MURDAGHAR – यहाँ मुर्दे नहीं… राज़ रखे जाते हैं

Writer – निशांत रावत

शहर के पुराने हिस्से में एक इमारत थी, जिसे लोग MURDAGHAR कहते थे।

असल में उसका सरकारी नाम था—
“शव संरक्षण केंद्र, ब्लॉक नंबर 7”

लेकिन पिछले बीस सालों में किसी ने उसे इस नाम से नहीं पुकारा था।

लोग कहते थे, वहाँ रखे मुर्दे कभी-कभी करवट बदलते हैं।
कभी कोई बंद drawer अंदर से खटखटाता है।
कभी रात के तीन बजे freezer room से किसी बच्चे के रोने की आवाज़ आती है।

और सबसे अजीब बात—

वहाँ जितने भी चौकीदार लगे, उनमें से कोई भी सातवीं रात के बाद वापस नहीं आया।

MURDAGHAR

नई नौकरी

विनय को इन बातों पर भरोसा नहीं था।

उसे सिर्फ पैसों पर भरोसा था।

उसके पिता की दवाइयाँ चल रही थीं, घर का किराया बाकी था, और जिस factory में वह काम करता था, वह अचानक बंद हो गई थी।

जब एक आदमी ने उसे रात की नौकरी offer की—

“बस पुरानी building की security करनी है। रात 9 से सुबह 5. Salary अच्छी है।”

विनय ने बिना ज्यादा पूछे हाँ कर दी।

MURDAGHAR जब उसने जगह का नाम सुना—

MURDAGHAR

तो उसके हाथ में पकड़ी चाय हल्की-सी हिल गई।

“मुर्दाघर?” उसने पूछा।

आदमी मुस्कुराया, “नाम से डर गया?”

“डरने वाली बात है क्या?”

आदमी ने उसकी आँखों में देखकर कहा,
“डरने वाली नहीं… समझने वाली बात है।”


पहली रात

रात 8:55 पर विनय वहाँ पहुँचा।

इमारत शहर के बाकी हिस्से से अलग, एक सूनी road के अंत में खड़ी थी। बाहर लगी tube light बार-बार blink कर रही थी।

Gate पर जंग लगा board टेढ़ा लटका था—

MURDAGHAR – Restricted Area

अंदर जाते ही एक बूढ़ा आदमी मिला। उसका नाम था हरिराम।

वह पिछली shift का चौकीदार था।

उसने विनय को एक key bunch दिया और बोला,
“Main gate, office, freezer room… और basement की चाबी।”

“Basement में क्या है?” विनय ने पूछा।

हरिराम का चेहरा सख्त हो गया।

“Basement मत खोलना।”

“क्यों?”

हरिराम ने जवाब नहीं दिया। बस अपनी जेब से एक छोटा-सा कागज़ निकाला और विनय को पकड़ा दिया।

उस पर लिखा था—

Rule No. 1: रात 2:17 के बाद freezer room में मत जाना।
Rule No. 2: अगर कोई dead body तुम्हें नाम से बुलाए, जवाब मत देना।
Rule No. 3: Basement से अगर knock आए, तो समझना कोई बाहर आना चाहता है। लेकिन दरवाज़ा मत खोलना।
Rule No. 4: अगर तुम्हें लगे कि तुम अकेले नहीं हो… तो तुम सच सोच रहे हो।

विनय हँस पड़ा।

“ये prank है?”

हरिराम ने उसे देखा।

“मैं भी पहली रात हँसा था।”

फिर वह बिना पीछे देखे चला गया।


सफेद चादर

रात के 11 बजे तक सब normal रहा।

विनय office room में बैठा CCTV screen देख रहा था। Screen पर corridors, freezer room का बाहर वाला हिस्सा, main gate और पीछे की दीवार दिख रही थी।

Freezer room के अंदर CCTV नहीं था।

क्योंकि हरिराम ने कहा था—

“अंदर camera लगाओगे तो screen पर वही दिखेगा जो वो दिखाना चाहेंगे।”

विनय ने खुद से कहा,
“बकवास।”

तभी corridor वाले camera में उसे कुछ दिखा।

एक सफेद चादर।

धीरे-धीरे जमीन पर घिसटती हुई।

विनय chair से उठ गया।

“कौन है?”

