रात का आखिरी खेत – एक डरावनी गांव की कहानी

रात का आखिरी खेत

सोनवाड़ी गांव के आखिरी छोर से करीब दो किलोमीटर दूर एक पुराना गन्ने का खेत था।

गांव के लोग उसे देवकर का खेत कहते थे।

रात का आखिरी खेत

करीब तीस एकड़ में फैला वह खेत दिन में बिल्कुल सामान्य दिखाई देता था। चारों तरफ हरे-भरे गन्ने, बीच से गुजरती संकरी पगडंडी और खेत के एक कोने पर बनी छोटी-सी पत्थर की कोठरी।

लेकिन सूरज डूबने के बाद उस तरफ कोई जाना पसंद नहीं करता था।

उसकी वजह खेत नहीं था।

वजह थी खेत के बीच खड़ा वह पुराना पानी का पंप

कई साल पहले वहां डीजल इंजन से चलने वाला पंप हुआ करता था। अब उसकी जगह नया मोटर पंप लग चुका था, लेकिन पुराने पंप का जंग लगा लोहे का पहिया आज भी वहीं पड़ा था।

गांव के बुजुर्ग कहते थे कि आधी रात के बाद कभी-कभी वह बंद पड़ा पहिया अपने आप घूमने लगता है।

और जिस रात वह घूमता है…

उस रात गन्ने के खेत में किसी के चलने की आवाज आती है।


उस रात करीब साढ़े ग्यारह बजे माधव खेत के बाहर बनी छोटी कोठरी के सामने चारपाई पर बैठा था।

उम्र करीब बत्तीस साल।

दुबला-पतला शरीर, चेहरे पर हल्की दाढ़ी और कंधे पर पुराना गमछा।

देवकर ने उसे केवल दस दिन पहले खेत की रखवाली के लिए रखा था।

पिछले कुछ दिनों से रात में कोई खेत से गन्ने काटकर ले जा रहा था।

माधव के लिए काम आसान था।

रात खेत में बिताओ।

सुबह घर जाओ।

महीने के आठ हजार रुपये।

उसने छोटा रेडियो चारपाई के पास रखा था। पुराने मराठी गाने धीमी आवाज में बज रहे थे।

सामने लालटेन जल रही थी।

माधव ने चाय का आखिरी घूंट लिया और खाली गिलास नीचे रखा।

चारों तरफ झींगुरों की आवाज थी।

हवा चलती तो गन्ने के लंबे पत्ते आपस में रगड़कर—

सर्र… सर्र…

की आवाज करते।

शुरू के दो दिन माधव को यह जगह थोड़ी डरावनी लगी थी।

अब उसे आदत हो गई थी।

उसने चारपाई पर पैर फैलाए ही थे कि अचानक—

खट्!

खेत के अंदर से आवाज आई।

माधव सीधा बैठ गया।

उसने रेडियो बंद किया।

कुछ सेकंड चुपचाप सुनता रहा।

कोई आवाज नहीं।

“बिल्ली होगी…”

वह बुदबुदाया।

तभी—

खट्… खट्…

इस बार आवाज साफ थी।

जैसे कोई सूखे गन्ने तोड़ रहा हो।

माधव तुरंत उठा।

कोठरी की दीवार से टंगी टॉर्च उठाई और हाथ में मोटी लकड़ी लेकर खेत की तरफ बढ़ा।

“कौन है?”

कोई जवाब नहीं।

“बाहर निकल! मालिक को बुलाऊं क्या?”

फिर भी सन्नाटा।

माधव गन्ने के बीच बनी पगडंडी पर आगे बढ़ने लगा।

टॉर्च की रोशनी कभी दाईं तरफ जाती, कभी बाईं तरफ।

कुछ दूर जाने के बाद वह रुका।

सामने जमीन पर एक ताजा कटा हुआ गन्ना पड़ा था।

माधव झुका।

उसे उठाया।

गन्ना सचमुच अभी-अभी काटा गया था।

“मतलब कोई है अंदर…”

उसने धीरे से कहा।

तभी उसके पीछे—

सर्ररर…

माधव तेजी से पलटा।

टॉर्च की रोशनी गन्नों पर पड़ी।

कुछ नहीं।

लेकिन गन्ने अब भी हिल रहे थे।

जैसे कोई अभी-अभी उनके बीच से निकला हो।

“रुक!”

माधव उस तरफ दौड़ा।

कुछ कदम आगे जाने के बाद उसे दूर कोई आकृति दिखाई दी।

एक आदमी।

वह गन्नों के बीच पीठ करके खड़ा था।

माधव ने टॉर्च उसकी तरफ की।

“कौन है तू?”

