मेरा नाम अशोक पाटील है। मेरी उम्र अब पैंतालीस साल से ज्यादा हो चुकी है। करीब बीस साल से मैं ट्रक चला रहा हूँ।
इन बीस सालों में मैंने देश की न जाने कितनी सड़कों पर सफर किया है। मुंबई–पुणे, पुणे–बेंगलुरु, कोल्हापुर–गोवा, नाशिक, सोलापुर, हैदराबाद… न जाने कितने घाट, कितने जंगल और कितनी सुनसान सड़कें मैंने रात के समय पार की हैं। Truck Driver Ghost Story
ट्रक ड्राइवर की जिंदगी बाहर से जितनी साधारण दिखाई देती है, असल में उतनी होती नहीं है।
दिन में सड़क कुछ और होती है और रात होते ही वही सड़क पूरी तरह बदल जाती है।
दिन में जहां दुकानें, लोग और गाड़ियां दिखाई देती हैं, वहीं रात के दो बजे सिर्फ अंधेरा होता है। सामने बस ट्रक की हेडलाइट की रोशनी दिखाई देती है और उस रोशनी के आगे क्या है… इसका कुछ पता नहीं होता।
इसीलिए रात में सड़क पर कोई अजीब चीज दिखाई देने पर मैंने कभी तुरंत यह नहीं माना कि वह कोई भूत-प्रेत ही होगा।
कभी किसी पेड़ की परछाई इंसान जैसी दिखाई देती है।
कभी सड़क किनारे पड़ा कोई पत्थर दूर से बैठे हुए आदमी जैसा लगता है।
और कभी लगातार दस-बारह घंटे गाड़ी चलाने की वजह से आंखों को भ्रम होने लगता है।
इसीलिए भूत, प्रेत और आत्मा जैसी चीजों पर मेरा ज्यादा विश्वास नहीं था।
लेकिन करीब सात-आठ साल पहले मेरे साथ एक ऐसी घटना घटी, जिसके बारे में मैं आज तक ठीक से नहीं समझ पाया।
उस रात के बाद मेरा विश्वास पूरी तरह बदल गया, ऐसा मैं नहीं कहूंगा।
आज भी मेरे पास इस बात का जवाब नहीं है कि उस रात मैंने आखिर देखा क्या था।
लेकिन एक बात मुझे आज भी साफ याद है।
उस रात मेरे ट्रक के पिछले पहिए के पास कोई चल रहा था।
और मुझे आज भी लगता है कि…
वह इंसान नहीं था।
उस समय मैं एक ट्रांसपोर्ट कंपनी का बारह पहियों वाला ट्रक चलाता था।
एक फैक्ट्री की मशीनरी लेकर मुझे रात में निकलना था। अगले दिन सुबह तक सामान पहुंचाना जरूरी था, इसलिए रास्ते में ज्यादा देर रुकने की गुंजाइश नहीं थी।
मेरे साथ हमेशा रहने वाला क्लीनर उस दिन नहीं आया था।
उसके घर में कोई परेशानी थी।
मालिक ने मुझसे पूछा,
“आज अकेले चला जाएगा?”
मैंने तुरंत हां कर दी।
क्योंकि अकेले ट्रक चलाने की मुझे आदत थी।
रात करीब साढ़े नौ बजे तक सामान लोड हो चुका था।
मैंने कागजात लिए, डीजल चेक किया, टायर देखे और करीब दस बजे ट्रक लेकर निकल पड़ा।
शुरुआत के दो-तीन घंटे बिल्कुल सामान्य रहे।
सड़क पर दूसरे ट्रकों की आवाजाही थी।
कहीं ढाबे खुले हुए थे।
कहीं पेट्रोल पंप पर गाड़ियां खड़ी थीं।
करीब साढ़े बारह बजे मैं एक ढाबे पर रुका।
चाय पी।
Truck Driver Ghost Story
चेहरे पर पानी डाला।
ढाबे पर तीन-चार और ट्रक ड्राइवर बैठे हुए थे।
उनसे थोड़ी बातचीत हुई।
उनमें से एक बुजुर्ग ड्राइवर ने मेरे ट्रक का नंबर देखा और पूछा,
“कहां तक जा रहे हो?”
