WRITER – KARAN MALHOTRA
रात के तीसरे पहर में सोनगढ़ के पुराने जंगल से हमेशा एक आवाज़ आती थी।
घुँघरुओं की।

धीमी… बहुत धीमी।
जैसे कोई औरत गीली मिट्टी पर नंगे पाँव चल रही हो।
गाँव वाले कहते थे, “जिसने वह आवाज़ सुन ली, वह सुबह तक इंसान नहीं रहता।”
लेकिन उस रात, आवाज़ सुनने वाला कोई आम आदमी नहीं था।
वह था देवांश—पुराने मंदिरों की मूर्तियों और लोककथाओं पर research करने वाला एक scholar, जिसे डर से ज़्यादा सच पर भरोसा था।
Yakshini उसके हाथ में एक पुरानी ताड़पत्र पांडुलिपि थी। उस पर सिर्फ तीन शब्द लिखे थे—
“वचन तोड़ोगे, यक्षिणी जागेगी।”
देवांश ने हँसकर पन्ना बंद किया।
“लोककथा,” उसने कहा।
तभी पीछे से एक स्त्री की आवाज़ आई—
“हर लोककथा कभी न कभी किसी की मौत से शुरू होती है।”
देवांश मुड़ा।
बरगद के नीचे सफेद वस्त्रों में एक स्त्री खड़ी थी।
उसका चेहरा इतना सुंदर था कि उसे देखकर डर लगना चाहिए था।
और उसकी आँखें इतनी शांत थीं कि उनमें मौत छुपी हुई थी।
Chapter 1 — The Forbidden Manuscript
सोनगढ़ कोई tourist spot नहीं था। वहाँ न कोई resort था, न cafe, न network।
बस पहाड़, धुंध, जंगल और एक ऐसा मंदिर, जिसकी सीढ़ियाँ ज़मीन में धँसती जा रही थीं।
देवांश वहाँ किसी adventure के लिए नहीं आया था। उसे Banaras की एक private archive में एक पांडुलिपि मिली थी, जिसमें सोनगढ़ के “रत्नकुंड मंदिर” का ज़िक्र था।
कहा गया था कि मंदिर के नीचे धरती में ऐसा खजाना दबा है, जिसकी रक्षा कोई देवी नहीं, एक यक्षिणी करती है।
यक्षिणी—जो धन, वन, जल और वचन की रक्षक होती है।
पर पांडुलिपि में एक अजीब बात थी।
उसमें लिखा था कि यक्षिणी को कभी पूजा नहीं गया।
उसे बाँधा गया था।
और जिसने उसे बाँधा था, वह कोई तांत्रिक नहीं… एक दूल्हा था।
देवांश जब गाँव पहुँचा, तो सबसे पहले उसने मंदिर का रास्ता पूछा।
चाय की दुकान पर बैठे बूढ़े ने बिना ऊपर देखे कहा, “मंदिर नहीं जाना।”
“क्यों?”
“क्योंकि वहाँ जो है, वह भगवान नहीं है।”
देवांश मुस्कुराया। “मैं डरने नहीं आया।”
बूढ़े ने पहली बार उसकी तरफ देखा।
“डरने वाले बच जाते हैं। जानने वाले नहीं।”
Chapter 2 — Warning Signs
रत्नकुंड मंदिर जंगल के बीच था।
उसकी दीवारों पर बेलें चढ़ी थीं। मूर्तियों के चेहरे टूटे हुए थे। लेकिन प्रवेश द्वार पर बनी एक आकृति बिल्कुल साफ थी।
एक स्त्री।
एक हाथ पेड़ की शाखा पर, दूसरा धरती की ओर।
चेहरे पर मुस्कान।
पाँवों में घुँघरू।
और आँखों में जड़ा हुआ काला पत्थर।
देवांश ने camera निकाला, पर screen काली हो गई।
Battery full थी।
फिर भी device dead।
उसने इसे humidity समझकर ignore किया।
मंदिर के अंदर एक गोल कुंड था। पानी नहीं, बस काली मिट्टी।
कुंड के पास पत्थर पर संस्कृत और प्राकृत के मिले-जुले अक्षर खुदे थे।
देवांश ने पढ़ने की कोशिश की—
“जो उसे पत्नी कहेगा, वह बचेगा।
जो उसे आत्मा कहेगा, वह मरेगा।
जो उसे मुक्त करेगा, वह सब खो देगा।”
उसे लगा, यह कोई symbolic curse होगा।
तभी मंदिर में किसी के चलने की आवाज़ आई।
घुँघरू।
देवांश ने torch घुमाई।
कोई नहीं था।
लेकिन कुंड की मिट्टी पर ताज़े पाँवों के निशान थे।
स्त्री के।
Chapter 3 — The Woman Near The Well
शाम को गाँव लौटते समय देवांश को रास्ते में एक पुराना कुआँ मिला।
कुएँ के पास वही स्त्री खड़ी थी।
सफेद साड़ी, खुले बाल, पाँवों में घुँघरू।
“आप रास्ता भटक गए?” उसने पूछा।
देवांश ने सावधानी से कहा, “नहीं। मैं मंदिर से आ रहा हूँ।”
स्त्री मुस्कुराई। “मंदिर आपको अंदर आने देता है, बाहर नहीं।”
“आप कौन हैं?”