आदमी ने जवाब नहीं दिया।

“सुनाई नहीं देता क्या?”

माधव आगे बढ़ा।

अचानक वह आदमी गन्नों के बीच गायब हो गया।

माधव भी उसके पीछे दौड़ा।

कुछ देर बाद उसे एहसास हुआ कि वह खेत के काफी अंदर आ चुका है।

उसने चारों तरफ देखा।

हर तरफ सिर्फ गन्ने।

“किधर गया?”

तभी—

घर्र… घर्र… घर्र…

एक अजीब आवाज सुनाई दी।

माधव का चेहरा बदल गया।

आवाज खेत के पुराने हिस्से से आ रही थी।

वह धीरे-धीरे उस तरफ बढ़ा।

कुछ ही देर में पुराने पंप के पास पहुंच गया।

टॉर्च की रोशनी सामने पड़ी…

और माधव वहीं रुक गया।

वर्षों से बंद पड़े पुराने डीजल पंप का लोहे का पहिया…

धीरे-धीरे घूम रहा था।

घर्र… घर्र… घर्र…

माधव की सांस अटक गई।

उसने आसपास देखा।

“कौन है?”

पहिया अचानक रुक गया।

पूरा खेत शांत हो गया।

फिर पंप के पीछे से किसी आदमी की धीमी आवाज आई—

“पानी…”

माधव पीछे हट गया।

“क… कौन?”

कुछ सेकंड बाद फिर वही आवाज—

“पानी चालू कर…”

माधव ने टॉर्च पंप के पीछे डाली।

वहां कोई नहीं था।

उसका गला सूख गया।

उसने वापस जाने के लिए कदम बढ़ाया।

तभी उसके ठीक पीछे किसी ने फुसफुसाया—

“मेरा खेत सूख रहा है…”

माधव बिना पीछे देखे भाग पड़ा।

उस रात वह दोबारा खेत में नहीं गया।


अगली सुबह देवकर अपने बड़े घर के बरामदे में बैठा चाय पी रहा था।

साठ के आसपास उम्र।

भारी शरीर।

सफेद कुर्ता-पायजामा।

गांव में जमीन का सबसे बड़ा मालिक।

माधव उसके सामने खड़ा था।

“मुझे आज का पैसा दे दीजिए मालिक। मैं काम छोड़ रहा हूं।”

देवकर ने कप नीचे रखा।

“दस दिन में डर गया?”

“डरने की बात नहीं है।”

“तो?”

माधव कुछ पल चुप रहा।

“आपके खेत में रात को कोई घूमता है।”

देवकर हंस पड़ा।

“चोर घूमते हैं। इसीलिए तो तुझे रखा था।”

“वो चोर नहीं था।”

देवकर की हंसी रुक गई।

माधव ने पूरी घटना बता दी।

पुराना पंप।

घूमता पहिया।

और वह आवाज।

मेरा खेत सूख रहा है।

यह सुनते ही देवकर के चेहरे पर कुछ पल के लिए तनाव आया।

लेकिन उसने तुरंत खुद को संभाल लिया।

“ज्यादा कहानी मत बना।”

उसने जेब से पैसे निकालकर माधव की तरफ फेंके।

“जा।”

माधव पैसे उठाकर चला गया।

देवकर उसे जाते हुए देखता रहा।

पीछे से उसकी पत्नी सुमित्रा आई।

“फिर एक आदमी चला गया?”

देवकर चुप रहा।

“मैं कितनी बार कह चुकी हूं उस पुराने पंप को वहां से हटवा दो।”

देवकर ने उसकी तरफ देखा।

“पंप से क्या होगा?”

“तुम जानते हो।”

देवकर का चेहरा सख्त हो गया।

“पुरानी बातें घर में मत दोहराया कर।”

“पुरानी बातें खत्म नहीं हुई हैं।”

सुमित्रा ने धीमे स्वर में कहा।

“बारह साल हो गए… लेकिन उस खेत में आज भी—”

“बस!”

