Mrityu Dwar Hindi Horror Story

मृत्यु द्वार — बंद कोठरी का रहस्य

रात के करीब साढ़े बारह बजे थे।

मध्य प्रदेश के पहाड़ी इलाके में बसे छोटे से गांव देवगढ़ में उस रात बारिश रुकने का नाम नहीं ले रही थी।

Mrityu Dwar Hindi Horror Story

गांव से लगभग तीन किलोमीटर दूर जंगल के किनारे एक पुराना मकान था।

लोग उसे रुद्रकोठी कहते थे।

करीब अस्सी साल से खड़ी वह कोठी अब लगभग खंडहर बन चुकी थी। उसकी बाहरी दीवारों पर काई जम गई थी। खिड़कियों के ज्यादातर शीशे टूट चुके थे और मुख्य दरवाजे के ऊपर लगी पत्थर की पट्टी पर लिखा नाम भी लगभग मिट चुका था।

लेकिन उस रात…

वर्षों से बंद उस कोठी की सबसे ऊपरी मंजिल की एक खिड़की में रोशनी जल रही थी।

कमरे के अंदर करीब साठ साल का एक आदमी जमीन पर बैठा था।

उसका नाम था रघुवीर शास्त्री। Mrityu Dwar Hindi Horror Story

उसके सामने जमीन पर सफेद कपड़े से ढकी एक पुरानी लकड़ी की चौकी थी।

चौकी के चारों कोनों पर चार छोटे दीपक जल रहे थे।

और बीच में रखी थी एक अजीब-सी वस्तु।

काले पत्थर से बना एक छोटा दरवाजा।

उसकी ऊंचाई मुश्किल से एक फुट रही होगी।

दरवाजे के चारों तरफ अजीब निशान बने हुए थे।

रघुवीर पिछले कई मिनटों से आंखें बंद करके कुछ बुदबुदा रहा था।

अचानक…

ठक…

वह चुप हो गया।

आवाज उसके सामने रखे उसी छोटे दरवाजे के अंदर से आई थी।

कुछ सेकंड बीते।

ठक… ठक…

इस बार आवाज साफ थी।

जैसे उस एक फुट के पत्थर के दरवाजे के दूसरी तरफ कोई खड़ा होकर बाहर आने के लिए दस्तक दे रहा हो।

रघुवीर की आंखों में चमक आ गई।

“आखिरकार…”

उसने कांपते हुए कहा।

“इतने सालों बाद रास्ता खुल गया।”

तभी दरवाजे के पीछे से किसी महिला की बहुत धीमी आवाज सुनाई दी।

“रघुवीर…”

Mrityu Dwar Hindi Horror Story

रघुवीर की आंखों में आंसू आ गए।

“मीरा?”

दूसरी तरफ कुछ पल खामोशी रही।

फिर आवाज आई—

“दरवाजा खोलो।”

रघुवीर ने तुरंत हाथ आगे बढ़ाया।

लेकिन जैसे ही उसकी उंगलियां पत्थर के दरवाजे तक पहुंचीं…

पीछे कमरे में रखा पुराना आईना अचानक टूट गया।

रघुवीर पलटा।

आईने के बीच एक लंबी दरार पड़ चुकी थी।

और उस दरार के पीछे…

उसे कुछ सेकंड के लिए किसी आदमी का चेहरा दिखाई दिया।

रघुवीर का हाथ रुक गया।

उसके चेहरे से खुशी गायब हो चुकी थी।

क्योंकि उसे एक बात याद आ गई थी।

इस दरवाजे के बारे में उसके गुरु ने मरने से पहले कहा था—

“उस पार से आवाज किसी की भी हो सकती है… लेकिन दरवाजा खोलने से पहले यह जरूर पूछना कि वह तुम्हारे बारे में क्या जानता है।”

रघुवीर ने छोटे दरवाजे की तरफ देखा।

“मीरा…”

“हमारी शादी किस तारीख को हुई थी?”

