प्रेत बाधा – एक डरावनी घटना | Hindi Horror Story

रात के लगभग सवा ग्यारह बज रहे थे। शहर की भीड़भाड़ धीरे-धीरे खत्म हो चुकी थी। सड़कों पर इक्का-दुक्का वाहन ही दिखाई दे रहे थे। आसमान बादलों से ढका था और बीच-बीच में चलने वाली ठंडी हवा पूरे माहौल को और भी अजीब बना रही थी। प्रेत बाधा

आदित्य पिछले छह वर्षों से एक निजी एम्बुलेंस सेवा में ड्राइवर था। उसने सड़क हादसे, हार्ट अटैक, गंभीर बीमारियां और मौत के अनगिनत मामले देखे थे। इतने वर्षों में वह हर मुश्किल परिस्थिति का सामना करना सीख चुका था। उसके लिए रात की ड्यूटी कोई नई बात नहीं थी।

 प्रेत बाधा

उस रात भी वह अपनी शिफ्ट खत्म होने का इंतजार कर रहा था कि कंट्रोल रूम से कॉल आया।

“आदित्य, एक इमरजेंसी है। पुरानी मिल रोड से एक महिला को तुरंत अस्पताल लाना है।”

उसने बिना देर किए एम्बुलेंस स्टार्ट की। उसके साथ पैरामेडिक संदीप भी था।

करीब बीस मिनट बाद वे एक पुराने बंगले के सामने पहुंचे। बंगला काफी बड़ा था लेकिन कई सालों से उसकी मरम्मत नहीं हुई थी। दीवारों पर सीलन थी, बरामदे में टूटी कुर्सियां पड़ी थीं और पूरा घर किसी वीरान जगह जैसा लग रहा था।

दरवाजा एक लगभग पचपन वर्षीय आदमी ने खोला।

“जल्दी आइए… मेरी पत्नी की हालत बिगड़ती जा रही है।”

दोनों अंदर पहुंचे।

कमरे में लगभग पैंसठ वर्ष की महिला बिस्तर पर लेटी थीं। उनकी आंखें बंद थीं लेकिन चेहरा किसी गहरे डर से भरा हुआ था। सबसे अजीब बात यह थी कि उनके दोनों हाथ हवा में ऐसे जकड़े हुए थे जैसे वे किसी अदृश्य चीज़ को दूर धकेलने की कोशिश कर रही हों।

संदीप ने उनका ब्लड प्रेशर चेक किया।

“बीपी बहुत नीचे है। तुरंत अस्पताल ले चलते हैं।”

जैसे ही महिला को स्ट्रेचर पर रखा गया, कमरे में रखी दीवार घड़ी अचानक बंद हो गई।

उसी क्षण पूरी लाइट दो बार झपकी।

संदीप ने धीरे से कहा,

“शायद वोल्टेज की दिक्कत होगी।”

लेकिन आदित्य की नजर दीवार पर लगी एक पुरानी तस्वीर पर टिक गई।

तस्वीर में महिला अपने परिवार के साथ मुस्कुरा रही थीं…

लेकिन उसे कुछ पल के लिए ऐसा लगा जैसे तस्वीर में महिला का चेहरा बाकी लोगों की तरफ नहीं, बल्कि सीधे उसकी तरफ देख रहा हो।

उसने पलक झपकी।

सब कुछ सामान्य था।

दोनों महिला को एम्बुलेंस में लेकर अस्पताल के लिए निकल पड़े।

करीब दस मिनट बाद महिला की उंगलियां अचानक कांपने लगीं।

मॉनिटर पर हार्ट रेट ऊपर-नीचे होने लगा।

संदीप दवा तैयार करने लगा।

उसी समय महिला ने बिना आंखें खोले धीमी आवाज़ में कहा,

“उसे मत आने देना…”

दोनों चौंक गए।

“किसे?”

महिला ने कोई जवाब नहीं दिया।

कुछ सेकंड बाद फिर वही आवाज़ आई।

“वह मेरे पीछे नहीं… मेरे साथ आया है…”

एम्बुलेंस के भीतर अचानक इतनी ठंड हो गई कि दोनों की सांसों से भाप निकलने लगी।

एसी बंद था।

प्रेत बाधा

खिड़कियां बंद थीं।

फिर भी तापमान तेजी से गिरता जा रहा था।

अचानक पीछे रखी ऑक्सीजन सिलेंडर की चेन अपने आप हिलने लगी।

खन… खन… खन…

संदीप पीछे मुड़ा।

वहां कोई नहीं था।

लेकिन ऐसा लग रहा था जैसे किसी ने अभी-अभी सिलेंडर को छुआ हो।

आदित्य ने गाड़ी की रफ्तार बढ़ा दी।

उसी समय एम्बुलेंस के अंदर लगा छोटा रियर कैमरा अपने आप चालू हो गया।

स्क्रीन पर स्ट्रेचर साफ दिखाई दे रहा था।

महिला भी दिखाई दे रही थीं।

लेकिन उनके सिर के ठीक पीछे कुछ सेकंड के लिए एक धुंधली काली आकृति खड़ी नजर आई।

आदित्य ने दोबारा देखा।

स्क्रीन बिल्कुल सामान्य थी।

“शायद कैमरे में गड़बड़ी है…”

