इस कहानी के लेखक हैं विजेन्द्र कुमार कर्ण
रात ………..स्याह अँधेरी रात……सन्नाटे से भरी….ये रात ख़ुद के अंदर छिपा रखती है कई गहरे राज़…….कभी शैतानी शक्तियों के तो कभी बुरी आत्माओं के ..कभी अतृप्त आत्माओं के तो कभी ऐसी रहस्यमयी शक्तियों के जिसके बारे में किसी को पता नहीं होता….
यही नहीं कहते हैं कि दुनिया के कई काले कामों का गवाह होती है ये रात….
रात गुनाहों के कई रास्ते भी खोलती है……. वो गुनाह जो दिन की रोशनी में संभव नहीं हो सकते…..
लाल चंदन के पेड़ों से भरा वो जंगल उस अँधेरी रात में डरावना तो लग रहा था लेकिन अँधेरे में भी वो अपनी खुशबू पूरी तरह फैला रहा था…..साथ ही साथ ये बनने जा रहा था गवाह एक गुनाह का……
Rakhandaar Ki Kahani जंगल के सन्नाटे को चीरता वो ट्रक आगे की ओर बढ़ा चला जा रहा था…..ट्रक में केवल चार लोग सवार थे…विक्रम , राजा , सिकंदर और राकेश…….इतनी रात में ट्रक का उस जंगल में आना मना था….लेकिन इसके बावजूद वो ट्रक अगर जंगल के अंदर भागा जा रहा था तो इसका ये साफ मतलब था कि ट्रक में जो लोग बैठे हैं वे सब ऊंची पहुंच वाले हैं….

विक्रम- ईमानदारी का जम़ाना ही नहीं रहा है भाई लोग…….पूरे डेढ़ लाख दिए हैं उस फॉरेस्ट अफसर को इस जंगल में घुसने के लिए….
राजा- भाई ढेढ़ लाख दिए तो क्या हुआ….डेढ़ करोड़ की चंदन की लकड़ियां भी तो ले जाएंगे यहां से…..
ट्रक अपनी स्पीड में चला जा रहा था और उनकी बातें भी उसी स्पीड में हो रही थी…लेकिन अचानक उस स्पीड को लगा ब्रेक…..जब विक्रम ने देखा कि एक आदमी एकदम ट्रक के बीचो बीच आकर खड़ा हो गया….जबतक वो ब्रेक लगाता……ट्रक की टक्कर उससे हो गई……..वो आदमी कई फुट ऊपर उड़ा और फिर धड़ाम से नीचे गिर गया….
सिकंदर- अबे….मार दिया क्या उस आदमी को…
विक्रम- पता नहीं भाई…..वो आदमी अचानक से कहां से आ गया….
सिकंदर- नीचे उतरकर देखें क्या …..
राकेश- क्या देखेगा……बे…..वो आदमी तेरा बाप था क्या…या तेरा ससुर….चल निकल यहां से…क्यों उसके लिए टाइम ख़राब करना…
विक्रम ने अपने दोस्तों की ओर देखा और गेयर लगाकर एक्सलेटर पर अपने पांव को रखा और स्टेयरिंग को थाम लिया….
लेकिन ये क्या…..कितना भी एक्सलेटर दबाया विक्रम ने ट्रक आगे ही नहीं बढ़ा….
सिकंदर- क्या हो गया भाई ट्रक को….
विक्रम- पता नहीं………बे……
सिकंदर- रात- रात को ही सारा काम खत्म करके निकलना है….नहीं तो डेढ़ लाख रुपये तो डूबेंगे ही हमें भी जेल की सलाखों के पीछे जाना होगा…
राकेश- अबे….क्यों बकवास बातें कर रहा है….कुछ छोटी मोटी ख़राबी आ गई होगी….सब कुछ ओके कर के ही तो चले थे…. चल पहले देखते हैं….
