Haunted Toll Plaza

जंगल के सुनसान रास्ते की डरावनी कहानी | Haunted Toll Plaza

पुणे से लगभग पैंतालीस किलोमीटर दूर पुराना पहाड़ी रास्ता बारिश के बाद पूरी तरह सुनसान पड़ा था। सड़क के दोनों तरफ काली पहाड़ियां थीं और बीच-बीच में इतनी घनी धुंध उतर रही थी कि कार की हेडलाइट भी कुछ मीटर आगे जाकर सफेद दीवार जैसी दिखाई देने लगती।

राघव ने स्टीयरिंग पर हाथ कसते हुए सामने देखा।

Haunted Toll Plaza

उसे इस रास्ते से आना ही नहीं था।

वह पुणे की एक प्राइवेट कंपनी में काम करता था और उस दिन ऑफिस में देर हो गई थी। आमतौर पर वह एक्सप्रेसवे से घर लौटता था, लेकिन रात में एक ट्रक पलट जाने के कारण रास्ता बंद था।

GPS ने उसे एक दूसरा रास्ता दिखाया था।

स्क्रीन पर लिखा था—

Fastest Route — Save 31 Minutes

राघव ने बिना ज्यादा सोचे वही रास्ता चुन लिया।

शुरुआत के दस मिनट सब सामान्य था।

कभी कोई गांव दिखाई देता, कभी सड़क किनारे बंद दुकान।

लेकिन फिर अचानक मोबाइल नेटवर्क चला गया।

GPS पर नक्शा तो खुला था, मगर नीला तीर एक ही जगह अटक गया।

“कमाल है…”

राघव ने फोन डैशबोर्ड पर रख दिया।

करीब दो किलोमीटर आगे बढ़ने के बाद सड़क और संकरी होने लगी।

दोनों तरफ जंगल था।

बारिश बंद हो चुकी थी, लेकिन पेड़ों से पानी की बूंदें लगातार गिर रही थीं।

तभी सामने पीली रोशनी दिखाई दी।

राघव ने स्पीड कम की।

सड़क के बीच एक पुराना टोल नाका बना था।

दो छोटे केबिन।

ऊपर जंग लगा बोर्ड।

और बीच में लाल-सफेद रंग का बैरियर।

राघव थोड़ा हैरान हुआ।

उसने पहले कभी इस रास्ते पर टोल होने के बारे में नहीं सुना था।

जैसे ही उसकी कार बैरियर के सामने रुकी, बाईं तरफ के केबिन की छोटी खिड़की खुली।

अंदर एक बूढ़ा आदमी बैठा था।

सफेद वर्दी।

सिर पर पुरानी टोपी।

चेहरा बहुत दुबला।

उसने बिना राघव की तरफ देखे कहा—

“चालीस रुपये।”

राघव ने पर्स निकाला।

“FASTag नहीं चलता?”

बूढ़े ने धीरे से सिर उठाया।

“यहां नहीं।”

उसकी आवाज अजीब तरह से सपाट थी।

राघव ने पचास का नोट दिया।

बूढ़े ने दस रुपये वापस किए और एक छोटी गुलाबी पर्ची उसकी तरफ बढ़ा दी।

राघव ने पर्ची लेकर डैशबोर्ड पर रख दी।

बैरियर ऊपर उठा।

वह आगे बढ़ गया।

कुछ सेकंड बाद राघव ने रियर व्यू मिरर में देखा।

टोल नाका धुंध के पीछे गायब हो चुका था।

करीब दस मिनट तक वह लगातार चलता रहा।

फिर उसे एक चीज अजीब लगी।

सड़क पर कोई मोड़ नहीं आ रहा था।

बस वही सीधा रास्ता।

वही पेड़।

वही सफेद डिवाइडर लाइन।

उसने कार की स्क्रीन देखी।

12:37 AM.

“बस… थोड़ा और।”

उसने खुद से कहा।

तभी सामने फिर पीली रोशनी दिखाई दी।

राघव का माथा सिकुड़ गया।

कुछ सेकंड बाद उसकी कार धीमी हो गई।

सामने…

एक टोल नाका था।

दो केबिन।

जंग लगा बोर्ड।

लाल-सफेद बैरियर।

राघव कार रोककर कुछ पल उसे देखता रहा।

“नहीं…”

उसने पीछे मुड़कर सड़क देखी।

वह रास्ता तो कहीं मुड़ा ही नहीं था।

फिर वही टोल कैसे?

