रात के करीब ढाई बजे थे।
नाशिक से करीब पैंतीस किलोमीटर दूर पुराने हाईवे पर पुलिस की एक गाड़ी खड़ी थी।
सड़क के किनारे एक सफेद रंग की कार चालू हालत में मिली थी।
हेडलाइट जल रही थी।
इंजन भी चल रहा था।
लेकिन ड्राइवर गायब था।
पुलिस को सबसे अजीब चीज कार के अंदर मिली।
ड्राइवर सीट के सामने लगे छोटे कैमरे की रिकॉर्डिंग अभी भी चालू थी।
रिकॉर्डिंग में कार चला रहा आदमी बार-बार अपने बगल वाली खाली सीट की तरफ देखकर किसी से बात कर रहा था।
लेकिन पूरी रिकॉर्डिंग में उस सीट पर कोई दिखाई नहीं दे रहा था।
आखिरी कुछ सेकंड में उसने अचानक गाड़ी रोक दी। आखिरी टोल नाका | सुनसान हाईवे की डरावनी कहानी
उसका चेहरा डर से सफेद पड़ गया।
वह सामने विंडस्क्रीन की तरफ देखते हुए बस इतना बोला—
“लेकिन… ये टोल नाका तो दस साल पहले बंद हो गया था ना?”
इसके बाद रिकॉर्डिंग बंद हो गई।
उस आदमी का नाम था समीर जाधव।
समीर नाशिक में एक छोटी ट्रैवल एजेंसी के लिए गाड़ी चलाता था।
उसकी उम्र करीब बत्तीस साल थी।
उस रात वह मुंबई से एक यात्री को नाशिक छोड़कर वापस लौट रहा था।
रात के करीब बारह बजकर पचपन मिनट हुए थे।
बारिश कुछ देर पहले ही बंद हुई थी।
सड़क गीली थी और दोनों तरफ फैले खेतों के ऊपर हल्का कोहरा जमा होने लगा था।
समीर ने मोबाइल देखा।
घर पहुंचने में करीब डेढ़ घंटा बाकी था।
उसने पत्नी को मैसेज किया—
“बस आखिरी रास्ता है। डेढ़ घंटे में पहुंच जाऊंगा।”
कुछ किलोमीटर आगे जाने के बाद नेविगेशन ने अचानक नया रास्ता दिखाया।
MAIN HIGHWAY — 74 MINUTES
OLD HIGHWAY — 51 MINUTES
समीर ने स्क्रीन देखी।
तेईस मिनट बच रहे थे।
उसने बिना ज्यादा सोचे पुराना हाईवे चुन लिया।
शुरुआत में रास्ता सामान्य था।
कहीं-कहीं छोटे ढाबे दिखाई दे रहे थे।
लेकिन करीब दस मिनट बाद आबादी खत्म हो गई।
अब सड़क के दोनों तरफ सिर्फ खेत और पुराने पेड़ थे।
समीर ने रेडियो चालू किया।
कुछ सेकंड गाना बजा।
फिर अचानक आवाज टूटने लगी।
खर्र…
खर्र…
और रेडियो बंद हो गया।
समीर ने दोबारा बटन दबाया।
कुछ नहीं हुआ।
“इसको भी अभी खराब होना था।”
वह खुद से बोलते हुए आगे बढ़ गया।
कुछ दूर जाने पर सड़क के किनारे एक पुराना बोर्ड दिखाई दिया।
उस पर धुंधले अक्षरों में लिखा था—
देवगांव — 12 KM
समीर आगे निकल गया।
करीब सात-आठ मिनट बाद फिर वैसा ही बोर्ड आया।
देवगांव — 12 KM
समीर ने भौंहें सिकोड़ लीं।
“अभी भी बारह?”
उसे लगा शायद दो बोर्ड लगे होंगे।
वह आगे बढ़ता रहा।
लेकिन तीसरी बार वही बोर्ड दिखाई दिया।
देवगांव — 12 KM
इस बार उसने गाड़ी धीमी कर दी।
उसने मोबाइल में नक्शा देखा।
स्क्रीन पर उसकी गाड़ी एक जगह स्थिर दिखाई दे रही थी।
GPS SIGNAL LOST.