मैंने जगह का नाम बताया।
उसने पूछा,
“आगे वाला पुराना घाट लोगे या बायपास?”
मैंने कहा,
“बायपास से करीब तीस-पैंतीस किलोमीटर ज्यादा पड़ता है। पुराने घाट से ही जाऊंगा।”
वह कुछ पल मेरी तरफ देखता रहा।
फिर बोला,
“रास्ता खराब है। संभलकर जाना।”
बस इतना ही।
उसकी बात में मुझे कुछ भी अजीब नहीं लगा।
मैंने चाय खत्म की और दोबारा निकल पड़ा।
करीब पैंतालीस मिनट बाद मैं मुख्य हाईवे छोड़कर पुराने रास्ते की तरफ मुड़ गया।
वहां से आगे जाते ही ट्रैफिक अचानक कम हो गया।
शुरुआत के दस-पंद्रह मिनट तक कभी-कभार कोई ट्रक सामने से आ जाता था।
फिर धीरे-धीरे वह भी बंद हो गया।
सड़क के दोनों तरफ पेड़ थे।
कुछ दूरी पर छोटे-छोटे गांव आते थे, लेकिन रात के डेढ़-दो बजे हर तरफ सन्नाटा था।
मैंने रेडियो चालू कर रखा था।
पुराने गाने बज रहे थे।
कुछ किलोमीटर आगे जाने के बाद नेटवर्क कमजोर होने लगा और रेडियो में खरखराहट आने लगी।
मैंने रेडियो बंद कर दिया।
अब केबिन में सिर्फ इंजन की आवाज थी।
मुझे आज भी याद है…
घड़ी में रात के 1 बजकर 47 मिनट हो रहे थे।
घाट की पहली चढ़ाई शुरू हुई।
रास्ता संकरा था।
एक तरफ पहाड़ था और दूसरी तरफ गहरी ढलान।
मैंने ट्रक दूसरे गियर में डाल दिया।
सामान भारी होने की वजह से ट्रक की रफ्तार काफी कम हो गई।
तभी पहली बार मुझे वह आवाज सुनाई दी।
“ठक…”
मैंने ध्यान नहीं दिया।
दो-तीन सेकंड बाद फिर आवाज आई—
“ठक… ठक…”
आवाज ट्रक के पीछे से आ रही थी।
ट्रक चलाने वाले के लिए ऐसी आवाजें कोई नई बात नहीं होतीं।
चेन हिलने, तिरपाल का हुक ढीला होने या सामान का कोई हिस्सा हिलने से ऐसी आवाज आ सकती है।
लेकिन मशीनरी अच्छी तरह बांधी गई थी।
फिर भी मैंने शीशे में पीछे देखा।
अंधेरे के अलावा कुछ दिखाई नहीं दिया।
मैं आगे बढ़ता रहा।
करीब पांच मिनट बाद फिर वही आवाज आई।
“ठक…”
इस बार थोड़ी तेज।
अब मुझे शक हुआ।
क्या टायर में कुछ फंस गया है?