देवकर जोर से बोला।

सुमित्रा चुप हो गई।

देवकर उठकर घर के अंदर चला गया।

लेकिन जाते-जाते उसके कदम कुछ पल के लिए रुक गए।

बारह साल।

वह संख्या उसके दिमाग में घूमने लगी।


गांव में एक आदमी था—रघुनाथ

लोग उसे रघु कहते थे।

आज से बारह साल पहले देवकर का आधा खेत उसी का हुआ करता था।

रघु के पास जमीन ज्यादा नहीं थी, लेकिन वही जमीन उसके परिवार का सहारा थी।

एक साल गांव में भयंकर सूखा पड़ा।

कुएं सूख गए।

फसलें खराब होने लगीं।

रघु ने देवकर से पैसे उधार लिए।

शर्त थी—

फसल आने के बाद पैसा वापस करेगा।

लेकिन उस साल फसल आई ही नहीं।

कर्ज बढ़ता गया।

कुछ महीनों बाद देवकर ने जमीन मांग ली।

रघु तैयार नहीं हुआ।

मामला पंचायत तक गया।

कागज देवकर के पक्ष में थे।

कैसे बने थे, यह गांव में हर कोई समझता था।

लेकिन कोई देवकर के खिलाफ बोलने की हिम्मत नहीं करता था।

रघु की जमीन देवकर के नाम हो गई।

इसके बाद भी रघु ने खेत नहीं छोड़ा।

एक रात वह पुराने पंप के पास बैठा मिला।

अगली सुबह वह गांव छोड़कर चला गया।

लोगों ने मान लिया कि वह किसी दूसरे जिले में मजदूरी करने गया होगा।

लेकिन उसके बाद…

रघु को गांव में किसी ने कभी नहीं देखा।


अगले दो दिन खेत बिना पहरेदार के रहा।

तीसरे दिन सुबह देवकर खेत देखने पहुंचा।

उसकी आंखें फैल गईं।

बीच के हिस्से में करीब बीस-पच्चीस गन्ने टूटे पड़े थे।

लेकिन अजीब बात यह थी कि कोई गन्ना लेकर नहीं गया था।

सभी जमीन पर ही पड़े थे।

जैसे किसी ने चोरी के लिए नहीं…

गुस्से में उन्हें तोड़ा हो।

देवकर ने मजदूरों को बुलाया।

“आज से रात को चार आदमी यहीं रहेंगे।”

एक बूढ़ा मजदूर बोला—

“मालिक, रात का काम मत करवाओ।”

“क्यों?”

वह चुप हो गया।

“बोल!”

“कल दोपहर मैं मोटर बंद करने गया था।”

“तो?”

“पुराने पंप के पास कोई बैठा था।”

देवकर उसे घूरने लगा।

“कौन?”

“पता नहीं।”

“देखा नहीं?”

“पीठ मेरी तरफ थी।”

मजदूर ने निगाहें नीचे कर लीं।

“लेकिन वो बार-बार एक ही बात बोल रहा था।”

देवकर के चेहरे पर तनाव आ गया।

“क्या?”

मजदूर ने धीरे से कहा—

“मेरे हिस्से का पानी मत रोक…”

देवकर कुछ सेकंड बिल्कुल चुप रहा।

फिर अचानक मजदूर पर चिल्लाया—

“काम कर अपना!”


उस रात देवकर सो नहीं पाया।

आधी रात के आसपास उसकी आंख लगी ही थी कि बाहर से आवाज आई।

घर्र… घर्र… घर्र…

उसने आंखें खोलीं।

कमरे में अंधेरा था।

आवाज फिर आई।

घर्र… घर्र…

देवकर उठकर बैठ गया।

वह आवाज पहचानता था।

पुराने डीजल पंप की।

लेकिन उसका घर खेत से दो किलोमीटर दूर था।

आवाज यहां कैसे आ सकती थी?

वह बाहर निकला।

आंगन खाली था।

आवाज बंद हो गई।

उसने राहत की सांस ली।

तभी मुख्य दरवाजे पर—

ठक… ठक… ठक…

देवकर ने पूछा—

“कौन?”

बाहर से जवाब आया—

“मैं हूं मालिक… माधव।”

देवकर ने दरवाजा खोला।

माधव घबराया हुआ खड़ा था।

“क्या हुआ?”

“मालिक, खेत में लोग घुस गए हैं।”

“कितने?”

“पता नहीं। बहुत सारे हैं।”

देवकर तुरंत अंदर गया।

अपनी मोटी लाठी और टॉर्च उठाई।

“चल।”

दोनों मोटरसाइकिल से खेत की तरफ निकल गए।


खेत के बाहर पहुंचते ही देवकर ने मोटरसाइकिल बंद की।

चारों तरफ सन्नाटा था।

“कहां हैं?”

माधव ने खेत की तरफ इशारा किया।

“अंदर।”

दोनों पगडंडी से आगे बढ़े।

करीब सौ मीटर अंदर जाने के बाद देवकर रुका।

“माधव।”

कोई जवाब नहीं।

उसने पीछे देखा।

माधव गायब था।

“माधव?”

सिर्फ गन्नों की सरसराहट।

“कहां गया बे?”

