WRITER – Vikas Sinha
गर्मी अब धीरे-धीरे खत्म होने लगी थी। हवा में अब पहले जैसी जलन नहीं थी, लेकिन रातें अभी भी अजीब तरह से भारी महसूस होती थीं। आसमान में बादल हर शाम बिना बारिश के मंडराते रहते और बिजली की चमक दूर खेतों के ऊपर ऐसे कौंधती जैसे कोई अदृश्य चीज़ अंधेरे में रास्ता खोज रही हो।

Midnight Ritual Story शहर से थोड़ा दूर एक पुराना मकान था। वह मकान वर्षों से बंद पड़ा था। लोग उसे “पुरानी कोठी” कहते थे। उसके चारों तरफ सूखे पेड़ थे जिनकी टेढ़ी-मेढ़ी शाखाएँ रात में किसी मरे हुए हाथ जैसी लगती थीं। दिन में भी वहाँ अजीब सन्नाटा रहता।
चार दोस्त वहाँ छुट्टियाँ बिताने आए थे।
विवेक, नील, करण और मयंक।
चारों को Horror Stories, Paranormal Activity, Ghost Investigation और Dark Mystery जैसी चीज़ों का बहुत शौक था। वे अक्सर इंटरनेट पर Haunted Places, Spirit Ritual और Ouija Board के बारे में पढ़ते रहते थे। शुरू में यह सब उनके लिए सिर्फ मनोरंजन था।
लेकिन उस रात सब कुछ बदल गया।
Midnight Ritual Story बारिश की हल्की बूंदें खिड़कियों से टकरा रही थीं। कमरे में सिर्फ एक लालटेन जल रही थी जिसकी पीली रोशनी दीवारों पर कांप रही थी। बाहर तेज हवा पेड़ों को हिला रही थी।
नील ने बैग से लकड़ी का एक बोर्ड निकाला।
“देखो क्या लाया हूँ…”
विवेक हँस पड़ा।
“सच में? Ouija Board?”
करण ने धीरे से कहा,
“भाई… ये चीज़ें मज़ाक नहीं होती।”
मयंक मुस्कुराया।
“अरे कुछ नहीं होता। Internet पर लोग बस कहानियाँ बनाते हैं।”
लेकिन नील का चेहरा गंभीर था।
“मैंने इसके Rules पढ़े हैं। अगर सही तरीके से किया जाए तो Spirit Contact हो सकता है।”
कमरे में अचानक अजीब चुप्पी फैल गई।
बाहर हवा और तेज हो चुकी थी।
चारों ने फर्श पर बोर्ड रखा। उसके ऊपर अंग्रेज़ी के अक्षर, Numbers और नीचे “YES” और “NO” लिखा था। बीच में एक काँच का छोटा गिलास रखा गया।
लालटेन की लौ अचानक कांपी।
करण ने घबराकर पीछे देखा।
“खिड़की बंद है ना?”
“हाँ।” विवेक बोला।
नील ने धीमी आवाज़ में कहा,
“सब अपनी उंगलियाँ गिलास पर रखो।”
चारों ने वैसा ही किया।
कमरे की हवा अचानक बहुत ठंडी हो गई।
“क्या यहाँ कोई Spirit मौजूद है?”
कुछ सेकंड तक कुछ नहीं हुआ।
फिर…
गिलास हल्का सा हिला।
चारों एक-दूसरे को देखने लगे।
“कौन कर रहा है?” मयंक फुसफुसाया।
“मैं नहीं…” करण बोला।
Midnight Ritual Story
गिलास धीरे-धीरे “YES” पर जाकर रुक गया।
विवेक हँसा, लेकिन उसकी आवाज़ काँप रही थी।
“बहुत बढ़िया Acting है।”
तभी लालटेन की लौ एकदम छोटी हो गई।
कमरे में किसी के साँस लेने जैसी आवाज़ गूँजने लगी।
नील ने फिर पूछा,
“तुम कौन हो?”
गिलास धीरे-धीरे अक्षरों पर घूमने लगा।
R…
A…
K…
T…
“RAKT…”
मयंक ने घबराकर हाथ हटा लिया।
“बस करो यार।”
लेकिन तभी कमरे का दरवाज़ा अपने आप बंद हो गया।
धड़ाम!
