दिल्ली–लखनऊ हाईवे पर रात में गाड़ी चलाने वाले लोग एक जगह का नाम आज भी धीरे आवाज़ में लेते हैं—“राजगढ़ मोड़।”
दिन में वहाँ कुछ खास नहीं दिखता। सड़क के किनारे सूखे पेड़, बंद पड़ा पेट्रोल पंप और दूर खेतों के बीच खड़ी एक पुरानी हवेली।
लेकिन ट्रक ड्राइवरों के बीच उस जगह को लेकर एक अजीब बात मशहूर है।
Horror Story in Hindi कई लोगों का कहना है कि अगर आधी रात के बाद आपकी गाड़ी राजगढ़ मोड़ के पास बंद हो जाए… तो किसी भी हालत में उस हवेली में मत जाना।

निखिल ने ये बात पहले भी सुनी थी।
लेकिन उस रात जब उसकी कार सच में उसी मोड़ के पास बंद हुई, तब उसे लगा ये सब बेकार की अफवाहें हैं।
उसने bonnet खोला। इंजन गर्म था, लेकिन कोई बड़ी खराबी समझ नहीं आ रही थी। हल्की बारिश लगातार गिर रही थी और हाईवे पर पिछले दस मिनट से एक भी वाहन नहीं गुज़रा था।
उसने मोबाइल निकाला।
No Signal.
“Perfect,” उसने बड़बड़ाते हुए कहा।
उसकी शर्ट बारिश से भीग चुकी थी। कुछ देर उसने सड़क पर खड़े होकर दूसरी गाड़ियों का इंतज़ार किया, लेकिन दूर तक सिर्फ अंधेरा दिखाई दे रहा था।
तभी उसकी नजर सड़क से थोड़ा हटकर बनी उस हवेली पर गई।
तीन मंज़िला पुरानी इमारत।
ऊपरी दीवारों पर काई जमी हुई थी। बरामदे के खंभों में दरारें थीं। ऐसा लग रहा था जैसे सालों से वहाँ कोई नहीं रहता।
लेकिन तीसरी मंज़िल पर एक कमरे की खिड़की से हल्की पीली रोशनी बाहर आ रही थी।
निखिल कुछ सेकंड वहीं खड़ा रहा।
फिर बैग उठाकर हवेली की तरफ चल पड़ा।
जैसे-जैसे वो करीब जा रहा था, उसे महसूस हुआ कि आसपास की आवाजें कम होती जा रही हैं। बारिश अब भी हो रही थी, लेकिन हवेली के पास पहुँचते-पहुँचते उसे सिर्फ अपने कदमों की आवाज सुनाई दे रही थी।
मुख्य दरवाज़ा पूरी तरह बंद नहीं था।
उसने धीरे से धक्का दिया।
दरवाज़ा चरमराते हुए खुल गया।
अंदर पुरानी लकड़ी और सीलन की गंध फैली हुई थी। हॉल काफी बड़ा था। दीवारों पर पुराने portraits टंगे थे जिनके चेहरे नमी से धुँधले पड़ चुके थे।
“कोई है?” निखिल ने आवाज लगाई।
कुछ पल कोई जवाब नहीं आया।
फिर ऊपर से lantern की हल्की रोशनी दिखाई दी।
एक बूढ़ा आदमी सीढ़ियों से नीचे उतर रहा था।
पतला शरीर। सफेद कुर्ता। आँखों के नीचे गहरे काले घेरे।
“गाड़ी खराब हो गई?” उसने बिना भूमिका के पूछा।
निखिल थोड़ा चौंका।
“जी… आपको कैसे पता?”
बूढ़ा आदमी हल्का सा मुस्कुराया।
“यहाँ जो भी आता है… उसी वजह से आता है।”
उसका जवाब अजीब था, लेकिन निखिल उस समय सिर्फ सूखी जगह और थोड़ी नींद चाहता था।
“मैं रात भर रुक सकता हूँ क्या?”