तभी देवकर को कुछ याद आया।

माधव तो तीन दिन पहले काम छोड़ चुका था।

और उसे पता भी नहीं था कि आज खेत में कोई पहरेदार नहीं है।

फिर वह आधी रात उसके घर कैसे पहुंचा?

देवकर के हाथ से टॉर्च लगभग छूट गई।

वह वापस मुड़ा।

लेकिन जिस रास्ते से आया था…

वह रास्ता गायब था।

हर तरफ ऊंचे गन्ने खड़े थे।

“ये क्या…?”

उसने दूसरी तरफ जाने की कोशिश की।

पांच मिनट चलता रहा।

फिर अचानक सामने वही पुराना पंप दिखाई दिया।

देवकर रुक गया।

“नहीं…”

वह दूसरी दिशा में गया।

कुछ देर बाद…

फिर वही पंप।

अब उसकी सांस तेज हो गई।

उसने तीसरा रास्ता चुना।

लेकिन कुछ मिनट बाद फिर उसी जगह पहुंच गया।

पुराने पंप का पहिया धीरे-धीरे घूमने लगा।

घर्र… घर्र… घर्र…

देवकर पीछे हटने लगा।

तभी पंप के दूसरी तरफ कोई बैठा दिखाई दिया।

एक आदमी।

पुरानी सफेद कमीज।

मिट्टी से सनी धोती।

पीठ देवकर की तरफ।

देवकर ने कांपती आवाज में पूछा—

“कौन है?”

आदमी ने जवाब नहीं दिया।

“कौन है बे?”

आदमी धीरे-धीरे खड़ा हुआ।

लेकिन पलटा नहीं।

फिर आवाज आई—

“मालिक… पानी मिलेगा?”

देवकर के चेहरे का रंग उड़ गया।

वह आवाज…

उसे याद थी।

बारह साल पुरानी।

“र… रघु?”

आदमी धीरे-धीरे पलटा।

अंधेरे में चेहरा साफ नहीं दिख रहा था।

लेकिन देवकर पहचान चुका था।

उसके हाथ कांपने लगे।

“तू… तू तो गांव छोड़कर चला गया था।”

रघु की आवाज आई—

“गांव छोड़ा था?”

कुछ पल सन्नाटा रहा।

“या तुमने सबको यही बताया था?”

देवकर पीछे हटने लगा।

और उसी पल उसकी आंखों के सामने बारह साल पुरानी रात घूम गई।


उस रात रघु पुराने पंप के पास बैठा था।

उसने देवकर से आखिरी बार विनती की थी।

“जमीन मत लो मालिक।”

“कागज पर अब जमीन मेरी है।”

“मेरे परिवार का क्या होगा?”

“मुझे नहीं पता।”

रघु ने पंप चालू करने की कोशिश की।

देवकर ने उसे रोक दिया।

“आज से यहां का पानी भी मेरा।”

“फसल सूख जाएगी।”

“सूखने दे।”

दोनों में झगड़ा हुआ।

गुस्से में देवकर ने रघु को धक्का दिया।

रघु पीछे रखे लोहे के हिस्से से टकराकर जमीन पर गिर गया।

कुछ देर तक कोई आवाज नहीं आई।

देवकर घबरा गया।

उसे लगा रघु उठ जाएगा।

लेकिन वह नहीं उठा।

उस रात देवकर ने अपने दो भरोसेमंद लोगों की मदद से रघु को खेत के पुराने सूखे जलकुंड में छिपा दिया।

कुछ महीनों बाद उसी जगह मिट्टी भरकर गन्ने लगा दिए गए।

गांव में खबर फैला दी—

रघु कर्ज से परेशान होकर गांव छोड़ गया।

मामला वहीं खत्म हो गया।

कम से कम देवकर यही समझता रहा।


वर्तमान में देवकर जमीन पर बैठ गया।

“मुझसे गलती हो गई थी।”

सामने खड़ा रघु चुप रहा।

“जो चाहिए ले ले।”

रघु की धीमी हंसी सुनाई दी।

“जमीन?”

देवकर ने तुरंत कहा—

“हां! पूरी जमीन तेरे परिवार के नाम कर दूंगा।”

“मेरा परिवार?”

देवकर चुप हो गया।

रघु की पत्नी वर्षों पहले गांव छोड़ चुकी थी।

उसका कोई पता नहीं था।

“बारह साल पहले मैंने भी यही कहा था।”

रघु आगे बढ़ा।

“मुझे सिर्फ अपना खेत चाहिए था।”

देवकर पीछे सरकने लगा।

अचानक चारों तरफ गन्नों से आवाजें आने लगीं।

सर्र… सर्र… सर्र…

जैसे दर्जनों लोग उसके चारों तरफ चल रहे हों।

देवकर ने टॉर्च घुमाई।

कहीं कोई नहीं।

फिर उसके पैरों के नीचे की मिट्टी गीली होने लगी।

उसने नीचे देखा।

सूखी जमीन से पानी निकल रहा था।

धीरे-धीरे पानी उसके पैरों के आसपास जमा होने लगा।

“ये… ये क्या है?”

