⚠️ इस कहानी को रात में अकेले पढ़ने की गलती मत करना…
कॉलेज का आज आखिरी पेपर देकर पवन, आनंद, पियूष और माधुरी कैंटीन में बैठकर आगे का प्लान कर रहे थे। हंसी-मजाक चल ही रहा था कि पवन ने सब से पूछा, “तुम लोगों का छुट्टियों का क्या प्लान है?”

माधुरी: “मेरे छोटे भाई को छुट्टियां लगेंगी तो हम गांव जाएंगे, लेकिन ये हफ्ता तो घर पर ही हूं।”
पवन और आनंद: “हाँ यार, घर पर बैठकर अब बोर ही होना है, कोई खास प्लान नहीं है।”
पियूष सबकी तरफ देखते हुए बोला,
“मेरे पास एक प्लान है…”, आओगे क्या? मैंने कल reels में अपने शहर के पास ‘लहरी बीच’ देखा। लोग कहते हैं वो haunted है, इसलिए रात को वहां कोई नहीं आता। हम आराम से नाइट पार्टी कर सकते हैं, चलोगे क्या?”
पवन डरते हुए: “पागल हो गया है क्या? उस भूतिया बीच पर… वो भी रात में!”
आनंद उसकी तरफ देखकर जोर से हंसता है: “फट्टू साला, अभी से ही डर गया!” फिर सब हंसने लगते हैं।
पियूष: “अरे आनंद, भूत-वूत कुछ नहीं होता। लोग बीच गंदा ना करें इसलिए ऐसी अफवाह फैलाई है। हम लोग कभी एडवेंचर करने बाहर गए ही नहीं, तो मजा आएगा। मैं कल पापा की गाड़ी ले आता हूं, सब चलते हैं और एंजॉय करते हैं।”
आनंद थोड़ा डरते हुए: “लेकिन कुछ होगा तो नहीं ना?”
पियूष: “अरे कुछ नहीं होगा, मैं हूं ना तुम्हारे साथ। तो तय रहा—कल शाम 6 बजे गार्डन के पास खड़े रहना, मैं वहीं से तुम्हें ले लूंगा।”
माधुरी: “हाँ पियूष, लेकिन रात को रुकने के लिए मम्मी-पापा परमिशन नहीं देंगे।”
पियूष: “नहीं दी तो कोई बहाना मार देना।”
आनंद: “वैसे भी बहाना मारने में ये सबसे आगे रहती है!”
सब जोर-जोर से हंसने लगते हैं।
दूसरे दिन शाम को लाल सा सूरज ढल रहा था, तभी आनंद, माधुरी और पवन अपने-अपने बैग कंधे पर टांगकर गार्डन के गेट के पास पियूष का इंतज़ार कर रहे थे।

तभी पियूष अपनी गाड़ी लेकर आया। तीनों ने दरवाज़ा खोला और अंदर बैठते ही गानों की आवाज़ तेज करके मस्ती शुरू कर दी। पीछे की सीट पर बैठे पवन और आनंद गाड़ी में ही नाचने लगे।

शहर से जैसे-जैसे वे दूर जाते गए, एक अजीब सी शांति उन्हें महसूस होने लगी। सड़क पर गाड़ियाँ कम होती गईं। कुछ दूरी के बाद तो सड़क लगभग खाली ही हो गई। गाड़ी में गाना चल रहा था, लेकिन बीच-बीच में कुछ सेकंड के लिए आवाज़ अजीब तरह से धीमी हो जाती… और फिर नॉर्मल हो जाती।
पवन खिड़की से बाहर देख रहा था… काफी दूरी तय करने के बाद उसे अचानक सड़क के किनारे कुछ पुराने, आधे मिटे हुए पैरों के निशान दिखाई दिए… जैसे कोई गीली रेत पर चला हो… लेकिन आसपास अभी समुद्र दिखाई नहीं दे रहा था।
“पियूष, यहाँ ये रेत कैसी है रे?”