उसने खुद को समझाया।

अस्पताल पहुंचने के बाद डॉक्टरों ने महिला को भर्ती कर लिया।

करीब आधे घंटे बाद महिला के पति ने आदित्य को एक तरफ बुलाया।

“क्या रास्ते में उन्होंने कुछ कहा था?”

“बार-बार किसी के आने की बात कर रही थीं।”

आदमी की आंखें भर आईं।

“दो महीने पहले हम लोग अपने पुश्तैनी घर गए थे। वहां एक बंद कमरा था जिसे मेरे पिता ने हमेशा बंद रखने को कहा था। लेकिन हमने सफाई के लिए वह कमरा खोल दिया।”

“अंदर क्या था?”

“एक पुरानी लकड़ी की कुर्सी… कुछ तांबे के बर्तन… और एक काला आईना, जिसे कपड़े से ढककर रखा गया था।”

“फिर?”

“मेरे बेटे ने मजाक में उस कपड़े को हटा दिया। उसी रात मेरी पत्नी ने कहा कि कमरे में कोई तीसरा आदमी खड़ा है।”

आदित्य ने इसे अंधविश्वास मानकर बात खत्म कर दी।

लेकिन अगले दिन सुबह अस्पताल से खबर आई कि महिला रातभर किसी अदृश्य व्यक्ति से बातें करती रहीं।

सीसीटीवी फुटेज में कई बार ऐसा दिखाई दिया कि वह कमरे के एक खाली कोने को देखकर मुस्कुरा रही थीं।

तीसरे दिन उनकी हालत और बिगड़ गई।

उन्होंने डॉक्टर से सिर्फ एक बात कही।

“वह अब किसी और को ढूंढ रहा है…”

डॉक्टर ने पूछा,

“कौन?”

महिला ने कांपती उंगली से दरवाजे की तरफ इशारा किया।

वहां कोई नहीं था।

उसी शाम महिला की मृत्यु हो गई।

कुछ दिनों तक सब कुछ सामान्य रहा।

आदित्य भी उस घटना को भूलने लगा।

लेकिन लगभग एक सप्ताह बाद उसकी फिर उसी इलाके में ड्यूटी लगी।

रात के ठीक बारह बजे।

एम्बुलेंस उसी पुराने बंगले के सामने से गुजर रही थी।

बंगला अब पूरी तरह बंद था।

खिड़कियों पर ताले लगे थे।

अचानक वायरलेस सेट अपने आप चालू हो गया।

उसमें से केवल खरखराहट सुनाई दे रही थी।

फिर एक धीमी स्त्री आवाज़ आई।

“पीछे मत देखना…”

आदित्य ने तुरंत वायरलेस बंद कर दिया।

लेकिन आवाज़ बंद नहीं हुई।

अब वह आवाज़ एम्बुलेंस के अंदर गूंज रही थी।

“वह तुम्हें देख रहा है…”

संदीप घबराकर बोला,

“तुमने भी सुना?”

आदित्य ने कोई जवाब नहीं दिया।

उसी समय सड़क के बीचों-बीच एक वृद्ध महिला दिखाई दी।

सफेद साड़ी…

झुका हुआ शरीर…

चेहरे पर वही भाव…

आदित्य ने तुरंत ब्रेक लगा दिए।

दोनों नीचे उतरे।

पूरी सड़क खाली थी।

दूर-दूर तक कोई इंसान नहीं था।

“अभी तो यहीं थीं…”

संदीप बुदबुदाया।

दोनों वापस एम्बुलेंस में बैठे।

जैसे ही आदित्य ने गाड़ी आगे बढ़ाई, रियर कैमरे की स्क्रीन अपने आप जल उठी।

इस बार स्क्रीन पर केवल वही महिला नहीं थीं।

उनके पीछे लगभग सात फीट लंबी एक काली परछाई स्थिर खड़ी थी।

उसका चेहरा पूरी तरह अंधेरे में छिपा था।

महिला ने धीरे-धीरे सिर उठाया।

उनके होंठ बिना आवाज़ के हिले।

“अब… वह तुम्हें पहचान चुका है…”

