कमरा नंबर 17” — एक डरावनी कहानी
अस्पतालों के बारे में लोग अक्सर कहते हैं कि वहां जीवन और मृत्यु दोनों साथ रहते हैं। लेकिन कुछ जगहें ऐसी भी होती हैं, जहां सिर्फ मौत नहीं रहती… बल्कि कुछ ऐसा भी रह जाता है जो कभी जा नहीं पाता। Real Ghost Story in Hindi
इंदौर के बाहरी इलाके में स्थित शिवम मल्टीस्पेशलिटी हॉस्पिटल दिन में पूरी तरह सामान्य दिखाई देता था। हर मंजिल पर मरीज, डॉक्टर, नर्सें और रिश्तेदारों की भीड़ रहती थी। लेकिन रात के बाद अस्पताल का माहौल बदल जाता था।

पांचवीं मंजिल का एक हिस्सा हमेशा बंद रहता था।
कारण?
पुराने स्टाफ के अनुसार वहां मौजूद कमरा नंबर 17 कई सालों से इस्तेमाल नहीं किया जाता था।
कोई आधिकारिक कारण कभी सामने नहीं आया।
कई नए कर्मचारियों ने पूछा भी, लेकिन जवाब हमेशा एक ही मिलता।
“मेंटेनेंस चल रही है।”
हालांकि अजीब बात यह थी कि सालों से किसी ने वहां कोई काम होते नहीं देखा।
राहुल माथुर उम्र तैंतीस वर्ष।
वह अस्पतालों के मेडिकल गैस सिस्टम की सर्विस करने वाली कंपनी में Biomedical Maintenance Engineer था। उसका काम अलग-अलग अस्पतालों में जाकर ऑक्सीजन लाइन, वैक्यूम सिस्टम और ICU के गैस पैनल की जांच करना था।
राहुल बेहद व्यवहारिक इंसान था।
उसे भूत-प्रेत जैसी बातों पर हंसी आती थी।
उसके लिए हर समस्या का कोई न कोई तकनीकी कारण जरूर होता था।
उस शाम उसे शिवम अस्पताल से इमरजेंसी कॉल मिली।
पांचवीं मंजिल की ऑक्सीजन प्रेशर लाइन बार-बार गिर रही थी।
रात नौ बजे तक वह अस्पताल पहुंच गया।
जांच शुरू हुई।
करीब एक घंटे बाद उसे पता चला कि मुख्य पाइपलाइन में कोई खराबी नहीं थी।
समस्या पांचवीं मंजिल के एक बंद सेक्शन से जुड़ी थी।
उसे वहीं जाकर वाल्व चेक करना था।
ड्यूटी पर मौजूद वार्ड बॉय अचानक चुप हो गया।
“सर… उधर?”
“हां।”
“वो… वहां कोई नहीं जाता।”
राहुल मुस्कुराया।
“अरे भाई, पाइप खुद ठीक नहीं होंगे।”
वार्ड बॉय ने चाबी निकाली।
हाथ कांप रहे थे।
“जल्दी वापस आ जाइएगा।”
लोहे का भारी दरवाजा खुला।
अंदर घुप्प अंधेरा।
राहुल ने टॉर्च ऑन की।
पूरा कॉरिडोर धूल से ढका था।
दीवारों पर पुराने पेंट की परतें उखड़ चुकी थीं।
कुछ कमरों के नंबर गायब थे।
कुछ दरवाजे आधे खुले हुए थे।
कॉरिडोर के आखिर में जंग लगी प्लेट लगी थी।
17
दरवाजा बाहर से बंद था।
लेकिन जैसे ही राहुल वहां पहुंचा…
अंदर से…
टक…टक…टक…
तीन हल्की दस्तक सुनाई दी।
राहुल ठिठक गया।
उसने सोचा शायद पाइप में दबाव बदलने की आवाज होगी।
फिर वही आवाज।
टक…
टक…
टक…
इस बार साफ दरवाजे के दूसरी तरफ से।
उसने दरवाजा खोला।
कमरा खाली था।
कोई फर्नीचर नहीं।
सिर्फ बीच में एक पुराना अस्पताल का बेड।
उस पर सफेद चादर।
बाकी पूरा कमरा धूल से भरा।
लेकिन…
बेड के चारों ओर जमीन बिल्कुल साफ थी।
जैसे कोई रोज वहां चलता हो।
राहुल ने वाल्व बॉक्स खोलना शुरू किया।
तभी…
पीछे किसी ने बहुत धीमी आवाज में कहा…
“देर हो गई…”
राहुल तुरंत पलटा।
कोई नहीं।
उसने पूरा कमरा देखा।
सन्नाटा।
वह फिर काम करने लगा।
आवाज दोबारा आई।
“आज… बहुत देर कर दी…”
इस बार आवाज बिल्कुल कान के पास थी।
राहुल तेजी से बाहर निकल आया।
कॉरिडोर खाली था।
उसने खुद को समझाया।
“साउंड रिफ्लेक्शन…”
लेकिन दिल की धड़कन सामान्य नहीं हो रही थी।
काम खत्म कर वह नीचे आया।
रिपोर्ट जमा की।
जाते-जाते उसने रिसेप्शनिस्ट से पूछा,
“ऊपर कमरा 17 क्यों बंद है?”
