दिन में जहां हजारों गाड़ियां दौड़ती थीं, वहीं इस समय चौड़ी सड़कें खाली पड़ी थीं। कुछ जगहों पर सिर्फ पीली स्ट्रीट लाइटें जल रही थीं और बीच-बीच में कोई आवारा कुत्ता सड़क पार करता दिखाई दे जाता था। दूर कहीं एंबुलेंस का सायरन सुनाई देता और फिर पूरा शहर दोबारा खामोश हो जाता।
लेकिन उस खामोशी को सबसे ज्यादा करीब से कोई देखता था, तो वह था विवेक शर्मा। 3 AM STORY
उम्र बत्तीस साल।

पिछले पांच साल से वह एक निजी कंपनी में City Surveillance Monitoring Executive के रूप में काम कर रहा था। उसकी जिम्मेदारी शहरभर में लगे लगभग बारह सौ CCTV कैमरों की निगरानी करना थी।
उसकी ड्यूटी रात नौ बजे से सुबह पांच बजे तक रहती थी।
ज्यादातर लोगों को लगता था कि CCTV देखने की नौकरी बेहद आसान होगी। लेकिन लगातार आठ घंटे तक सैकड़ों स्क्रीन पर नजर रखना किसी मानसिक परीक्षा से कम नहीं था।
कई बार सड़क दुर्घटनाएं लाइव दिखती थीं।
कभी चोरी।
कभी लड़ाई।
कभी कोई व्यक्ति अचानक सड़क पर गिर जाता।
इन सबके बीच विवेक का दिमाग इतना मजबूत हो चुका था कि अब उसे किसी भी दृश्य से ज्यादा फर्क नहीं पड़ता था।
उसकी एक आदत थी।
हर रात ठीक तीन बजे वह अपनी कुर्सी से उठकर मशीन से बिना चीनी वाली कॉफी लेता, कंट्रोल रूम की बड़ी खिड़की के पास दो मिनट खड़ा होकर बाहर देखता और फिर वापस अपनी सीट पर आ जाता।
उसका कहना था कि अगर तीन बजे आंखें पांच मिनट भी स्क्रीन से हट जाएं तो दिमाग दोबारा ताजा महसूस करता है।
उस रात भी सब कुछ बिल्कुल सामान्य था।
दीवार पर लगी डिजिटल घड़ी ने 02:58 AM दिखाया।
विवेक उठा।
कॉफी मशीन तक गया।
कप भरा।
वापस लौटते समय उसकी नजर कंट्रोल रूम में बैठे दूसरे ऑपरेटर नदीम पर गई।
नदीम कुर्सी पर झुककर मोबाइल चला रहा था।
“भाई, दो मिनट स्क्रीन देख लेना।”
नदीम बिना ऊपर देखे बोला,
“हाँ… जा।”
विवेक खिड़की तक गया।
बाहर हल्की धुंध थी।
पूरा इंडस्ट्रियल एरिया लगभग सुनसान पड़ा था।
उसने कॉफी का पहला घूंट लिया।
तभी…
टन…
दीवार पर लगी डिजिटल घड़ी ने 03:00 AM दिखा दिया।
उसी क्षण कंट्रोल रूम के स्पीकर से हल्की सी बीप सुनाई दी।
बीप का मतलब था कि किसी कैमरे में मोशन डिटेक्शन हुआ है।
ऐसा रोज होता था।
विवेक आराम से वापस अपनी सीट पर बैठ गया।
स्क्रीन नंबर 47 अपने आप बड़ा होकर सामने आ गया।
कैमरा शहर के पुराने फ्लाईओवर पर लगा था।
सड़क बिल्कुल खाली थी।
सिर्फ हवा चल रही थी।
विवेक ने सिस्टम पर नजर डाली।
मोशन डिटेक्शन लगातार सक्रिय था।
लेकिन स्क्रीन पर कोई इंसान दिखाई नहीं दे रहा था।
उसने कैमरे को डिजिटल ज़ूम किया।
कुछ नहीं।
फिर भी सिस्टम बार-बार बता रहा था—
Motion Detected.
उसने सोचा शायद हवा में उड़ता प्लास्टिक होगा।
उसने अलर्ट बंद कर दिया।
तीन सेकंड बाद वही बीप दोबारा सुनाई दी।
इस बार स्क्रीन पर कुछ अलग था।
फ्लाईओवर के बीचोंबीच…
एक महिला खड़ी थी।
सफेद नहीं।
काले कपड़ों में।
चेहरा नीचे झुका हुआ।
बाल सीधे कंधों तक।
वह बिल्कुल स्थिर खड़ी थी।
विवेक ने तुरंत रिकॉर्डिंग पीछे की।
दस सेकंड पहले।
महिला गायब।
पांच सेकंड पहले।
गायब।
फिर अचानक अगले फ्रेम में…
वह वहीं खड़ी दिखाई देने लगी।
जैसे किसी ने वीडियो एडिट करके उसे बीच में जोड़ दिया हो।
विवेक ने नदीम को आवाज दी।
“जरा इधर आ।”
नदीम आया।
स्क्रीन देखी।
“क्या हुआ?”
“ये महिला देख।”
“कहाँ?”
“बीच सड़क पर।”
नदीम कुछ सेकंड स्क्रीन देखता रहा।
फिर बोला,
“स्क्रीन खाली है।”
विवेक ने उसकी तरफ देखा।
“मजाक मत कर।”
“मैं सच बोल रहा हूँ।”
विवेक ने वापस स्क्रीन देखी।
महिला अभी भी वहीं खड़ी थी।
एक इंच भी नहीं हिली थी।
लेकिन नदीम उसे देख ही नहीं पा रहा था।
विवेक ने स्क्रीन की ब्राइटनेस बढ़ाई।
महिला और साफ दिखाई देने लगी।
उसकी गर्दन अस्वाभाविक रूप से दाईं तरफ झुकी हुई थी।
नदीम ने फिर पूछा,
“तू किसे देख रहा है?”
