Raat Ko School Ki Light Apne Aap Jal Uthi | Classroom Horror Story

Written by Govind Bhise

देवपुर का पुराना स्कूल अब वहाँ नहीं है।

दो साल पहले पंचायत ने पूरी building गिरवा दी थी। मैदान समतल कर दिया गया। दीवारें तोड़ दी गईं। यहां तक कि ऊपर लगी लोहे की घंटी भी हटाकर कबाड़ी को बेच दी गई।

लेकिन आज भी रात में उस रास्ते से गुजरने वाले कुछ लोग दावा करते हैं कि कभी-कभी वहां घंटी की आवाज़ सुनाई देती है।

Classroom Horror Story

धीमी। भारी। जैसे किसी पुराने classroom में attendance शुरू होने वाली हो।

मैं उन बातों पर पहले विश्वास नहीं करता था।

फिर एक रात मेरे mobile पर उस स्कूल की photo आई।

जबकि वो स्कूल तब तक मिट्टी बन चुका था।

मेरा नाम विवेक है। मैं कानपुर में courier company में काम करता हूँ। पिछले कुछ सालों में जिंदगी इतनी भागदौड़ वाली हो गई थी कि गांव जाना लगभग बंद हो चुका था। मां कई बार बुलाती थीं, लेकिन हर बार मैं कोई न कोई बहाना बना देता।

असल वजह कुछ और थी।

Classroom Horror Story मैं देवपुर लौटना नहीं चाहता था।

क्योंकि उस गांव में एक ऐसी याद दबी हुई थी जिसे मैं सालों से नजरअंदाज करता आ रहा था।

समीर।

हम दोनों बचपन में साथ पढ़ते थे। एक ही bench पर बैठते थे। साथ घर लौटते थे। गांव में लोग हमें भाई कहते थे।

फिर एक दिन वह अचानक गायब हो गया।

उस समय हम छठी में थे।

पूरे गांव में हंगामा मच गया था। खेत, तालाब, जंगल… हर जगह खोज हुई। पुलिस भी आई। लेकिन समीर कभी नहीं मिला।

कुछ महीनों बाद स्कूल बंद कर दिया गया।

लोगों ने अलग-अलग बातें बनाईं। किसी ने कहा बच्चा भाग गया होगा। किसी ने कहा कुएं में गिरा होगा।

लेकिन गांव के बच्चे एक ही बात कहते थे—

“स्कूल में कुछ है।”

मैंने उस घटना के बाद कभी किसी से ज्यादा बात नहीं की। यहां तक कि अपने आप से भी नहीं।

उस रात मैं मां को देखने गांव जा रहा था। बस लेट हो गई थी। जब देवपुर के मोड़ पर उतरा तो रात के करीब साढ़े दस बज रहे थे।

हल्की ठंड थी। खेतों से मिट्टी और धुएं की मिली-जुली गंध आ रही थी। गांव की तरफ जाने वाली सड़क लगभग खाली थी।

मैंने बैग उठाया और पैदल चलने लगा।

थोड़ी दूर आगे जाकर सड़क दो हिस्सों में बंटती थी। एक रास्ता मंदिर की तरफ घूमकर जाता था। दूसरा पुराने स्कूल के पीछे से निकलता था।

मैं कुछ सेकंड रुका।

फिर वही छोटा रास्ता चुन लिया।

शायद आदत से।

शायद जल्दी घर पहुंचने की वजह से।

या शायद इसलिए क्योंकि इंसान कुछ जगहों से डरता जरूर है, लेकिन पूरी तरह बच नहीं पाता।

स्कूल की टूटी boundary दूर से ही दिखाई दे गई।

बरसों से बंद होने के बावजूद वह जगह अजीब तरह से वैसी ही लग रही थी। बरामदे की छत झुकी हुई थी। खिड़कियों के शीशे टूट चुके थे। मैदान में घास उग आई थी।

मुझे याद आया— यहीं सुबह assembly होती थी। समीर हमेशा पीछे खड़ा होकर anthem गाते वक्त हँसता था।

