Maine Apni Hi Maut Dekh Li | Maut Wali Darawani Kahani

पहली बार मुझे लगा कि मौत आने से पहले आवाज़ करती है।
दूसरी बार समझ आया, वो आवाज़ बाहर से नहीं… मेरे अंदर से आ रही थी।
और तीसरी बार, मैंने अपनी ही लाश को मेरी आँखों में देखते हुए पाया।


उस रात बारिश नहीं हो रही थी, लेकिन हवा में बारिश जैसी गंध थी।

Maut Wali Darawani Kahani

मुंबई के पुराने हिस्सों में एक अजीब बात है। वहाँ रात कभी पूरी तरह शांत नहीं होती। कहीं न कहीं से पानी टपकता रहता है, कोई खिड़की हिलती रहती है, कोई कुत्ता बिना वजह भौंकता रहता है, और लोकल ट्रेन की दूर से आती हुई आवाज़ ऐसे लगती है जैसे शहर नींद में भी करवट ले रहा हो।

मैं, निखिल, उस दिन दादर से भायखला लौट रहा था। रात के करीब साढ़े बारह बज चुके थे। ऑफिस में video edit का काम लंबा खिंच गया था। client को सुबह तक final cut चाहिए था, और मेरे boss को बस एक ही बात आती थी—
“थोड़ा adjust कर ले, निखिल. You are good at this.”

Good at this.

कभी-कभी इंसान इतना “good” हो जाता है कि अपनी थकान तक महसूस करना छोड़ देता है।

मैंने बाइक निकाली। सड़कें लगभग खाली थीं। स्ट्रीट लाइट्स की पीली रोशनी गीले डामर पर फैल रही थी, जबकि बारिश हुई ही नहीं थी। हवा में सीलन थी। जैसे कोई पुरानी इमारत बहुत देर से बंद रही हो।

फोन की battery 12% पर थी। मां का missed call था। दो बार। मैं जानता था वो पूछेंगी, “खाना खाया?” और मैं झूठ बोल दूंगा, “हां.”

भायखला के पास एक पुरानी मिल के पीछे से shortcut जाता था। दिन में भी लोग कम जाते थे, रात में तो बिल्कुल नहीं। लेकिन मुझे घर जल्दी पहुंचना था। मैंने वही रास्ता लिया।

सड़क संकरी थी। दोनों तरफ बंद godown, टूटी दीवारें, जंग लगे shutter, और बीच-बीच में पेड़ों की टेढ़ी परछाइयां। हवा चलती तो सूखे पत्ते सड़क पर घिसटते हुए आवाज़ करते—
खर्र… खर्र… खर्र…

मैंने बाइक की speed कम कर दी।

तभी सामने सड़क के बीचोंबीच कोई खड़ा दिखा।

एक आदमी।

सफेद shirt, काली pant, सिर थोड़ा झुका हुआ।

मैंने horn दिया।

वो नहीं हिला।

मैंने फिर horn दिया, इस बार लंबा।

वो धीरे-धीरे मेरी तरफ मुड़ा।

मेरी उंगलियां brake पर कस गईं।

वो मैं था।

सफेद shirt, काली pant, वही office bag, वही helmet हाथ में। बस चेहरा… चेहरा ऐसा था जैसे कई दिनों से सोया न हो। आंखें गहरी, होंठ सूखे, और गर्दन पर काला निशान।

मैंने बाइक रोक दी।

“क्या…” मेरे मुंह से आवाज़ ही नहीं निकली।

सामने खड़ा आदमी मेरी ही आवाज़ में बोला,
“घर मत जा।”

मेरी रीढ़ में ठंड उतर गई।

मैंने हिम्मत करके कहा,
“कौन है तू?”

वो हंसा नहीं। मुस्कुराया भी नहीं। बस मेरी तरफ देखता रहा।

फिर उसने धीरे से कहा,
“मैं तू ही हूं… कल सुबह वाला।”

मेरे हाथ कांप गए। बाइक का engine बंद हो गया। अब वहां सिर्फ हवा थी, पत्तों की घिसटती आवाज़ थी, और दूर कहीं से आती लोकल ट्रेन की चीख।

मैंने पीछे मुड़कर देखा। सड़क खाली थी।

जब वापस सामने देखा, वो आदमी गायब था।

मेरे कानों में सिर्फ उसकी आवाज़ रह गई थी—
“घर मत जा।”

मैंने खुद को समझाया। Stress. Sleep deprivation. Low sugar. कुछ भी हो सकता है। मैंने दिन भर सिर्फ दो cutting chai पी थी और एक वडा पाव। दिमाग glitch कर सकता है। इंसान hallucinate कर सकता है।