“मेरा नाम नीलांबरी है।”
नाम सुनते ही देवांश को पांडुलिपि का एक शब्द याद आया—
नीलांबरी यक्षिणी।
उसने तुरंत खुद को संभाला। “गाँव में रहती हैं?”
“कभी रहती थी।”
“अब?”
“अब लोग मुझे कहानी समझते हैं।”
देवांश की रीढ़ में ठंड उतर गई।
हवा में रातरानी की महक घुल गई थी। इतनी तेज़ कि साँस भारी होने लगी।
नीलांबरी कुएँ के पास आई और बोली, “आपने शिलालेख पढ़ा?”
“थोड़ा।”
“पूरा पढ़िए। अधूरा सच सबसे खतरनाक होता है।”
देवांश ने पूछा, “आप चाहती क्या हैं?”
उसने बहुत धीरे कहा—
“मेरा वचन लौटाइए।”
और अगले ही पल वह गायब थी।
कुएँ के पानी में सिर्फ उसका reflection बचा था।
पर देवांश के सामने कोई नहीं था।
Chapter 4 — Village Secret
गाँव का बूढ़ा, जिसका नाम हरिनारायण था, देवांश को रात में अपने घर ले गया।
“तुमने उसे देख लिया,” उसने कहा।
देवांश चुप रहा।
हरिनारायण ने एक लकड़ी का संदूक खोला। उसमें पुराने कपड़े, तांबे की घंटी और एक काला धागा था।
“यह मंदिर किसी राजा ने नहीं बनवाया था,” बूढ़े ने कहा। “यह एक वचन की समाधि है।”
“किसका वचन?”
“सौ साल पहले यहाँ माधव नाम का एक मूर्तिकार रहता था। वह मंदिरों में यक्षिणी की मूर्तियाँ बनाता था। कहते हैं, उसने जंगल में एक वास्तविक यक्षिणी देखी—नीलांबरी। वह पेड़ों, कुंड और धरती के नीचे छुपे रत्नों की रक्षक थी।”
देवांश ध्यान से सुन रहा था।
“माधव ने उससे प्रेम का वचन लिया। नीलांबरी ने शर्त रखी—वह धन नहीं माँगेगा, मंदिर नहीं बनाएगा, और उसका नाम पत्थर पर नहीं लिखेगा।”
“फिर?”
“फिर उसने तीनों काम किए।”
कमरे में अचानक हवा ठंडी हो गई।
हरिनारायण ने आगे कहा, “माधव ने राजा को खुश करने के लिए उसके नाम पर मंदिर बनाया। खजाना खोदा। और नीलांबरी को मूर्ति में बाँध दिया।”
देवांश ने कहा, “तो वह बदला लेती है?”
बूढ़े ने सिर हिलाया। “नहीं। यही गलती सब करते हैं।”
“तो?”
“वह अपना वचन ढूँढती है। हर उस आदमी में, जो माधव जैसा दिखता है।”
देवांश का गला सूख गया।
“और मैं?”
