Us Kuan Se Door Raho | Kala Kuan Horror Story

उत्तर प्रदेश के हर गाँव में कोई न कोई ऐसी जगह जरूर होती है जिसके बारे में लोग खुलकर बात नहीं करते।

कहीं पुराना पीपल का पेड़…
कहीं बंद पड़ी हवेली…
और कहीं ऐसा रास्ता जहाँ लोग रात के बाद अकेले नहीं जाते।

बड़ागांव में वो जगह थी — “काला कुआँ।”

Kala Kuan Horror Story

रोहित आज भी उस रास्ते का नाम सुनकर असहज हो जाता है।
तीन साल बीत चुके हैं… लेकिन उसे आज तक समझ नहीं आया कि उस रात जंगल में सच में क्या हुआ था।

उसने कई बार खुद को समझाने की कोशिश की कि शायद वो सब डर था… थकान थी… या दिमाग का भ्रम।

लेकिन फिर उसे याद आता है—

Kala Kuan Horror Story उस रात जब वो गाँव पहुँचा था… उसकी बाइक के पीछे मिट्टी में किसी गीले हाथ के निशान बने हुए थे।

और वो निशान इंसान के नहीं लग रहे थे।


ये घटना अगस्त 2021 की है।

बारिश का मौसम था। पूरे दिन बादल छाए रहे थे। शाम तक कई जगह पानी भर चुका था। रोहित अपने तीन दोस्तों—समीर, विशाल और करण—के साथ शहर से वापस लौट रहा था।

चारों एक शादी में गए थे।

रात काफी हो चुकी थी, इसलिए उन्होंने जल्दी गाँव पहुँचने के लिए जंगल वाला पुराना रास्ता चुन लिया। वही रास्ता जिसे गाँव वाले रात में इस्तेमाल नहीं करते थे।

विशाल ने बाइक स्टार्ट करते हुए मजाक किया—

“अगर भूत मिल गया ना तो पहले समीर को पकड़कर ले जाएगा। सबसे ज्यादा बकवास यही करता है।”

समीर हँस पड़ा।

“भूत अगर होता तो सबसे पहले तेरे चेहरे से डर जाता।”

चारों हँसते हुए निकल पड़े।

शुरुआत में सब सामान्य था। सड़क गीली थी लेकिन मौसम शांत था। कहीं-कहीं खेतों के पास पानी जमा था और मिट्टी की तेज गंध हवा में घुली हुई थी।

करीब आधे घंटे बाद जंगल शुरू हुआ।

और उसी के साथ सड़क का माहौल बदलने लगा।

मोबाइल नेटवर्क गायब हो गया।

सड़क पर कोई वाहन नहीं था।

यहाँ तक कि कुत्तों या कीड़ों की आवाज भी नहीं आ रही थी।

बस बाइक के इंजन की आवाज।

करण पीछे बैठा बार-बार अंधेरे जंगल की तरफ देख रहा था।

“यार… यहाँ इतना शांत क्यों है?”

रोहित ने जवाब नहीं दिया।

असल में उसने भी ये बात महसूस कर ली थी।

बरसात के बाद जंगल कभी इतना चुप नहीं होता।

कुछ दूर आगे जाते ही समीर की बाइक अचानक बंद हो गई।

“अबे क्या हुआ?” विशाल ने पूछा।

समीर ने दो-तीन बार self start दबाया।

कुछ नहीं हुआ।

“पेट्रोल है?”

“पूरा है।”

रोहित भी अपनी बाइक रोककर नीचे उतरा। सड़क पर हल्की धुंध उतरने लगी थी। पेड़ों से पानी अब भी टपक रहा था।

तभी करण ने धीरे से कहा—

“तुम लोगों को आवाज सुनाई दे रही है?”