उसने torch उठाई और corridor में चला गया।

Corridor ठंडा था। इतना ठंडा कि उसकी साँस धुएँ जैसी दिख रही थी।

आगे floor पर सफेद चादर पड़ी थी।

विनय ने पास जाकर उसे उठाया।

नीचे कुछ नहीं था।

उसी पल पीछे से आवाज़ आई—

“विनय…”

वह जम गया।

आवाज़ freezer room के अंदर से आई थी।


नाम लेकर पुकारना

विनय के कानों में rule number 2 गूंजा।

अगर कोई dead body तुम्हें नाम से बुलाए, जवाब मत देना।

उसने होंठ बंद रखे।

फिर वही आवाज़—

“विनय… दरवाज़ा खोलो…”

यह आवाज़ किसी बूढ़ी औरत की थी।

विनय ने freezer room के छोटे glass window से अंदर झाँका।

अंदर लंबी metal tables थीं। कुछ bodies सफेद कपड़े से ढकी थीं। दीवार के साथ steel drawers लगे थे।

Drawer नंबर 13 थोड़ा खुला हुआ था।

अंदर अंधेरा था।

फिर उसी drawer से आवाज़ आई—

“बेटा… ठंड लग रही है…”

विनय पीछे हट गया।

उसकी जेब में रखी चाबी खनखनाई।

अचानक drawer नंबर 13 अपने-आप बंद हो गया।

धड़ाम।

फिर अंदर से तीन बार knock हुआ।

ठक।
ठक।
ठक।


2:17 AM

विनय office में लौट आया।

उसने घड़ी देखी।

1:49 AM.

वह बार-बार CCTV देखता रहा। सब खाली था।

लेकिन उसके कानों में वह आवाज़ अटकी हुई थी—

“बेटा… ठंड लग रही है…”

2:16 AM पर lights flicker करने लगीं।

2:17 AM पर पूरी building की बिजली चली गई।

Emergency light जल गई।

लाल रंग की।

अब पूरी जगह किसी crime scene जैसी लग रही थी।

तभी basement के दरवाज़े की तरफ से आवाज़ आई।

ठक।

विनय ने सांस रोक ली।

ठक।

ठक।

फिर किसी ने अंदर से धीरे-धीरे कहा—

“Vinay… मुझे बाहर निकालो…”

इस बार आवाज़ उसकी माँ जैसी थी।

विनय का दिल जोर से धड़कने लगा।

उसकी माँ गाँव में थी। वह बीमार थी। लेकिन आवाज़… बिल्कुल वही।

“विनय… बेटा… मैं अंधेरे में हूँ…”

विनय की आँखों में आँसू आ गए।

वह basement door की ओर बढ़ा।

उसके हाथ ने key bunch कसकर पकड़ा।

फिर उसके phone पर message आया।

Unknown number.

Don’t open the basement. She is not your mother.

विनय रुक गया।

उसने काँपते हाथ से reply किया—

Who are you?

Answer आया—

The last guard.


आखिरी चौकीदार

विनय ने तुरंत call किया।

Phone लगा।

दूसरी तरफ से बहुत धीमी साँसों की आवाज़ आई।

“Hello?”

एक आदमी बोला,
“तुम्हारी पहली रात है?”

“तुम कौन हो?”

“नाम मत पूछो। नाम यहाँ चीज़ों को ताकत देता है।”

“मुझे क्या करना चाहिए?”

“सुबह तक जिंदा रहना है तो तीन बातें याद रखो।
पहली—basement में जो है, वह इंसान की आवाज़ चुरा सकता है।
दूसरी—freezer room में जो bodies हैं, उनमें से सब मरी हुई नहीं हैं।
तीसरी—सबसे बड़ा खतरा मुर्दों से नहीं… records room से है।”

“Records room?”

“जहाँ उनके नाम लिखे हैं।”

“किसके नाम?”

कुछ सेकंड चुप्पी रही।

फिर वह बोला—

“उनके, जिन्हें कभी मारा ही नहीं गया… लेकिन मुर्दा घोषित कर दिया गया।”

Call कट गया।


Records Room

विनय ने office की दराजें खंगालीं।

एक पुरानी file मिली—

Missing Bodies Register

उसने पहला पन्ना खोला।

कई नाम कटे हुए थे।

फिर उसे एक नाम दिखा—

Vinay Sharma – Received: 17 August 2004

विनय का गला सूख गया।

उसका पूरा नाम यही था।

लेकिन उसकी जन्म तारीख 17 August 2004 थी।

Register में आगे लिखा था—

Status: Body not found. Identity preserved.

Identity preserved?

इसका मतलब क्या था?