दूसरी तरफ सन्नाटा छा गया।

रघुवीर की सांसें तेज हो गईं।

फिर अंदर से आवाज आई—

“दरवाजा खोलो, रघुवीर।”

उसने दोबारा पूछा—

“तारीख बताओ।”

कुछ सेकंड बाद…

दरवाजे के पीछे से धीमी हंसी सुनाई देने लगी।

पहले किसी महिला की।

फिर किसी पुरुष की।

और फिर…

एक साथ कई लोगों की।

रघुवीर डरकर पीछे हट गया।

छोटा पत्थर का दरवाजा अपने आप कांपने लगा।

कमरे के चारों दीपक एक साथ बुझ गए।

अंधेरे में सिर्फ एक आवाज गूंजी—

“इतने साल लगा दिए हमें रास्ता दिखाने में…”

और अगले ही पल पूरी कोठी अंधेरे में डूब गई।

उस रात के बाद रघुवीर शास्त्री को किसी ने दोबारा नहीं देखा।


तीस साल बाद

भोपाल में रहने वाला समीर देशमुख पेशे से प्रॉपर्टी फोटोग्राफर था।

उसका काम पुरानी हवेलियों, होटलों और बड़ी properties की professional photography करना था।

एक सुबह उसे एक अनजान नंबर से फोन आया।

“क्या आप समीर देशमुख बोल रहे हैं?”

“जी।”

“देवगढ़ में एक पुरानी property की photography करवानी है।”

“कौन-सी property?”

कुछ सेकंड खामोशी रही।

“रुद्रकोठी।”

समीर ने नाम पहले कभी नहीं सुना था।

उसने सामान्य तरीके से पूछा—

“कितने दिनों का काम है?”

“सिर्फ एक दिन।”

“Payment?”

सामने वाले आदमी ने जो रकम बताई, उसे सुनकर समीर कुछ सेकंड चुप रह गया।

एक दिन के काम के लिए वह उसकी सामान्य फीस से लगभग पांच गुना ज्यादा थी।

“इतना ज्यादा?”

“Property बहुत पुरानी है। अंदर लगभग तीस कमरे हैं।”

“ठीक है। मालिक कौन है?”

फोन पर फिर कुछ पल खामोशी रही।

“आप वहां पहुंचेंगे तो caretaker मिल जाएगा।”

कॉल कट गया।

दो दिन बाद समीर देवगढ़ पहुंचा।

उसके साथ उसका दोस्त और assistant विवेक भी था।

गांव से आगे जाते ही पक्की सड़क खत्म हो गई।

करीब बीस मिनट कच्चे रास्ते पर गाड़ी चलाने के बाद उन्हें जंगल के बीच एक विशाल लोहे का गेट दिखाई दिया।

गेट के पीछे थी—

रुद्रकोठी।

समीर ने गाड़ी रोक दी।

“यही है?”

विवेक ने मोबाइल में location देखते हुए कहा—

“हां।”

दोनों कुछ देर उस इमारत को देखते रहे।

कोठी तस्वीरों में पुरानी लग सकती थी।

लेकिन सामने से देखने पर उसमें कुछ अलग ही था।

ऐसा लग रहा था जैसे वह वर्षों से खाली नहीं…

बल्कि वर्षों से किसी का इंतजार कर रही हो।

गेट के पास लगभग सत्तर साल का एक बूढ़ा आदमी खड़ा था।

“समीर साहब?”

“जी।”

“मैं हरिराम। यहां देखभाल करता हूं।”

हरिराम ने गेट खोल दिया।

अंदर जाते समय उसने अचानक कहा—

“शाम होने से पहले काम खत्म कर लेना।”

समीर मुस्कराया।

“क्यों? यहां बिजली नहीं है?”

हरिराम ने उसकी तरफ देखा।

“बिजली है।”

“फिर?”

“बस… रात को यहां रहना ठीक नहीं।”

विवेक ने समीर की तरफ देखकर हल्की मुस्कान दी।

उसे लगा बूढ़ा आदमी उन्हें डराने की कोशिश कर रहा है।

तीनों अंदर चले गए।


रुद्रकोठी अंदर से उम्मीद से कहीं ज्यादा बड़ी थी।

बीच में विशाल हॉल।

दोनों तरफ लकड़ी की सीढ़ियां।

दीवारों पर पुराने portraits।

ज्यादातर तस्वीरों में एक ही परिवार के लोग दिखाई दे रहे थे।

हरिराम ने बताया—

“ये कोठी शास्त्री परिवार की थी।”

समीर एक तस्वीर के सामने रुक गया।

तस्वीर में लगभग साठ साल का आदमी था।

नीचे नाम लिखा था—

रघुवीर शास्त्री — 1938-1996

समीर ने पूछा—

“इनकी मौत यहीं हुई थी?”