घाट में ट्रक रोकना खतरनाक था।
इसलिए मैं किसी समतल जगह के आने तक आगे बढ़ता रहा।
कुछ दूर जाने के बाद सड़क के किनारे थोड़ी खुली जगह दिखाई दी।
मैंने ट्रक किनारे लगाया।
हैंडब्रेक खींचा।
इंजन चालू ही रखा।
टॉर्च ली और नीचे उतर गया।
उस जगह पर कितना सन्नाटा था, इसे शब्दों में बताना मुश्किल है।
ट्रक का इंजन चल रहा था, इसलिए उसकी आवाज सुनाई दे रही थी।
लेकिन उसके अलावा…
कुछ भी नहीं।
मैंने पहले आगे के टायर देखे।
फिर पीछे गया।
सारे टायर ठीक थे।
सामान को बांधने वाली रस्सियां और चेन भी ठीक थीं।
मैं ट्रक के बिल्कुल पीछे गया।
टॉर्च की रोशनी सड़क पर घुमाई।
कुछ नहीं था।
लेकिन वहीं खड़े-खड़े अचानक मेरी नजर एक चीज पर गई।
मेरे ट्रक के बाईं तरफ के आखिरी पहिए के पास जमीन गीली थी।
उस दिन बारिश नहीं हुई थी।
पूरी सड़क सूखी थी।
लेकिन उस एक पहिए के पास काली-सी गीली मिट्टी दिखाई दे रही थी।
मुझे लगा शायद ट्रक से कुछ लीक हो रहा होगा।
मैं नीचे झुककर देखने लगा।
कुछ भी लीक नहीं हो रहा था।
तभी मेरे पीछे झाड़ियों से कुछ हिलने की आवाज आई।
“खस्स…”
मैंने तुरंत टॉर्च उधर घुमाई।
कुछ नहीं।
मैंने सोचा कोई जानवर होगा।
मैं वापस केबिन में आ गया।
दरवाजा बंद किया और ट्रक आगे बढ़ा दिया।
दो-तीन किलोमीटर तक कुछ नहीं हुआ।
फिर घाट की चढ़ाई और ज्यादा तेज हो गई।
ट्रक की रफ्तार दस-पंद्रह किलोमीटर प्रति घंटे से भी कम हो गई।
और तभी…
मेरी नजर बाईं तरफ के शीशे पर गई।
ट्रक के पीछे कुछ हिलता हुआ दिखाई दिया।
मैंने दोबारा शीशे में देखा।
पहले मुझे लगा कि पेड़ों की परछाई होगी।
लेकिन कुछ सेकंड बाद वह फिर दिखाई दिया।
मेरे ट्रक के बिल्कुल आखिरी पहिए के पास…
कोई चल रहा था।
मैंने शीशे में नजरें गड़ा दीं।
आकृति साफ दिखाई नहीं दे रही थी।
पीछे घना अंधेरा था और ट्रक की लाइट भी वहां तक ठीक से नहीं पहुंच रही थी।
लेकिन वह किसी इंसान जितनी लंबी काली आकृति थी।
सबसे अजीब बात यह थी कि ट्रक चल रहा था।
रफ्तार कम जरूर थी, लेकिन फिर भी करीब दस-बारह किलोमीटर प्रति घंटा थी।
और वह आकृति…
उसी रफ्तार से पिछले पहिए के पास चल रही थी।
मैंने एक्सीलेरेटर दबाया।
ट्रक की रफ्तार थोड़ी बढ़ी।
मैंने फिर शीशे में देखा।
अब वहां कुछ नहीं था।
मेरे पूरे शरीर में सिहरन दौड़ गई।
मैं खुद को समझाने लगा—
“अशोक… पेड़ की परछाई थी। बेकार में दिमाग मत खराब कर।”
मैं सामने देखते हुए ट्रक चलाता रहा।
एक मोड़ निकला।
दूसरा मोड़ निकला।
और फिर—
“ठक… ठक… ठक…”
इस बार आवाज सीधे मेरे दरवाजे के नीचे से आती हुई महसूस हुई।