अचानक पीछे से किसी ने कहा—

“तुम देर से आए।”

विनय पलटा।

दरवाज़े पर एक छोटा लड़का खड़ा था। उम्र करीब 9 साल। चेहरा पीला। आँखें काली।

“तुम कौन हो?” विनय ने पूछा।

लड़के ने कहा—

“मैं वो हूँ जिसे तुम्हारी जगह रखा गया था।”

विनय पीछे हट गया।

“मेरी जगह?”

लड़के ने मुस्कुराकर कहा—

“हर शहर को कुछ जिंदा लोगों की जरूरत होती है… और कुछ ऐसे लोगों की, जिन्हें कागजों में मारना पड़ता है।”

“तुम क्या बोल रहे हो?”

लड़के ने office की दीवार पर लगी पुरानी photo की तरफ इशारा किया।

वहाँ एक आदमी खड़ा था।

सफेद coat में।

नीचे नाम लिखा था—

Dr. Mahendra Kaul – Founder

लड़के ने कहा—

“यह डॉक्टर मुर्दों को नहीं रखता था। यह पहचानें रखता था।”


पहचान का खेल

विनय को धीरे-धीरे समझ आने लगा।

इस मुर्दाघर में सिर्फ dead bodies नहीं आती थीं।

यहाँ उन लोगों की पहचानें छुपाई जाती थीं जिनको system से गायब करना होता था।

कभी किसी गरीब का नाम मरने वालों की list में डाल दिया जाता।
कभी किसी बच्चे की file बदल दी जाती।
कभी किसी जिंदा आदमी को paper पर dead घोषित कर दिया जाता।

फिर उसकी identity किसी और को दे दी जाती।

लड़का बोला—

“तुम असली विनय नहीं हो।”

विनय चीख पड़ा,
“चुप!”

लड़का शांत रहा।

“तुम्हें जो माँ मिली, वह तुम्हारी माँ नहीं। जो घर मिला, वह तुम्हारा घर नहीं। जो नाम मिला, वह भी तुम्हारा नहीं।”

विनय का सिर घूमने लगा।

“झूठ…”

लड़का पास आया।

“सच basement में बंद है।”


Basement का दरवाज़ा

Basement से फिर आवाज़ आई।

इस बार किसी बूढ़े आदमी की।

“Vinay… मुझे बचा लो…”

फिर एक लड़की की।

“भैया…”

फिर एक बच्चे की।

“अंधेरा है…”

हर आवाज़ अलग थी।

हर आवाज़ मदद मांग रही थी।

विनय के हाथ काँप रहे थे।

उसे phone वाला आदमी याद आया—

Don’t open the basement.

लेकिन अगर अंदर सच में लोग बंद हों?

अगर rule सिर्फ डराने के लिए हों?

अगर यह पूरा system किसी crime को छुपा रहा हो?

विनय ने key निकाली।

लड़का मुस्कुराया।

“हाँ… खोलो।”

विनय ने उसकी तरफ देखा।

“तुम चाहते हो मैं खोलूँ?”

लड़का चुप हो गया।

यही गलती थी।

विनय समझ गया—
जो भी basement में था, वह चाहता था कि दरवाज़ा खुले।

उसने key वापस जेब में रख ली।

लड़के का चेहरा बिगड़ गया।

उसकी आँखों से काला पानी बहने लगा।

“तुम भी बाकी लोगों जैसे हो…”

विनय ने पूछा—

“बाकी लोग कहाँ हैं?”

लड़के ने अपने गले पर उंगली रखी।

फिर धीरे से बोला—

“Freezer room.”


Drawer Number 13

विनय freezer room में गया।

घड़ी 3:08 AM दिखा रही थी।

अंदर इतनी ठंड थी कि उसकी उंगलियाँ सुन्न हो गईं।

Drawer number 13 बंद था।

उसने handle पकड़ा।

जैसे ही उसने drawer खींचा, अंदर से बदबू का तेज झोंका आया।

Drawer में कोई body नहीं थी।

सिर्फ पुरानी files थीं।

ऊपर रखी file पर लिखा था—

PROJECT MURDAGHAR

विनय ने file खोली।

पहला पन्ना—

मानव पहचान संरक्षण प्रयोग
Objective: मृत्यु प्रमाणपत्र के माध्यम से जीवित व्यक्तियों को system से हटाना।

दूसरे पन्ने पर photos थीं।

कई बच्चे।

कई गरीब परिवार।

कई अनाथ।

फिर एक photo देखकर विनय की सांस रुक गई।

वह खुद।

लेकिन photo में वह 6 महीने का बच्चा था।

नीचे लिखा था—

Subject V-17. Adopted identity assigned.