चारों उछल पड़े।
हवा अचानक बिल्कुल शांत हो गई।
अब सिर्फ उनकी साँसों की आवाज़ सुनाई दे रही थी।
उस रात के बाद सब कुछ बदल गया।
पहली घटना अगले दिन हुई।
सुबह करण नींद से उठा तो उसने देखा कि उसकी बाँह पर नाखूनों के गहरे निशान बने हुए थे। जैसे किसी ने रात भर उसे पकड़कर घसीटा हो।
“ये कैसे हुआ?” उसने घबराकर पूछा।
किसी के पास जवाब नहीं था।
रात होते-होते पूरे मकान में अजीब आवाज़ें आने लगीं। कभी ऊपर से किसी के चलने की आवाज़ आती, कभी दीवारों के अंदर से फुसफुसाहट।
विवेक ने खुद को समझाया,
“पुराना मकान है… लकड़ी की आवाज़ होगी।”
लेकिन अंदर कहीं ना कहीं डर पैदा हो चुका था।
तीसरी रात।
मयंक बाथरूम गया।
कुछ मिनट बाद उसकी चीख पूरे मकान में गूँज उठी।
तीनों भागकर अंदर पहुँचे।
मयंक काँप रहा था।
आईने पर खून जैसी लाल लकीरों से लिखा था—
“तुमने बुलाया था…”
नील का चेहरा पीला पड़ गया।
करण ने तुरंत कहा,
“हमें यहाँ से निकलना होगा।”
लेकिन बाहर जाते ही उनकी कार बंद हो गई।
इंजन बार-बार स्टार्ट करने पर भी नहीं चला।
आसमान में काले बादल घिर आए।
और तभी…
ऊपर दूसरी मंज़िल की खिड़की में किसी का चेहरा दिखाई दिया।
सफेद आँखें।
बिना पलक झपकाए उन्हें घूरती हुई।
उस रात किसी को नींद नहीं आई।
करीब दो बजे विवेक को लगा जैसे कोई उसके कान के पास फुसफुसा रहा हो।
“मुझे वापस मत भेजो…”
उसने आँखें खोलीं।
कमरे के कोने में कोई खड़ा था।
बहुत लंबा।
उसका शरीर अंधेरे में घुला हुआ था लेकिन उसकी आँखें साफ दिखाई दे रही थीं।
पूरी सफेद।
विवेक चीख पड़ा।
बाकी तीनों जाग गए।
लेकिन कोने में कुछ नहीं था।
अब डर खुलकर सामने आ चुका था।
नील ने इंटरनेट पर Ouija Board Rules फिर पढ़े।
उसका चेहरा उतर गया।
“हमसे बहुत बड़ी गलती हो गई…”
“क्या?”
“Session खत्म करने से पहले हमने Goodbye नहीं कहा…”
कमरे में सन्नाटा छा गया।
करण की आवाज़ काँप रही थी।
“मतलब?”
“मतलब… जो भी आया था… वो अभी भी यहीं है।”
उसके बाद घटनाएँ और भयानक होने लगीं।
रात में दरवाज़ों पर खरोंचने की आवाज़ आती।
कभी कोई दीवार पर धीरे-धीरे थपथपाता।
कभी सीढ़ियों पर किसी के भागने की आवाज़ सुनाई देती।
लेकिन जब देखने जाते…
कोई नहीं होता।
एक रात नील अचानक गायब हो गया।
उसका कमरा अंदर से बंद था।
दरवाज़ा तोड़ा गया।
अंदर सिर्फ Ouija Board पड़ा था।
उस पर ताज़ा खून गिरा हुआ था।
और नीचे लिखा था—
“एक आ चुका है…”
करण की टाँगें काँपने लगीं।
मयंक रोने लगा।
“हमें यहाँ नहीं आना चाहिए था…”
उस रात पहली बार उन्होंने उस चीज़ को साफ देखा।
बिजली चमकी।
सीढ़ियों पर कोई खड़ा था।
उसका शरीर इंसान जैसा था लेकिन हाथ असामान्य रूप से लंबे थे। चेहरा पूरी तरह काला। सिर्फ आँखें चमक रही थीं।
वह धीरे-धीरे मुस्कुरा रहा था।
और उसकी मुस्कान इंसानों जैसी नहीं थी।
बहुत ज्यादा चौड़ी।
असंभव रूप से चौड़ी।
विवेक ने काँपती आवाज़ में पूछा,
“तू क्या चाहता है?”
उसकी आवाज़ पूरे मकान में गूँज उठी।
“तुमने मुझे बुलाया था…”
फिर अचानक वह चीज़ गायब हो गई।
अगले ही पल मयंक हवा में उठ गया।
उसकी गर्दन किसी अदृश्य ताकत ने पकड़ रखी थी।
वह चीख रहा था।
करण और विवेक उसे पकड़ने की कोशिश कर रहे थे लेकिन उसका शरीर ऊपर खिंचता जा रहा था।
फिर…
चक!