ना चाहते हुए भी उन सभी को नीचे उतरना पड़ा…..जैसे ही वो नीचे उतरे उन्होंने देखा कि वही आदमी जिसकी अभी अभी ट्रक से टक्कर हुई थी…..अपनी धुन में चुपचाप पत्थर के ऊपर बैठा हुआ है…..उसके मुंह में एक बीड़ी भी है…लेकिन वो जल नहीं रही है…
चारों के चारों उस आदमी को घूर ही रहे थे और सोच रहे थे कि इतनी ज़ोर से टक्कर के बावजूद भी ये ज़िंदा कैसे है……तभी उसने कहा कि ..
आदमी- माचिस है क्या…
विक्रम- आंय…क्या…
Rakhandaar Ki Kahani
आदमी– ऊंचा सुनते हो…माचिस है क्या तुम्हारे पास…
विक्रम- माचिस……हां……..है…..
विक्रम ने अपनी जेब में हाथ डाला और उसको माचिस निकालकर दिया…..लेकिन तभी कुछ ऐसा हुआ जिसे देखकर विक्रम के हाथ पैर कांपने लगे…… हुआ ये कि जैसे ही उस आदमी ने माचिस ली…
उसने बीड़ी को होंठों से हटाया… और धीरे से माचिस की तीली रगड़ी…
चटाक…की आवाज़ आई……लेकिन… उस आवाज़ के बाद तीली की लौ सीधी नहीं जली… वो उल्टी दिशा में मुड़ी… जैसे हवा के खिलाफ नहीं… बल्कि… किसी अनदेखी ताक़त की तरफ खिंच रही हो…
जैसे ही लौ जली… चारों ने देखा… उस आदमी की आँखों में लौ नहीं… पूरा जंगल जलता हुआ दिख रहा था…!
विक्रम (घबराते हुए): “ये… ये क्या है…?” इसकी आँखों में ये क्या है….
लेकिन अगले ही पल सब कुछ शांत हो गया…. चारों के चारों शॉक्ड होकर उसे देख ही रहे थे कि
वो आदमी मुस्कुराया… और अगली ही सेकंड उसकी आँखें एकदम खोखली हो गईं….उसकी पुतिलयां गायब थीं…
उन ख़ौफनाक आँखों को देखकर सभी के चेहरे का रंग उड़ गया….वे सभी के सभी भागने की सोच ही रहे थे तभी
तभी अचानक… पीछे खड़ा ट्रक… अपने आप स्टार्ट हो गया…….. ट्रक के इंजन की आवाज़ रात की उस खामोशी में लगातार गूंजने लगी…. जबकि ट्रक की चाबी अभी भी विक्रम की जेब में थी…
सिकंदर चिल्लाया: “अबे… ट्रक किसने चालू किया…!!”
विक्रम- पता नहीं यार…चाबी तो मेरे पास है……ये देख….
चारों पीछे मुड़े… और जैसे ही उन्होंने ट्रक की खिड़की में देखा—
ड्राइवर सीट पर कोई बैठा था……लेकिन जैसे ही उन्होंने उसका चेहरा देखा…सभी के सभी चिल्ला उठे….
सिकंदर- अबे..ये ….ये ड्राइवर की सीट पर ये आदमीकहां से आ गया……
अचानक उन्हें हंसने की आवाज़ सुनाई दी…..बहुत ही ख़ौफ़नाक हंसी थी वो…..उन्होंने पीछे मुड़कर देखा तो वही आदमी बीड़ी का धुँआ उड़ा रहा था….उन्होंने फिर से ट्रक की ओर देखा तो वही इंसान उन्हें ट्रक की ड्राइविंग सीट पर भी बैठा दिखा..
विक्रम- अबे ……..ये हो क्या रहा है…..ये यहां भी है वहां भी…..ये कैसे संभव है यार….