विनय की आँखों के सामने सब घूमने लगा।

तभी freezer room का दरवाज़ा अपने आप बंद हो गया।

अंदर से lock।

और सभी drawers एक-एक करके खुलने लगे।


मुर्दे उठे नहीं… यादें उठीं

Bodies बाहर नहीं आईं।

उनकी आवाज़ें आईं।

“मेरा नाम वापस दो…”
“मुझे घर जाना है…”
“मेरी माँ अब भी मुझे ढूंढ रही होगी…”
“मैं मरा नहीं था…”
“मुझे कागज़ में मार दिया…”

विनय ने कान बंद कर लिए।

फिर सबसे आखिरी drawer खुला।

उसमें एक बूढ़ा आदमी लेटा था।

आँखें खुली हुईं।

लेकिन वह सड़ा नहीं था।

जैसे किसी ने उसे सालों से जिंदा और मुर्दा के बीच रोक रखा हो।

उसने विनय को देखा।

“तू आ गया…”

“कौन हो तुम?”

बूढ़ा बोला—

“मैं असली विनय हूँ।”

विनय के पैरों तले जमीन खिसक गई।

“नहीं…”

बूढ़ा हँसा।

“तेरा चेहरा मेरा है। तेरा नाम मेरा है। तेरी जिंदगी मेरी file से बनी है।”

“तो मैं कौन हूँ?”

बूढ़े ने जवाब दिया—

“तू वो बच्चा है जिसे बचाने के लिए मुझे मारा गया था।”


असली सच

बूढ़े ने टूटी आवाज़ में बताया—

सालों पहले Dr. Mahendra Kaul ने एक secret experiment शुरू किया था।
वह मरे हुए लोगों की पहचान जिंदा लोगों पर डालता था।
अनाथ बच्चों को नई identities दी जाती थीं।
कुछ लोग बच जाते थे।
कुछ हमेशा के लिए गायब हो जाते थे।

विनय असल में एक ऐसे परिवार का बच्चा था, जिसकी हत्या कर दी गई थी।
उसे बचाने के लिए एक ward boy ने उसका record बदल दिया।
उसे “Vinay Sharma” बना दिया।

लेकिन असली Vinay Sharma को system में dead दिखाकर basement में बंद कर दिया गया।

“मैंने बीस साल इंतजार किया,” बूढ़ा बोला,
“क्योंकि file तभी खुलती है जब borrowed identity वाला आदमी वापस आता है।”

“मुझे यहाँ किसने भेजा?” विनय ने पूछा।

बूढ़े की आँखें लाल हो गईं।

“जिसने तुझे पाला।”

विनय पीछे हट गया।

“मेरी माँ?”

“नहीं। वो औरत जिसने माँ बनकर तुझे छुपाया।”

“क्यों?”

“क्योंकि वह Dr. Kaul की assistant थी।”


Phone Call

विनय का phone बजा।

Screen पर नाम आया—

Maa

उसके हाथ काँप गए।

उसने call उठाया।

“हेलो…”

दूसरी तरफ से वही प्यारी आवाज़ आई।

“बेटा, नौकरी कैसी चल रही है?”

विनय चुप रहा।

“विनय?”

उसने धीमे से पूछा—

“आपने मुझे कहाँ से लाया था?”

चुप्पी।

फिर आवाज़ बदली।

ठंडी।

बिल्कुल unknown।

“तुमने files खोल दीं?”

विनय की आँखों से आँसू निकल पड़े।

“मैं कौन हूँ?”

औरत बोली—

“तुम्हें यह नहीं जानना चाहिए था।”

“मेरे असली माता-पिता कौन थे?”

“मरे हुए।”

“किसने मारा?”

कुछ पल बाद जवाब आया—

“तुम्हारे पिता ने।”

विनय सन्न रह गया।

“क्या?”

“तुम्हारे पिता कोई गरीब आदमी नहीं थे। वह Dr. Kaul के partner थे। जब experiment गलत हो गया, उसने सबूत मिटाने के लिए अपनी पत्नी और बच्चे को जलाने की कोशिश की। बच्चा बच गया। वह बच्चा तुम थे।”

“तो मेरे पिता जिंदा हैं?”

औरत बोली—

“हाँ।”

“कहाँ?”

