WRITER – Rudra Noir
सुबह के आठ बजे भी शहर का सबसे व्यस्त रेलवे जंक्शन पूरी तरह जाग चुका था। प्लेटफॉर्मों पर लगातार आती-जाती ट्रेनों की आवाज़ें, चाय बेचने वालों की पुकार, यात्रियों की भीड़ और लाउडस्पीकर पर गूंजती घोषणाएँ पूरे स्टेशन को जीवंत बनाए हुए थीं।

लेकिन इस भीड़ के बीच एक जगह ऐसी भी थी, जहाँ लोग बिना वजह रुकना पसंद नहीं करते थे।
वह था प्लेटफॉर्म नंबर 7।
दिलचस्प बात यह थी कि प्लेटफॉर्म पूरी तरह बंद नहीं था। दिन में कभी-कभार मालगाड़ियाँ वहाँ से गुजरती थीं, लेकिन यात्री ट्रेनों का संचालन वर्षों पहले बंद कर दिया गया था।
सरकारी रिकॉर्ड में वजह सिर्फ इतनी लिखी थी—
“ऑपरेशनल री-एलाइनमेंट।”
लेकिन स्टेशन के पुराने कर्मचारियों के बीच एक अलग कहानी चलती थी।
वे कहते थे कि प्लेटफॉर्म नंबर 7 का आख़िरी सिग्नल आज तक बंद नहीं हुआ।
तीस वर्षीय आरव त्रिपाठी भारतीय रेलवे में सिग्नल एवं टेलीकम्युनिकेशन सेक्शन इंजीनियर था। उसका काम पुराने सिग्नल सिस्टम की जांच, इलेक्ट्रॉनिक इंटरलॉकिंग, ट्रैक सर्किट और कंट्रोल नेटवर्क में आने वाली तकनीकी खराबियों को ठीक करना था।
वह अंधविश्वास पर विश्वास नहीं करता था।
उसके लिए हर खराबी का कोई न कोई तकनीकी कारण होता था।
जब डिवीजन ऑफिस से आदेश आया कि प्लेटफॉर्म नंबर 7 के पुराने सिग्नल में लगातार फॉल्ट आ रहा है और उसे जांचना है, तो उसने इसे सामान्य काम समझकर स्वीकार कर लिया।
फाइल खोलते ही उसे पहली अजीब बात दिखाई दी।
सिस्टम लॉग में पिछले चार महीनों से रोज़ एक ही समय दर्ज था।
23:47
हर रात।
हर दिन।
उसी समय सिग्नल अपने आप “GREEN” दिखाता था।
लगभग तीस सेकंड बाद फिर “RED” हो जाता था।
जबकि उस लाइन पर कोई ट्रेन चलती ही नहीं थी।
आरव ने सोचा—
“शायद पुराना रिले अटक रहा होगा।”
Railway Ghost Story
उसी दोपहर वह स्टेशन पहुँच गया।
स्टेशन मास्टर देवेंद्र सक्सेना लगभग साठ वर्ष के अनुभवी अधिकारी थे।
आरव ने फाइल उनकी तरफ बढ़ाई।
“सर, प्लेटफॉर्म नंबर 7 का सिग्नल कहाँ है?”
देवेंद्र ने कुछ पल उसकी तरफ देखा।
“तुम्हें वही काम मिला?”
“जी।”
उन्होंने गहरी सांस ली।
“दिन में जितना देखना हो देख लेना।”
“रात?”
उन्होंने बात अधूरी छोड़ दी।
आरव मुस्कुरा दिया।
“सर… भूत-वूत वाली कहानी है क्या?”
देवेंद्र ने मुस्कुराया नहीं।
उन्होंने सिर्फ इतना कहा—
“कहानी होती तो मैं भी हँस देता।”
आरव ट्रैक के साथ-साथ चलता हुआ प्लेटफॉर्म नंबर 7 तक पहुँचा।
जैसे-जैसे वह आगे बढ़ रहा था, स्टेशन की भीड़ पीछे छूटती जा रही थी।
कुछ ही मिनटों बाद शोर लगभग खत्म हो गया।
यह अजीब था।
सिर्फ दो प्लेटफॉर्म दूर ही तो मुख्य स्टेशन था।
फिर भी यहाँ इतनी खामोशी क्यों थी?