“गाइस… अपने haunted बीच का एरिया शुरू हो गया लगता है…” पियूष ने हल्की आवाज़ में कहा।
आनंद तुरंत बोला, “अरे वाह मस्त… आज अगर भूत मिला ना, तो मैं उससे पूछूंगा—तू full time haunt करता है या part time?”
सब ज़ोर से हँस पड़े… लेकिन उस हँसी की आवाज़ गाड़ी में थोड़ी देर तक गूंजती हुई सी लगी।
पवन ने तुरंत बाहर देखते हुए कहा, “शटअप यार… कुछ जगहें मज़ाक करने के लिए नहीं होती।”
माधुरी ने सामने इशारा करते हुए कहा, “अरे सनसेट देखो… कितना शानदार लग रहा है!”
सामने फैले हुए समुद्र में सूरज धीरे-धीरे डूब रहा था। आसमान लाल और केसरिया रंगों से भर गया था।

कुछ पल के लिए सब चुप हो गए।
पियूष ने आसपास देखकर एक टूटी हुई लकड़ी की बेंच के पास गाड़ी पार्क की। इंजन बंद होते ही एकदम सन्नाटा छा गया… इतना कि कुछ पल के लिए समुद्र की आवाज़ भी सुनाई नहीं दी।

माधुरी “चलो, उतरते हैं…”
माधुरी नीचे उतरी और सीधे समुद्र की तरफ चलने लगी।

उसके पीछे पवन और आनंद भी गए। पियूष ने गाड़ी से बियर की बोतल निकाली और बोनट पर बैठकर आसपास देखते हुए व्यू एंजॉय करने लगा।

कुछ देर बाद वह भी उनके साथ लहरों में खेलने लगा। कुछ क्षण बाद उसने पीछे मुड़कर गाड़ी की तरफ देखा… एक पल के लिए उसे लगा कि गाड़ी थोड़ी अलग जगह पर है… और जो लकड़ी की बेंच उसने देखी थी, वो अब काफी दूर दिखाई दे रही थी। “बियर चढ़ने लगी क्या…” वह मन ही मन बुदबुदाया और फिर उनकी तरफ लौट आया।
अब चारों रेत पर चल रहे थे। उनके पैरों के निशान पीछे बनते जा रहे थे… (पियूष और माधुरी आगे, और आनंद-पवन पीछे) तभी कुछ दूरी पर जाकर आनंद अचानक रुक गया।

“ए… हम चार ही हैं ना?” उसने धीमे से पूछा।
“हाँ ना… क्यों?” पवन ने पूछा।
आनंद कुछ नहीं बोला… बस पीछे रेत में बने पैरों के निशानों को देखता रहा… एक पल के लिए उसे लगा कि वहाँ निशान थोड़े ज़्यादा हैं… लेकिन तभी अचानक आई एक बड़ी लहर ने आकर सब मिटा दिए। इससे आनंद थोड़ा घबरा गया।
आगे चल रहे माधुरी और पियूष को कुछ भी महसूस नहीं हुआ था। उन्होंने पीछे मुड़कर देखा—
“चल ना… क्या देख रहा है?” माधुरी ने आवाज़ दी। आनंद ने एक बार फिर पीछे देख, अब वहाँ कुछ भी नहीं था। वह हल्का सा मुस्कुराया, “कुछ नहीं…” कहकर आगे बढ़ गया। दूर कहीं समुद्र फिर से सामान्य आवाज़ करने लगा… लेकिन उस सन्नाटे का वो पल… जैसे अब भी चुपचाप उनके पीछे खड़ा था…
समुद्र से अब तेज ठंडी हवा चलने लगी थी। उसी में भीगने की वजह से माधुरी को ठंड लगने लगी। उसने पियूष की तरफ देखते हुए कहा, “चलो ना, गाड़ी के पास चलते हैं… मुझे कपड़े बदलने हैं।”

तो सब मुड़ गए और गाड़ी की तरफ चलने लगे। अचानक पीछे से न जाने कहाँ से एक पागल सा बूढ़ा उसकी उम्र साठ-पैंसठ के आसपास होगी, लेकिन उसका चेहरा अजीब तरह से झुर्रियों से भरा हुआ था—जैसे बहुत सालों से धूप और नमक ने उसे घिस दिया हो। उसकी आँखें गहरी धँसी हुई थीं… और उनमें एक अजीब सी बेचैनी थी, जैसे वो कुछ देख चुका हो… जो बाकी लोग नहीं देख सकते। उसके बाल उलझे हुए, सफेद और गीले से लग रहे थे… मानो अभी-अभी समुद्र से निकलकर आया हो। दाढ़ी बिखरी हुई थी और हवा के साथ हल्की-हल्की हिल रही थी।
उसने एक पुरानी, फटी हुई कमीज़ पहनी थी… जो जगह-जगह से गीली थी और उस पर रेत चिपकी हुई थी। उसके पैर नंगे थे… और टखनों तक गीली रेत लगी हुई थी। वो चलते वक्त सीधे नहीं चल रहा था… उसके कदम थोड़े घिसटते हुए आगे बढ़ रहे थे… और हर कदम के साथ रेत की हल्की “चुर्र…” सी आवाज आ रही थी। उनके सामने से गुजरते हुए बोलने लगा—