खिड़की खुली।

वही बूढ़ा आदमी बैठा था।

इस बार उसने कहा—

“चालीस रुपये।”

राघव हंस पड़ा।

“अरे बाबा, अभी तो दिया आपको।”

बूढ़ा शांत बैठा रहा।

“चालीस रुपये।”

राघव ने डैशबोर्ड से पिछली पर्ची उठाई।

“ये देखिए।”

बूढ़े की नजर पर्ची पर गई।

फिर वह पहली बार हल्का-सा मुस्कुराया।

“वो पिछले चक्कर की थी।”

राघव की मुस्कान गायब हो गई।

“क्या मतलब?”

बूढ़े ने हाथ बाहर किया।

“चालीस रुपये।”

कुछ सेकंड राघव उसे देखता रहा।

फिर उसने गुस्से में चालीस रुपये दिए।

बूढ़े ने दूसरी गुलाबी पर्ची दी।

बैरियर खुल गया।

राघव तेजी से आगे निकल गया।

इस बार उसने कार 70 की स्पीड तक पहुंचा दी।

उसने तय कर लिया था कि अगले गांव या पेट्रोल पंप पर जरूर रुकेगा।

लेकिन सामने कुछ नहीं आया।

पांच मिनट।

दस मिनट।

पंद्रह मिनट।

सिर्फ जंगल।

राघव ने मोबाइल उठाया।

नेटवर्क अभी भी नहीं था।

लेकिन GPS अचानक चल पड़ा।

स्क्रीन पर लिखा था—

Destination: 46 km

राघव चौंका।

जब उसने इस रास्ते पर प्रवेश किया था, तब घर सिर्फ 38 किलोमीटर दूर था।

उसने फोन लॉक करके फेंक दिया।

तभी कार के अंदर एक आवाज आई।

टक।

राघव ने नीचे देखा।

डैशबोर्ड पर रखी दोनों पर्चियों में से एक नीचे गिर गई थी।

उसने पर्ची उठाई।

और पहली बार उस पर ध्यान से नजर डाली।

ऊपर किसी टोल कंपनी का नाम नहीं था।

सिर्फ तारीख छपी थी।

14 July 1998

राघव के हाथ रुक गए।

उसने दूसरी पर्ची उठाई।

3 September 2007

“ये क्या…”

उसने दोनों पर्चियां पलटकर देखीं।

पीछे सिर्फ एक नंबर लिखा था।

पहली पर—

17

दूसरी पर—

18

राघव कुछ समझ पाता, उससे पहले सामने फिर वही पीली रोशनी दिखाई दी।

उसका गला सूख गया।

तीसरी बार वही टोल नाका।

इस बार उसने कार नहीं रोकी।

“भाड़ में जाए।”

उसने एक्सेलरेटर दबाया।

बैरियर तेजी से नजदीक आ रहा था।

लेकिन ठीक टकराने से पहले—

बैरियर अपने आप ऊपर उठ गया।

राघव पूरी रफ्तार से टोल पार कर गया।

कुछ नहीं हुआ।

उसने राहत की सांस ली।

फिर पीछे से बहुत धीमी आवाज आई।

“पर्ची नहीं ली आपने।”

राघव का पूरा शरीर सुन्न हो गया।

आवाज कार के अंदर से आई थी।

उसने धीरे-धीरे रियर व्यू मिरर में देखा।

पीछे की सीट खाली थी।

मगर सीट के बीचोंबीच एक नई गुलाबी पर्ची पड़ी थी।

राघव ने तुरंत ब्रेक मारा।

कार सड़क के किनारे रुक गई।

कुछ सेकंड तक वह सिर्फ पर्ची को देखता रहा।

फिर कांपते हाथ से उठाया।

उस पर तारीख थी—

19 August 2026

राघव की सांस रुक गई।

आज की तारीख।

उसने पर्ची पलटी।

पीछे लिखा था—

19

और उसके नीचे छोटी लिखावट में—

अगला यात्री

राघव ने पर्ची तुरंत फेंक दी।

“ये सब बकवास है।”

वह बार-बार खुद से कहने लगा।

“थक गया हूं… बस दिमाग खेल कर रहा है।”

उसने कार दोबारा स्टार्ट की।

लेकिन इंजन स्टार्ट नहीं हुआ।

एक बार।

दो बार।

तीन बार।

कुछ नहीं।

फिर अचानक कार की सारी लाइटें एक साथ बंद हो गईं।

पूरी तरह अंधेरा।

सिर्फ मोबाइल स्क्रीन की हल्की रोशनी बची।

राघव ने फोन उठाया।

नेटवर्क की एक लाइन आ गई थी।

उसने तुरंत अपने दोस्त निखिल को कॉल लगाया।

फोन जुड़ गया।

“हेलो?”

राघव लगभग चिल्लाया—

“निखिल! मैं पुराने घाट वाले रोड पर फंस गया हूं। यहां कोई अजीब टोल है—”

दूसरी तरफ कुछ सेकंड चुप्पी रही।

फिर निखिल बोला—

“कौन-सा टोल?”

