खिड़की के बाहर कौन था? यह सवाल निशा के दिमाग में उस रात बार-बार घूम रहा था, जब रात 3 बजे उसके कमरे की खिड़की पर किसी ने धीरे-धीरे दस्तक दी।
रात के ठीक 3:07 बजे निशा की नींद अचानक खुल गई।
आज तक उस बिल्डिंग में लोग पूछते हैं — खिड़की के बाहर कौन था?
कमरे में पूरी खामोशी थी।
सिर्फ छत पर घूमते पुराने पंखे की आवाज़ आ रही थी।
वो पानी पीने के लिए उठी ही थी कि तभी उसके फोन पर एक नोटिफिकेशन आया।

“खिड़की के बाहर मत देखना।”
खिड़की के बाहर कौन था और निशा क्यों डर गई?
निशा कुछ सेकंड तक स्क्रीन को घूरती रही।
कोई नंबर नहीं।
कोई ऐप नहीं।
बस काली स्क्रीन पर सफेद अक्षर।
उसने तुरंत फोन लॉक किया और खुद को समझाने लगी।
“शायद सपना है…”
लेकिन तभी…
टक… टक… टक…
उसके बेडरूम की खिड़की पर किसी ने धीरे-धीरे दस्तक दी।
निशा का गला सूख गया।
वो तीसरी मंज़िल पर रहती थी।
इतनी ऊँचाई पर आधी रात को कौन हो सकता था?
दस्तक फिर हुई।
इस बार थोड़ा ज़ोर से।
टक… टक… टक…
उसका दिल इतनी तेज धड़क रहा था कि उसे खुद अपनी सांसें सुनाई दे रही थीं।
फोन फिर vibrate हुआ।
“अगर आवाज़ आए… जवाब मत देना।”
अब डर उसके चेहरे पर साफ दिखने लगा था।
निशा बार-बार सोच रही थी कि आखिर खिड़की के बाहर कौन था।
निशा धीरे-धीरे पीछे हटने लगी।
तभी खिड़की के बाहर से एक औरत की आवाज़ आई।
बहुत धीमी।
बहुत टूटी हुई।
“बेटा… खिड़की खोल दो…”
निशा वहीं जम गई।
आवाज़ बिल्कुल उसकी माँ जैसी थी।
लेकिन उसकी माँ तो दो साल पहले गुजर चुकी थी।
निशा की आंखों में आंसू आ गए।
“मम्मी…?”
जैसे ही उसके मुंह से ये शब्द निकला…
फोन की स्क्रीन अपने आप ON हो गई।
उस पर सिर्फ एक लाइन लिखी थी:
“अब इसे पता चल गया है कि तुमने इसे पहचान लिया।”
अचानक कमरे की सारी लाइट्स बंद हो गईं।
पूरा कमरा अंधेरे में डूब गया।
निशा बार-बार सोच रही थी कि आखिर खिड़की के बाहर कौन था।
सिर्फ बाहर से आती हल्की नीली चांदनी बची थी।
और उसी रोशनी में निशा ने देखा…
खिड़की के बाहर कोई खड़ा था।
तीसरी मंज़िल की खिड़की के बाहर।
हवा में।
उसका चेहरा पूरी तरह अंधेरे में छिपा था।
लेकिन उसकी मुस्कान दिख रही थी।
बहुत लंबी।
बहुत डरावनी।
निशा चीखना चाहती थी, लेकिन आवाज़ नहीं निकल रही थी।
तभी बाहर खड़ी वो चीज़ धीरे-धीरे कांच पर अपना हाथ रखने लगी।
उसकी उंगलियां इंसानों जैसी नहीं थीं।
बहुत लंबी।
बहुत पतली।
और पूरी तरह काली।
चरररर…
खिड़की का कांच धीरे-धीरे crack होने लगा।
निशा तुरंत कमरे से भागी और drawing room में पहुंच गई।
उसके हाथ कांप रहे थे।
उसने दरवाज़ा खोलकर बाहर भागने की कोशिश की।
लेकिन main door बाहर से locked था।
“ये कैसे हो सकता है…?”
वो अकेली रहती थी।
तभी पीछे bedroom से आवाज़ आई।
ठक… ठक… ठक…
जैसे कोई अंदर आ चुका हो।
निशा बार-बार सोच रही थी कि आखिर खिड़की के बाहर कौन था।
निशा रोते हुए फोन unlock करने लगी।
उसने Google पर search किया:
“रात में खिड़की पर दस्तक paranormal meaning”
एक पुराना article खुला।
Title था:
“जो चीज़ मर चुके लोगों की आवाज़ में बुलाती है… उसे जवाब मत देना।”
Article में लिखा था कि कुछ entities इंसानों के दुख का इस्तेमाल करती हैं।
पहले वो किसी अपने की आवाज़ में बुलाती हैं।
फिर धीरे-धीरे घर के अंदर आने की कोशिश करती हैं।
और अगर कोई उन्हें पहचान ले…
तो वो उसका पीछा कभी नहीं छोड़तीं।
निशा article पढ़ ही रही थी कि अचानक bedroom का दरवाज़ा अपने आप खुल गया।
अंदर पूरा अंधेरा था।
लेकिन उस अंधेरे में दो सफेद आंखें चमक रही थीं।
निशा बार-बार सोच रही थी कि आखिर खिड़की के बाहर कौन था।
फिर…
उसी अंधेरे से उसकी माँ की आवाज़ आई।
बहुत प्यार से।
“निशा… बेटा… डर क्यों रही हो…?”
निशा टूट गई।
उसकी आंखों से आंसू बहने लगे।
एक पल के लिए उसका दिल बोला—
“शायद सच में मम्मी हैं…”
वो धीरे-धीरे bedroom की तरफ बढ़ने लगी।
तभी फोन पर आखिरी notification आया।
“अगर वो तुम्हें तुम्हारे नाम से बुलाए… पीछे मत मुड़ना।”
लेकिन देर हो चुकी थी।
क्योंकि उसी समय…
उसके कान के बिल्कुल पास कोई फुसफुसाया—
“निशा…”
वो जम गई।
उसकी सांस रुक गई।
क्योंकि आवाज़ bedroom से नहीं आई थी।
आवाज़ उसके ठीक पीछे से आई थी।
धीरे-धीरे उसने कांपते हुए गर्दन घुमाई।
और जो उसने देखा…
उसके बाद उस बिल्डिंग में रहने वाले लोगों ने निशा को कभी नहीं देखा।
बस अगले दिन पुलिस को उसके apartment की दीवार पर एक लाइन लिखी मिली—
खून जैसे लाल अक्षरों में।
“इसने दरवाज़ा नहीं खोला… इसलिए मैं खिड़की से आ गया।”
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