अगले ही पल कैमरा बंद हो गया।

अस्पताल पहुंचने के बाद आदित्य ने पूरी एम्बुलेंस की जांच करवाई।

कैमरा…

वायरलेस…

बिजली…

सब कुछ बिल्कुल ठीक था।

कोई खराबी नहीं मिली।

उस घटना के बाद एक अजीब बदलाव शुरू हुआ।

जब भी आदित्य आधी रात के बाद किसी मरीज को लेकर निकलता, उसे कुछ सेकंड के लिए रियर कैमरे की स्क्रीन अपने आप चालू होती दिखाई देती।

कभी खाली सड़क…

कभी धुंध…

और कभी वही काली आकृति।

वह कभी पास नहीं आती।

बस दूर खड़ी रहती…

जैसे किसी अदृश्य सीमा के बाहर से उसे लगातार देख रही हो।

आज उस घटना को कई साल बीत चुके हैं।

आदित्य अब भी एम्बुलेंस चलाता है।

लेकिन उसकी एक आदत कभी नहीं बदली।

रात के बारह बजे के बाद…

वह कभी भी रियर कैमरे की स्क्रीन की तरफ नहीं देखता।

क्योंकि उसे यकीन है…

कुछ प्रेत इंसान का पीछा नहीं करते।

वे सिर्फ इंतजार करते हैं…

कि कोई एक बार…

उनकी तरफ देखने की गलती कर दे।

उस रात के बाद आदित्य ने किसी को भी रियर कैमरे वाली घटना के बारे में नहीं बताया। उसे लगा कि शायद लगातार नाइट ड्यूटी और मानसिक तनाव की वजह से उसका दिमाग भ्रम पैदा कर रहा है। लेकिन अगले कुछ दिनों में ऐसी घटनाएं होने लगीं, जिन्हें वह किसी भी तर्क से समझा नहीं पा रहा था।

हर रात ठीक बारह बजकर सात मिनट पर एम्बुलेंस का रियर कैमरा अपने आप चालू हो जाता। कभी स्क्रीन पर खाली सड़क दिखाई देती, कभी घना कोहरा, और कभी कुछ सेकंड के लिए वही लंबी काली परछाई।

धीरे-धीरे आदित्य की नींद कम होने लगी। जब भी वह आंखें बंद करता, उसे ऐसा लगता जैसे कोई उसके सिरहाने खड़ा होकर उसे घूर रहा हो। कई बार वह अचानक उठकर पूरे कमरे की लाइट जला देता, लेकिन वहां कोई नहीं होता।

एक सप्ताह बाद उसे फिर उसी इलाके से कॉल मिला।

इस बार मरीज कोई बुजुर्ग नहीं, बल्कि लगभग तीस साल का युवक था। उसके परिवार वालों का कहना था कि वह पिछले दो दिनों से बार-बार बेहोश हो रहा था और होश में आते ही एक ही बात दोहराता था—

“उसे मत आने देना… वह दरवाजे पर खड़ा है…”

आदित्य के शरीर में सिहरन दौड़ गई।

यही शब्द उसने उस बुजुर्ग महिला के मुंह से भी सुने थे।

वह युवक को लेकर अस्पताल की ओर चल पड़ा।

रास्ते में अचानक एम्बुलेंस की सभी लाइटें कुछ सेकंड के लिए बंद हो गईं। इंजन चलता रहा, लेकिन पूरा केबिन अंधेरे में डूब गया।

जब लाइट वापस आई, तो स्ट्रेचर पर लेटा युवक घबराकर बैठ चुका था। उसकी आंखें पूरी तरह खुली थीं और वह सीधे आदित्य की तरफ नहीं, बल्कि उसके पीछे देख रहा था।

कांपती आवाज़ में उसने कहा,

“वह अब आपके साथ आ गया है…”

इतना कहकर वह फिर बेहोश हो गया।

अस्पताल पहुंचने के बाद डॉक्टरों ने उसे भर्ती कर लिया, लेकिन आदित्य पहली बार डर गया था। यह कोई संयोग नहीं हो सकता था।

अगले दिन उसने छुट्टी ली और उस पुराने बंगले के बारे में जानकारी जुटानी शुरू की।

आसपास के लोगों से पूछने पर पता चला कि कई साल पहले वहां रघुवीर नाम का एक तांत्रिक रहता था। लोग दूर-दूर से उसके पास झाड़-फूंक कराने आते थे। कहा जाता था कि वह जिन लोगों से प्रेत बाधा हटाता था, उनकी नकारात्मक शक्तियों को एक विशेष काले आईने में बांध देता था।

लेकिन एक रात अचानक उसकी मृत्यु हो गई।

उसके बाद उस घर को हमेशा के लिए बंद कर दिया गया।

आदित्य को तुरंत उस बुजुर्ग महिला के पति की बात याद आई।

काला आईना…

उसी दिन उसने उस व्यक्ति से संपर्क किया।

आदमी ने कांपती आवाज़ में स्वीकार किया,

“मैंने सच छिपाया था। हमने वह आईना बेच दिया था। लगा था कि पुरानी बेकार चीज़ है।”

“किसे?”