मैं अनजाने में मुस्कुरा दिया।

उसी पल घंटी बजी।

टनन्…

मेरी मुस्कान वहीं रुक गई।

आवाज़ स्कूल के अंदर से आई थी।

पुरानी लोहे की घंटी की वही भारी आवाज़।

मैंने सोचा शायद आसपास कोई लड़का होगा। लेकिन रात के उस समय वहाँ कोई नहीं हो सकता था।

मैंने जेब से mobile निकाला और torch ऑन की।

रोशनी टूटी हुई सीढ़ियों तक गई।

सब खाली था।

फिर दूसरी बार घंटी बजी।

इस बार उसके बाद बहुत हल्की बच्चों की फुसफुसाहट सुनाई दी।

जैसे कोई classroom में धीरे-धीरे बात कर रहा हो।

मेरे पैर अपने आप रुक गए।

और तभी पीछे से किसी ने मेरा नाम लिया।

“विवेक…”

आवाज़ इतनी पास थी कि मैं तुरंत पलटा।

सड़क खाली थी।

दूर सिर्फ धुंध और पेड़ों की परछाइयाँ।

फिर वही आवाज़ आई—

“अंदर नहीं आएगा?”

मेरा गला सूख गया।

वह समीर की आवाज़ थी।

लेकिन वैसी नहीं जैसी किसी बड़े आदमी की होनी चाहिए।

वही बारह साल के बच्चे वाली आवाज़।

मैं भाग सकता था। सच कहूँ तो भाग जाना चाहिए था। लेकिन कुछ आवाज़ें इंसान को डराकर नहीं, याद दिलाकर रोकती हैं।

मैं धीरे-धीरे टूटे हुए gate के पास गया।

Gate को धक्का देते ही जंग लगी लोहे की आवाज़ पूरे मैदान में गूँज गई।

अंदर कदम रखते ही अजीब सी सीलन महसूस हुई। जैसे building अभी भी सांस ले रही हो।

मेरी torch corridor की दीवारों पर घूम रही थी। जगह-जगह बच्चों की faded drawings बनी हुई थीं। “स्वच्छ रहो”, “पेड़ लगाओ”, “मेरा भारत महान।”

और उन्हीं के बीच chalk से लिखा एक sentence दिखाई दिया—

“आज attendance पूरी होगी।”

मेरे हाथ ठंडे पड़ गए।

मैंने खुद को समझाया कि शायद गांव के लड़कों की शरारत होगी।

लेकिन तभी दाईं तरफ वाले classroom से bench खिसकने की आवाज़ आई।

धीमी। भारी।

मैं दरवाजे तक गया।

कमरा वही था जहाँ मैं और समीर बैठते थे।

मुझे आज भी याद था— आखिरी bench की लकड़ी टूटी हुई थी क्योंकि समीर उस पर compass से अपना नाम खोदता रहता था।

मैंने दरवाजा थोड़ा खोला।

कमरे के अंदर धूल जमी थी। ceiling fan नीचे झुका हुआ था। blackboard आधा टूटा हुआ।

लेकिन आखिरी bench बिल्कुल साफ थी।

जैसे अभी किसी ने उसे पोंछा हो।

मेरी torch blackboard पर गई।

उस पर सफेद chalk से names लिखे थे।

रमेश
कविता
मीना
संदीप

और सबसे नीचे—

विवेक

मेरे नाम के आगे खाली जगह छोड़ी गई थी।

जैसे कोई अभी tick लगाने वाला हो।

मेरी सांसें तेज हो गईं।

तभी पीछे से classroom का दरवाजा बंद हो गया।

धड़ाम।

मैं झटके से मुड़ा और handle पकड़ लिया। दरवाजा नहीं खुला।

कमरे में अचानक बहुत धीमी बच्चों की आवाजें गूँजने लगीं।

“Present sir…”

“Present…”

“Present…”

मैंने पीछे देखा।

आखिरी bench पर कोई बैठा था।

नीली school shirt। सिर झुका हुआ।

मेरी उंगलियाँ कांपने लगीं।

“समीर?”