“रुक जाइए।”
बूढ़े आदमी ने lantern आगे करते हुए कहा, “ऊपर एक कमरा खाली है।”
सीढ़ियाँ चढ़ते वक्त निखिल ने पूछा, “आप यहाँ अकेले रहते हैं?”
“अब हाँ।”
“अब?”
बूढ़े आदमी ने जवाब नहीं दिया।
दूसरी मंज़िल पर पहुँचकर उसने एक कमरा खोला। कमरा पुराना जरूर था, लेकिन साफ था। एक लकड़ी का bed, पानी का जग और कोने में पुराना heater रखा था।
“सुबह तक बारिश रुक जाएगी,” बूढ़े आदमी ने कहा।
फिर जाते-जाते वो दरवाज़े पर रुक गया।
“तीसरी मंज़िल पर मत जाइएगा।”
निखिल मुस्कुराया।
“वहाँ क्या है?”
बूढ़े आदमी ने सीधा उसकी तरफ देखा।
“एक कमरा… जो खाली नहीं है।”
उसके जाने के बाद कुछ देर तक निखिल कमरे में बैठा रहा। बाहर बारिश की आवाज आ रही थी। उसने मोबाइल charge पर लगाया, लेकिन network अब भी गायब था।
करीब आधे घंटे बाद उसे ऊपर से किसी भारी चीज़ के खिसकने जैसी आवाज सुनाई दी।
घर पुराना था। उसने पहले ध्यान नहीं दिया।
लेकिन फिर वही आवाज दोबारा आई।
इस बार उसके बाद धीमे कदमों की आवाज सुनाई दी।
जैसे कोई तीसरी मंज़िल पर धीरे-धीरे चल रहा हो।
निखिल ने घड़ी देखी।
2:11 AM.
उसे अचानक caretaker की बात याद आई।
“तीसरी मंज़िल पर मत जाइएगा।”
यही बात उसके दिमाग में अटक गई।
कई मिनट तक उसने खुद को रोकने की कोशिश की। फिर आखिर curiosity जीत गई।
उसने दरवाज़ा खोला और corridor में बाहर आ गया।
पूरी दूसरी मंज़िल अंधेरी थी। सिर्फ सीढ़ियों के पास लगी छोटी yellow bulb जल रही थी।
ऊपर जाते वक्त उसे महसूस हुआ कि हवा अचानक बहुत ठंडी हो गई है।
तीसरी मंज़िल बाकी हवेली से अलग लग रही थी।
यहाँ दीवारों पर धूल कम थी। जैसे कोई जगह साफ रखता हो।
गलियारे के आखिर में एक काला दरवाज़ा था।
बाकी सारे दरवाज़े लकड़ी के भूरे रंग के थे। सिर्फ वही एक पूरी तरह काला था।
और उसके नीचे से हल्की रोशनी बाहर आ रही थी।
निखिल धीरे-धीरे आगे बढ़ा।
उसे लगा शायद caretaker वहीं रहता होगा।
लेकिन जैसे ही वो दरवाज़े के पास पहुँचा, अंदर से फुसफुसाने जैसी आवाज आने लगी।
पहले लगा टीवी चल रहा होगा।
फिर ध्यान से सुनने पर महसूस हुआ कि कई लोग एक साथ बहुत धीमी आवाज़ में कुछ बोल रहे हैं।
कोई भाषा समझ नहीं आ रही थी।
निखिल का गला सूख गया।
उसने धीरे से दरवाज़े के पास कान लगाया।
अचानक सारी आवाजें बंद हो गईं।
पूरा गलियारा एकदम शांत।
और फिर…
अंदर से किसी ने धीरे से knock किया।
ठक।
निखिल तुरंत पीछे हट गया।
कुछ सेकंड बाद फिर वही आवाज आई।
ठक।
इस बार थोड़ा ज़ोर से।
फिर अंदर से किसी ने कहा—
“निखिल…”
उसका शरीर वहीं जम गया।
आवाज़ बिल्कुल उसी की थी।
एकदम वही tone। वही बोलने का तरीका।
“दरवाज़ा खोलो।”
उसके हाथ ठंडे पड़ चुके थे। वो पीछे हटने ही वाला था कि अचानक नीचे से caretaker की आवाज गूँजी—
“वहीं खड़े मत रहो!”