“कमाल है…”
आखिरी टोल नाका
उसने फोन डैशबोर्ड पर रखा और गाड़ी आगे बढ़ा दी।
करीब पांच मिनट बाद दूर एक हल्की पीली रोशनी दिखाई दी।
समीर को लगा शायद कोई पेट्रोल पंप होगा।
पास पहुंचने पर उसे सड़क के बीच एक पुराना टोल नाका दिखाई दिया।
चार छोटी लेन।
ऊपर जंग लगा बोर्ड।
दो बंद केबिन।
और सबसे दाईं तरफ वाले केबिन में एक पीला बल्ब जल रहा था।
समीर हैरान था।
नेविगेशन में यहां किसी टोल का जिक्र नहीं था।
उसने सबसे दाईं लेन में गाड़ी डाल दी।
बैरियर नीचे था।
समीर ने कार रोकी।
कुछ सेकंड तक कोई नहीं आया।
उसने हॉर्न दिया।
पीले बल्ब वाले केबिन के अंदर हलचल हुई।
एक बूढ़ा आदमी धीरे-धीरे बाहर आया।
उसने पुरानी खाकी वर्दी पहन रखी थी।
सिर पर टोपी थी।
लेकिन उसका चेहरा अंधेरे में साफ नहीं दिखाई दे रहा था।
वह ड्राइवर वाली खिड़की के पास आया।
समीर ने शीशा नीचे किया।
“कितना हुआ?”
बूढ़ा कुछ सेकंड उसे देखता रहा।
फिर बोला—
“अकेले हो?”
समीर को सवाल थोड़ा अजीब लगा।
“हां।”
बूढ़े ने कार के अंदर देखा।
फिर उसकी नजर समीर के बगल वाली खाली सीट पर टिक गई।
“नहीं।”
समीर ने उसकी तरफ देखा।
“क्या?”
बूढ़े ने फिर कहा—
“तुम अकेले नहीं हो।”
समीर के चेहरे से मुस्कान गायब हो गई।
उसने बगल वाली सीट देखी।
वह खाली थी।
पीछे देखा।
वहां भी कोई नहीं था।
“बाबा, मजाक मत करो। कितना टोल है?”
बूढ़े ने जवाब नहीं दिया।
उसने बैरियर उठा दिया।
“जाओ।”
“पैसे?”
“अगली बार दे देना।”
समीर को उसका व्यवहार अजीब लगा, लेकिन उसने कुछ नहीं कहा।
कार आगे बढ़ गई।
कुछ मीटर जाने के बाद उसने रियर-व्यू मिरर में देखा।
बूढ़ा अभी भी सड़क के बीच खड़ा उसकी कार को देख रहा था।
फिर अचानक उसने दोनों हाथ ऊपर किए।
जैसे समीर को रुकने का इशारा कर रहा हो।
समीर ने ब्रेक लगाने के बारे में सोचा।
तभी उसकी बगल वाली सीट से आवाज आई—
“मत रोकना।”
समीर का पूरा शरीर सुन्न पड़ गया।
उसने तुरंत बगल में देखा।
सीट खाली थी।
उसकी सांस तेज हो गई।
“क… कौन?”
कोई जवाब नहीं।
उसने गाड़ी की रफ्तार बढ़ा दी।
कुछ सेकंड बाद फिर आवाज आई।
इस बार बिल्कुल उसके बगल से।
एक महिला की धीमी आवाज।
“वो तुम्हें वापस बुला रहा है।”
समीर ने डरते हुए सीट की तरफ देखा।
वह अब भी खाली थी।
उसने गाड़ी रोकने की हिम्मत नहीं की।
“कौन हो तुम?”
चुप्पी।
फिर सीट बेल्ट अपने आप खिंची।
क्लिक।
बगल वाली खाली सीट का seat belt अपने आप लॉक हो गया।
जैसे वहां कोई बैठा हो।
समीर के हाथ कांपने लगे।
उसने हनुमान चालीसा याद करने की कोशिश की।
तभी महिला की आवाज आई—
“मुझे उससे डर नहीं लगता।”
समीर की सांस अटक गई।
“तुम्हें क्या चाहिए?”
