सुबह के नौ बज रहे थे। शहर के सबसे बड़े रियल एस्टेट एक्सपो में इतनी भीड़ थी कि हर स्टॉल के सामने लोगों की लाइन लगी हुई थी। कोई अपने पहले फ्लैट का सपना देख रहा था, कोई निवेश के लिए प्रॉपर्टी ढूंढ़ रहा था, तो कोई रिटायरमेंट के बाद शांत जिंदगी बिताने के लिए घर तलाश रहा था।

इसी भीड़ में खड़ा था 34 वर्षीय आदित्य त्रिवेदी। Horror Stories in Hindi
वह पेशे से इंटीरियर विजुअलाइज़ेशन आर्टिस्ट था। उसका काम कंप्यूटर पर ऐसे घरों के थ्री-डी मॉडल बनाना था जो अभी बने भी नहीं होते थे। पिछले दस सालों में उसने हजारों घर डिज़ाइन किए थे, लेकिन खुद का घर खरीदने का सपना हर बार पैसों की कमी के कारण टल जाता था।
आज पहली बार उसे लगा कि शायद यह सपना सच हो सकता है।
एक स्टॉल पर बड़ा-सा बोर्ड लगा था—
“सिर्फ आज के लिए – रेडी टू मूव लक्ज़री विला, मार्केट प्राइस से 60% कम।”
इतना बड़ा डिस्काउंट देखकर उसे पहले तो मज़ाक लगा।
लेकिन स्टॉल पर मौजूद सेल्स मैनेजर ने मुस्कुराते हुए कहा,
“सर, सिर्फ एक प्रॉपर्टी बची है। मालिक विदेश जा चुके हैं। उन्हें तुरंत बेचना है।”
आदित्य ने ब्रोशर हाथ में लिया।
घर की तस्वीर किसी फिल्म के सेट जैसी लग रही थी।
दो मंज़िला सफेद विला…
कांच की बड़ी-बड़ी खिड़कियां…
आसपास कोई दूसरा मकान नहीं…
पीछे घना हरियाली वाला इलाका…
और सामने लंबा पत्थरों का रास्ता।
“इतनी कम कीमत क्यों?” आदित्य ने पूछा।
सेल्स मैनेजर कुछ सेकंड चुप रहा।
“बस… कुछ लीगल औपचारिकताएं थीं। अब सब क्लियर है।”
जवाब सामान्य था, लेकिन उसके चेहरे पर एक अजीब-सी झिझक थी।
आदित्य ने ज्यादा ध्यान नहीं दिया।
शाम तक वह उस घर को देखने पहुंच गया।
शहर से लगभग चालीस मिनट दूर एक नया डेवलपमेंट एरिया था।
सड़कें बनी हुई थीं…
स्ट्रीट लाइटें भी लगी थीं…
लेकिन अधिकांश प्लॉट अभी खाली पड़े थे।
पूरे इलाके में सिर्फ वही एक विला पूरी तरह तैयार दिखाई दे रहा था।
कार गेट के सामने रुकी।
लोहे का ऑटोमैटिक गेट धीरे-धीरे खुला।
अंदर कदम रखते ही आदित्य के मुंह से अपने आप निकला—
“कमाल है…”
घर बाहर से तस्वीर से भी ज्यादा खूबसूरत था।
गार्डन बिल्कुल साफ…
कहीं धूल नहीं…
फव्वारा बंद था लेकिन पानी बिल्कुल साफ दिखाई दे रहा था।
जैसे कोई अभी भी इस घर की देखभाल करता हो।
दरवाजा खोलने के लिए एजेंट ने जेब से चाबी निकाली।
लेकिन जैसे ही वह लॉक के पास पहुंचा…
क्लिक…
दरवाजा अपने आप खुल गया।
एजेंट तुरंत हंस पड़ा।
“शायद ठीक से बंद नहीं हुआ होगा।”
आदित्य ने भी यही सोचा।
घर के अंदर हल्की लकड़ी की खुशबू फैली हुई थी।
महंगे फर्नीचर…
दीवारों पर आधुनिक पेंटिंग…
सीढ़ियों के नीचे छोटा-सा इनडोर गार्डन…
Horror Stories in Hindi
सब कुछ बिल्कुल नया।
लेकिन एक बात अजीब थी।
इतने दिनों से बंद पड़े घर में भी हवा ऐसी लग रही थी जैसे अभी-अभी खिड़कियां खोली गई हों।
एजेंट पूरे घर का टूर कराने लगा।
किचन…
स्टडी…
होम थिएटर…
ऊपर तीन बेडरूम…
सब कुछ शानदार था।
फिर वह दूसरे फ्लोर के आखिरी कमरे के सामने रुक गया।
उसने हैंडल पकड़ा…
लेकिन दरवाजा नहीं खोला।
“यह स्टोर रूम है।”
“देख सकता हूं?”
“उसमें कुछ नहीं है सर।”
“फिर भी।”
एजेंट कुछ पल तक उसे देखता रहा।
फिर धीरे से बोला,
“चाबी… शायद ऑफिस में रह गई।”
आदित्य ने सिर हिलाया।
उसे बात थोड़ी अजीब लगी।
पूरा घर खुला था…
सिर्फ यही कमरा बंद क्यों?
घर से लौटते समय आदित्य ने फैसला कर लिया।
वह यही विला खरीदेगा।
उसकी मंगेतर नेहा को जब उसने तस्वीरें दिखाईं तो वह खुशी से उछल पड़ी।
“इतना सुंदर घर… इतने कम पैसों में?”