मैं चौंक गया।
शीशे में देखा।
कुछ नहीं।
लेकिन कुछ सेकंड बाद बाईं तरफ के शीशे के बिल्कुल निचले हिस्से में वह आकृति फिर दिखाई दी।
इस बार वह चल नहीं रही थी।
वह दौड़ रही थी।
मेरे ट्रक के बराबर।
उसका चेहरा दिखाई नहीं दे रहा था।
बस काला-सा शरीर।
सिर थोड़ा नीचे झुका हुआ।
और दोनों हाथ शरीर के बगल में अजीब तरीके से हिल रहे थे।
मैंने डरकर हॉर्न बजा दिया।
ट्रक के भारी हॉर्न की आवाज पूरे घाट में गूंज उठी।
और उसी पल…
वह आकृति गायब हो गई।
अब मैं सचमुच डर चुका था।
मैंने तय कर लिया कि अब चाहे कुछ भी हो जाए, ट्रक कहीं नहीं रोकूंगा।
आगे कोई गांव मिलने तक नहीं रुकूंगा।
मैं भगवान का नाम लेते हुए ट्रक चलाता रहा।
करीब दस मिनट बाद सड़क के दाईं तरफ एक आदमी खड़ा दिखाई दिया।
सफेद शर्ट।
काली पैंट।
हाथ ऊपर करके ट्रक रोकने का इशारा कर रहा था।
मेरा पहला ख्याल था—
शायद किसी दूसरी गाड़ी का ड्राइवर होगा।
लेकिन अगले ही पल मन में दूसरा सवाल आया।
रात के करीब दो बजे इस सुनसान घाट में यह अकेला क्या कर रहा है?
मैंने ट्रक की रफ्तार कम नहीं की।
उसके पास से गुजरते समय मैंने उसकी तरफ देखा।
वह अधेड़ उम्र का लग रहा था।
सिर नीचे झुका हुआ था।
चेहरा ठीक से दिखाई नहीं दिया।
ट्रक आगे निकल गया।
मैंने दाईं तरफ के शीशे से पीछे देखा।
वह आदमी वहीं खड़ा था।
मुझे थोड़ी राहत मिली।
कम से कम वह कोई सामान्य इंसान था।
लेकिन करीब दो मिनट बाद मैंने अगला मोड़ लिया…
और मेरी छाती में जैसे कुछ धंस गया।
वही सफेद शर्ट वाला आदमी…
फिर सामने खड़ा था।
इस बार सड़क की बाईं तरफ।
मेरे हाथ स्टिअरिंग पर कस गए।
“ये कैसे हो सकता है?”
पहली जगह से मैं कम से कम डेढ़-दो किलोमीटर आगे आ चुका था।
वह मुझसे पहले यहां कैसे पहुंच गया?
मैंने ट्रक की रफ्तार बिल्कुल कम नहीं की।
उसके पास से गुजरते हुए मैंने हॉर्न बजाया।
उस आदमी ने अपना चेहरा ऊपर किया।
आज भी वह पल याद आता है तो शरीर में सिहरन दौड़ जाती है।
उसका चेहरा मुझे साफ दिखाई नहीं दिया।
लेकिन उसके माथे से लेकर नीचे तक पूरा चेहरा काली परछाई में था।
ऐसा लग रहा था जैसे हेडलाइट की रोशनी उसके पूरे शरीर पर पड़ रही हो…
लेकिन उसके चेहरे पर रोशनी पड़ ही नहीं रही थी।
मैंने दोबारा उसकी तरफ नहीं देखा।
ट्रक आगे बढ़ाता रहा।
अब मैं लगातार भगवान का नाम ले रहा था।
कुछ देर बाद घाट का उतार शुरू हुआ।
मुझे लगा अब जल्दी ही मुख्य सड़क मिल जाएगी।
लेकिन अचानक ट्रक के केबिन के पीछे जोरदार आवाज हुई।
“धाड़!”