कुछ पल कोई आवाज नहीं आई।
फिर—
“घर जाना है।”
“कहां?”
“आगे।”
“कहां आगे?”
“जहां रास्ता खत्म होता है।”
समीर ने एक्सीलेटर दबा दिया।
अब वह किसी भी तरह मुख्य सड़क पर वापस पहुंचना चाहता था।
लेकिन कुछ मिनट बाद उसे दूर फिर पीली रोशनी दिखाई दी।
उसका दिल बैठ गया।
वही टोल नाका।
वही चार लेन।
वही जंग लगा बोर्ड।
“नहीं…”
उसने कार रोक दी।
इस बार बूढ़ा पहले से सड़क के बीच खड़ा था।
वह जोर-जोर से हाथ हिला रहा था।
“गाड़ी रोक!”
समीर ने शीशा बंद रखा।
बूढ़ा उसके पास दौड़कर आया और कांच पर हाथ मारा।
“उसकी बात मत सुनना!”
समीर ने डरते हुए शीशा थोड़ा नीचे किया।
“मेरी गाड़ी में कौन है?”
बूढ़े का चेहरा पहली बार पीली रोशनी में साफ दिखाई दिया।
उसकी आंखों में डर था।
“तुमने उसे कहां से बैठाया?”
“मैंने किसी को नहीं बैठाया!”
बूढ़ा अचानक शांत हो गया।
“तो उसने तुम्हें चुन लिया।”
समीर कुछ समझ पाता उससे पहले बगल वाली सीट से जोर की आवाज आई—
“चलो!”
कार का हॉर्न अपने आप बजने लगा।
लाइट्स तेजी से flicker करने लगीं।
बूढ़ा पीछे हट गया।
“गाड़ी बंद कर! अभी!”
समीर ने चाबी घुमाई।
लेकिन इंजन बंद नहीं हुआ।
इसके उलट कार अपने आप आगे बढ़ने लगी।
समीर ने ब्रेक दबाया।
ब्रेक कठोर हो चुका था।
बूढ़ा चिल्लाया—
“पीछे मत देखना!”
कार बैरियर तोड़कर आगे निकल गई।
अब स्पीड अपने आप बढ़ रही थी।
60…
70…
80…
समीर स्टीयरिंग संभालने की कोशिश कर रहा था।
तभी उसे पीछे वाली सीट से किसी के धीरे-धीरे सांस लेने की आवाज सुनाई दी।
वह जम गया।
बगल वाली सीट का seat belt खुल चुका था।
क्लिक…
पीछे वाला seat belt लॉक हुआ।
वो चीज अब पीछे बैठी थी।
समीर ने मिरर नहीं देखा।
लेकिन कुछ सेकंड बाद मिरर अपने आप नीचे झुकने लगा।
उसमें पीछे वाली सीट दिखाई दी।
पहले सिर्फ अंधेरा था।
फिर धीरे-धीरे एक महिला का चेहरा दिखाई दिया।
करीब तीस-पैंतीस साल की महिला।
भीगे हुए बाल।
पीला पड़ा चेहरा।
लेकिन वह किसी डरावने रूप में नहीं थी।
उसकी आंखों में सिर्फ एक अजीब उदासी थी।
वह समीर को देख रही थी।
“मुझे याद नहीं किया?”
समीर ने सिर हिलाया।
“मैं तुम्हें नहीं जानता।”
महिला कुछ सेकंड शांत रही।
फिर बोली—
“सात साल पहले।”
समीर का चेहरा बदल गया।
“बरसात की रात।”
उसकी उंगलियां स्टीयरिंग पर कस गईं।
“यही रास्ता।”
समीर की आंखों के सामने अचानक पुरानी याद उभर आई।
सात साल पहले वह एक दूसरी ट्रैवल कंपनी में ड्राइवर था।
उस रात भी तेज बारिश हो रही थी।
इसी पुराने हाईवे पर उसने सड़क किनारे एक पलटी हुई कार देखी थी।
एक आदमी सड़क पर खड़ा मदद मांग रहा था।
कार के अंदर उसकी पत्नी फंसी थी।
समीर ने गाड़ी धीमी की थी।
लेकिन वह रुका नहीं।
उसकी गाड़ी में कंपनी के कुछ पैसे थे।
उसे डर था कि कहीं लूटपाट का जाल न हो।
वह आगे निकल गया था।
अगली सुबह खबर आई थी—
कार में फंसी महिला की मौत हो गई।
समीर ने उस खबर को पढ़ा जरूर था।
लेकिन कुछ दिनों बाद भूल गया।
उसकी आंखों में डर उतर आया।
“तुम… वही हो?”