प्लेटफॉर्म पुराना जरूर था, लेकिन पूरी तरह जर्जर नहीं।
लोहे की बेंचें जंग खा चुकी थीं।
घोषणा करने वाले स्पीकर बंद थे।
डिजिटल डिस्प्ले वर्षों पहले हटाए जा चुके थे।
किनारे पर लगा एक पुराना यांत्रिक सिग्नल अब भी खड़ा था।
उसके साथ बाद में लगाया गया इलेक्ट्रॉनिक LED सिग्नल भी मौजूद था।
आरव ने उपकरण निकाले और जांच शुरू कर दी।
वोल्टेज सामान्य।
केबल सही।
रिले बॉक्स ठीक।
डेटा लाइन ठीक।
कहीं कोई खराबी नहीं।
फिर सिस्टम हर रात ग्रीन कैसे हो जाता था?
शाम तक जांच खत्म हो गई।
रिपोर्ट में लिखने लायक कुछ नहीं मिला।
तभी पीछे से आवाज़ आई।
“साहब…”
आरव ने मुड़कर देखा।
करीब पैंसठ वर्षीय एक सफाई कर्मचारी खड़ा था।
“पहली बार आए हो?”
“हाँ।”
“आज रात मत रुकना।”
आरव हँस पड़ा।
“क्यों?”
बूढ़े ने प्लेटफॉर्म की तरफ देखा।
“क्योंकि यहाँ ट्रेन नहीं आती…
लेकिन सिग्नल किसी के लिए आज भी खुलता है।”
आरव ने जवाब नहीं दिया।
उसे ऐसे किस्से हर पुराने रेलवे स्टेशन पर सुनने को मिलते थे।
शाम को वह कंट्रोल रूम पहुँचा।
वहाँ पूरे स्टेशन के CCTV कैमरे लगे थे।
जिज्ञासा में उसने पिछले एक महीने की रिकॉर्डिंग निकलवाई।
रात 11:47।
वीडियो तेज़ गति से चलने लगा।
11:46…
11:47…
पुराना सिग्नल अचानक ग्रीन हो गया।
किसी कर्मचारी ने उसे ऑपरेट नहीं किया था।
कोई कमांड नहीं भेजी गई थी।
सिस्टम लॉग भी खाली था।
सिर्फ सिग्नल बदल गया।
तीस सेकंड बाद फिर लाल।
आरव ने वीडियो दोबारा चलाया।
इस बार उसने प्लेटफॉर्म पर ध्यान दिया।
उसे लगा जैसे कैमरे के बिल्कुल किनारे पर कोई खड़ा है।
वीडियो रोककर ज़ूम किया।
पिक्सेल टूट गए।
कुछ साफ नहीं दिखा।
लेकिन आकृति इंसान जैसी लग रही थी।
उसने दूसरे कैमरे का फुटेज खोला।
वहाँ कोई नहीं था।
पहले कैमरे में फिर वही धुंधली परछाईं।
दूसरे में खाली प्लेटफॉर्म।
“कैमरा खराब है?”
उसने ऑपरेटर से पूछा।
“नया कैमरा है साहब।
तीन महीने पहले लगाया है।”
“कभी रिपेयर हुआ?”
“नहीं।”
आरव ने रिकॉर्डिंग अपने लैपटॉप में कॉपी कर ली।
रात को होटल पहुँचकर उसने फुटेज फ्रेम-बाय-फ्रेम देखना शुरू किया।
अचानक उसकी नजर एक चीज़ पर अटक गई।
कैमरे के टाइमस्टैम्प में 23:47:12 लिखा था।
उसी फ्रेम में सिग्नल ग्रीन था।
लेकिन ट्रैक के ऊपर…
बहुत हल्की…
धुएँ जैसी…
एक लंबी आकृति दिखाई दे रही थी।
मानो कोई पटरियों के बीच खड़ा हो।
उसने ब्राइटनेस बढ़ाई।
आकृति गायब।
कॉन्ट्रास्ट कम किया।
फिर दिखाई दी।
आरव ने स्क्रीनशॉट सेव कर लिया।
अगली सुबह उसने स्टेशन के पुराने रिकॉर्ड देखने की अनुमति मांगी।
रिकॉर्ड रूम स्टेशन की सबसे पुरानी इमारत में था।
धूल से भरी अलमारियों में दशकों पुरानी फाइलें रखी थीं।
स्टेशन क्लर्क ने कहा—
“जो चाहिए खुद ढूँढ लो।”
करीब दो घंटे बाद उसे एक पुरानी दुर्घटना रिपोर्ट मिली।
तारीख—
17 सितंबर 1998
रिपोर्ट अधूरी थी।
कई पन्ने गायब थे।
जो बचा था, उसमें सिर्फ इतना लिखा था—
“डाउन पैसेंजर को प्लेटफॉर्म नंबर 7 पर रोकने की तैयारी थी। अंतिम क्षणों में सिग्नल प्रणाली में असामान्य बदलाव दर्ज हुआ…”
इसके बाद का पूरा हिस्सा फटा हुआ था।
आखिरी पन्ने पर सिर्फ एक लाइन बची थी—
“…आख़िरी सिग्नल मिलने के बाद भी ट्रेन निर्धारित प्लेटफॉर्म तक नहीं पहुँच सकी।”
बस।
आगे कुछ नहीं।
आरव ने देवेंद्र सक्सेना से पूछा—
“1998 में क्या हुआ था?”