सब चुप हो गए।

दूर कहीं से… जैसे कोई धीरे-धीरे रो रहा हो।

पहले लगा शायद किसी जानवर की आवाज होगी। लेकिन कुछ सेकंड बाद साफ सुनाई दिया—

वो किसी औरत के रोने जैसी आवाज थी।

समीर ने जबरदस्ती हँसने की कोशिश की।

“कोई गाँव होगा पास में।”

लेकिन वहाँ आसपास कोई गाँव नहीं था। ये बात सब जानते थे।

रोहित ने टॉर्च ऑन की और सड़क के किनारे रोशनी डाली।

उसी वक्त विशाल की नजर बाईं तरफ पड़ी।

“उधर देख…”

सड़क से थोड़ा नीचे झाड़ियों के पीछे पत्थर का गोल ढांचा दिखाई दे रहा था।

पुराना कुआँ।

चारों धीरे-धीरे नीचे उतरे।

कुएँ के आसपास की मिट्टी बाकी जगहों से ज्यादा काली थी। जैसे वहाँ हमेशा नमी रहती हो। ऊपर लोहे का टूटा बोर्ड टेढ़ा लटक रहा था।

उस पर मुश्किल से पढ़ा जा रहा था—

“काला कुआँ
पास आना मना है”

करण ने तुरंत पीछे हटते हुए कहा—

“चलो यहाँ से।”

लेकिन रोहित कुएँ के पास चला गया।

उसे लगा शायद अंदर कोई जानवर गिरा होगा। वही आवाज आ रही होगी।

उसने मोबाइल की flashlight अंदर डाली।

कुआँ बहुत गहरा था।

Kala Kuan Horror Story

इतना गहरा कि रोशनी नीचे तक पहुँच ही नहीं रही थी।

और तभी…

अंदर से किसी ने बहुत धीमी आवाज में कहा—

“भैया…”

रोहित का हाथ वहीं रुक गया।

आवाज इतनी साफ थी कि उसे लगा कुएँ के अंदर सच में कोई मौजूद है।

विशाल भी घबरा गया।

“किसी को बुलाओ क्या?”

नीचे से फिर आवाज आई—

“मुझे बाहर निकालो…”

इस बार वो आवाज किसी छोटे बच्चे जैसी लगी।

समीर ने तुरंत कहा—

“ये मजाक है क्या?”

कोई जवाब नहीं आया।

लेकिन कुछ सेकंड बाद कुएँ के अंदर से पानी में हलचल जैसी आवाज आने लगी… जबकि अंदर पानी था ही नहीं।

करण अब सच में डर चुका था।

“रोहित बस… चल यहाँ से…”

उसी समय पीछे जंगल की तरफ से किसी के पैरों की आहट सुनाई दी।

चारों एक साथ मुड़े।

अंधेरे में एक बूढ़ी औरत खड़ी थी।

पतली… झुकी हुई… सिर पर गीला कपड़ा… और हाथ में पुरानी लालटेन।

वो इतनी चुपचाप खड़ी थी कि किसी को पता ही नहीं चला वो वहाँ कब आई।

उसने सीधे कुएँ की तरफ देखते हुए कहा—

“आवाज सुनी तुम लोगों ने?”

कोई कुछ नहीं बोला।

बूढ़ी औरत धीरे-धीरे उनके पास आई। उसकी आँखें अजीब तरह से लाल थीं, जैसे कई दिनों से सोई न हो।

“जिसने पहली बार आवाज सुनी… वो बचकर नहीं जाता।”

रोहित ने पूछा—

“क्या मतलब?”

औरत ने जवाब देने से पहले कुएँ के अंदर देखा। फिर बहुत धीमी आवाज में बोली—

“बीस साल पहले एक बस यहाँ पलटी थी। बारिश की रात थी। आधे लोग इसी कुएँ में गिरे थे।”

हवा अचानक तेज चलने लगी।

लालटेन की लौ काँपने लगी।

“तब से ये कुआँ लोगों को बुलाता है।”

समीर ने चिढ़कर कहा—

“अम्मा डराओ मत। अगर इतना ही खतरनाक है तो गाँव वाले इसे बंद क्यों नहीं करते?”

औरत ने उसकी तरफ देखा।

उस नजर में कुछ ऐसा था जिससे समीर तुरंत चुप हो गया।

“बंद किया था,” उसने कहा।
“तीन बार।”

“हर बार कुआँ फिर खुल गया।”

उसके बाद कुछ सेकंड तक सिर्फ हवा की आवाज आती रही।

फिर अचानक—

समीर गायब था।

सचमुच गायब।

वो अभी दो सेकंड पहले रोहित के बगल में खड़ा था।

लेकिन अब वहाँ कोई नहीं था।

“समीर!”