मैंने बाइक फिर start की।

घर पहुंचा तो building की lobby में tube light blink कर रही थी।

हमारी building पुरानी थी—तीन मंजिला, नीचे medical store, ऊपर किराए के flat। सीढ़ियों में हमेशा phenyl, सीलन और पुराने कपड़ों की मिली-जुली smell रहती थी।

Maut Wali Darawani Kahani

मैं दूसरी मंजिल पर रहता था। मां गांव में थीं, मैं अकेला। मुंबई में अकेले रहने वाले लोग घर नहीं लौटते, बस अपने कमरे में वापस आते हैं।

दरवाज़ा खोलते ही मुझे लगा अंदर कोई है।

कमरे में अंधेरा था। खिड़की बंद थी। fan बंद। फिर भी curtain हल्का-हल्का हिल रहा था।

मैंने switch on किया।

सब normal.

Table पर laptop, कोने में कपड़े, sink में दो प्लेट, bed पर मुड़ा हुआ bedsheet।

मैंने bag रखा, shoes उतारे, और पानी पीने kitchen में गया।

तभी mirror में मुझे कुछ दिखा।

Kitchen के छोटे से glass panel में मेरे पीछे कोई खड़ा था।

मैं पलटा।

कोई नहीं।

मैंने खुद को गाली दी, “बस कर निखिल. तू बच्चा नहीं है।”

Phone पर मां को message किया—
“घर पहुंच गया. सो रहा हूं.”

Reply तुरंत आया—
“ठीक है बेटा. दरवाज़ा अच्छे से lock करना.”

मैंने lock चेक किया। अंदर से latch लगाया। chain लगाई।

फिर भी मन शांत नहीं हुआ।

मैं bed पर लेटा, पर नींद नहीं आई। बाहर corridor में किसी के चलने की आवाज़ आई।

धीरे-धीरे कदम।

टक… टक… टक…

वो आवाज़ मेरे दरवाज़े के सामने आकर रुक गई।

मैं उठकर बैठ गया।

कोई knock नहीं।

बस खामोशी।

मैंने पूछा, “कौन?”

कोई जवाब नहीं।

फिर नीचे से किसी बच्चे के रोने जैसी आवाज़ आई। बहुत हल्की। जैसे किसी ने मुंह दबा रखा हो।

मेरे दिमाग में तुरंत practical बातें आईं—किसी पड़ोसी का बच्चा होगा, कोई drunk आदमी होगा, बिल्ली होगी।

लेकिन मेरी building में कोई बच्चा नहीं रहता था।

मैं धीरे से दरवाज़े के पास गया। peephole से देखा।

Corridor खाली था।

पर floor पर पानी था।

दरवाज़े के ठीक बाहर।

जैसे कोई गीले पैरों से आकर खड़ा हुआ हो।

मैं पीछे हटा। तभी दरवाज़े के नीचे से एक कागज़ अंदर सरका।

मेरी सांस रुक गई।

मैंने तुरंत latch नहीं खोला। झुककर कागज़ उठाया।

उस पर काले pen से लिखा था—

“सुबह 6:17 पर तू मर जाएगा।”

मेरे हाथ से कागज़ गिर गया।

मैंने mobile उठाया। 1:43 AM.

मैंने अपने दोस्त समीर को call लगाया। वो मेरे साथ office में काम करता था। तीन ring के बाद उसने उठाया।

“भाई, मर गया क्या? इस time?”

मैंने जल्दी-जल्दी सब बताया। सड़क पर मेरा जैसा आदमी, घर मत जा, corridor, note.

दूसरी तरफ कुछ seconds चुप्पी रही।

फिर समीर बोला, “तू सच में ठीक है?”

“मैं मज़ाक कर रहा हूं क्या?”

“नहीं, पर तू दो दिन से properly सोया नहीं है. और तू horror edits भी कर रहा था न? दिमाग mix कर रहा होगा.”

“Note hallucination नहीं हो सकता, समीर.”

“Photo भेज.”

मैंने कागज़ की photo खींची। WhatsApp पर भेजी।

एक tick.

दो tick नहीं।

Network चला गया।

ऊपर से अचानक बिजली चली गई।

पूरा कमरा अंधेरे में डूब गया।

मेरे phone की screen ही रोशनी थी।

Battery 7%.

मैंने flashlight on की।

उसी पल दरवाज़े पर तीन knock हुए।

ठक।

ठक।

ठक।

इतने धीरे कि अगर कमरे में कोई और आवाज़ होती तो सुनाई भी न देते।

मैंने सांस रोक ली।

फिर मेरी अपनी आवाज़ बाहर से आई—

“निखिल… दरवाज़ा खोल।”

मैं वहीं जम गया।

आवाज़ मेरी थी। बिल्कुल मेरी। वही tone, वही हल्की भारीपन वाली थकान।

“खोल न,” बाहर से आवाज़ आई, “time नहीं है.”