उसने कहा—

“Basement में।”


असली शैतान

अब सब उल्टा हो गया था।

Basement में जो आवाज़ें थीं, उनमें उसका पिता भी था?

या यह नया झूठ था?

विनय ने बूढ़े को देखा।

“मेरा पिता basement में है?”

बूढ़े ने कहा—

“तुम्हारा पिता नहीं… उसका बचा हुआ हिस्सा।”

“मतलब?”

“Dr. Kaul और तुम्हारे पिता ने identity experiment अपने ऊपर किया था। वे मरना नहीं चाहते थे। उन्होंने अपनी यादें, आवाज़ें, पहचानें… सब लोगों के records में बांट दीं।”

“Basement में शरीर नहीं हैं?”

“नहीं। वहाँ identities बंद हैं।”

“अगर door खुला तो?”

बूढ़ा डर गया।

“तो वो सब बाहर आ जाएँगी। और शहर में कोई अपने नाम से नहीं रहेगा।”


अंतिम Puzzle

विनय ने Project file के आखिरी पन्ने देखे।

एक note था—

To destroy MURDAGHAR, burn the original name.

Original name?

किसका original name?

Building का?
Dr. Kaul का?
उसका खुद का?

तभी office की दीवारों से आवाज़ आने लगी—

“Vinay…”
“Vinay…”
“Vinay…”

हर body, हर file, हर shadow उसे उसी नाम से बुला रही थी।

विनय समझ गया।

जब तक वह इस नाम को स्वीकार करता रहेगा, system जिंदा रहेगा।

उसे अपना borrowed name जलाना होगा।

लेकिन अगर उसने Vinay नाम की file जला दी, तो उसकी current identity मिट जाएगी।
उसका bank, घर, माँ, past—सब खत्म।

वह legally dead हो सकता था।

लेकिन अगर नहीं जलाया, तो basement खुल जाएगा।


आग

विनय ने records room से अपनी file निकाली—

Vinay Sharma – Subject V-17

उसने lighter निकाला।

तभी “माँ” की आवाज़ आई—

“बेटा, मत कर। तुम्हारे बिना मैं अकेली हो जाऊँगी।”

फिर एक आदमी की आवाज़—

“बेटा, मैं तुम्हारा पिता हूँ।”

फिर एक बच्चे की—

“भैया, मुझे बचा लो।”

फिर वह छोटा लड़का सामने आया।

“अगर नाम जलाया, तो तुम भी कोई नहीं रहोगे।”

विनय ने कहा—

“शायद पहली बार मैं सच में कोई बनूँगा।”

उसने file में आग लगा दी।

पूरे मुर्दाघर में चीखें गूंज उठीं।

Walls पर लिखे नाम जलने लगे।
Freezer room के drawers खुलकर खाली हो गए।
Basement का door खुद-ब-खुद कांपने लगा।

अंदर से एक भारी आवाज़ आई—

“तू सोचता है नाम जलाने से कहानी खत्म हो जाएगी?”

विनय ने जलती file को basement door के नीचे सरका दिया।

आग दरवाज़े के नीचे से अंदर चली गई।

फिर ऐसा लगा जैसे हजारों लोग एक साथ सांस छोड़ रहे हों।

पूरी building हिल गई।

और अचानक—

सब शांत।


सुबह

सुबह 5:03 पर police पहुँची।

किसी unknown caller ने fire की report की थी।

MURDAGHAR आधा जल चुका था।

अंदर से कोई body नहीं मिली।

कोई bones नहीं।
कोई files नहीं।
कोई proof नहीं।

सिर्फ एक आदमी बेहोश मिला—

विनय।

Police ने उससे नाम पूछा।

वह चुप रहा।

“तुम्हारा नाम?”

उसने बहुत देर बाद कहा—

“मुझे नहीं पता।”

Police officer ने पूछा—

“तुम यहाँ कैसे आए?”

वह बोला—

“नौकरी करने।”

“किसने भेजा?”

विनय ने officer की तरफ देखा।

Officer की name plate पर लिखा था—

M. Kaul

विनय का खून जम गया।

Officer मुस्कुराया।

“कुछ जगहें जलती नहीं, Vinay… बस shift हो जाती हैं।”

विनय पीछे हटने लगा।

Police officer ने धीरे से कहा—

“Welcome back to MURDAGHAR.”

और तभी ambulance के अंदर रखे एक सफेद कपड़े के नीचे से आवाज़ आई—

“विनय… ठंड लग रही है…”

The End

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