“निकल जाओ यहाँ से… निकल जाओ… उसके आने का वक्त हो गया है… चले जाओ यहाँ से… नहीं तो वो तुम्हें भी अपने साथ ले जाएगी…”
पियूष ने उसकी तरफ देखा और कुछ पूछने ही वाला था कि वो चलते-चलते उनके सामने से गायब सा हो गया।
“अरे ये कहाँ से आया था अचानक?” पवन बोला।
“छोड़ ना… कहाँ ध्यान देता है…” आनंद ने कहा।
ऐसा कहते हुए सब आगे बढ़ गए।
माधुरी बोली, “चलो, सब लोग साइड में जाओ… मुझे गीले कपड़े बदलने हैं।”
वो गाड़ी के अंदर चली गई। पियूष, पवन और आनंद गाड़ी से थोड़ा हटकर समुद्र की तरफ मुंह करके खड़े हो गए।

आनंद बोला, “यार पियूष, हम बेकार में यहाँ आ गए… लगता है आज समुद्र में तूफान आने वाला है… देख ना कितनी तेज लहरें टकरा रही हैं।”
पवन बोला, “हाँ, हम आने वाले थे इसलिए सुनामी भेज दी है।”
पियूष और पवन जोर-जोर से हँसने लगे।
आनंद बोला, “यार हर चीज को तुम लोग मजाक में लेते हो… जब सिर पर आएगी तब समझ आएगा।”
हवा और तेज होने लगी… और उसके साथ रेत भी उड़कर उनके शरीर से टकराने लगी।
तभी माधुरी अचानक दौड़ते हुए आई और पियूष का हाथ कसकर पकड़ लिया। वो कांपते हुए बोली,
“मैं जब कपड़े बदल रही थी… तब यार… गाड़ी के बाहर से कोई मुझे देख रहा था… बिल्कुल पास से…”

पियूष धीरे से बोला, “हमें तो कोई नहीं दिखा… अरे वो वही बूढ़ा होगा… साला ठरकी बूढ़ा…”
ये कहते हुए तीनों पियूष के पीछे-पीछे गाड़ी की तरफ दौड़े।
गाड़ी के पास सिर्फ रेत में गीले पैरों के निशान दिखाई दे रहे थे… जो धीरे-धीरे गाड़ी के चारों तरफ घूम रहे थे… उन गहरे धंसे हुए पैरों के निशानों को देखकर सब एक पल के लिए वहीं जम गए।

अचानक उनके पीछे रेत में हल्की सी आवाज हुई—चुर्र… चुर्र… जैसे कोई गीली रेत पर पैर घसीटते हुए चल रहा हो। जैसे ही आवाज करीब आई, सबने पीछे मुड़कर देखा… लेकिन वहाँ कोई नहीं था… सिर्फ रेत में गीले पैरों के निशान बनते हुए दिखाई दे रहे थे… वहाँ पैर दिखाई नहीं दे रहे थे… लेकिन निशान आगे बढ़ रहे थे।
माधुरी की साँसें तेज हो गईं, “वो… वो हमारी तरफ आ रहा है…”
एक ही पल में माहौल बदल गया… हवा तेज हो गई… समुद्र की आवाज बदल गई…
लहरें पीछे जाने लगीं… जैसे समुद्र खुद सांस ले रहा हो… तभी एक बहुत बड़ी लहर जोर से किनारे पर आकर टकराई। सबके ऊपर पानी उछल गया… अचानक बदले हुए माहौल और उन आवाजों से सब बुरी तरह घबरा गए। उन्हें जैसे ही एक क्रूर हँसी की आवाज महसूस हुई, सब गाड़ी की तरफ भागे और जल्दी-जल्दी अंदर बैठने लगे।