ऐसा लगा जैसे किसी ने पीछे से छलांग लगाकर ट्रक के ऊपर चढ़ने की कोशिश की हो।
मेरा पैर ब्रेक की तरफ गया।
लेकिन मैंने खुद को रोक लिया।
कुछ भी हो जाए…
गाड़ी नहीं रोकनी है।
फिर आवाज आई—
“धाड़…”
और उसके बाद छत पर—
“ठक…”
“ठक…”
“ठक…”
अब आवाज साफ तौर पर ऊपर से आ रही थी।
ऐसा लग रहा था जैसे कोई ट्रक पर रखे सामान के ऊपर चलते हुए आगे की तरफ आ रहा हो।
पीछे से शुरू हुई आवाज धीरे-धीरे केबिन की तरफ बढ़ रही थी।
ठक…
ठक…
ठक…
मैंने स्टिअरिंग कसकर पकड़ लिया।
मुझे पसीना आ रहा था।
बाहर हवा ठंडी थी, लेकिन मेरी शर्ट पूरी तरह पसीने से भीग चुकी थी।
आवाज अब मेरे सिर के ठीक ऊपर पहुंच चुकी थी।
और अचानक…
बंद हो गई।
पांच सेकंड…
दस सेकंड…
कुछ नहीं।
मुझे लगा शायद सब खत्म हो गया।
तभी…
बाईं तरफ की खिड़की पर किसी के नाखून घिसने जैसी आवाज आई।
“खर्रर्रर्र…”
मैंने खिड़की की तरफ नहीं देखा।
मेरी नजर सीधे सड़क पर थी।
लेकिन कुछ सेकंड बाद फिर—
“खर्रर्र…”
अब अनजाने में मेरी नजर बाईं तरफ चली गई।
खिड़की के बाहर कुछ नहीं था।
लेकिन कांच पर चार गीली लकीरें थीं।
जैसे किसी ने गीली उंगलियों से ऊपर से नीचे तक कांच पर हाथ फेरा हो।
मेरे पैरों की ताकत जैसे खत्म हो गई।
और उसी पल मुझे पीछे वाले शीशे में वह काली आकृति फिर दिखाई दी।
लेकिन इस बार…
वह सड़क पर नहीं थी।
वह ट्रक के पिछले हिस्से पर बैठी थी।
दोनों पैर नीचे लटक रहे थे।
गर्दन नीचे झुकी हुई थी।
ट्रक मोड़ पर था, इसलिए कुछ सेकंड तक वह आकृति साफ दिखाई दी।
मैंने तुरंत शीशे से नजर हटा ली।
फिर देखा।
वहां कुछ नहीं था।
अब दूर सामने कुछ रोशनियां दिखाई देने लगी थीं।
मैं लगभग चिल्ला पड़ा—
“भगवान… बस वहां तक पहुंचा दे।”
रोशनियां पास आने लगीं।
वह एक छोटा-सा ढाबा था।
बाहर दो ट्रक खड़े थे।
मैंने सीधे ढाबे के सामने ट्रक रोक दिया।
इंजन बंद किया और नीचे उतर गया।
ढाबे पर तीन आदमी थे।
मेरा चेहरा देखकर उनमें से एक ने पूछा,
“क्या हुआ?”
कुछ पल तक मैं बोल ही नहीं पाया।
मैंने पानी मांगा।
पूरा गिलास एक ही सांस में पी गया।
फिर उन्हें सारी बात बताई।
मेरी बात सुनने के बाद ढाबे पर बैठा एक बुजुर्ग आदमी शांत हो गया।
उसने पूछा,
“आप घाट में कहीं रुके थे?”
मैंने हां कहा।
“शुरुआत की चढ़ाई पर। ट्रक से आवाज आ रही थी, वही देखने रुका था।”
उसने फिर पूछा,
“बाईं तरफ रुके थे?”