मैंने कांपते हुए कहा, “कौन है?”

बाहर से जवाब आया,
“तू.”

मैं पीछे हट गया। पैर bed से टकराया और मैं बैठ गया।

Phone फिर vibrate हुआ। समीर का call आ रहा था।

मैंने उठाया।

“भाई, photo नहीं आई. तू कहां है अभी?”

मैंने फुसफुसाकर कहा, “मेरे door के बाहर कोई मेरी आवाज़ में बोल रहा है.”

समीर की आवाज़ गंभीर हो गई।
“Door मत खोलना.”

बाहर से फिर आवाज़ आई,
“समीर पर भरोसा मत कर.”

मेरे हाथ से phone लगभग छूट गया।

समीर phone पर बोला, “क्या हुआ?”

मैंने धीरे से पूछा, “तूने कुछ बोला?”

“क्या?”

“तूने कहा door मत खोलना?”

“हां.”

“बाहर वाला बोल रहा है कि तुझ पर भरोसा मत कर.”

समीर चुप हो गया।

फिर उसने कहा, “निखिल, listen carefully. मैं अभी तेरे घर आ रहा हूं. तू अंदर रह. किसी को door मत खोल. Police को call कर.”

मैंने 100 dial करने की कोशिश की। Call connect नहीं हुआ। Network no service.

बाहर से मेरी आवाज़ फिर आई—
“Police तब आती है जब कोई ज़िंदा होता है.”

मैंने phone कान से हटाया। Battery 5%.

समीर बोला, “निखिल? बोल!”

“समीर… अगर मैं सच में hallucinate कर रहा हूं तो?”

“तू मुझसे बात कर रहा है. Focus कर. Room में कोई sharp चीज़ मत पकड़ना. Window से बाहर मत जाना. बस बैठ जा.”

“तू कितनी देर में आएगा?”

“बीस minute.”

बीस minute उस रात बीस साल जैसे लगने वाले थे।

Call कट गया। Battery 4%.

मैंने flashlight बंद कर दी ताकि battery बचे। अंधेरे में आंखें adjust होने लगीं। बाहर से कोई आवाज़ नहीं आ रही थी।

मैंने दरवाज़े के नीचे देखा। corridor की हल्की emergency light में किसी के पैर दिख रहे थे।

वो दरवाज़े के बिल्कुल पास खड़ा था।

मैंने peephole से देखने की हिम्मत नहीं की।

अचानक बाहर से मेरी मां की आवाज़ आई—

“बेटा, दरवाज़ा खोल. मैं हूं.”

मैं लगभग टूट गया।

“मां?” मेरे मुंह से निकला।

मां गांव में थीं। नासिक के पास। यहां नहीं हो सकती थीं।

आवाज़ फिर आई, “तूने खाना नहीं खाया न? खोल.”

मेरी आंखों में आंसू आ गए। डर का सबसे गंदा रूप वही होता है जब वो किसी अपने की आवाज़ पहन लेता है।

मैंने जोर से कहा, “चले जाओ!”

बाहर से मां की आवाज़ बंद हो गई।

फिर बहुत धीमी हंसी सुनाई दी।

मेरी ही हंसी।

मैंने bed के नीचे से cricket bat निकाला। College के time का पुराना bat। हाथ में पकड़कर थोड़ा confidence आया, लेकिन सच कहूं तो मुझे पता था कि अगर दरवाज़ा खुला, bat किसी काम का नहीं होगा।

कमरे में अचानक सड़ी हुई गंध भरने लगी।

जैसे गीले कपड़े कई दिनों तक बंद bucket में पड़े रहें। जैसे hospital के पीछे वाला कूड़ाघर। जैसे कुछ अंदर से खराब हो रहा हो।

मैंने नाक ढकी।

फिर bathroom से पानी गिरने की आवाज़ आई।

टप।

टप।

टप।

मैं bathroom में गया ही नहीं था। नल बंद था।

मैंने phone की flashlight फिर on की। Bathroom का दरवाज़ा आधा खुला था। अंदर अंधेरा।

मैं धीरे-धीरे आगे बढ़ा। हर कदम पर floor ठंडा लग रहा था।

Bathroom में पहुंचकर मैंने light switch दबाया। बिजली नहीं थी।

Flashlight अंदर घुमाई।

Sink सूखा था। bucket खाली। नल बंद।

फिर आवाज़ आई—

टप।

इस बार ऊपर से।

मैंने flashlight ceiling पर डाली।

Ceiling से पानी नहीं… खून टपक रहा था।

गाढ़ा, काला, चिपचिपा।

एक बूंद मेरे गाल पर गिरी।

मैं चीखते-चीखते रुका। हाथ से पोंछा। वो लाल नहीं था। पानी था। साफ पानी।

मैंने आंखें बंद कीं। खोलते ही ceiling normal थी।

मैं wall से टिक गया। सांस तेज चल रही थी।

“ये दिमाग है,” मैंने खुद से कहा, “ये सब दिमाग है.”