रिसेप्शनिस्ट का चेहरा उतर गया।
उसने कोई जवाब नहीं दिया।
पास बैठे बूढ़े सिक्योरिटी गार्ड ने धीरे से कहा,
“आप अंदर गए थे?”
“हां।”
गार्ड कुछ पल उसे देखता रहा।
फिर बोला,
“कल छुट्टी ले लेना।”
“क्यों?”
“ज्यादातर लोगों को पहली रात कुछ नहीं होता…”
राहुल हंसते हुए घर चला गया।
रात दो बजकर सत्रह मिनट।
मोबाइल बजा।
अज्ञात नंबर।
उसने रिसीव किया।
उधर सिर्फ मशीन जैसी बीप सुनाई दी।
बीप…
बीप…
बीप…
फिर एक महिला की सांसें।
और बहुत धीरे…
“रूम…
सत्रह…”
कॉल कट गई।
उसने नंबर मिलाया।
नंबर अस्तित्व में ही नहीं था।
अगले दिन ऑफिस में बैठा था।
लैपटॉप पर अस्पताल की रिपोर्ट बना रहा था।
अचानक स्क्रीन झिलमिलाई।
कुछ सेकंड बाद मॉनिटर पर CCTV जैसा दृश्य दिखाई दिया।
एक अस्पताल का कमरा।
बीच में बेड।
दीवार पर लिखा था—
17
राहुल घबरा गया।
उसने स्क्रीन बंद की।
दोबारा ऑन की।
सब सामान्य।
उसने सोचा सिस्टम हैंग हुआ होगा।
लेकिन उसी शाम…
उसे फिर वही अस्पताल भेजा गया।
इस बार कारण और भी अजीब था।
रात में पांचवीं मंजिल का ऑक्सीजन अलार्म बार-बार बज रहा था।
लेकिन वहां कोई मरीज भर्ती नहीं था।
राहुल मन मारकर गया।
कॉरिडोर में पहुंचते ही उसे ठंडी हवा का झोंका महसूस हुआ।
कमरा 17 का दरवाजा इस बार पहले से खुला था।
हालांकि उसने पिछली रात खुद बंद किया था।
अंदर गया।
बेड पर इस बार धूल नहीं थी।
चादर बिल्कुल नई लग रही थी।
और…
बेड के पास एक मरीज की फाइल रखी थी।
उसने फाइल खोली।
नाम की जगह खाली।
फोटो की जगह खाली।
लेकिन नीचे एक लाइन लिखी थी—
“अगला मरीज…”
उसके नीचे…
उसका अपना नाम।
राहुल माथुर।
राहुल के हाथ सुन्न हो गए।
उसी समय बेड के पीछे लगे पुराने हार्ट मॉनिटर ने खुद-ब-खुद काम करना शुरू कर दिया।
बीप…
बीप…
बीप…
फिर स्क्रीन पर ECG लाइन चलने लगी।
कमरे में कोई मरीज नहीं था।
लेकिन मॉनिटर किसी की धड़कन रिकॉर्ड कर रहा था।
धीरे-धीरे बीप की गति कम होने लगी।
बीप…
…………
बीप…
…………
फिर लंबी लगातार आवाज।
बीईईईईईईईईईईप….