मैंने कहा,
“हां।”
वह कुछ पल चुप रहा।
फिर बाहर निकला और मेरे ट्रक की तरफ गया।
उसने टॉर्च लेकर पिछले टायर देखने शुरू किए।
मैं भी उसके पीछे चला गया।
वह बाईं तरफ के आखिरी पहिए के पास रुक गया।
उसने जमीन पर टॉर्च डाली।
फिर मेरी तरफ देखकर बोला,
“यह देखो।”
टायर के बाहरी हिस्से पर गीला कीचड़ लगा था।
इसमें कुछ अजीब नहीं था।
लेकिन ट्रक की बगल में लगी लोहे की पट्टी पर चार लंबे गीले निशान थे।
बिल्कुल…
हाथ की उंगलियों जैसे।
मैंने कहा,
“घाट में कहीं कीचड़ लग गया होगा।”
वह कुछ नहीं बोला।
हम वापस ढाबे पर आ गए।
कुछ देर बाद उसने बताया कि कई साल पहले उस घाट में एक ट्रक का बहुत बड़ा एक्सीडेंट हुआ था।
ब्रेक फेल होने की वजह से ट्रक मोड़ से नीचे चला गया था।
ड्राइवर बच गया था।
लेकिन उसके साथ मौजूद एक आदमी गंभीर रूप से घायल हो गया था।
दुर्घटना के बाद वह ट्रक से बाहर जा गिरा था।
मदद मिलने में काफी देर हो गई।
बाद में लोगों ने बताया कि वह घायल हालत में सड़क के किनारे चलते हुए मदद मांगने की कोशिश कर रहा था।
वह बच नहीं पाया।
उस कहानी में कितनी सच्चाई थी, मुझे नहीं पता।
ऐसी सड़कों पर लगभग हर घाट से जुड़ी दो-चार कहानियां होती ही हैं।
मैंने उस आदमी से पूछा,
“सफेद शर्ट वाला आदमी?”
वह मेरी तरफ देखकर बोला,
“कुछ ड्राइवर कहते हैं कि रात में एक आदमी गाड़ी रोकने की कोशिश करता है। लेकिन हर किसी की कहानी अलग है। सच क्या है… कौन जाने?”
उस रात मुझमें आगे जाने की हिम्मत नहीं बची थी।
मैं सुबह होने तक उसी ढाबे पर बैठा रहा।
करीब साढ़े पांच बजे उजाला होने लगा।
जब दूसरे दो ट्रक वहां से निकले, तब मैं भी उनके साथ निकल गया।
दिन में वही रास्ता बिल्कुल सामान्य लग रहा था।
कहीं कुछ अजीब नहीं था।
सामान पहुंचाने के बाद मैंने ट्रक दोबारा अच्छी तरह चेक करवाया।
मैंने मैकेनिक को रात में आने वाली आवाजों के बारे में बताया।
उसने टायर, बॉडी, सस्पेंशन और चेन… सब कुछ देखा।
उसे कोई खास समस्या नहीं मिली।
मैं खुद को समझाने लगा—
शायद थकान की वजह से मुझे भ्रम हुआ होगा।
शायद पिछले पहिए के पास दिखाई देने वाली आकृति किसी पेड़ की परछाई रही होगी।
सफेद शर्ट वाले दोनों आदमी अलग-अलग रहे होंगे।
छत पर आने वाली आवाज सामान की चेन की रही होगी।
खिड़की पर मौजूद गीले निशान पहले से रहे होंगे।
हर घटना का अलग-अलग कोई सामान्य कारण निकाला जा सकता था।
लेकिन सिर्फ एक चीज ऐसी थी…
जिसका जवाब मुझे कभी नहीं मिला।
अगली सुबह ट्रक साफ करते समय मुझे पिछले बाएं पहिए के ऊपर लगे लोहे के हिस्से पर कुछ दिखाई दिया।
एक हाथ का अधूरा निशान।
कीचड़ से बना हुआ।
अगर वह सामान्य जगह पर होता तो शायद मुझे कुछ नहीं लगता।
लेकिन वह निशान इतनी ऊंची जगह पर था कि जमीन पर खड़े किसी आदमी का हाथ वहां आसानी से पहुंचना मुश्किल था।
मैंने पानी डालकर वह निशान धो दिया।
मालिक को कुछ नहीं बताया।
उस घटना के बाद भी मैंने कई साल ट्रक चलाया।
रात में भी चलाया।
घाटों से भी गुजरा।
लेकिन…
उस पुराने रास्ते से मैं फिर कभी नहीं गया।
दो-तीन साल बाद एक बार मेरी दूसरे ट्रक ड्राइवर से बातचीत हो रही थी।
बातों-बातों में उसी रास्ते का जिक्र निकल आया।
मैंने उसे अपना अनुभव नहीं बताया।
बस सामान्य तरीके से पूछा,
“उस पुराने घाट से रात में जाता है?”