चारों का दिमाग घूम रहा था…उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि ये आख़िर उनके साथ ये क्या और क्यों हो रहा है….लेकिन चारों लोगों को एक बात तो समझ आ गई थी कि ये इंसान कोई साधारण इंसान नहीं है…ये ज़रूर कोई भूत या प्रेत है……और उससे बचने का एक ही तरीका था…वहां से भागना…..
राजा डर के मारे पीछे हटते हुए बोला
राजा- भाई लोग…भागो यहां से….ये कोई नॉर्मल इंसान नहीं है…..ज़रूर कोई बुरी आत्मा इसपर सवार है…
चारों के चारों फुल स्पीड में भागने लगे……लेकिन वो कुछ ही दूर गए थे कि विक्रम के पैरों के नीच कुछ आ गया…….विक्रम धड़ाम से नीचे गिर पड़ा….और जैसे ही उसने कोशिश की ये देखने की कि उसका पैर किस चीज़ में उलझा था उसकी चीख निकल पड़ी
विक्रम- अबे…..ये….ये यहां कैसे आ गया…
विक्रम के पैरों के नीचे और कुछ नहीं वही आदमी था जो लगातार हंसे जा रहा था और जम़ीन पर लेटा लेटा बीच-बीच में बीड़ी पी रहा था…
राजा, सिकंदर और राकेश को पता नहीं था कि विक्रम पीछे छूट गया है…वो भागे जा रहे थे…..लेकिन सभी के साथ वही घटना घटी…..वे सभी के सभी नीचे गिरे और नीचे गिरने के बाद जब उन्होंने उस आदमी को देखा तो उनके दिल की धड़कन कई गुना बढ़ गई…… वो आँखें मीच मीच कर उस आदमी को देखते रहे और सोचते रहे कि इसके इतने रूप कैसे हो सकते हैं……कई सारे सवाल उनके ज़ेहन में थे लेकिन किसी का भी जवाब उनके पास नहीं था….
वे सभी फिर से उठकर भागना चाहते थे लेकिन जैसे ही वो उठते वो ना जाने फिर से कैसे गिर जाते…..ऐसा लगता कि कोई उनके पैर पकड़कर खींच रहा है….वो फिर उठते फिर गिर जाते…….. वो अब थक गए थे….उन सभी को डर ने अपने रंग में रंग लिया था….
अचानक उन सभी को लगा कि उनके पैरों को उस आदमी ने पकड़ लिया है…और उसे खींच रहा है…..
विक्रम- अरे छोड़ो हमारे पैर…हमें…हमें कहां ले जा रहे हो……
आदमी- तुम्हारे दोस्तों को पास
कुछ देर बाद वे चारों के चारों एक पेड़ के नीचे थे…..वो आदमी उसी तरह बेफ्रिक होकर बीड़ी का धुआँ हवा में उड़ा रहा था….
आख़िरकार थक हार कर उन्होंने उसके आगे गिड़गिड़ाते हुए बोला कि
विक्रम- कौन कौन हो तुम….और हमारे पीछे क्यों पड़े हो…….हमने क्या बिगाड़ा है तुम्हारा……
राजा- हां भाई ..हमने क्या बिगाड़ा है तुम्हारा…कौन…कौन हो तुम…..
वो आदमी थोड़ी देर कुछ नहीं बोलता बस बीड़ी पीते हुए हंसते रहता है और फिर चीख कर बोलता है…
आदमी – राखंदार……राखंदार हूं मैं……इस जंगल का रखवाला हूँ ……सदियों से …सदियों से मैं इस जंगल की रक्षा कर रहा हूं…….बुरे लोगों से…….बुरी ताकतों से…………
उसकी आवाज़ अजीब सी निकल रही थी….बहुत मोटी……और वो आवाज़ जंगल में गूंज रही थी……राखंदार…राखंदार..