उसने धीरे-धीरे सिर उठाया।

चेहरा वही था।

Classroom Horror Story

लेकिन आँखों के नीचे गहरे काले धब्बे थे। जैसे कई दिनों से सोया न हो।

वह मुझे देखकर हल्का सा मुस्कुराया।

“तू चला क्यों गया था उस दिन?”

मेरे कानों में पुरानी आवाज़ गूँज गई।

“विवेक… दरवाजा खोल…”

मैं जम गया।

याद अचानक साफ होने लगी।

उस दिन छुट्टी के बाद समीर अपनी pencil box लेने classroom में वापस गया था। तभी श्रीधर सर आए थे। उनका मूड खराब था। उन्होंने गुस्से में दरवाजा बाहर से बंद कर दिया।

समीर अंदर से चिल्ला रहा था।

मैंने आवाज़ सुनी थी।

लेकिन मैं डर गया था।

मैं भाग गया।

मैंने किसी को कुछ नहीं बताया।

अगले दिन समीर गायब था।

सालों तक मैंने खुद को समझाया कि शायद उसका गायब होना अलग बात होगी।

लेकिन अंदर कहीं न कहीं मुझे हमेशा सच पता था।

समीर bench से उठा।

उसके कदमों की आवाज़ नहीं आ रही थी।

“मैं बहुत देर तक दरवाजा पीटता रहा,” उसने धीमे से कहा।

मेरी आँखों में आँसू भर आए।

“मुझे माफ कर दे…”

वह कुछ सेकंड मुझे देखता रहा।

फिर बहुत धीरे बोला—

“मैंने कोशिश की थी बाहर आने की।”

उसी पल corridor में लकड़ी की stick टकराने की आवाज़ सुनाई दी।

ठक…

ठक…

ठक…

मेरा खून जम गया।

वही आवाज़।

श्रीधर सर हमेशा ऐसी ही छड़ी लेकर चलते थे।

Classroom के बाहर कोई आकर रुका।

दरवाजे के नीचे लंबी shadow दिखाई दी।

फिर बाहर से आवाज़ आई—

“Attendance शुरू करें?”

मेरे शरीर की सारी ताकत जैसे खत्म हो गई।

समीर ने मेरी तरफ देखा।

इस बार उसके चेहरे पर डर था।

“वो अभी भी यहीं है,” उसने फुसफुसाकर कहा।

दरवाजा धीरे-धीरे खुला।

बरामदे की अंधेरी रोशनी में एक लंबा आदमी खड़ा था। सफेद shirt। हाथ में पुरानी लकड़ी की stick।

लेकिन उसका चेहरा पूरा साफ नहीं दिख रहा था।

जैसे कोई धुआँ लगातार उसे ढक रहा हो।

“Late आए हो विवेक,” उसने कहा।

और उसी पल classroom के पीछे बैठे बाकी बच्चे धीरे-धीरे सिर उठाने लगे।

अब वहाँ सिर्फ समीर नहीं था।

करीब दस–बारह बच्चे benches पर बैठे थे।

कुछ के चेहरे धूल से ढके थे। कुछ की आँखें बंद थीं। कुछ सिर्फ मुझे घूर रहे थे।

सभी एक साथ बोलने लगे—

“Present sir…”

मुझे लगा अगर मैं एक सेकंड और वहाँ रुका तो कभी बाहर नहीं निकल पाऊँगा।

मैं पूरी ताकत से दरवाजे की तरफ भागा।

बरामदा लंबा होता जा रहा था। हर classroom के अंदर silhouettes दिखाई दे रहे थे। कहीं कोई blackboard साफ कर रहा था। कहीं कोई बच्चा खिड़की से बाहर देख रहा था।

और ऊपर लगी घंटी लगातार बज रही थी।

टनन्…

टनन्…

टनन्…

भागते-भागते मैं पुराने store room तक पहुँच गया।

दरवाजा आधा खुला था।

मैं अंदर घुस गया।

कमरे में टूटी desks, पुराने registers और लोहे की बड़ी almirah रखी थी।

मेरी नजर नीचे पड़े एक छोटे school bag पर गई।

नीला bag।

समीर का।

मैं घुटनों के बल बैठ गया।

Bag के अंदर एक पुरानी notebook थी।

पहले पन्ने पर टेढ़े अक्षरों में लिखा था—

“अगर मैं घर नहीं गया तो…”