पीछे बैठी महिला ने कोई जवाब नहीं दिया।
समीर की आंखों में आंसू आने लगे।
“मुझे लगा था कोई लूटने की कोशिश कर रहा है। मुझे नहीं पता था…”
महिला धीरे से आगे झुकी।
“उस रात मैं बहुत देर तक इंतजार करती रही।”
कार की रफ्तार और बढ़ गई।
सामने सड़क अचानक खत्म होती दिखाई दी।
उसके आगे एक अधूरा पुल था।
समीर ने पूरी ताकत से ब्रेक दबाया।
कुछ नहीं हुआ।
100 मीटर।
80 मीटर।
60 मीटर।
समीर चीखा—
“मुझे माफ कर दो!”
पीछे से आवाज आई—
“माफी मुझसे नहीं।”
40 मीटर।
“फिर किससे?”
20 मीटर।
महिला ने सामने इशारा किया।
अचानक कार बंद हो गई।
ब्रेक अपने आप लग गए।
कार पुल के किनारे से कुछ ही मीटर पहले रुक गई।
समीर कुछ देर स्टीयरिंग पर सिर रखकर बैठा रहा।
जब उसने दोबारा मिरर में देखा…
पीछे कोई नहीं था।
सुबह करीब पांच बजे एक दूध की गाड़ी वाले ने उसकी कार वहां देखी।
समीर जिंदा था।
वह उसी दिन पुलिस स्टेशन गया।
सात साल पुराने accident की जानकारी निकलवाई।
मृत महिला का नाम था—
रश्मि पाटील।
उसका पति दुर्घटना में बच गया था।
लेकिन उसके बाद वह उसी इलाके में रहने लगा था।
समीर उसे खोजते हुए देवगांव पहुंचा।
वहां उसे एक छोटा-सा घर मिला।
दरवाजा करीब साठ साल के आदमी ने खोला।
“आप रश्मि पाटील के पति हैं?”
आदमी कुछ पल उसे देखता रहा।
“हां।”
समीर ने सात साल पुरानी पूरी घटना बता दी।
आदमी चुपचाप सुनता रहा।
आखिर में समीर ने सिर झुका लिया।
“उस रात मैं रुक सकता था। लेकिन नहीं रुका। शायद मेरी वजह से…”
आदमी ने उसे बीच में रोक दिया।
“तुम अकेले नहीं थे।”
समीर ने उसकी तरफ देखा।
“उस रात ग्यारह गाड़ियां वहां से निकली थीं।”
वह आदमी अंदर गया और एक पुरानी डायरी लेकर आया।
उसमें गाड़ियों के नंबर लिखे थे।
“मैंने सबके नंबर लिखे थे।”
समीर के हाथ कांप गए।
उसमें उसकी पुरानी गाड़ी का नंबर भी था।
“लेकिन आपको कैसे…?”
“मैं सड़क पर खड़ा हर गाड़ी को रोकने की कोशिश कर रहा था।”
उस आदमी की आंखें भर आईं।
“कोई नहीं रुका।”
कमरे में कुछ देर चुप्पी रही।
फिर समीर को अचानक टोल वाले बूढ़े की याद आई।
“वहां जो पुराना टोल है… वहां एक बूढ़ा काम करता है क्या?”
आदमी ने हैरानी से उसे देखा।
“कौन-सा टोल?”