लेकिन दरवाज़ा बंद करते समय माधुरी का हाथ दरवाज़े में फँस गया… वो जोर से चिल्लाई… लेकिन किसी का ध्यान उसकी तरफ नहीं गया।
पियूष ने बिना उसकी तरफ देखे तेजी से गाड़ी स्टार्ट की और जोर से मोड़ते हुए बीच से बाहर निकलने की कोशिश करने लगा। माधुरी की उंगली पूरी तरह दरवाज़े में फँसी हुई थी… और उससे खून टपककर नीचे रेत पर गिर रहा और उस अंधेरे में… उसके खून की हर बूंद को एक जीभ आकर चाट रही थी… पियूष ने किसी तरह गाड़ी उस बीच से निकालकर सड़क पर ला दी।

कुछ देर तक सबको लगा कि गाड़ी सीधी जा रही है… लेकिन धीरे-धीरे पियूष को एहसास होने लगा कि रास्ता बदल ही नहीं रहा।
वही टेढ़ा पेड़ फिर सामने आ गया…
कुछ सेकंड बाद फिर वही पत्थर… वही टूटी हुई पट्टी… वही मोड़।
पियूष ने स्टीयरिंग कसकर पकड़ लिया।
“हम… यहाँ से पहले भी गुज़रे हैं ना?” उसका आवाज़ दबा हुआ था।
आनंद ने डरते हुए जवाब दिया,
“हाँ… अभी पाँच मिनट पहले…”
पवन धीरे से बोला,
“हम सीधा जा रहे हैं… लेकिन ये जगह हमें छोड़ ही नहीं रही…”
गाड़ी की रफ्तार बढ़ती जा रही थी… लेकिन बाहर का नज़ारा बिल्कुल नहीं बदल रहा था।
जैसे वो किसी गोल चक्कर में फँस गए हों… रास्ता खत्म ही नहीं हो रहा था… बस घूमता जा रहा था।

पियूष झुंझलाकर बोला,
“ये हो ही नहीं सकता… GPS भी कुछ नहीं दिखा रहा!”
मोबाइल की स्क्रीन पर सिर्फ एक खाली लाइन थी… नेटवर्क गायब।
तभी काँच पर फिर से धुंध जमने लगी…
आनंद ने हाथ फेरकर उसे साफ किया… और अचानक रुक गया।
“ये देख…” उसने काँच की तरफ इशारा किया।
धुंध में धीरे-धीरे उँगलियों के निशान बन रहे थे…
अंदर से नहीं… बाहर से।
एक…
दो…
तीन…

पियूष ने खिड़की से बाहर देखा—
उनकी तेज़ रफ्तार गाड़ी के साथ-साथ… कोई… बिल्कुल ठंडे कदमों से उनके साथ चल रहा था…
और काँच पर हाथ फेर रहा था।
पवन ने पियूष की तरफ देखा—वो बाहर ही घूर रहा था।
वो थोड़ा आगे झुककर धीमे से बोला,
“पियूष… सामने देख… उधर मत देख… पियूष सामने देख…”
लेकिन उसका ध्यान बगल में बैठी माधुरी पर नहीं गया… वो कब से खिड़की के बाहर देख रही थी… और हल्के-हल्के मुस्कुरा रही थी… गाड़ी की रफ्तार के साथ-साथ… बाहर एक परछाईं चल रही थी… और माधुरी उसी को एकटक देख रही थी।

आनंद ने उसकी तरफ देखा… और जोर से चिल्लाया,
“माधुरी!!”
लेकिन वो हिली तक नही, उसने उसे झकझोरकर होश में लाने की कोशिश की… लेकिन वो फिर भी नहीं हिली, अचानक… उसने धीरे-धीरे अपना चेहरा उनकी तरफ घुमाया… जैसे ही उसकी नज़र आनंद से मिली आनंद डर के मारे पीछे हट गया और दरवाज़े से टकरा गया। पियूष और पवन ने भी पीछे मुड़कर देखा… और वो भी जम गए… माधुरी नहीं थी… कोई और ही थी… उसका चेहरा पूरी तरह बदल चुका था…
उसका पूरा चेहरा किसी भयानक साये जैसा लग रहा था… माथे पर फैला हुआ लाल सिंदूर अब खून जैसा बहकर आँखों के पास तक उतर आया था। बाल पूरी तरह बिखरे हुए, गीले और चेहरे से चिपके हुए थे… जैसे अभी-अभी पानी से निकली हो। उसकी आँखें गहरी और काली पड़ चुकी थीं, अंदर जैसे कुछ हिल रहा हो… और पलकें बिल्कुल नहीं झपक रही थीं। गालों पर खरोंच के निशान थे, जिनसे ताज़ा खून रिसकर ठुड्डी तक आ रहा था। उसका मुँह हल्का खुला हुआ था… और होंठों के किनारों से खून की पतली धार नीचे गर्दन तक बह रही थी… अब उन्हें समझ आ चुका था कि माधुरी के अंदर कुछ और है… वो माधुरी नहीं रही। गाड़ी के अंदर डर अपने चरम पर था। पवन ने काँपते हुए एक पल के लिए उसकी तरफ देखा… और अचानक हिम्मत जुटाकर उसे जोर का धक्का दिया। चलती गाड़ी का दरवाज़ा खुला और माधुरी बाहर अंधेरे में जा गिरी। अगले ही पल पवन ने झटके से दरवाज़ा बंद कर दिया