हरिराम तुरंत चुप हो गया।

“पता नहीं।”

“मतलब?”

“उनकी लाश कभी मिली ही नहीं।”

समीर ने तस्वीर की एक फोटो ले ली।

तभी विवेक की आवाज आई—

“समीर… इधर आ।”

वह सीढ़ियों के पास खड़ा था।

वहां दीवार पर कोठी का पुराना नक्शा लगा हुआ था।

नक्शे में नीचे basement भी दिखाया गया था।

समीर ने हरिराम से पूछा—

“नीचे भी कमरे हैं?”

“थे।”

“थे मतलब?”

“तीस साल पहले बंद कर दिए।”

“चाबी?”

हरिराम ने साफ कहा—

“मेरे पास नहीं है।”

लेकिन यह कहते समय उसकी नजरें समीर से हट गई थीं।

समीर समझ गया।

चाबी उसी के पास थी।


उन्होंने photography शुरू कर दी।

दोपहर तक सब सामान्य रहा।

लेकिन करीब तीन बजे विवेक ने एक अजीब बात notice की।

“समीर।”

“क्या?”

“तूने ऊपर वाले कमरे की photos ली थीं?”

“हां।”

“ये देख।”

उसने camera screen दिखाई।

एक कमरे की पहली तस्वीर बिल्कुल सामान्य थी।

दूसरी भी।

लेकिन तीसरी तस्वीर में कमरे के पीछे लगा लकड़ी का दरवाजा खुला हुआ दिखाई दे रहा था।

समीर ने तुरंत कहा—

“शायद मैंने ही खोला होगा।”

विवेक ने अगली तस्वीर दिखाई।

दरवाजा फिर बंद था।

“दो photos के बीच सिर्फ तीन सेकंड का gap है।”

समीर कुछ देर स्क्रीन देखता रहा।

“Camera glitch होगा।”

दोनों ने बात वहीं खत्म कर दी।

लेकिन शाम के करीब पांच बजे दूसरी घटना हुई।

विवेक bathroom की photography कर रहा था।

अचानक उसने आवाज लगाई—

“समीर!”

समीर दौड़कर वहां पहुंचा।

“क्या हुआ?”

विवेक आईने की तरफ देख रहा था।

आईने की धूल पर किसी ने उंगली से लिखा था—

नीचे मत जाना।

समीर ने तुरंत हरिराम को बुलाया।

लेकिन हरिराम उसे देखते ही घबरा गया।

“आप दोनों अभी यहां से चलिए।”

“ये किसने लिखा?”

“मुझे नहीं पता।”

“इस कोठी में हमारे अलावा कौन है?”

हरिराम ने कोई जवाब नहीं दिया।

समीर उसके पास गया।

“आप कुछ छिपा रहे हैं।”

हरिराम की नजर basement के नक्शे पर चली गई।

कुछ सेकंड बाद उसने धीमी आवाज में कहा—

“रघुवीर शास्त्री पागल नहीं थे।”

“क्या मतलब?”

“गांव वाले कहते थे कि पत्नी की मौत के बाद उनका दिमाग खराब हो गया था। लेकिन सच कुछ और था।”

हरिराम ने मुख्य दरवाजे की तरफ देखा।

बाहर सूरज लगभग डूब चुका था।

“अब यहां बात करने का समय नहीं है।”

उसने जेब से एक पुरानी चाबी निकाली।

समीर चौंक गया।

“Basement?”

“हां।”

“अभी तो आप कह रहे थे चाबी नहीं है।”

“क्योंकि नीचे जो है, उसे बंद ही रहना चाहिए।”

“तो अब दे क्यों रहे हो?”

हरिराम ने चाबी उसकी हथेली पर रख दी।

“क्योंकि तुम दोनों के आने के बाद उसने फिर दस्तक देना शुरू कर दिया है।”

समीर कुछ समझ नहीं पाया।

“किसने?”