“किस्मत खुल गई हमारी।”
दोनों अगले ही हफ्ते शिफ्ट हो गए।
पहले दो दिन किसी सपने जैसे बीते।
सुबह बालकनी में चाय…
शाम को गार्डन…
रात को होम थिएटर।
आदित्य बार-बार कहता,
“यकीन नहीं होता कि अब यह सब हमारा है।”
लेकिन तीसरी रात…
कुछ बदल गया।
करीब ढाई बजे उसकी आंख खुली।
उसे लगा नीचे किचन में कोई बर्तन रख रहा है।
टक…
टक…
टक…
वह बिस्तर पर बैठ गया।
नेहा गहरी नींद में थी।
आदित्य धीरे-धीरे नीचे उतरा।
पूरा किचन खाली था।
सभी बर्तन अपनी जगह रखे थे।
उसने पानी पिया और वापस ऊपर चला गया।
जैसे ही वह बेडरूम में पहुंचा…
नीचे फिर वही आवाज आई।
इस बार पहले से तेज।
वह दोबारा नीचे गया।
फिर कुछ नहीं।
तीसरी बार आवाज आई…
लेकिन इस बार ऊपर से।
उसने गर्दन उठाई।
आवाज ठीक उसी बंद स्टोर रूम की दिशा से आ रही थी जिसे एजेंट ने नहीं खोला था।
कुछ सेकंड तक वह सीढ़ियों पर खड़ा सुनता रहा।
फिर सब शांत हो गया।
उसने खुद को समझाया—
“पुराना घर है… लकड़ी सिकुड़ती होगी।”
और वापस सो गया।
अगली सुबह नेहा ने कहा,
“कल रात तुम ऊपर-नीचे क्यों घूम रहे थे?”
“तुम जाग रही थीं?”
“नहीं… लेकिन ऐसा लगा जैसे कोई लगातार सीढ़ियां चढ़-उतर रहा हो।”
आदित्य ने पूरी बात नहीं बताई।
वह नहीं चाहता था कि नेहा बेवजह डर जाए।
लेकिन उसी दिन दोपहर में एक और अजीब घटना हुई।
नेहा किचन में खाना बना रही थी।
अचानक उसे लगा कोई पीछे खड़ा है।
उसने बिना देखे कहा,
“आदित्य, नमक देना।”
कोई जवाब नहीं आया।
उसने मुड़कर देखा।
पीछे कोई नहीं था।
लेकिन फ्रिज के स्टील वाले दरवाजे पर साफ दिखाई दे रहा था…
जैसे किसी की धुंधली परछाई अभी-अभी वहां से हटकर गई हो।
उसने तुरंत आदित्य को फोन किया।
आदित्य हंस पड़ा।
“नई जगह है। दिमाग एडजस्ट कर रहा होगा।”
नेहा भी यही मान गई।
लेकिन शाम को जब दोनों गार्डन में बैठे थे…
उनकी नजर पहली बार सामने वाली सड़क पर गई।
लगभग दो सौ मीटर दूर एक बूढ़ा आदमी खड़ा था।
वह लगातार उसी घर को देख रहा था।
करीब दस मिनट तक।
फिर धीरे-धीरे मुड़ा और चला गया।
अगले दिन…
वह फिर आया।
तीसरे दिन भी।
हर बार वही समय।
शाम के करीब छह बजे।
ना वह गेट के पास आता…
ना आवाज देता…
बस दूर खड़ा होकर घर को देखता रहता।
आखिर चौथे दिन आदित्य खुद उसके पास पहुंच गया।
“नमस्ते अंकल… आप रोज यहां आते हैं?”
बूढ़े ने पहले घर की तरफ देखा।
फिर आदित्य की आंखों में।
“तुम लोग… अंदर रहने लगे?”
“जी।”
“कब से?”
“चार दिन हुए हैं।”
कुछ पल तक बूढ़ा चुप रहा।
फिर उसने बहुत धीमी आवाज में पूछा,
“ऊपर वाला आखिरी कमरा खोला?”
आदित्य चौंक गया।
“आपको उसके बारे में कैसे पता?”
बूढ़े के चेहरे का रंग बदल गया।
उसने बिना जवाब दिए जेब से एक पुरानी चाबी निकाली।
चाबी पूरी तरह जंग लगी हुई थी।
“अगर कभी… रात में यह घर तुम्हें अपने सपने दिखाना शुरू कर दे…”
उसने चाबी आदित्य के हाथ पर रख दी।
“…तो इस चाबी से उस कमरे का दरवाजा खोलना मत।”
“लेकिन यह चाबी किसकी है?”
बूढ़ा कुछ कदम पीछे हट गया।
“जिसने भी उस कमरे को खोला…”
“…उसे फिर कभी अपना असली घर याद नहीं रहा।”
इतना कहकर वह मुड़ा और बिना पीछे देखे तेज कदमों से चला गया।
आदित्य कई मिनट तक सड़क पर खड़ा रहा।
उसकी हथेली में रखी जंग लगी चाबी धूप में चमक रही थी।
और पहली बार…
उसे लगा…
शायद उसने कोई घर नहीं खरीदा…
बल्कि किसी ऐसे सपने में कदम रख दिया है…
जिससे जागना शायद अब संभव नहीं होगा।
अगले भाग में कहानी और रहस्यमयी हो जाएगी—आदित्य और नेहा को ऐसे सपने आने लगेंगे जो धीरे-धीरे वास्तविकता को बदलने लगेंगे, और उस बंद कमरे का रहस्य सामने आना शुरू होगा।
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