। तीनों एक साथ जोर-जोर से चिल्लाने लगे। लेकिन उसी वक्त… पियूष के हाथों से स्टीयरिंग पर नियंत्रण फिसल गया।
गाड़ी अचानक अजीब तरीके से झटके खाने लगी… और बिना किसी वजह के वहीं पर गोल-गोल घूमने लगी। टायर रेत और सड़क पर घिसटते हुए चीखने जैसी आवाज़ कर रहे थे… गाड़ी जैसे किसी अदृश्य ताकत के कब्जे में आ गई थी। पियूष पूरी ताकत से स्टीयरिंग सीधा करने की कोशिश कर रहा था… लेकिन गाड़ी उसकी सुन ही नहीं रही थी…
तीनों के चेहरे पर दहशत साफ दिख रही थी अब उन्हें समझ आ गया था… वो माधुरी को पीछे नहीं छोड़ पाए हैं… माधुरी ज़ोर-ज़ोर से हँस रही थी… उसका वो भयानक, खोखला हँसना गूंजता हुआ सीधे उनके सामने से समुद्र की तरफ बढ़ने लगा। वो धीरे-धीरे पानी की तरफ जा रही थी… और बिना रुके लहरों के अंदर उतरती चली गई।
गाड़ी के अंदर बैठे तीनों घबराकर दरवाज़ा खोलने की कोशिश करने लगे—पवन ने हैंडल खींचा, आनंद ने धक्का मारा, पियूष ने पूरी ताकत लगा दी… लेकिन दरवाज़ा जैसे जाम हो चुका था।
“खुल क्यों नहीं रहा…!” पवन चीखा।
तीनों पूरी ताकत से बाहर निकलने की कोशिश कर रहे थे… लेकिन जैसे किसी ने उन्हें अंदर ही कैद कर लिया हो… कोई भी गाड़ी से बाहर नहीं आ पा रहा था… तभी अचानक… बिना किसी के छुए गाड़ी खुद-ब-खुद स्टार्ट हो गई। इंजन की आवाज़ एकदम भारी और अनजानी लग रही थी। पियूष ने घबराकर स्टीयरिंग संभालने की कोशिश की… लेकिन उसका हाथ जैसे जाम हो गया था—गाड़ी पर उसका कोई नियंत्रण नहीं था।
गाड़ी धीरे-धीरे खुद ही आगे बढ़ने लगी… सीधा उसी दिशा में… जहाँ माधुरी पानी के अंदर जा रही थी।
“रोक… पियूष रोक…!” आनंद चीख रहा था।
“ब्रेक मार…!” पवन जोर-जोर से चिल्ला रहा था।
लेकिन ब्रेक दबाने पर भी गाड़ी नहीं रुक रही थी… वो अपने आप… माधुरी के पीछे-पीछे बढ़ती जा रही थी। बाहर… माधुरी पानी में और अंदर जाती जा रही थी… और गाड़ी… उसी रफ्तार से उसका पीछा कर रही थी… जैसे दोनों के बीच कोई अदृश्य डोर बंधी हो। लहरें अब और उफान मारने लगी थीं… हवा चीखने लगी थी… और गाड़ी… बिना रुके… सीधे समुद्र की तरफ बढ़ती जा रही थी।
तीनों के चीखने की आवाज़ गूंज रही थी… लेकिन बाहर… माधुरी की हँसी अब भी साफ सुनाई दे रही थी… और अगले ही पल गाड़ी लहरों के अंदर समा गई…
लेखक : रा. वि. कुलकर्णी