हरिराम ने सिर्फ इतना कहा—

“दरवाजे ने।”


उसी समय बाहर तेज बारिश शुरू हो गई।

कच्चा रास्ता कुछ ही मिनटों में कीचड़ से भर गया।

हरिराम गांव की तरफ निकल चुका था।

समीर और विवेक को मजबूरन कोठी में रुकना पड़ा।

रात के करीब नौ बजे बिजली चली गई।

दोनों हॉल में emergency light लगाकर बैठे थे।

तभी ऊपर से आवाज आई।

ठक…

विवेक ने सिर उठाया।

“सुना?”

ठक… ठक…

समीर ने flashlight उठा ली।

“ऊपर से आ रही है।”

दोनों सीढ़ियां चढ़कर पहली मंजिल पर पहुंचे।

आवाज अब corridor के आखिरी कमरे से आ रही थी।

ठक… ठक… ठक…

विवेक ने कहा—

“अंदर कोई है?”

समीर ने दरवाजा खोला।

कमरा खाली था।

लेकिन दस्तक अभी भी आ रही थी।

समीर ने flashlight चारों तरफ घुमाई।

तभी विवेक ने नीचे देखा।

“आवाज नीचे से आ रही है।”

दोनों चुप हो गए।

वह आवाज फर्श के नीचे से आ रही थी।

ठक… ठक…

समीर को हरिराम की बात याद आई।

“Basement।”

दोनों नीचे आए।

समीर ने पुरानी चाबी निकाली।

Basement का दरवाजा खोलते ही सीढ़ियां अंधेरे में उतरती दिखाई दीं।

विवेक ने कहा—

“मुझे नहीं लगता हमें जाना चाहिए।”

“बस देखकर वापस आएंगे।”

दोनों नीचे उतर गए।

तहखाना उम्मीद से बहुत बड़ा था।

दीवारों पर पुरानी अलमारियां थीं।

एक तरफ टूटे furniture का ढेर।

लेकिन सबसे आखिर में एक लोहे का दरवाजा था।

और दस्तक उसी के पीछे से आ रही थी।

ठक… ठक…

समीर धीरे-धीरे आगे बढ़ा।

दरवाजे पर बाहर से ताला लगा था।

उसके ऊपर एक छोटी तख्ती थी—

कक्ष 31

विवेक ने तुरंत कहा—

“नक्शे में तीस कमरे थे।”

समीर भी यही सोच रहा था।

फिर इकतीसवां कमरा कहां से आया?

उसने ताला देखा।

अजीब बात थी।

हरिराम की दी हुई चाबी उसमें फिट हो गई।

“मत खोल।”

विवेक ने उसका हाथ पकड़ लिया।

उसी समय अंदर से एक आवाज आई—

“समीर…”

दोनों जम गए।

समीर ने विवेक की तरफ देखा।

“इसको मेरा नाम कैसे पता?”

फिर आवाज आई—

“समीर बेटा…”

इस बार उसके हाथ से flashlight लगभग गिर गई।

वह आवाज उसकी मां की थी।

समीर की मां की मृत्यु पांच साल पहले हो चुकी थी।

“मां?”

विवेक ने तुरंत कहा—

“नहीं। दरवाजा मत खोल।”

अंदर से आवाज आई—

“मुझे यहां से निकाल।”

समीर की आंखें नम होने लगीं।

“मां…?”

विवेक ने उसे पीछे खींच लिया।

“तुझे समझ नहीं आ रहा? तेरी मां यहां कैसे हो सकती है?”

अचानक आवाज बंद हो गई।

फिर…

दरवाजे के पीछे से किसी पुरुष की आवाज आई।

“सही कह रहा है विवेक।”

अब विवेक का चेहरा सफेद पड़ गया।

“ये…”

समीर ने उसकी तरफ देखा।

“किसकी आवाज है?”

