दिन में देवपुरा गांव बिल्कुल साधारण दिखाई देता था। मिट्टी के घर, पुराने पीपल और बरगद के पेड़, खेतों के बीच से गुजरती संकरी पगडंडियां और शाम होते ही घर लौटते मवेशी। यहां रहने वाले लोग एक-दूसरे को नाम से जानते थे और गांव की हर छोटी-बड़ी बात कुछ ही घंटों में पूरे इलाके में फैल जाती थी। 2 AM at Night Horror Story in Hindi लेकिन गांव की एक ऐसी परंपरा थी, जिसके बारे में कोई खुलकर बात नहीं करता था। हर रात जब घड़ी में ठीक 2:00 बजे होते, पूरा गांव अपने आप गहरी खामोशी में डूब जाता। किसी घर का दरवाजा नहीं खुलता, कोई खिड़की नहीं सरकती, यहां तक कि कुत्ते भी भौंकना बंद कर देते। गांव के बुजुर्ग हमेशा कहते थे, “दो बजे के बाद बाहर मत निकलना… क्योंकि उस समय गांव जागता नहीं, किसी और के लिए रास्ता छोड़ देता है।”

छत्तीस वर्षीय महेंद्र चौहान पास के कस्बे में बिजली विभाग में लाइनमैन था। उसका काम अक्सर रात तक खिंच जाता था। तार टूट जाए, ट्रांसफॉर्मर जल जाए या किसी गांव की सप्लाई अचानक बंद हो जाए, तो उसे तुरंत निकलना पड़ता था। वह पढ़ा-लिखा और व्यवहारिक इंसान था। भूत-प्रेत, टोना या गांव की पुरानी मान्यताओं पर उसका कभी भरोसा नहीं रहा। उसके लिए हर घटना का कोई न कोई कारण जरूर होता था।
एक दिन शाम को तेज आंधी आई। कई पेड़ बिजली की लाइनों पर गिर गए। रात करीब साढ़े बारह बजे विभाग से फोन आया कि पड़ोस के गांव में बिजली पूरी तरह चली गई है। वहां एक बुजुर्ग मरीज ऑक्सीजन मशीन पर थे और बिजली तुरंत बहाल करनी जरूरी थी। महेंद्र बिना देर किए औजारों का बैग लेकर निकल पड़ा।
करीब डेढ़ घंटे की मेहनत के बाद बिजली वापस आ गई। गांव वालों ने राहत की सांस ली। महेंद्र ने चाय पी, बाइक स्टार्ट की और अपने गांव की तरफ लौटने लगा। सड़क पूरी तरह सुनसान थी। दूर-दूर तक केवल खेत, अंधेरा और हवा की सरसराहट थी। उसने घड़ी देखी—1:57 AM।
देवपुरा गांव की सीमा बस कुछ ही दूरी पर थी कि अचानक उसकी बाइक झटके से बंद हो गई। उसने दोबारा स्टार्ट करने की कोशिश की, लेकिन इंजन ने कोई जवाब नहीं दिया। उसी समय उसकी कलाई घड़ी ने दो बजने का संकेत दिया।
2:00 AM।
उसी पल ऐसा लगा जैसे पूरी दुनिया की आवाज किसी ने बंद कर दी हो। हवा रुक गई। झींगुर चुप हो गए। दूर कहीं बैल की घंटी बज रही थी, वह भी अचानक थम गई।
महेंद्र ने बाइक सड़क किनारे खड़ी की और पैदल गांव की तरफ चल पड़ा।
गांव का पहला मोड़ पार करते ही उसे अजीब सा एहसास हुआ। हर घर वैसा ही था, लेकिन सब कुछ असामान्य रूप से स्थिर था। किसी घर में लालटेन नहीं जल रही थी। किसी आंगन से खांसने की आवाज तक नहीं आ रही थी।
तभी सामने सफेद साड़ी पहने एक बूढ़ी औरत दिखाई दी। उसके हाथ में मिट्टी का दीया था जिसकी लौ बिल्कुल स्थिर थी, जबकि हवा चल रही थी।
महेंद्र ने आवाज दी।
“अम्मा… इतनी रात को कहां जा रही हैं?”
औरत ने कोई जवाब नहीं दिया।
वह धीमे-धीमे आगे बढ़ती रही।
महेंद्र उसके पीछे चल पड़ा।
कुछ कदम बाद औरत गांव के पुराने चौक की तरफ मुड़ी।
महेंद्र भी मुड़ा…
लेकिन वहां कोई नहीं था।
सिर्फ मिट्टी का एक बुझा हुआ दीया जमीन पर रखा था।
महेंद्र का गला सूख गया।
उसे लगा शायद अंधेरे में आंखों का धोखा हुआ होगा।
वह वापस चलने लगा।
तभी उसे अपने पीछे किसी के नंगे पैरों की धीमी आवाज सुनाई दी।
छप… छप… छप…
वह पलटा।
कोई नहीं।
जैसे ही उसने दोबारा कदम बढ़ाया…
वही आवाज फिर शुरू हो गई।
अब आवाज बिल्कुल उसके पीछे से आ रही थी।
उसने अचानक घूमकर टॉर्च जलाई।
रास्ता खाली था।
लेकिन मिट्टी पर ताजा पैरों के निशान बन रहे थे।
जैसे कोई अदृश्य व्यक्ति उसके पीछे चल रहा हो।
महेंद्र का साहस पहली बार टूटने लगा।
वह तेज कदमों से अपने घर पहुंचा।
दरवाजा खुला हुआ था।
वह सन्न रह गया।
घर से निकलते समय उसने खुद ताला लगाया था।
धीरे से अंदर गया।
आंगन में उसकी मां चारपाई पर बैठी थीं।
उनके सामने तेल का छोटा दीपक जल रहा था।
उन्होंने उसकी तरफ देखा और बिना हैरान हुए पूछा,
“देर हो गई?”