“देवगांव से पहले वाला।”
उस आदमी का चेहरा धीरे-धीरे गंभीर हो गया।
“वो टोल तो ग्यारह साल पहले बंद हो गया था।”
समीर के पैरों तले जमीन खिसक गई।
“लेकिन वहां एक बूढ़ा था। खाकी कपड़े में।”
आदमी ने दीवार की तरफ देखा।
वहां एक पुरानी तस्वीर लगी थी।
तस्वीर में उसी टोल नाके के सामने चार कर्मचारी खड़े थे।
समीर की नजर उनमें से एक पर जाकर रुक गई।
वही बूढ़ा।
“यही था!”
रश्मि के पति ने तस्वीर उतारी।
“नाम था दत्तात्रय काका।”
“अब कहां हैं?”
आदमी ने समीर की तरफ देखा।
“मर चुके हैं।”
समीर कुछ नहीं बोला।
“कब?”
आदमी ने जवाब दिया—
“उसी रात।”
समीर की सांस रुक गई।
रश्मि के पति ने बताया कि accident की खबर मिलने के बाद दत्तात्रय काका टोल से दौड़कर वहां पहुंचे थे।
उन्होंने रश्मि को बाहर निकालने की कोशिश की।
एम्बुलेंस को फोन किया।
लेकिन मदद आने से पहले रश्मि की मौत हो गई।
कुछ घंटे बाद वापस टोल जाते समय दत्तात्रय काका को एक तेज रफ्तार ट्रक ने टक्कर मार दी।
उस रात उस सड़क पर दो मौतें हुई थीं।
एक ऐसी महिला की, जिसकी मदद के लिए कोई नहीं रुका।
और दूसरा वह आदमी…
जो मदद करने के लिए रुका था।
समीर की आंखों के सामने पिछली रात का दृश्य घूम गया।
दत्तात्रय काका बार-बार उसे रोकने की कोशिश क्यों कर रहे थे…
अब उसे समझ आ गया था।
उस दिन के बाद समीर ने रात में उस पुराने हाईवे का रास्ता कभी नहीं लिया।
लेकिन कहानी वहीं खत्म नहीं हुई।
करीब तीन महीने बाद उसी रास्ते पर एक कॉलेज प्रोफेसर की कार खराब हो गई।
रात के करीब डेढ़ बजे थे।
फोन में नेटवर्क नहीं था।
वह कार के पास खड़ा मदद का इंतजार कर रहा था।
कुछ देर बाद दूर से एक टैक्सी आती दिखाई दी।
टैक्सी उसके पास आकर रुक गई।
ड्राइवर ने शीशा नीचे किया।
“क्या हुआ?”
“गाड़ी बंद हो गई है। देवगांव तक छोड़ देंगे?”
ड्राइवर ने दरवाजा खोल दिया।
“बैठ जाइए।”
प्रोफेसर पीछे बैठ गया।
टैक्सी आगे बढ़ी।
कुछ किलोमीटर बाद उन्हें एक पुराना बंद टोल नाका दिखाई दिया।
टोल के पास खाकी वर्दी में एक बूढ़ा खड़ा था।
टैक्सी उसके सामने से निकली तो बूढ़े ने ड्राइवर की तरफ देखकर मुस्कुराते हुए सिर हिलाया।
प्रोफेसर ने पूछा—
“ये बंद टोल पर कौन खड़ा था?”
ड्राइवर ने रियर-व्यू मिरर में देखा।
“कौन?”
“वही बूढ़े काका।”
ड्राइवर का चेहरा सफेद पड़ गया।
उसने कुछ नहीं कहा।
लेकिन उसी समय प्रोफेसर ने कार के शीशे से बाहर देखा।
सड़क किनारे एक महिला खड़ी थी।
साधारण साड़ी में।
उसने टैक्सी रोकने के लिए हाथ नहीं उठाया।
बस शांत खड़ी रही।
टैक्सी आगे निकल गई।
प्रोफेसर ने पीछे मुड़कर देखा।
महिला के बगल में अब वही बूढ़ा भी खड़ा था।
दोनों सड़क की तरफ देख रहे थे।
जैसे इंतजार कर रहे हों…
कि अगली बार इस रास्ते पर किसी को मदद की जरूरत पड़े—
तो कोई बिना रुके आगे न निकल जाए।
Ministry of Road Transport & Highways, Government of India — Indian road safety और highway information के लिए।