वह बोला,
“दिन में जाता हूं। रात में कोशिश करता हूं कि न जाऊं।”
मैंने पूछा,
“क्यों?”
वह हंस पड़ा।
“रास्ता खराब है।”
मैं भी हंस दिया।
लेकिन कुछ पल बाद उसने खुद ही कहा,
“और उस जगह की एक पागल-सी अफवाह भी है।”
मैंने पूछा,
“कैसी अफवाह?”
उसने चाय का एक घूंट लिया और बिल्कुल सामान्य तरीके से कहा—
“कुछ लोग कहते हैं कि रात में चढ़ाई पर जब ट्रक धीमा होता है ना…
तो पिछले पहिए के साथ-साथ कोई चलता है।”
मेरे हाथ में पकड़ा चाय का गिलास वहीं रुक गया।
मैंने उससे पूछा,
“तूने देखा है?”
वह बोला,
“नहीं रे। मैंने नहीं देखा। दूसरों से सुना है।”
मैंने उससे आगे कुछ नहीं कहा।
क्योंकि उसी पल मुझे एक बात याद आई…
मैंने अपने उस अनुभव के बारे में उस इलाके के किसी भी ड्राइवर को कभी बताया ही नहीं था।
फिर भी उसने बिल्कुल वही बात कही थी।
“पिछले पहिए के साथ-साथ कोई चलता है।”
उस घटना को अब कई साल बीत चुके हैं।
अब मैं पहले की तरह रोज लंबी दूरी का ट्रक नहीं चलाता।
लेकिन आज भी रात में किसी हाईवे से गुजरते समय कोई बड़ा ट्रक दिखाई देता है…
तो अनजाने में मेरी नजर उसके पिछले पहियों की तरफ चली जाती है।
ज्यादातर वहां कुछ नहीं होता।
बस घूमते हुए पहिए…
सड़क पर पड़ती उनकी परछाई…
और पीछे फैला हुआ अंधेरा।
लेकिन आज भी मुझे उस रात का एक पल बिल्कुल साफ याद है।
घाट की चढ़ाई…
दस-बारह किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार…
बाईं तरफ के शीशे में दिखाई देती वह काली आकृति…
और ट्रक की रफ्तार से रफ्तार मिलाकर पिछले पहिए के पास चलती हुई…
वह चीज।
लोग मुझसे पूछते हैं—
“क्या सच में वह भूत था?”
मेरे पास इसका जवाब नहीं है।
शायद वह मेरा भ्रम था।
शायद थकान थी।
शायद उन सभी घटनाओं के पीछे कोई सामान्य वजह रही होगी।
लेकिन इतने साल ट्रक चलाने के बाद मुझे एक बात जरूर समझ आई है।
रात की सड़क पर दिखाई देने वाली हर चीज के बारे में जानने की कोशिश करना जरूरी नहीं होता।
कभी-कभी…
शीशे में कुछ अजीब दिखाई दे…
तो सामने देखते रहना ही बेहतर होता है।
क्योंकि आप शीशे में देखना बंद कर सकते हैं…
लेकिन आपके ट्रक के पीछे चलने वाली चीज…
सिर्फ इसलिए रुक जाएगी कि आपने उसे देखना बंद कर दिया है…
यह जरूरी नहीं।
Ministry of Road Transport & Highways