महेंद्र ने राहत की सांस ली।
“अम्मा… आपने दरवाजा क्यों खोला?”
मां ने उसकी बात का जवाब नहीं दिया।
उन्होंने सिर्फ एक सवाल पूछा।
“तू गांव में दो बजे के बाद चला था?”
महेंद्र चौंक गया।
“आपको कैसे पता?”
मां की आंखें कुछ पल के लिए दरवाजे की तरफ चली गईं।
फिर उन्होंने धीमे स्वर में कहा,
“क्योंकि कोई तेरे पीछे भी आया है।”
महेंद्र ने तुरंत पीछे देखा।
कोई नहीं था।
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लेकिन दरवाजे के बाहर गीली मिट्टी में दो तरह के पैरों के निशान साफ दिखाई दे रहे थे।
एक उसके अपने…
और दूसरे किसी ऐसे व्यक्ति के…
जिसके पैरों की उंगलियां उल्टी दिशा में थीं।
उस रात किसी ने कुछ नहीं कहा।
सुबह होते ही महेंद्र गांव के सबसे बुजुर्ग व्यक्ति रामलाल बाबा के पास पहुंचा।
बाबा ने सारी बात सुनने के बाद लंबी सांस ली।
“तुम्हें गांव की पुरानी बात कभी किसी ने नहीं बताई?”
महेंद्र ने सिर हिलाया।
बाबा बोले,
“करीब साठ साल पहले गांव में भीषण आग लगी थी। आधी रात थी। कई परिवार अपने घरों में फंस गए। लोगों ने उन्हें बचाने की कोशिश की, लेकिन आग इतनी तेज थी कि बहुत से लोग बाहर ही नहीं निकल सके। कहते हैं कि जिनकी आखिरी इच्छा घर लौटने की थी, उनकी बेचैन परछाइयां आज भी हर रात दो बजे गांव की गलियों में चलती हैं। वे किसी को नुकसान नहीं पहुंचातीं… लेकिन अगर कोई उनके रास्ते में आ जाए, तो उसे अपने साथ ले जाने की कोशिश जरूर करती हैं।”
महेंद्र ने बात सुनकर मुस्कुराने की कोशिश की।
उसे लगा शायद यह सब गांव की बनाई हुई कहानी है।
लेकिन उसी शाम जब उसने अपनी बाइक ठीक करने के लिए सड़क पर जाकर देखा, तो उसका खून जम गया।
बाइक बिल्कुल सही हालत में थी।
एक किक में स्टार्ट हो गई।
जैसे रात को वह कभी खराब हुई ही न हो।
उस रात उसने तय किया कि वह दो बजे तक जागेगा।
ठीक 1:59 AM पर उसने कमरे की खिड़की से बाहर देखना शुरू किया।
घड़ी ने जैसे ही दो बजाए…
गांव की गली में एक-एक करके धुंधली आकृतियां दिखाई देने लगीं।
पुरुष…
औरतें…
बच्चे…
सबके हाथों में मिट्टी के दीये थे।
कोई किसी से बात नहीं कर रहा था।
सभी एक ही दिशा में बढ़ रहे थे।
गांव के बाहर पुराने सूखे कुएं की तरफ।
महेंद्र बिना सोचे उनके पीछे चल पड़ा।
उसे महसूस हुआ जैसे उसके पैरों पर उसका अपना नियंत्रण नहीं रहा।
कुएं के पास पहुंचकर एक-एक आकृति अंधेरे में उतरने लगी।
कोई आवाज नहीं।
कोई गिरने की आहट नहीं।
बस… गायब।
अब केवल महेंद्र बचा था।
तभी किसी ने उसके कंधे पर हाथ रखा।
उसने पलटकर देखा।
उसकी मां खड़ी थीं।
लेकिन उनके चेहरे पर डर साफ दिखाई दे रहा था।
उन्होंने जोर से उसका हाथ पकड़ा और कहा,
“पीछे मत देखना… बस मेरे साथ चल।”
महेंद्र आंखें बंद किए उनके पीछे-पीछे चलता रहा।
कुछ देर बाद जब उसने आंखें खोलीं, तो वह अपने घर के आंगन में था।
सुबह की पहली रोशनी फैल चुकी थी।
उसे लगा शायद यह सब सपना था।
लेकिन तभी उसकी नजर अपने पैरों पर गई।
उन पर काली, गीली मिट्टी लगी हुई थी।
ठीक वैसी ही मिट्टी…
जो केवल गांव के उस पुराने सूखे कुएं के आसपास मिलती थी।
उस घटना के बाद महेंद्र ने कभी रात दो बजे घर से बाहर कदम नहीं रखा।
आज भी देवपुरा गांव में रात के दो बजते ही हर दरवाजा बंद हो जाता है।
कहा जाता है कि अगर कोई अनजान मुसाफिर उस समय गांव की गलियों में भटक जाए, तो उसे एक लाइनमैन टॉर्च लिए दिखाई देता है। वह रास्ता रोककर मुस्कुराते हुए सिर्फ एक बात कहता है—
“अभी लौट जाओ… क्योंकि दो बजे के बाद यह गांव इंसानों का नहीं रहता।”
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