विवेक के होंठ कांप रहे थे।

“मेरे पापा की।”

कुछ सेकंड तक दोनों बिल्कुल शांत खड़े रहे।

फिर दरवाजे के अंदर से तीसरी आवाज आई।

इस बार किसी बूढ़े आदमी की—

“तुम दोनों बहुत देर से आए।”

लोहे का ताला अपने आप खुलकर जमीन पर गिर गया।

दरवाजा धीरे-धीरे खुल गया।

अंदर छोटा-सा कमरा था।

कमरे के बीच पत्थर की मेज।

और उसके ऊपर रखा था—

वही एक फुट ऊंचा काले पत्थर का दरवाजा।

समीर धीरे-धीरे उसके पास गया।

पत्थर के दरवाजे पर दर्जनों नाम खुदे हुए थे।

सबसे ऊपर—

मीरा शास्त्री।

उसके नीचे—

रघुवीर शास्त्री।

फिर कई दूसरे नाम।

लेकिन सबसे नीचे दो नाम देखकर समीर की सांस रुक गई।

विवेक शर्मा।

और उसके ठीक नीचे—

समीर देशमुख।

विवेक पीछे हट गया।

“हमारे नाम यहां कैसे हो सकते हैं?”

तभी पीछे लोहे का दरवाजा बंद हो गया।

अंधेरे में बूढ़े आदमी की आवाज आई—

“क्योंकि नाम आज नहीं लिखे गए।”

Emergency light अपने आप जल उठी।

कमरे के कोने में कोई खड़ा था।

रघुवीर शास्त्री।

बिल्कुल उसी तस्वीर वाला चेहरा।

उसी उम्र में।

जैसे पिछले तीस वर्षों में उसके शरीर पर एक दिन भी न बीता हो।

समीर ने कांपते हुए पूछा—

“आप… जिंदा हैं?”

रघुवीर मुस्कराया।

“नहीं।”

“फिर आप कौन हैं?”

“मैं वो हूं जिसने गलती से इस तरफ का दरवाजा खोल दिया था।”

उसने पत्थर के छोटे दरवाजे की तरफ इशारा किया।

“हम सोचते हैं कि मरने के बाद इंसान कहीं चला जाता है। लेकिन कुछ पुराने ग्रंथ कहते हैं कि जीवन और मृत्यु के बीच एक जगह है।”

“एक बंद रास्ता।”

“एक ऐसा रास्ता जिसके दोनों तरफ दरवाजे हैं।”

समीर ने पूछा—

“आपने इसे क्यों खोला?”

रघुवीर की आंखें झुक गईं।

“अपनी पत्नी को वापस लाने के लिए।”

“लेकिन वह नहीं आई।”

“उसकी आवाज आई।”

“उसकी यादें आईं।”

“उसकी बातें आईं।”

“बस… वह नहीं आई।”

विवेक ने पूछा—

“तो कौन आया?”

रघुवीर ने उसकी तरफ देखा।

“वो चीज जो दरवाजे के दूसरी तरफ खड़ी होकर हमारे मरे हुए लोगों की बातें सुनती रहती है।”

कमरे में सन्नाटा छा गया।

“उसे शरीर चाहिए।”

“लेकिन वह जबरदस्ती नहीं आ सकती।”

“कोई जीवित इंसान खुद दरवाजा खोले… तभी रास्ता बनता है।”

समीर ने छोटे दरवाजे की तरफ देखा।

“फिर हमारे नाम?”

रघुवीर ने जवाब दिया—

“हर तीस साल में यह दरवाजा दो नए लोगों को बुलाता है।”

“एक दरवाजा खोलता है।”

“दूसरा उस चीज को बाहर ले जाने के लिए शरीर देता है।”

विवेक तुरंत पीछे हट गया।

“हम कुछ नहीं खोलेंगे।”

रघुवीर की आंखों में अजीब उदासी दिखाई दी।

“तुम पहले ही खोल चुके हो।”

समीर चौंक गया।

“क्या?”

“कक्ष 31 का दरवाजा।”

अचानक पत्थर के छोटे दरवाजे के अंदर से जोरदार दस्तक हुई।

धड़ाम!

दोनों पीछे हट गए।

धड़ाम!

पत्थर में दरार पड़ने लगी।

रघुवीर चिल्लाया—

“भागो!”