राहुल ने घबराकर पीछे देखा।
बेड पर अब कोई लेटा हुआ था।
सफेद चादर से ढका शरीर।
कुछ सेकंड पहले वहां कुछ नहीं था।
चादर के नीचे मौजूद आकृति धीरे-धीरे उठने लगी।
लेकिन…
सिर की जगह कुछ नहीं था।
सिर्फ गर्दन तक शरीर।
राहुल चीखता हुआ बाहर भागा।
कॉरिडोर अचानक पहले से लंबा हो गया।
जितना भागता…
निकास उतना दूर होता जाता।
हर दरवाजे पर सिर्फ एक ही नंबर दिखाई देने लगा।
17
17
17
17
पूरा कॉरिडोर जैसे उसी कमरे में बदल गया था।
पीछे से पहियों की आवाज आई।
चर्र…
चर्र…
चर्र…
राहुल ने पलटकर देखा।
एक खाली स्ट्रेचर अपने आप उसकी तरफ आ रहा था।
उसके पीछे वही बिना सिर वाला शरीर चल रहा था।
उसके कदमों की आवाज नहीं थी।
सिर्फ स्ट्रेचर के पहियों की चरमराहट।
राहुल पूरी ताकत से भागा।
अचानक सामने लिफ्ट खुल गई।
वह अंदर कूद गया।
दरवाजा बंद हुआ।
लिफ्ट नीचे जाने लगी।
राहुल ने राहत की सांस ली।
लेकिन जब दरवाजा खुला…
वह फिर उसी पांचवीं मंजिल पर था।
और सामने…
कमरा नंबर 17।
तीसरी बार दरवाजा अपने आप खुला।
अंदर इस बार पूरा कमरा बदल चुका था।
दीवारें नई थीं।
लाइटें जल रही थीं।
डॉक्टर और नर्सें भाग-दौड़ कर रहे थे।
जैसे कोई ऑपरेशन चल रहा हो।
बीच में एक मरीज पड़ा था।
डॉक्टर चिल्ला रहा था,
“ऑक्सीजन गिर रही है!”
“जल्दी!”
राहुल पास गया।
मरीज का चेहरा देखने के लिए डॉक्टर हटे…
और बेड पर वही लेटा था।
राहुल।
उसने खुद को देखा।
मशीनें बंद हो रही थीं।
डॉक्टर बोले,
“टाइम ऑफ डेथ…
2:17 AM.”
अचानक पूरा दृश्य गायब हो गया।
कमरा फिर वीरान हो गया।
सुबह अस्पताल के सिक्योरिटी गार्ड ने देखा कि पांचवीं मंजिल का बंद हिस्सा खुला हुआ है।
कमरा नंबर 17 के अंदर राहुल बेहोश पड़ा था।
उसकी नब्ज चल रही थी।
लेकिन होश आने के बाद उसने सिर्फ एक ही बात कही—
“वह कमरा मरीजों को नहीं बुलाता…
वह उनके मरने का समय पहले से जानता है।”
कुछ दिनों बाद राहुल ने नौकरी छोड़ दी।
उसने कभी किसी अस्पताल में दोबारा काम नहीं किया।
लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती।
आज भी शिवम अस्पताल में आधिकारिक तौर पर कमरा नंबर 17 मौजूद नहीं है।
पांचवीं मंजिल के नक्शे में कमरों की गिनती…
16 के बाद सीधे 18 से शुरू होती है।
फिर भी…
रात ठीक 2 बजकर 17 मिनट पर अस्पताल के पुराने इंटरकॉम पर कभी-कभी एक कॉल आती है।
दूसरी तरफ कोई दिखाई नहीं देता।
सिर्फ एक धीमी आवाज सुनाई देती है—
“अगला मरीज… कमरा नंबर 17 तैयार है…”
और कॉल अपने आप कट जाती है।
Pingback: Usne Window Me Kisi Ko Dekha | Purana Power House Ki Sachchi Kahani - Scary Crocodile
Pingback: कैमरे में कैद हुआ भूत? | Gwalior Fort की सच्ची कहानी - Scary Crocodile