बूढ़े ने उसकी आँखों में देखा।
“तुम्हारा चेहरा माधव से मिलता है।”
Chapter 5 — Midnight Research
देवांश ने रात भर archive notes, पांडुलिपि और मंदिर की photos मिलाईं।
एक detail बार-बार सामने आ रही थी।
नीलांबरी को श्राप नहीं दिया गया था।
उसे “विवाह-वचन” में बाँधा गया था।
माधव ने कहा था—
“जब तक कोई मेरे रक्त से जन्मा पुरुष तुम्हें तुम्हारा नाम देकर मुक्त नहीं करेगा, तुम इस कुंड की रक्षा करोगी।”
देवांश ने अपनी family history खोली।
उसके दादा का गाँव—सोनगढ़।
उसके परदादा का surname—माधववंशी।
उसने laptop बंद कर दिया।
कमरे में अंधेरा था।
फिर screen अपने-आप जल गई।
उस पर एक line type हुई—
“तुम लौट आए।”
देवांश पीछे हट गया।
खिड़की पर वही घुँघरू की आवाज़ आई।
नीलांबरी बाहर खड़ी थी।
“डर गए?” उसने पूछा।
देवांश ने मुश्किल से कहा, “तुम मुझे मार सकती थीं।”
“हाँ।”
“फिर मारा क्यों नहीं?”
नीलांबरी ने कहा, “क्योंकि तुमने अभी तक झूठ नहीं बोला।”
“तुम्हें मुक्ति चाहिए?”
वह मुस्कुराई।
“मुक्ति नहीं। न्याय।”
Chapter 6 — The Missing Bride
अगली सुबह देवांश को मंदिर के पीछे एक छोटी समाधि मिली।
उस पर नाम लिखा था—
काव्या
साल: 1924
हरिनारायण ने बताया, “काव्या माधव की होने वाली पत्नी थी। शादी से एक रात पहले वह गायब हो गई।”
“मरी?”
“किसी ने शरीर नहीं देखा।”
देवांश ने समाधि की मिट्टी छुई। वह गीली थी।
जैसे अभी-अभी किसी ने पानी डाला हो।
उस रात देवांश को सपना आया।
एक मंडप।
माधव दूल्हे के वस्त्र में।
काव्या लाल साड़ी में रो रही थी।
और मंदिर के बाहर नीलांबरी खड़ी थी।
माधव कह रहा था, “मैंने यक्षिणी को बाँध दिया है। अब खजाना मेरा है। शादी के बाद हम राजघराने जैसे रहेंगे।”
काव्या चीखी, “तुमने देवी को धोखा दिया!”
माधव हँसा। “वह देवी नहीं, शक्ति है। और शक्ति का उपयोग किया जाता है।”
तभी काव्या ने अग्नि के सामने शपथ ली—
“जिस वचन से उसे बाँधा है, उसी वचन से तुम्हारा वंश बँधेगा।”
सपना टूट गया।
देवांश के हाथ में लाल धागा था।
वही धागा जो सपने में काव्या की कलाई पर था।
Chapter 7 — Horror Begins
उस दिन से गाँव में अजीब घटनाएँ शुरू हो गईं।
तालाब का पानी काला हो गया।
रत्नकुंड मंदिर से रात में स्त्री के रोने की आवाज़ आने लगी।
हर घर की चौखट पर मिट्टी से एक ही symbol बन जाता—
एक वृक्ष।
उसकी जड़ों में एक स्त्री।
और उसके ऊपर एक टूटा हुआ वचन।
देवांश ने मंदिर में जाकर कुंड खोदने का फैसला किया।
हरिनारायण ने रोका। “जड़ों को मत छेड़ना।”
“क्यों?”
“क्योंकि वह वहाँ नहीं दबी। वह वहाँ रोकी गई है।”
देवांश फिर भी गया।
मंदिर के अंदर कुंड की मिट्टी में हाथ डालते ही उसे कुछ कठोर महसूस हुआ।
एक चाँदी का पायल।
उस पर लिखा था—
काव्या नहीं मरी।
देवांश का सिर घूम गया।
अगर काव्या नहीं मरी, तो समाधि किसकी थी?
