लगे।
कुछ भागने लगे।
लेकिन तभी ज़मीन काँपी।
कुएँ के पास दबा रांजण अपने आप उठकर मंदिर के सामने आ गया।
लोग चीख पड़े।
रांजण के मुँह की गाँठ अपने आप खुलने लगी।
कपड़ा गिरा।
अंदर से बदबू नहीं आई।
अंदर से बच्चे की हँसी आई।
फिर राख के बीच से एक छोटी-सी हड्डी बाहर गिरी।
और उसके साथ एक काली चूड़ी।
पुजारी काँपते हुए बोले—
“नाम दो इसे।”
आरव ने पूछा—
“किसका?”
“जिसे बिना नाम के मारा गया, वह कभी मुक्त नहीं होता।”
आरव ने चूड़ी उठाई।
उसने पहली बार उस अजन्मे बच्चे के लिए कहा—
“तेरा नाम… जीव होगा।”
हवा अचानक शांत हो गई।
बच्चे का रोना बंद।
बारिश रुक गई।
लोगों ने राहत की साँस ली।
लेकिन तभी रांजण के भीतर से एक और आवाज़ आई।
बहुत बूढ़ी।
बहुत गहरी।
“एक नाम से क्या होगा, आरव?”
सब जम गए।
आरव ने रांजण के भीतर झाँका।
अंदर अंधेरा नहीं था।
अंदर कई चेहरे थे।
और उनमें सबसे आगे एक चेहरा था—
नानी का।
वे मुस्कुरा रही थीं।
पर वह मुस्कान नानी की नहीं थी।
रांजण से आवाज़ आई—
“अब जब सच बाहर आ गया है… तो हम भी बाहर आएँगे।”
रांजण में दरार पड़ी।
फिर दूसरी।
फिर तीसरी।
और आरव को पहली बार समझ आया—
रहस्य रांजण में दबा नहीं था।
रांजण ने रहस्य को गाँव से बचाकर रखा था।
असल डर तो अब बाहर आने वाला था।
To be continued…
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