समीर और विवेक लोहे के दरवाजे की तरफ दौड़े।

लेकिन वह नहीं खुला।

पीछे से पत्थर टूटने की आवाज आई।

फिर अचानक…

सब शांत हो गया।

समीर ने पीछे देखा।

छोटा दरवाजा खुल चुका था।

लेकिन उसके पीछे कोई दीवार नहीं थी।

वहां सिर्फ गहरा अंधेरा था।

इतना गहरा कि flashlight की रोशनी भी उसमें गायब हो रही थी।

फिर उस अंधेरे से समीर की मां की आवाज आई—

“बेटा…”

समीर ने आंखें बंद कर लीं।

“तुम मेरी मां नहीं हो।”

आवाज तुरंत बंद हो गई।

फिर वही आवाज बोली—

“सही पहचाना।”

अब वह उसकी मां की आवाज नहीं थी।

वह दर्जनों लोगों की आवाज एक साथ थी।

विवेक चिल्लाया—

“इसे बंद कैसे करें?”

रघुवीर ने कहा—

“जिसकी कोई याद इस तरफ मौजूद न हो… उसकी आवाज वह नहीं बना सकता।”

समीर समझ नहीं पाया।

तभी उसे अपना camera याद आया।

उसने तुरंत पिछले photographs देखना शुरू किया।

एक तस्वीर पर आकर वह रुक गया।

वह रघुवीर का portrait था।

समीर ने camera उसकी तरफ कर दिया।

“आपकी तस्वीर अभी भी ऊपर लगी है।”

रघुवीर कुछ समझ गया।

“यानी मेरी याद अभी इस घर में है।”

उसने समीर से camera लिया।

फिर जमीन पर पटक दिया।

Camera टूट गया।

उसी समय ऊपर से जोरदार आवाज आई।

जैसे दीवार से कोई भारी चीज नीचे गिरी हो।

रघुवीर का portrait।

रघुवीर मुस्कराया।

“अब इस दुनिया में मेरी आखिरी पहचान भी खत्म हो गई।”

अंधेरे के अंदर से आवाज आई—

“नहीं!”

रघुवीर छोटे दरवाजे की तरफ बढ़ा।

समीर चिल्लाया—

“क्या कर रहे हैं?”

“तीस साल पहले मैंने इसे खोला था।”

“अब मैं ही बंद करूंगा।”

रघुवीर ने दोनों हाथ दरवाजे पर रखे।

अंदर से काली परछाइयां उसकी तरफ बढ़ीं।

लेकिन इस बार वे उसका रूप नहीं बना पा रही थीं।

रघुवीर ने पूरी ताकत से पत्थर का दरवाजा बंद कर दिया।

धड़ाम!

पूरा तहखाना कांप उठा।

Emergency light बुझ गई।

कुछ सेकंड बाद…

सन्नाटा।

जब समीर ने flashlight जलाई…

रघुवीर गायब था।

पत्थर का छोटा दरवाजा बंद था।

उस पर लिखे सारे नाम मिट चुके थे।

सिवाय एक के।

समीर देशमुख।

समीर का चेहरा उतर गया।

विवेक ने कहा—

“चल यहां से।”

दोनों किसी तरह बाहर निकले।

सुबह होते ही बारिश रुक गई।

वे बिना photography पूरी किए भोपाल लौट आए।

समीर ने उस घटना के बाद पुरानी properties की photography करना बंद कर दिया।

उसने अपना camera भी बदल दिया।

कुछ महीनों बाद जिंदगी फिर सामान्य होने लगी।

उसे लगने लगा कि रुद्रकोठी में जो हुआ था, वह वहीं खत्म हो चुका है।

फिर एक रात…

करीब 2:13 बजे उसकी नींद खुली।

कमरे में कोई आवाज आई थी।

ठक…

समीर उठकर बैठ गया।

उसने दरवाजे की तरफ देखा।

कोई नहीं था।

फिर आवाज आई—

ठक… ठक…

इस बार आवाज दरवाजे से नहीं आई थी।

उसकी नजर कमरे की अलमारी पर गई।

वह धीरे-धीरे वहां पहुंचा।

आवाज अलमारी के अंदर से आ रही थी।

उसने दरवाजा खोला।

अंदर कपड़ों के बीच एक छोटा पैकेट रखा था।

समीर का दिल तेजी से धड़कने लगा।

उसने पैकेट बाहर निकाला।

उसके ऊपर कोई नाम नहीं था।

उसने उसे खोला।

अंदर वही पुराना memory card था जो रुद्रकोठी में टूटे camera के अंदर लगा था।

“ये यहां कैसे आया?”