पीछे से आवाज़ आई—
“अब समझे?”
नीलांबरी खड़ी थी।
आज उसकी आँखें शांत नहीं थीं।
वे लाल थीं।
Chapter 8 — The Real Curse
“काव्या कहाँ है?” देवांश ने पूछा।
नीलांबरी ने कुंड की ओर इशारा किया।
“यहीं।”
“माधव ने उसे मारा?”
“नहीं। उसने उसे मेरे सामने बलि बना दिया।”
देवांश पीछे हट गया।
नीलांबरी की आवाज़ भारी हो गई।
“मुझे बाँधने के लिए मानव-वचन काफी नहीं था। उसे जीवित रक्त चाहिए था। काव्या ने मुझे बचाने की कोशिश की। माधव ने उसे कुंड में धकेल दिया।”
“तो तुमने माधव को मारा?”
नीलांबरी हँसी।
उस हँसी में पत्तों की सरसराहट और हड्डियों की खनक थी।
“नहीं। मैंने उसे जीवित छोड़ा। ताकि उसका वंश अपने ही नाम से डरता रहे।”
देवांश बोला, “मुझे क्या करना होगा?”
“कुंड खोलो। काव्या की अस्थियाँ निकालो। मेरा नाम पत्थर से मिटाओ। और माधव का सच लिखो।”
“बस इतना?”
नीलांबरी उसके पास आई।
“नहीं। आखिरी वचन बाकी है।”
“कौन सा?”
“माधव के रक्त से जन्मे पुरुष को मेरा पति बनकर अग्नि के सामने कहना होगा—मैंने धोखा दिया था।”
देवांश ने कहा, “लेकिन धोखा मैंने नहीं दिया।”
नीलांबरी ने फुसफुसाकर कहा—
“वंश सिर्फ खून नहीं लाता, अधूरा पाप भी लाता है।”
Chapter 9 — Suspense Point
देवांश ने खुदाई शुरू की।
कुंड की मिट्टी से पहले राख निकली।
फिर लाल काँच की चूड़ियाँ।
फिर एक खोपड़ी।
उसके माथे पर सिंदूर का दाग अब भी था।
देवांश काँप गया।
तभी मंदिर के बाहर भीड़ जमा हो गई।
गाँव वाले चिल्ला रहे थे, “उसे मत निकालो! यक्षिणी मुक्त हो जाएगी!”
हरिनारायण भी आया।
पर उसकी आँखें बदली हुई थीं।
“देवांश,” उसने कहा, “कुंड बंद कर दो।”
“आपने कहा था सच निकालना होगा।”
बूढ़ा धीरे से मुस्कुराया।
“सच वही होता है जो बचा रहे। जो सबको मार दे, वह सच नहीं, विनाश है।”
देवांश को पहली बार शक हुआ।
“आप कौन हैं?”
हरिनारायण ने उत्तर नहीं दिया।
नीलांबरी अचानक मंदिर के द्वार पर प्रकट हुई।
उसने बूढ़े को देखकर कहा—
“माधव।”
देवांश की साँस रुक गई।
हरिनारायण हँसा।
“सौ साल बाद भी पहचान लिया?”
Chapter 10 — The Twist
हरिनारायण बूढ़ा नहीं था।
वह माधव था।
नीलांबरी की शक्ति चुराकर उसने अपनी उम्र बाँध रखी थी।
हर पीढ़ी में वह नाम बदलकर जीवित रहा।
हर बार अपने ही वंश के किसी पुरुष को मंदिर तक लाता।
हर बार यक्षिणी को दोष देकर खजाने की रक्षा करता।
क्योंकि खजाना सिर्फ सोना नहीं था।
वह नीलांबरी की शक्ति थी।
देवांश ने पूछा, “तो मैं तुम्हारा वंशज नहीं?”
माधव ने कहा, “हो। लेकिन तुम्हें यहाँ मैंने बुलाया। Archive में पांडुलिपि मैंने रखवाई। Research grant मैंने approve कराया। तुम्हारे सपनों तक का रास्ता मैंने बनाया।”
“क्यों?”