“यार वही जंगल के बीच!”

फिर चुप्पी।

“राघव…”

निखिल की आवाज बदल गई।

“उस रोड पर कोई टोल नहीं है।”

राघव ने सामने देखा।

धुंध कार के चारों तरफ फैल रही थी।

“क्या?”

“वहां कभी एक टोल हुआ करता था। बहुत पुराना। करीब बीस साल पहले बंद हो गया।”

राघव की उंगलियां ठंडी पड़ गईं।

“बंद क्यों हुआ?”

फोन पर सिर्फ हल्की खरखराहट सुनाई दी।

फिर निखिल ने कहा—

“एक रात पहाड़ी से बस नीचे गिर गई थी। उसके बाद पता चला था कि टोल वालों ने खराब मौसम के बावजूद बैरियर खोलकर बस को आगे भेज दिया था।”

राघव ने कुछ नहीं कहा।

“बस में कितने लोग थे?”

उसने धीरे से पूछा।

कुछ सेकंड बाद जवाब आया—

“अठारह।”

राघव की नजर उन पर्चियों पर चली गई।

तभी कॉल कट गई।

मोबाइल स्क्रीन पर No Service दिखाई देने लगा।

और उसी पल सामने कार के शीशे पर—

टक…टक…

राघव जम गया।

फिर दोबारा—

टक…टक…टक।

वह धीरे से सामने देखने लगा।

विंडशील्ड के दूसरी तरफ वही बूढ़ा टोल कर्मचारी खड़ा था।

लेकिन अब वह वैसा नहीं दिख रहा था जैसा केबिन में दिखा था।

उसकी सफेद वर्दी मिट्टी से भरी थी।

चेहरे के एक हिस्से पर सूखा खून था।

और उसकी गर्दन अस्वाभाविक रूप से एक तरफ झुकी हुई थी।

उसने हाथ आगे बढ़ाया।

हाथ में गुलाबी पर्ची थी।

“आपकी एंट्री हो गई है।”

राघव ने डर के मारे कार पीछे करने की कोशिश की।

इंजन अचानक स्टार्ट हो गया।

उसने तुरंत रिवर्स गियर लगाया।

कार पीछे भागने लगी।

वह लगातार पीछे करता गया।

20…

30…

40 की स्पीड।

धुंध के अंदर रास्ता ठीक से दिख भी नहीं रहा था।

फिर अचानक रियर कैमरे में कुछ नजर आया।

सड़क पर लोग खड़े थे।

राघव ने ब्रेक मारा।

पीछे करीब दस-पंद्रह लोग थे।

पुराने कपड़े पहने हुए।

कोई आदमी।

कोई औरत।

कोई बुजुर्ग।

सभी सड़क पर अलग-अलग दूरी पर खड़े थे।

और हर किसी के हाथ में गुलाबी पर्ची थी।

उनके चेहरे नहीं दिख रहे थे।

बस सबका सिर नीचे था।

राघव ने सामने देखा।

बूढ़ा गायब था।

अब उसके पास सिर्फ एक रास्ता बचा था।

आगे।

उसने गाड़ी घुमाई और पूरी रफ्तार से दौड़ा दी।

अचानक GPS अपने आप चालू हुआ।

एक नई स्क्रीन दिखाई दी।

EXIT — 2.4 km

“बस…”

राघव ने एक्सेलरेटर दबाया।

2 किलोमीटर।

1 किलोमीटर।

500 मीटर।

सामने जंगल खत्म होता दिखाई देने लगा।

दूर हाईवे की लाइटें थीं।

राघव की आंखों में उम्मीद लौट आई।

लेकिन ठीक जंगल से बाहर निकलने से पहले सड़क पर फिर एक बैरियर गिर गया।

वह तेजी से ब्रेक दबाता है।

कार बैरियर से कुछ फीट पहले रुक गई।

दाईं तरफ छोटा केबिन था।

इस बार अंदर कोई बूढ़ा नहीं था।

केबिन खाली था।

लेकिन उसकी छोटी खिड़की के सामने एक रजिस्टर खुला पड़ा था।

राघव को समझ नहीं आया क्यों, लेकिन उसकी नजर उस रजिस्टर पर अटक गई।

वह कार से उतरा।

हाईवे सामने दिखाई दे रहा था।

बस बैरियर के दूसरी तरफ।

वह धीरे-धीरे केबिन के पास गया।

रजिस्टर में नाम लिखे थे।

तारीखें।

गाड़ी के नंबर।

कुछ नाम बहुत पुराने थे।

हर नाम के सामने आखिरी कॉलम में सिर्फ एक शब्द लिखा था—

PAID

वह पन्ने पलटता गया।

आखिरी लाइन पर उसकी उंगलियां रुक गईं।

नाम—

Raghav Mehra

गाड़ी का नंबर भी उसका।

समय—

12:22 AM

और आखिरी कॉलम खाली।

तभी पीछे से बूढ़े की आवाज आई।

“किसी का हिसाब अधूरा नहीं छोड़ते साहब।”