विशाल जोर से चिल्लाया।

कोई जवाब नहीं।

करण भागकर सड़क तक गया। रोहित ने टॉर्च जंगल में घुमाई। कहीं कुछ नहीं था।

तभी कुएँ के अंदर से आवाज आई—

“रोहित…”

इस बार वो समीर की आवाज थी।

रोहित धीरे-धीरे कुएँ के पास गया।

उसका गला सूख चुका था।

उसने नीचे रोशनी डाली।

और उसका शरीर वहीं जम गया।

बहुत नीचे अंधेरे में… समीर खड़ा था।

लेकिन वो ऊपर नहीं देख रहा था।

वो कुएँ की दीवार की तरफ मुँह करके खड़ा था।

जैसे किसी से बात कर रहा हो।

“समीर!” रोहित चिल्लाया।

धीरे-धीरे उसने अपना सिर घुमाया।

उसके चेहरे पर अजीब सी मुस्कान थी।

और तभी टॉर्च बंद हो गई।

पूरे जंगल में अंधेरा छा गया।

करण चीख पड़ा।

कहीं पास में किसी के दौड़ने की आवाज आई।

विशाल ने रोहित का हाथ पकड़ा—

“भाग!”

चारों तरफ अफरा-तफरी मच गई।

रोहित और विशाल ऊपर सड़क की तरफ भागे। पीछे करण भी था… लेकिन कुछ दूर जाकर उसकी आवाज अचानक बंद हो गई।

रोहित ने पीछे मुड़कर देखा।

सड़क खाली थी।

सिर्फ गीली मिट्टी पर घसीटने के निशान बने हुए थे।

उस रात दोनों किसी तरह मुख्य सड़क तक पहुँचे।

सुबह होते ही गाँव वाले उन्हें लेकर वापस जंगल गए।

लेकिन वहाँ कुछ नहीं था।

न कुआँ।

न टूटा बोर्ड।

न कोई रास्ता नीचे जाता हुआ।

बस घनी झाड़ियाँ।

रोहित बार-बार वही जगह दिखाता रहा जहाँ कुआँ था।

लेकिन गाँव वालों के चेहरे बदल चुके थे।

गाँव के एक बूढ़े आदमी ने धीरे से पूछा—

“तुम लोगों के साथ कौन था?”

“क्या मतलब?”

“समीर और करण…”

उस आदमी ने काँपती आवाज में कहा—

“उन दोनों की मौत तो तीन साल पहले हो चुकी है।”

रोहित हँस पड़ा।

उसे लगा गाँव वाले मजाक कर रहे हैं।

लेकिन फिर उन्हें पुराने अखबार दिखाए गए।

बरसात की रात।
जंगल का वही रास्ता।
बाइक हादसा।

मरने वालों के नाम—

समीर चौहान।
करण यादव।

रोहित के हाथ से अखबार गिर गया।

उसे तभी याद आया—

शादी से लौटते वक्त समीर और करण पूरे रास्ते असामान्य तरीके से चुप थे।

उन्होंने रास्ते में एक बार भी मोबाइल इस्तेमाल नहीं किया था।

और सबसे अजीब बात—

जब वो चारों चाय पीने रुके थे… दुकान वाले ने सिर्फ दो कप चाय रखी थी।

उस वक्त किसी ने ध्यान नहीं दिया।

आज भी बड़ागांव में लोग उस रास्ते से रात में नहीं गुजरते।

क्योंकि कई लोगों का कहना है—

बारिश के मौसम में कभी-कभी जंगल के अंदर फिर वही कुआँ दिखाई देता है।

और अगर कोई उसके अंदर झाँक ले…

तो उसे नीचे किसी अपने की आवाज जरूर सुनाई देती है।

भारत में ऐसी कई रहस्यमयी और डरावनी कहानियाँ लोककथाओं का हिस्सा रही हैं। आप Horror Fiction के बारे में यहाँ पढ़ सकते हैं:
https://en.wikipedia.org/wiki/Horror_fiction

तो उसे अपने पीछे किसी के खड़े होने का एहसास जरूर होता है… 💀

ऐसी ही और डरावनी कहानियाँ पढ़ने के लिए हमारी Hindi Horror Stories कैटेगरी जरूर देखें।

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