माधव ने अपनी छड़ी उठाई।
“क्योंकि हर सौ साल में बंधन कमजोर होता है। उसे फिर से मजबूत करने के लिए माधव के रक्त की जरूरत होती है।”
देवांश पीछे हट गया।
“इस बार बलि मेरी है?”
माधव मुस्कुराया।
“नहीं। इस बार तुम दूल्हे होगे। और नीलांबरी फिर से बाँध दी जाएगी।”
नीलांबरी चीखी।
मंदिर की दीवारें हिल गईं।
बरगद की जड़ें जमीन से बाहर आने लगीं।
माधव ने मंत्र पढ़ना शुरू किया।
Chapter 11 — The Last Vow
देवांश ने काव्या की खोपड़ी अपने हाथ में उठाई।
उसने याद किया—शिलालेख।
“जो उसे पत्नी कहेगा, वह बचेगा।
जो उसे आत्मा कहेगा, वह मरेगा।
जो उसे मुक्त करेगा, वह सब खो देगा।”
सब खो देगा।
शायद यही कीमत थी।
देवांश अग्नि-कुंड के सामने खड़ा हुआ।
माधव चिल्लाया, “वचन मत देना!”
देवांश ने नीलांबरी की ओर देखा।
वह अब भयानक थी।
आधा चेहरा सुंदर स्त्री का।
आधा सूखी जड़ों जैसा।
पर आँखों में वही पीड़ा थी।
देवांश ने ऊँची आवाज़ में कहा—
“नीलांबरी, मैं तुम्हें शक्ति नहीं, अस्तित्व मानता हूँ। मैं तुम्हें वस्तु नहीं, वचन मानता हूँ। मैं माधव के रक्त से जन्मा हूँ, और उसके पाप को स्वीकार करता हूँ।”
माधव ने मंत्र रोक दिया।
देवांश ने आगे कहा—
“मैंने धोखा दिया था।”
जैसे ही ये शब्द निकले, मंदिर की छत टूटने लगी।
कुंड से काले पानी की धारा उठी।
माधव जवान होने लगा, फिर बूढ़ा, फिर राख।
वह चिल्लाया, “खजाना मेरा था!”
नीलांबरी ने कहा—
“नहीं। खजाना कभी धन नहीं था। खजाना स्मृति थी।”
माधव राख बनकर कुंड में गिर गया।
Chapter 12 — Ending With Final Suspense
सुबह गाँव वालों ने देखा, रत्नकुंड मंदिर ढह चुका था।
बरगद हरा हो गया था।
कुंड में साफ पानी भर गया था।
देवांश गायब था।
सिर्फ पत्थर पर नया inscription था—
“यहाँ नीलांबरी यक्षिणी को बाँधा नहीं गया।
यहाँ उसे याद किया गया।”
गाँव में फिर कभी घुँघरुओं की आवाज़ नहीं आई।
लोगों ने कहा, यक्षिणी मुक्त हो गई।
पर सच इतना simple नहीं था।
तीन महीने बाद Banaras की उसी archive में एक नई पांडुलिपि मिली।
उस पर देवांश की handwriting थी।
शीर्षक था—
“Yakshini: Field Notes After Death”
पहले पन्ने पर लिखा था—
“मैं जीवित हूँ, पर मनुष्य नहीं। नीलांबरी मुक्त हुई, लेकिन वचन खाली नहीं रह सकता। हर रक्षक को किसी रक्षक की ज़रूरत होती है।”
दूसरे पन्ने पर एक sketch था।
एक स्त्री बरगद के नीचे खड़ी थी।
उसके पीछे एक पुरुष।
दोनों के पाँवों में घुँघरू थे।
और आखिरी line पढ़कर archive का कर्मचारी बेहोश हो गया—
“जो यह पांडुलिपि पढ़ेगा, वह सोनगढ़ का रास्ता खुद ढूँढ लेगा।”
उस रात Banaras की गलियों में पहली बार घुँघरुओं की आवाज़ सुनाई दी।
धीमी… बहुत धीमी।
जैसे कोई कहानी अब भी खत्म नहीं हुई।
Yakshini 👇