उसने laptop में memory card लगाया।

उसमें सिर्फ एक photograph बची थी।

समीर ने तस्वीर खोली।

वह कक्ष 31 की तस्वीर थी।

कमरे में पत्थर का छोटा दरवाजा दिखाई दे रहा था।

लेकिन photograph देखकर समीर की सांस अटक गई।

उसे याद था कि उसने वह तस्वीर तब ली थी जब कमरे में सिर्फ वह और विवेक मौजूद थे।

मगर तस्वीर में…

उन दोनों के पीछे एक तीसरा आदमी खड़ा था।

समीर ने zoom किया।

वह रघुवीर नहीं था।

वह हरिराम भी नहीं था।

वह कोई अनजान आदमी था।

उसका चेहरा धुंधला था।

लेकिन उसके हाथ में कुछ साफ दिखाई दे रहा था।

एक कागज।

समीर ने और zoom किया।

कागज पर लिखा था—

“दरवाजा बंद नहीं हुआ है।”

तभी laptop की screen अपने आप black हो गई।

समीर पीछे हट गया।

Black screen पर उसका reflection दिखाई दे रहा था।

लेकिन उसके reflection के पीछे…

वही अनजान आदमी खड़ा था।

समीर तुरंत पलटा।

कमरा खाली था।

उसने वापस screen की तरफ देखा।

अब वहां भी कोई नहीं था।

फिर laptop के speakers से बहुत धीमी आवाज आई—

“रघुवीर ने हमें बाहर आने से नहीं रोका…”

कुछ सेकंड खामोशी रही।

फिर आवाज उसके बिल्कुल पीछे से आई—

“उसने सिर्फ दरवाजा बदल दिया।”

समीर धीरे-धीरे नीचे देखने लगा।

उसकी अलमारी के नीचे फर्श पर काले रंग की एक पतली रेखा दिखाई दे रही थी।

रेखा धीरे-धीरे फैलने लगी।

कुछ ही सेकंड में उसने एक छोटे चौकोर दरवाजे का आकार बना लिया।

और फिर…

उसके अंदर से तीन बार दस्तक हुई।

ठक…

ठक…

ठक…

समीर पीछे हट गया।

तभी अंदर से एक जानी-पहचानी आवाज आई।

लेकिन इस बार वह उसकी मां की नहीं थी।

वह विवेक की आवाज थी।

“समीर… दरवाजा मत खोलना।”

समीर का चेहरा सफेद पड़ गया।

उसने तुरंत विवेक को फोन लगाया।

एक बार घंटी गई।

दो बार।

तीसरी बार किसी ने फोन उठा लिया।

समीर ने घबराकर पूछा—

“विवेक… तू ठीक है?”

दूसरी तरफ कुछ सेकंड तक सिर्फ सांस लेने की आवाज आती रही।

फिर विवेक की आवाज आई—

“मैं बिल्कुल ठीक हूं।”

समीर ने राहत की सांस ली।

लेकिन अगले ही पल फर्श के अंदर से फिर विवेक की आवाज आई—

“समीर…”

“फोन पर जो है…”

“वो मैं नहीं हूं।”

समीर के हाथ से मोबाइल छूट गया।

फोन जमीन पर गिरते ही speaker अपने आप चालू हो गया।

दूसरी तरफ से धीमी हंसी सुनाई देने लगी।

और फिर वही आवाज बोली—

“अब तुम्हें समझ आया?”

“एक दरवाजा रुद्रकोठी में था…”

“दूसरा तुम्हारे घर में है…”

कुछ सेकंड खामोशी रही।

फिर उसके कमरे के बाहर…

मुख्य दरवाजे पर किसी ने दस्तक दी।

ठक… ठक… ठक…

समीर वहीं खड़ा रह गया।

बाहर से विवेक की आवाज आई—

“समीर! जल्दी दरवाजा खोल!”