स्टेशन मास्टर कुछ देर चुप रहे।
फिर बोले—
“उस केस की फाइल कभी पूरी नहीं मिली।”
“लेकिन हुआ क्या था?”
“आधिकारिक जवाब?
तकनीकी खराबी।”
“और गैर-आधिकारिक?”
देवेंद्र ने धीरे से कहा—
“कुछ लोग कहते हैं…
उस रात प्लेटफॉर्म नंबर 7 पर जिस ट्रेन का इंतजार हो रहा था…
वह स्टेशन तक पहुँची ही नहीं।”
“मतलब?”
“वह ट्रेन अगले स्टेशन से निकली थी।
उसके बाद…”
उन्होंने वाक्य पूरा नहीं किया।
“…उसका रेडियो संपर्क टूट गया।”
आरव चौंक गया।
“पूरी ट्रेन?”
“जब मिली…
तो ट्रेन थी…
लेकिन उसमें बैठे लोग नहीं थे।”
आरव ने अविश्वास से उनकी ओर देखा।
“सर, ऐसा कैसे हो सकता है?”
“इसीलिए उस रिपोर्ट के ज़्यादातर पन्ने कभी सार्वजनिक नहीं हुए।”
उस रात आरव ने फैसला किया—
वह खुद प्लेटफॉर्म नंबर 7 पर मौजूद रहेगा।
रात 11:20 पर वह अपने उपकरण, थर्मल कैमरा, डेटा लॉगर और वायरलेस रिकॉर्डर के साथ वहाँ पहुँच गया।
पूरा स्टेशन दूर से सामान्य दिखाई दे रहा था।
लेकिन प्लेटफॉर्म नंबर 7 पर अजीब सन्नाटा पसरा था।
11:38…
उसने सिग्नल कंट्रोल बॉक्स खोला।
हर तार सही था।
11:43…
हवा अचानक ठंडी हो गई।
11:45…
उसका वायरलेस सेट बिना वजह हल्की खरखराहट करने लगा।
11:46…
स्टेशन की बाकी आवाज़ें जैसे धीरे-धीरे गायब होने लगीं।
ऐसा लगा मानो किसी ने आसपास की सारी ध्वनि बंद कर दी हो।
उसने घड़ी देखी।
23:46:48
अचानक…
पुराने यांत्रिक सिग्नल का भारी लीवर बिना किसी इंसान के छुए धीरे-धीरे ऊपर उठने लगा।
चर्ररर…
लोहे के घिसने की आवाज़ पूरे प्लेटफॉर्म में गूँज गई।
उसी क्षण इलेक्ट्रॉनिक सिग्नल भी अपने आप…
GREEN
हो गया।
आरव के हाथ से टॉर्च लगभग छूट गई।
उसने तुरंत डेटा रिकॉर्डर की स्क्रीन देखी।
कोई कमांड नहीं।
कोई इनपुट नहीं।
फिर भी सिग्नल बदल चुका था।
तभी…
बहुत दूर…
अंधेरे ट्रैक की दिशा से…
एक लंबी, गूँजती हुई ट्रेन की सीटी सुनाई दी।
लेकिन उस लाइन पर वर्षों से कोई ट्रेन नहीं चलती थी।
आरव ने टॉर्च उठाकर सामने रोशनी डाली।
ट्रैक खाली था।
फिर भी सीटी लगातार करीब आती जा रही थी…
और अगले ही पल उसे महसूस हुआ कि पटरियाँ उसके पैरों के नीचे बहुत हल्के-हल्के काँपने लगी हैं…
Pingback: Mandir Ki Kinnar Insaan Nahi Thi | Kinnar Ki Sacchi Kahani - Scary Crocodile