राखंदार… ये कोई आम आत्मा नहीं होती… ये ना पूरी तरह इंसान होते हैं… और ना ही पूरी तरह भूत… कहते हैं… जब किसी जगह पर बार-बार अन्याय होता है… जब लालच, धोखा और गुनाह… हद पार कर देते हैं…
तब उस जगह की आत्मा… खुद एक रूप लेती है… उसी रूप को कहते हैं — राखंदार… राखंदार पैदा नहीं होते… बनाए जाते हैं… कभी किसी बेगुनाह की मौत से… कभी किसी अधूरी चीख से… तो कभी उस दर्द से… जो मिट्टी के अंदर दबा रह जाता है… धीरे-धीरे… वो दर्द… वो गुस्सा… वो चीखें… एक ताकत बन जाती हैं… और फिर… वो जगह खुद अपना रखवाला पैदा करती है… राखंदार का काम सिर्फ एक होता है— रक्षा… और सज़ा… वो हर उस इंसान को देखता है… जो उस जगह के नियम तोड़ता है… जो लालच में आकर उसे नुकसान पहुंचाता है… और फिर… वो फैसला करता है… कौन ज़िंदा जाएगा… और कौन… हमेशा के लिए वहीं का हो जाएगा… सबसे डरावनी बात ये है कि… राखंदार को बुलाना नहीं पड़ता… वो खुद आ जाता है… जब… गुनाह अपनी हद पार कर देता है…
और एक बार… अगर राखंदार ने तुम्हें देख लिया… तो समझ लो… तुम जंगल में नहीं हो…
जंगल तुम्हारे अंदर उतर चुका है…
विक्रम, राजा, सिकंदर और राकेश… चारों के चेहरे पर पसीना था… वो समझ गए कि अब उनकी मौत पक्की है…
विक्रम- हमसे गलती हो गई… हमें जाने दो…”
वो आदमी कुछ नहीं बोला… बस धीरे-धीरे उनके चारों ओर घूमने लगा… अजीब बात ये थी कि उसके कदमों की आवाज़ नहीं आ रही थी… लेकिन सूखे पत्ते अपने आप दब रहे थे… जैसे कोई अदृश्य चीज़ उसके साथ चल रही हो…
अचानक विक्रम को लगा… किसी ने उसके कान के बिल्कुल पास आकर बहुत धीरे से कहा—
“भाग क्यों नहीं रहे…?” विक्रम उछलकर पीछे हटा… उसने तुरंत पीछे देखा… वहां कोई नहीं था… लेकिन जैसे ही उसने सामने देखा… उसका गला सूख गया… वो आदमी उसके बिल्कुल सामने खड़ा था… और उसका चेहरा बिलकुल विकृत सा दिख रहा था…. चारों पीछे हटे ही थे कि अचानक ट्रक का हॉर्न अपने आप बज उठा… लंबी, डरावनी आवाज़… जो पूरे जंगल में गूंजने लगी… उन्होंने ट्रक की तरफ देखा… हेडलाइट्स अपने आप जल चुकी थीं…जो सीधी उनकी आँखों पर पड़ रही थीं… उस तेज़ रोशनी में… उन्हें कुछ दिखा… चारों के शरीर… पेड़ों से लटके हुए… बिल्कुल निर्जीव… राजा की चीख निकल गई… लेकिन अगले ही पल… रोशनी बुझ गई… और सब गायब… अब जंगल फिर से शांत था…इतना शांत कि अपनी धड़कन भी साफ सुनाई दे… तभी… उनके पैरों के नीचे ज़मीन थोड़ी नरम होने लगी… जैसे मिट्टी नहीं… कुछ और हो… विक्रम ने नीचे देखा… और उसका दिल ज़ोरों से धड़कने लगा… वो मिट्टी नहीं थी…हजारों हाथ थे… जो उनके पैरों को पकड़ने की कोशिश कर रहे थे… चारों बुरी तरह घबरा गए… लेकिन जैसे ही उन्होंने खुद को छुड़ाने की कोशिश की… सब कुछ अचानक गायब हो गया… अब जमीन फिर से सख्त थी… जैसे कुछ हुआ ही न हो…
तभी… दूर से किसी के घिसटने की आवाज़ आई…और किसी के चीखने की भी…… चारों ने उस दिशा में देखा… तो उनकी सांसें थम गईं……वो और कोई नहीं था वो था वही फॉरेस्ट ऑफिसर… जिसे उन्होंने पैसे दिए थे…
वो जमीन पर घिसटता हुआ…आ रहा था जैसे कोई उसे खींच रहा हो… वो धीरे-धीरे उनकी तरफ आ रहा था… उसके चेहरे पर डर था… आंखें फटी हुई… वो चिल्ला रहा था—
फॉरेस्ट अफसर- “मुझे बचाओ… कोई मुझे घर से उठा लाया…!!”