राघव ने पलटकर देखा।

बूढ़ा उसके ठीक पीछे खड़ा था।

राघव भागने के लिए मुड़ा।

लेकिन बूढ़े ने उसे छुआ भी नहीं।

सिर्फ कहा—

“पैसा नहीं चाहिए।”

राघव रुक गया।

“फिर क्या चाहिए?”

बूढ़े ने सड़क की तरफ देखा।

जहां धुंध के बीच वे सभी लोग खड़े थे।

“एक आदमी ने हमें आगे जाने दिया था।”

उसकी आंखें राघव पर टिक गईं।

“अब हर बार कोई नया आदमी आगे जाएगा…”

“और कोई पुराना यहां से जाएगा।”

राघव कुछ समझ नहीं पाया।

तभी उन लोगों में सबसे आगे खड़ा एक व्यक्ति धीरे-धीरे चलकर धुंध से बाहर आया।

वह करीब तीस साल का आदमी था।

पुरानी शर्ट।

चेहरा पीला।

उसके हाथ में वही पर्ची थी जिस पर नंबर 18 लिखा था।

वह राघव के पास से गुजरा।

बैरियर अपने आप ऊपर उठ गया।

उस आदमी ने पहली बार सिर उठाकर राघव को देखा।

उसकी आंखों में डर नहीं था।

सिर्फ राहत थी।

वह हाईवे की तरफ चला गया।

कुछ ही सेकंड में गायब हो गया।

बूढ़े ने रजिस्टर में राघव के नाम के सामने लिखा—

PAID

फिर गुलाबी पर्ची उसकी तरफ बढ़ाई।

नंबर—

19

राघव पीछे हट गया।

“नहीं…”

बूढ़ा मुस्कुराया।

“अब आपको सिर्फ इंतजार करना है।”

“किसका?”

बूढ़े ने बैरियर नीचे कर दिया।

“बीसवें यात्री का।”

अगली सुबह पुलिस को पुराने घाट रोड से कुछ किलोमीटर पहले राघव की कार मिली।

कार बिल्कुल सही हालत में थी।

फोन अंदर था।

पर्स अंदर था।

दरवाजे लॉक थे।

लेकिन राघव कहीं नहीं मिला।

पुलिस ने कई दिनों तक जंगल में खोज की।

कुछ नहीं मिला।

उसके परिवार ने पोस्टर लगाए।

दोस्तों ने सोशल मीडिया पर जानकारी शेयर की।

लेकिन समय के साथ मामला ठंडा पड़ गया।

करीब सात महीने बाद रात में उसी सड़क से एक ट्रक ड्राइवर गुजर रहा था।

बारिश हो रही थी।

GPS ने अचानक उसे एक शॉर्टकट दिखाया।

वह जंगल के रास्ते पर मुड़ गया।

कुछ किलोमीटर आगे उसे पीली रोशनी दिखाई दी।

एक पुराना टोल नाका।

लाल-सफेद बैरियर।

ट्रक रुका।

केबिन की खिड़की खुली।

अंदर एक युवा आदमी बैठा था।

चेहरा थका हुआ।

आंखों के नीचे काले घेरे।

उसने बिना ड्राइवर की तरफ देखे हाथ आगे किया।

“चालीस रुपये।”

ड्राइवर ने पैसे दिए।

युवक ने उसे गुलाबी पर्ची दी।

ड्राइवर ने मजाक में पूछा—

“भाई, रात भर यहीं बैठे रहते हो?”

युवक कुछ सेकंड चुप रहा।

फिर पहली बार उसकी तरफ देखा।

उसकी आंखों में डर था।

उसने बहुत धीमे कहा—

“अगली बार GPS शॉर्टकट दिखाए…”

“तो मत मुड़ना।”

ड्राइवर कुछ पूछ पाता उससे पहले बैरियर ऊपर उठ गया।

वह आगे निकल गया।

कुछ देर बाद उसने पर्ची देखी।

पीछे सिर्फ एक नंबर लिखा था—

20

और उसी रात के बाद…

पुराने घाट के उस टोल नाके पर किसी ने राघव को दोबारा नहीं देखा।

Maharashtra Tourism — पुणे और महाराष्ट्र travel information के लिए: Maharashtra Tourism Official Website

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