विवेक के हाथ धीरे-धीरे ठंडे होने लगे।
उसने कैमरे का लाइव फीड बंद करके रिकॉर्डिंग खोली।
रिकॉर्डिंग में भी वही महिला मौजूद थी।
लेकिन जैसे ही उसने रिकॉर्डिंग दूसरे सिस्टम पर भेजी…
वह महिला गायब हो गई।
दूसरे सिस्टम पर सिर्फ खाली सड़क दिखाई दे रही थी।
नदीम हंस पड़ा।
“भाई… दो दिन की छुट्टी ले ले।”
विवेक कुछ नहीं बोला।
उसने बात वहीं खत्म कर दी।
लेकिन अगले पंद्रह मिनट तक वह बार-बार उसी कैमरे को देखता रहा।
महिला वहीं खड़ी थी।
बिना हिले।
बिना कुछ किए।
फिर…
03:16 AM पर…
उसने धीरे-धीरे अपना सिर ऊपर उठाया।
पहली बार उसका चेहरा दिखाई दिया।
चेहरा बिल्कुल सामान्य था।
लेकिन आंखें…
पूरी तरह काली।
जैसे उनमें सफेद हिस्सा था ही नहीं।
विवेक अनायास कुर्सी पर सीधा बैठ गया।
महिला सीधे कैमरे की तरफ देखने लगी।
ऐसा लग रहा था जैसे उसे पता हो कि कोई उसे देख रहा है।
फिर उसने अपना दायाँ हाथ उठाया।
और…
कैमरे की ओर इशारा किया।
विवेक की रीढ़ में ठंडक दौड़ गई।
उसी समय स्क्रीन अचानक काली हो गई।
Signal Lost
कुछ सेकंड बाद कैमरा वापस चालू हुआ।
सड़क खाली थी।
महिला गायब थी।
विवेक ने राहत की सांस ली।
“सिस्टम ग्लिच होगा…”
उसने खुद को समझाया।
लेकिन उसी समय…
स्क्रीन नंबर 112 पर मोशन अलर्ट आया।
यह कैमरा शहर के दूसरे छोर पर था।
विवेक ने स्क्रीन खोली।
वहीं महिला।
इस बार बस स्टॉप पर।
सिर नीचे।
बिल्कुल स्थिर।
उसने तुरंत दूसरी स्क्रीन खोली।
कैमरा 209।
महिला।
कैमरा 341।
महिला।
कैमरा 518।
महिला।
हर कैमरे में।
शहर के अलग-अलग हिस्सों में।
एक ही समय पर।
एक ही मुद्रा में।
विवेक की उंगलियाँ कीबोर्ड पर जम गईं।
इतने में पीछे से सुपरवाइज़र अरुण आ गया।
“क्या हुआ?”
विवेक ने बिना कुछ बोले स्क्रीन दिखा दी।
अरुण ने स्क्रीन देखी।
फिर बोला,
“कौन-सी प्रॉब्लम है?”
“सर… ये महिला…”
“कहाँ?”
विवेक का गला सूख गया।
अरुण को भी कुछ दिखाई नहीं दे रहा था।
उसी पल कंट्रोल रूम की सारी लाइटें एक साथ हल्की-सी टिमटिमाईं।
एक सेकंड के लिए पूरा कमरा अंधेरे में डूब गया।
लाइट वापस आई।
सभी स्क्रीन सामान्य थीं।
महिला गायब थी।
अरुण ने सिस्टम रीस्टार्ट करने को कहा और चला गया।
नदीम फिर मुस्कुराने लगा।
“कम नींद का असर है।”
विवेक ने कोई जवाब नहीं दिया।
उस रात बाकी ड्यूटी बिना किसी घटना के खत्म हो गई।
सुबह पांच बजे वह पार्किंग में पहुंचा।
आसमान में हल्की रोशनी फैलने लगी थी।
उसने कार स्टार्ट की।
घर पहुंचने में लगभग चालीस मिनट लगते थे।
रास्ते में उसने कई बार खुद को समझाया कि शायद यह आंखों का भ्रम था।
लगातार स्क्रीन देखने से ऐसा हो सकता है।
घर पहुंचकर उसने नहाया।
फोन साइलेंट किया।
और सो गया।
शाम करीब छह बजे उसकी आंख खुली।
वह किचन में चाय बनाने गया।
तभी उसका मोबाइल बजा।
कंपनी के आईटी विभाग से कॉल था।
“विवेक सर?”
“हाँ?”
“कल रात आपने जिन कैमरों की रिकॉर्डिंग मार्क की थी… उनमें कुछ अजीब मिला है।”
विवेक चौंक गया।
“क्या?”
“रिकॉर्डिंग में कोई महिला नहीं है… लेकिन ठीक 03:16 AM पर हर कैमरे में एक फ्रेम के लिए कुछ टेक्स्ट अपने आप दिखाई दिया है।”
“क्या लिखा था?”
उधर कुछ सेकंड खामोशी रही।
फिर आईटी इंजीनियर धीमी आवाज में बोला—
“I CAN SEE YOU TOO.“
विवेक के हाथ से चाय का कप छूटकर फर्श पर गिर गया।
उसी क्षण उसके ड्रॉइंग रूम में लगे बंद CCTV मॉनिटर की काली स्क्रीन अपने आप जल उठी।
स्क्रीन पर सिर्फ एक ही चीज दिखाई दे रही थी…
उसके अपने बेडरूम का लाइव दृश्य।
जबकि उसके घर में कोई CCTV कैमरा लगा ही नहीं था…