उसके बाद sentence अधूरा था।

अगले पन्ने पर सिर्फ एक line थी—

“Sir रात को बच्चों को नीचे ले जाते हैं।”

मेरे हाथ सुन्न पड़ गए।

तभी पीछे से आवाज़ आई—

“बहुत पढ़ लिया।”

मैंने मुड़कर देखा।

श्रीधर सर दरवाजे पर खड़े थे।

अब उनका चेहरा साफ दिख रहा था।

सूखी त्वचा। धँसी आँखें। होंठों पर अजीब सी मुस्कान।

उन्होंने कहा—

“कुछ बच्चे सुनते नहीं थे।”

मैं पीछे हट गया।

“आपने समीर को बंद किया था।”

वे चुप रहे।

फिर धीमे से बोले—

“मैं सिर्फ discipline सिखाता था।”

तभी कमरे में बच्चों की फुसफुसाहट भर गई।

“झूठ…”

“Sir झूठ बोलते हैं…”

श्रीधर सर अचानक गुस्से में चिल्लाए—

“चुप!”

कमरे की सारी लोहे की अलमारियाँ जोर से हिलने लगीं।

मैं दरवाजे की तरफ भागा, लेकिन उन्होंने मेरा हाथ पकड़ लिया।

उनकी पकड़ बर्फ जैसी ठंडी थी।

“अब attendance पूरी होगी,” उन्होंने कहा।

उसी समय पीछे से किसी ने उनका हाथ पकड़ा।

समीर।

लेकिन इस बार वह वैसा नहीं दिख रहा था जैसा classroom में था।

वह बस एक डरा हुआ बच्चा लग रहा था।

वही पुराना समीर।

उसने मेरी तरफ देखकर कहा—

“इस बार भाग मत… निकल जा।”

मैंने पूरी ताकत से खुद को छुड़ाया और corridor की तरफ दौड़ पड़ा।

गेट सामने दिखाई दे रहा था।

लेकिन बंद था।

मैंने जोर से धक्का दिया। नहीं खुला।

तभी मुझे याद आया— notebook के अंदर एक छोटी चाबी रखी थी।

कांपते हाथों से मैंने जेब टटोली।

चाबी मिल गई।

Lock पहली बार में नहीं खुला।

पीछे घंटी लगातार बज रही थी।

टनन्…

टनन्…

दूसरी बार भी चाबी अटक गई।

मुझे पीछे बच्चों की आवाज़ें सुनाई देने लगीं।

“Present sir…”

तीसरी बार lock खुल गया।

मैं बाहर गिर पड़ा।

उसी पल सारी आवाज़ें बंद हो गईं।

मैंने पलटकर देखा।

पूरा school फिर शांत था।

सिर्फ ऊपर लगी घंटी धीरे-धीरे हिल रही थी।

अगली सुबह गांव वाले, पुलिस और अधिकारी वहाँ पहुँचे।

Store room की फर्श तोड़ी गई।

नीचे से छोटे बच्चे की bones मिलीं।

समीर आखिर घर लौट आया था।

सच बनकर।

उस शाम उसका अंतिम संस्कार हुआ। उसकी माँ बहुत देर तक रोती रहीं। जाते-जाते उन्होंने मेरे सिर पर हाथ रखा और सिर्फ इतना कहा—

“अब उसे डर नहीं लगेगा।”

उस रात मैं पहली बार खुलकर रोया।

कुछ महीनों बाद स्कूल गिरा दिया गया।

लोगों ने राहत की सांस ली।

लेकिन कहानी वहीं खत्म नहीं हुई।

दो महीने बाद रात करीब 12 बजे मेरे mobile पर unknown number से एक photo आई।

तस्वीर उसी स्कूल gate की थी।

जबकि अब वहाँ सिर्फ खाली मैदान था।

Gate पर chalk से लिखा था—

“नई class सोमवार से शुरू होगी।”

और उसी पल…

मेरे कमरे के बाहर बहुत धीमी घंटी बजी।

टनन्…

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