निखिल घबराकर मुड़ा। बूढ़ा आदमी सीढ़ियों के पास खड़ा था और पहली बार उसके चेहरे पर साफ डर दिखाई दे रहा था।
“नीचे आओ।”
दोनों जल्दी से दूसरी मंज़िल पर लौट आए।
कमरे के अंदर आते ही caretaker ने दरवाज़ा बंद कर दिया।
कुछ सेकंड तक वो चुप खड़ा रहा। फिर बोला—
“उसने तुम्हारा नाम ले लिया?”
निखिल ने धीरे से सिर हिलाया।
बूढ़े आदमी ने आँखें बंद कर लीं।
“अब शायद वो तुम्हें छोड़ने वाला नहीं है।”
“वो है क्या?” निखिल लगभग फुसफुसाया।
Horror Story in Hindi
Caretaker खिड़की के पास जाकर खड़ा हो गया।
“बहुत साल पहले इस हवेली का मालिक लोगों पर अजीब experiments करता था। उसे इंसानों की पहचान, डर और दिमाग से obsession था।”
“मतलब?”
“वो कहता था कि हर इंसान के अंदर एक दूसरा चेहरा छुपा होता है। अगर उसे बाहर निकाल दिया जाए… तो असली इंसान धीरे-धीरे खत्म होने लगता है।”
निखिल को उसकी बातों पर विश्वास नहीं हो रहा था।
लेकिन ऊपर सुनी अपनी ही आवाज अब भी उसके कानों में गूँज रही थी।
“आग लगी थी इस हवेली में,” caretaker ने आगे कहा। “सब लोग मर गए। लेकिन तीसरी मंज़िल का वो कमरा कभी नहीं जला।”
कुछ देर दोनों चुप बैठे रहे।
फिर अचानक corridor में कदमों की आवाज सुनाई दी।
धीमी।
नापी हुई।
टक…
टक…
टक…
आवाज़ उनके कमरे के बाहर आकर रुक गई।
निखिल की साँस अटक गई।
दरवाज़े के नीचे किसी की shadow दिखाई दे रही थी।
फिर बाहर से आवाज आई—
“दरवाज़ा खोलिए…”
इस बार आवाज caretaker की थी।
लेकिन असली caretaker तो उसके सामने खड़ा था।
कमरे के अंदर खड़े बूढ़े आदमी का चेहरा सफेद पड़ गया।
बाहर फिर वही आवाज आई—
“मैं बाहर हूँ।”
अब दरवाज़े के दूसरी तरफ धीरे-धीरे खरोंचने की आवाज आने लगी।
निखिल पीछे हट गया।
Caretaker ने बहुत धीमी आवाज में कहा—
“उसकी तरफ जवाब मत देना।”
कुछ सेकंड बाद अचानक सारी आवाजें बंद हो गईं।
पूरा घर फिर शांत हो गया।
इतना शांत कि दोनों को सिर्फ अपनी साँसें सुनाई दे रही थीं।
करीब पाँच मिनट बाद caretaker ने कहा—
“चलो।”
“कहाँ?”
“अभी। इसी वक्त।”
दोनों जल्दी-जल्दी नीचे उतरे। बाहर बारिश कम हो चुकी थी।
वे हवेली से निकलकर सड़क की तरफ भागे।
निखिल ने पीछे मुड़कर नहीं देखा… जब तक कि वो मुख्य सड़क तक नहीं पहुँच गए।
वहाँ पहुँचकर उसने एक बार पीछे देखा।
तीसरी मंज़िल की वही खिड़की अब भी जल रही थी।
और काँच के पीछे कोई खड़ा था।
उसका चेहरा साफ दिखाई नहीं दे रहा था।
लेकिन मुस्कान दिखाई दे रही थी।
धीमी… स्थिर… और बिल्कुल वैसी…
जैसी मुस्कान निखिल की थी।
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“अंदर आ जाओ…”
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