उसकी गर्दन उल्टी दिशा में घूम गई।
कमरे में हड्डियाँ टूटने की आवाज़ गूँज गई।
मयंक का शरीर फर्श पर गिर पड़ा।
बिल्कुल शांत।
अब सिर्फ विवेक और करण बचे थे।
दोनों पूरी रात एक कमरे में बंद बैठे रहे।
बाहर लगातार कदमों की आवाज़ आती रही।
धीरे-धीरे।
जैसे कोई कमरे के बाहर चक्कर लगा रहा हो।
कभी दरवाज़े पर थपकी देता।
कभी हँसता।
वह हँसी इंसानी नहीं थी।
उसमें दर्द था… और गुस्सा भी।
सुबह होने लगी।
पहली बार लगा कि शायद सब खत्म हो जाएगा।
लेकिन तभी करण ने देखा…
विवेक दीवार की तरफ मुँह करके खड़ा था।
बिल्कुल स्थिर।
“विवेक?”
कोई जवाब नहीं।
करण धीरे-धीरे उसके पास गया।
विवेक ने अचानक गर्दन घुमाई।
उसकी आँखें पूरी सफेद हो चुकी थीं।
और होंठों पर वही चौड़ी मुस्कान थी।
“अब तुम अकेले हो…”
करण पीछे हट गया।
विवेक चारों हाथ-पैरों पर झुक गया।
उसका शरीर टूटती हड्डियों की आवाज़ के साथ अजीब तरीके से मुड़ने लगा।
फिर वह जानवर की तरह तेजी से करण की तरफ दौड़ा।
करण भागता हुआ नीचे पहुँचा।
मकान का मुख्य दरवाज़ा खुला हुआ था।
वह पूरी ताकत से बाहर भागा।
बारिश शुरू हो चुकी थी।
पीछे से कदमों की आवाज़ें आ रही थीं।
बहुत सारी कदमों की आवाज़ें।
जैसे अब सिर्फ एक नहीं… कई चीज़ें उसका पीछा कर रही हों।
करण सड़क तक पहुँचा।
दूर उसे एक ट्रक दिखाई दिया।
उसने हाथ हिलाया।
ट्रक रुक गया।
ड्राइवर ने उसे अंदर बैठाया।
“क्या हुआ?”
करण रोते हुए बोला,
“वो… वो लोग मर गए…”
ड्राइवर ने पीछे देखा।
“कौन लोग?”
करण ने मुड़कर देखा।
पुरानी कोठी अब वहाँ नहीं थी।
उसकी जगह सिर्फ सूखे पेड़ खड़े थे।
जैसे वहाँ कभी कोई मकान था ही नहीं।
कई महीने गुजर गए।
करण ने कभी उस घटना के बारे में किसी को नहीं बताया।
लेकिन चीज़ें खत्म नहीं हुई थीं।
हर रात उसे वही फुसफुसाहट सुनाई देती।
“Goodbye नहीं कहा…”
उसके कमरे के आईने पर अक्सर उंगलियों के निशान दिखाई देते।
कभी-कभी रात में कंप्यूटर अपने आप चालू हो जाता।
स्क्रीन पर सिर्फ एक शब्द लिखा होता—
“RETURN”
एक रात करण की नींद अचानक खुली।
कमरे में बहुत ठंड थी।
उसने देखा…
बिस्तर के पास वही Ouija Board रखा था।
जबकि उसने उसे महीनों पहले जला दिया था।
उसके ऊपर गिलास अपने आप घूम रहा था।
धीरे-धीरे।
अक्षर बनते गए।
C…
O…
M…
E…
“COME…”
करण के हाथ काँपने लगे।
तभी कमरे के अंधेरे कोने से वही आवाज़ आई—
“इस बार Goodbye कहना मत भूलना…”
करण चीख पड़ा।
लेकिन अब बहुत देर हो चुकी थी।
क्योंकि कमरे के हर कोने से सफेद आँखें उसे घूर रही थीं।
और धीरे-धीरे पूरा कमरा फुसफुसाहटों से भर गया।
अगली सुबह पुलिस को उसका घर खाली मिला।
दरवाज़ा अंदर से बंद था।
कमरे में सिर्फ एक चीज़ पड़ी थी।
पुराना लकड़ी का Ouija Board।
उस पर ताज़ा खून से लिखा था—
“अब खेल शुरू हुआ है…”
और नीचे…
चार नए उंगलियों के निशान बने हुए थे।
जैसे किसी ने फिर से Session शुरू कर दिया हो…
समाप्त।
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