वो उनके सामने आकर रुक गया… लेकिन खड़ा नहीं हो पा रहा था… जैसे उसके पैर किसी ने पकड़ रखे हों… वो रहस्यमयी आदमी अब उसके सामने आ चुका था… उसकी आवाज़ अब पहले से भारी थी… गुस्से से भरी हुई—
आदमी- “तुम्हारा काम क्या था…?” ऑफिसर कांपते हुए बोला— “जंगल… की… रक्षा…”
आदमी- “और तुमने क्या किया…?”
ऑफिसर रोने लगा— मुझसे गलती हो गई… मुझे माफ कर दो…”
अचानक उसके पीछे खड़ा एक पेड़ हिलने लगा… धीरे-धीरे… उसका तना मुड़ा… और वो पेड़… इंसान जैसा आकार लेने लगा… लंबा… डरावना… और उसकी आंखें… सीधी ऑफिसर पर… ऑफिसर चीखने लगा… लेकिन तभी उसके पैरों में जड़ें निकलने लगीं… वो वहीं जमने लगा… चारों ने ये देखा तो उनके होश उड़ गए…
वे भागने लगे…लेकिन इस बार… जंगल बदल चुका था…रास्ते गायब थे…हर दिशा में वही पेड़… और हर पेड़ के पीछे… कोई खड़ा था… उन्हें लग रहा था… जैसे कोई उनके साथ-साथ चल रहा हो…
हर कदम पर… विक्रम भागते-भागते अचानक गिर पड़ा… उसने महसूस किया… किसी ने उसका पैर पकड़ लिया है…
उसने नीचे देखा… कोई नहीं था… लेकिन पकड़ मजबूत थी… उसने ऊपर देखा… और सामने… वही रहस्यमयी इंसान खड़ा था…
इस बार… उसका चेहरा इंसान का नहीं था… वो था आधा लकड़ी… आधा इंसान…
उसने धीरे से कहा— “जंगल… कभी किसी को छोड़ता नहीं…” तभी… चारों के शरीर भारी होने लगे… उनकी त्वचा सख्त होने लगी… उनकी आवाज़ बंद हो गई और सांसें भी लगभग बंद
वे चिल्लाना चाहते थे… लेकिन आवाज़ बाहर नहीं आ रही थी… धीरे-धीरे… उनके पैरों से जड़ें निकलने लगीं… और वो जमीन में धंसते चले गए… फॉरेस्ट ऑफिसर भी… चीखते-चीखते… उसी तरह पेड़ बन चुका था…
कुछ ही पलों में… वहां पांच नए लाल चंदन के पेड़ खड़े थे… बिल्कुल सीधे… बिल्कुल खामोश…
दूर… पत्थर पर… वही रहस्यमयी इंसान बैठा था… बीड़ी पीते हुए… उसने धीरे से सिर उठाया… और चिल्लाते हुए बोला
मैं राखंदार हूं राखंदार…….मेरे रहते मेरे जंगल को मैं कुछ नहीं होने दूंगा…
The End
अगर आपको ऐसी Horror Stories पसंद हैं, तो ये books भी पढ़ें 👇