पंप का पहिया तेजी से घूमने लगा।

घर्रररररर…

वर्षों से बंद पाइप से अचानक पानी निकल पड़ा।

देवकर घबराकर भागा।

गन्नों के बीच दौड़ता रहा।

कभी बाईं तरफ।

कभी दाईं तरफ।

लेकिन हर रास्ता उसे उसी पुराने पंप तक वापस ले आता।

अचानक उसे दूर रोशनी दिखाई दी।

“रास्ता!”

वह पूरी ताकत से उस तरफ दौड़ा।

रोशनी करीब आती गई।

वह गन्नों से बाहर निकला…

और रुक गया।

यह खेत का बाहर का रास्ता नहीं था।

सामने वही पुराना जलकुंड था जिसे वर्षों पहले मिट्टी से भर दिया गया था।

लेकिन अब वहां गन्ने नहीं थे।

मिट्टी धंस चुकी थी।

बीच में गहरा गड्ढा बन गया था।

उसके दूसरी तरफ रघु खड़ा था।

“मालिक…”

देवकर रोने लगा।

“मुझे जाने दे।”

रघु ने सिर्फ एक सवाल पूछा—

“उस रात मुझे जाने दिया था?”

अचानक देवकर के पीछे से पुराने पंप की तेज आवाज आई।

वह घबराकर पलटा।

वहां कोई नहीं था।

दोबारा सामने देखा…

रघु भी गायब था।

देवकर भागने के लिए मुड़ा।

लेकिन उसका पैर गीली मिट्टी में फिसला।

वह नीचे गिर पड़ा।

उसने पास की घास पकड़कर खुद को रोक लिया।

आधा शरीर गड्ढे के ऊपर लटका था।

वह पूरी ताकत से ऊपर आने की कोशिश करने लगा।

तभी नीचे अंधेरे से आवाज आई—

“मेरे हिस्से का पानी…”

देवकर ने नीचे देखा।

अंधेरे में कुछ दिखाई नहीं दिया।

लेकिन अगले ही पल उसे लगा जैसे किसी ने नीचे से उसका पैर पकड़ लिया हो।

“नहीं!”

उसकी चीख पूरे खेत में गूंज गई।


अगली सुबह मजदूर खेत पहुंचे।

पुराने पंप के पास देवकर बेहोश पड़ा मिला।

वह जिंदा था।

लेकिन होश में आते ही उसने एक ही बात कही—

“खुदाई करवाओ।”

लोगों ने पूछा—

“कहां?”

उसने कांपते हाथ से खेत के पुराने हिस्से की तरफ इशारा किया।

उसी दिन पुलिस बुलाई गई।

खुदाई शुरू हुई।

कुछ फीट मिट्टी हटाने के बाद पुराने कपड़ों के अवशेष मिले।

फिर मानव कंकाल।

गांव में हड़कंप मच गया।

देवकर ने वर्षों पुराना सच कबूल कर लिया।

रघु गांव छोड़कर नहीं गया था।

वह इतने वर्षों से उसी खेत की मिट्टी के नीचे था।


कुछ महीनों बाद देवकर की जमीन का वह हिस्सा कानूनी प्रक्रिया के बाद उसके कब्जे से चला गया।

पुराना पंप भी हटवा दिया गया।

लोगों को लगा अब सब खत्म हो गया।

लेकिन सोनवाड़ी के बुजुर्ग आज भी एक बात बताते हैं।

बरसात के मौसम में कभी-कभी आधी रात के बाद उस खेत के पास से गुजरते समय…

बंद पड़े पानी के पाइप से बहने की आवाज आती है।

और गन्नों के बीच कोई धीमे-धीमे चलता सुनाई देता है।

सर्र… सर्र… सर्र…

लेकिन अब गांव वाले उससे डरते नहीं।

क्योंकि उसके बाद खेत में किसी को नुकसान नहीं हुआ।

बस कभी-कभी दूर से एक आदमी की संतुष्ट आवाज सुनाई देती है—

“अब मेरे हिस्से का पानी मिल गया…”

Wikipedia – Horror Fiction

Haunted Toll Plaza

Raat Ka Aakhri Safar | Horror Story Hindi

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Scroll to Top