लेकिन उसी समय…

फर्श के छोटे काले दरवाजे के अंदर से भी विवेक की आवाज आई—

“मत खोलना।”

समीर की नजर कभी घर के मुख्य दरवाजे पर जाती…

तो कभी फर्श पर बने उस काले दरवाजे पर।

दोनों तरफ विवेक था।

लेकिन असली कौन था…

यह जानने का अब उसके पास सिर्फ एक तरीका था।

उसे वही सवाल पूछना था जो तीस साल पहले रघुवीर ने पूछा था।

ऐसा सवाल…

जिसका जवाब केवल असली विवेक जानता हो।

समीर मुख्य दरवाजे के पास गया।

उसने कांपती आवाज में पूछा—

“रुद्रकोठी में पहली तस्वीर खराब होने के बाद तूने मुझसे क्या कहा था?”

बाहर अचानक सन्नाटा छा गया।

समीर इंतजार करता रहा।

फिर बाहर खड़े विवेक ने कहा—

“Camera glitch होगा।”

समीर का चेहरा उतर गया।

वह बात विवेक ने नहीं…

समीर ने कही थी।

उसी पल फर्श के अंदर से विवेक चीखा—

“समीर! भाग!”

मुख्य दरवाजे की कुंडी अपने आप घूमने लगी।

समीर पीछे हट गया।

दरवाजा धीरे-धीरे खुलने लगा।

बाहर कोई खड़ा था।

उसका चेहरा बिल्कुल विवेक जैसा था।

लेकिन वह मुस्करा रहा था।

“एक बात रघुवीर तुम्हें बताना भूल गया था।”

समीर पीछे हटता गया।

“क्या?”

विवेक जैसे दिखने वाले उस आदमी ने घर के अंदर कदम रखा।

“हम सिर्फ मरे हुए लोगों की आवाज नहीं सीखते…”

उसकी मुस्कान और चौड़ी हो गई।

“एक बार दरवाजा खुल जाए…”

“तो हम जीवित लोगों को भी सीखना शुरू कर देते हैं।”

उसी क्षण कमरे की सारी lights बुझ गईं।

अंधेरे में सिर्फ एक आखिरी आवाज सुनाई दी—

ठक… ठक… ठक…

अगली सुबह पड़ोसियों ने समीर के घर का मुख्य दरवाजा खुला पाया।

घर के अंदर कोई नहीं था।

पुलिस को सिर्फ उसका मोबाइल मिला।

उसमें रात 2:31 बजे एक आखिरी photograph खींची गई थी।

तस्वीर में समीर अपने कमरे के बीच खड़ा था।

उसके पीछे अलमारी थी।

फर्श बिल्कुल सामान्य था।

लेकिन तस्वीर के सबसे अंधेरे कोने में…

एक छोटा काला दरवाजा खुला हुआ दिखाई दे रहा था।

और उसके अंदर से कोई बाहर देख रहा था।

पुलिस ने समीर और विवेक दोनों की तलाश की।

लेकिन दोनों कभी नहीं मिले।

रुद्रकोठी की जांच भी की गई।

वहां पुलिस को कोई कक्ष 31 नहीं मिला।

पुराने नक्शे के अनुसार उस तहखाने में हमेशा से केवल तीस कमरे थे।

लेकिन जांच के दौरान एक पुलिसकर्मी ने हॉल में लगी पुरानी तस्वीरों में कुछ अजीब देखा।

रघुवीर शास्त्री के portrait के ठीक बगल में एक नई तस्वीर लगी थी।

उसमें दो आदमी खड़े थे।

समीर और विवेक।

तस्वीर कितनी पुरानी थी, यह कोई नहीं बता सका।

क्योंकि उसके नीचे लगी पीतल की पट्टी पर लिखा था—

“रुद्रकोठी के रखवाले — 1966”

जबकि उन दोनों का जन्म उसके कई साल बाद हुआ था।

और तस्वीर के पीछे दीवार पर किसी ने बहुत छोटे अक्षरों में एक वाक्य लिखा था—

“मृत लोग वापस नहीं आते।

दरवाजे के उस पार रहने वाले बस उनका रूप याद कर लेते हैं।”

Encyclopaedia Britannica – Ghosts — “भूत-प्रेत और supernatural मान्यताओं” जैसे contextual शब्द पर लगा सकते हैं।

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