“एक कबाड़ वाले को…”

काफी खोजबीन के बाद पता चला कि वह आईना शहर के बाहर स्थित एक पुराने गोदाम में पड़ा है।

रात होने से पहले आदित्य, संदीप और वह आदमी वहां पहुंचे।

गोदाम के अंदर चारों तरफ धूल जमी हुई थी। टूटी अलमारियां, जंग लगे लोहे के सामान और पुराने फर्नीचर के बीच आखिरकार उन्हें एक कपड़े से ढका लंबा आईना दिखाई दिया।

कमरे में अचानक असामान्य ठंड फैल गई।

संदीप ने कांपते हाथों से कपड़ा हटाया।

आईने का शीशा बिल्कुल काला था।

उसमें किसी का प्रतिबिंब नहीं दिख रहा था।

अचानक गोदाम का दरवाजा अपने आप बंद हो गया।

तेज हवा चलने लगी।

चारों तरफ लोहे का सामान हिलने लगा।

तभी आईने की काली सतह में धीरे-धीरे एक चेहरा उभरने लगा।

वही लंबी काली आकृति…

लेकिन इस बार उसका चेहरा दिखाई दे रहा था।

उसकी आंखें पूरी तरह सफेद थीं और होंठों पर अजीब मुस्कान थी।

वह आईने के अंदर से बाहर आने की कोशिश कर रही थी।

आदित्य का गला सूख गया।

उसी समय उसे अपनी दादी की कही एक बात याद आई—

“जिस चीज़ में बुराई कैद हो… उसे देखने से ज्यादा जरूरी है उसे ढक देना।”

उसने तुरंत पास पड़ा मोटा सफेद कपड़ा उठाया और पूरे आईने पर डाल दिया।

जैसे ही कपड़ा आईने पर पड़ा, पूरी इमारत जोर से कांपी।

एक भयानक चीख पूरे गोदाम में गूंज उठी।

कुछ ही सेकंड बाद सब शांत हो गया।

ठंडी हवा रुक गई।

लोहे का सामान स्थिर हो गया।

दरवाजा अपने आप खुल गया।

अगले दिन उस आईने को स्थानीय प्रशासन की अनुमति से एक बड़े लोहे के संदूक में बंद कर दिया गया। संदूक को मोटी जंजीरों से बांधकर उस जगह दफना दिया गया जहां अब किसी का आना-जाना नहीं था।

धीरे-धीरे सारी घटनाएं बंद हो गईं।

एम्बुलेंस का रियर कैमरा अब कभी अपने आप चालू नहीं हुआ।

वायरलेस से अजीब आवाज़ें भी आना बंद हो गईं।

आदित्य ने राहत की सांस ली।

उसे लगा कि सब कुछ खत्म हो चुका है।

लेकिन लगभग छह महीने बाद…

एक रात उसकी ड्यूटी शहर के दूसरे छोर पर लगी थी।

वह पूरी तरह निश्चिंत होकर गाड़ी चला रहा था कि अचानक कंट्रोल रूम से नई लोकेशन मिली।

“पुराना औद्योगिक क्षेत्र… गोदाम नंबर सत्रह…”

यह वही जगह थी…

जहां आईना दफनाया गया था।

आदित्य कुछ पल के लिए बिल्कुल चुप हो गया।

जब वह वहां पहुंचा तो पुलिस पहले से मौजूद थी।

एक जेसीबी मशीन से खुदाई चल रही थी।

एक मजदूर ने बताया,

“नई इमारत बनने वाली है… खुदाई में लोहे का बड़ा संदूक मिला है।”

आदित्य की सांसें थम गईं।

उसने दूर से देखा…

संदूक का ढक्कन आधा खुला हुआ था।

जंजीरें टूटी हुई थीं।

और उसके अंदर…

आईना नहीं था।

उसके बिल्कुल पास, धूल में किसी ने उंगली से सिर्फ तीन शब्द लिखे थे—

“मैं बाहर आ चुका हूँ।”

उस रात के बाद आदित्य ने एम्बुलेंस की नौकरी छोड़ दी।

कई साल बीत गए।

आज भी जब किसी पुराने गोदाम, बंद फैक्ट्री या सुनसान इमारत की खुदाई की खबर सुनाई देती है, तो वह अनायास टीवी बंद कर देता है।

क्योंकि उसे पता है…

कुछ प्रेत नष्ट नहीं होते।

उन्हें केवल कुछ समय के लिए कैद किया जा सकता है।

और जब कोई अनजाने में उनकी कैद तोड़ देता है…

तो वे फिर किसी नए चेहरे की तलाश में निकल पड़ते हैं।

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