तभी bathroom mirror में text उभरने लगा।

भाप जैसा, जबकि कोई steam नहीं थी।

“6:17”

मैं भागकर कमरे में आया। Clock देखा—2:26 AM.

अब मुझे समझ नहीं आ रहा था कि बचना किससे है। बाहर खड़े आदमी से, अपने दिमाग से, या उस time से जो धीरे-धीरे मेरी तरफ आ रहा था।

मैंने दरवाज़े के पास जाकर चिल्लाया, “तू चाहता क्या है?”

बाहर से जवाब आया,
“बस याद कर.”

“क्या याद करूं?”

“जिसे तूने भुला दिया.”

मैंने आंखें बंद कीं। दिमाग में कई चेहरे आए—office, दोस्त, पुरानी girlfriend, मां, landlord, पड़ोसी। लेकिन कोई ऐसी बात नहीं जो इस सब से जुड़ती।

फिर अचानक मुझे एक धुंधली memory आई।

तीन महीने पहले।

यही shortcut। यही mill road।

रात। बारिश। तेज़ horn। brake की चीख। किसी के गिरने की आवाज़।

मैंने तुरंत आंखें खोल दीं।

नहीं।

वो memory नहीं थी। वो सपना था।

या शायद…

Phone vibrate हुआ। समीर का message आया, network एक second को आया होगा—

“मैं building के नीचे हूं. Door मत खोलना जब तक मैं call न करूं.”

मुझे राहत मिली। इतनी राहत कि मैं रो सकता था।

फिर तुरंत दूसरा message आया—

“मैं ऊपर आ रहा हूं.”

दो tick नहीं। बस एक tick।

मैंने phone पकड़ा रखा।

कुछ minute बाद सीढ़ियों से कदमों की आवाज़ आई।

तेज़ कदम।

समीर की आवाज़ आई, “निखिल! दरवाज़ा खोल!”

मैं दरवाज़े के पास गया। Peephole से देखा।

समीर खड़ा था। नीली rain jacket, jeans, हाथ में helmet। हां, वही था। उसका चेहरा परेशान दिख रहा था।

“जल्दी खोल!” उसने कहा।

मैंने chain हटाने के लिए हाथ बढ़ाया।

तभी phone vibrate हुआ।

समीर का call।

मैंने screen देखी। Incoming: Sameer.

बाहर खड़ा समीर दरवाज़ा पीट रहा था।

Phone पर समीर भी call कर रहा था।

मेरी उंगलियां जम गईं।

मैंने call उठाया।

दूसरी तरफ समीर हांफ रहा था, “भाई, मैं traffic में फंसा हूं. दस minute लगेंगे. तू ठीक है?”

मैंने peephole से बाहर देखा।

बाहर वाला समीर मुस्कुरा रहा था।

उसकी मुस्कान बहुत चौड़ी थी।

इतनी चौड़ी कि cheeks खिंच गए थे।

फिर उसने धीरे से कहा,
“Network बहुत unreliable है न आजकल?”

मैं पीछे गिर पड़ा।

बाहर वाला समीर दरवाज़े पर नाखून घिसने लगा।

चर्रर्रर्र…

चर्रर्रर्र…

मेरे कानों में जैसे लोहे की कील घुस रही थी।

Phone पर असली समीर चिल्लाया, “क्या हुआ? निखिल!”

मैंने कहा, “मत आ. Please मत आ. यहां कुछ है.”

“मैं आ रहा हूं. बस दरवाज़ा मत खोलना.”

Call कट गया। Battery 2%.

मैंने कमरे में नजर दौड़ाई। भागने का एक ही रास्ता था—खिड़की।

मेरा flat second floor पर था। नीचे narrow lane और एक पुराना tin shed। अगर कूदा तो पैर टूट सकता था, पर शायद बच सकता था।

मैं खिड़की की तरफ गया। बाहर देखा।

नीचे सड़क पर कोई खड़ा था।

वो सफेद shirt वाला आदमी।

मैं।

वो ऊपर देख रहा था।

उसने हाथ उठाकर इशारा किया—मत कूद।

अब मैं सच में फंस गया था।

दरवाज़ा नहीं। खिड़की नहीं। Phone dead होने वाला। Time 3:11 AM.

मैं floor पर बैठ गया। Bat हाथ में। आंखें door पर।

धीरे-धीरे scratch की आवाज़ बंद हो गई।

फिर सब शांत।

इतना शांत कि मुझे अपना heartbeat सुनाई देने लगा।

कुछ देर बाद कमरे के अंदर से आवाज़ आई।

“निखिल.”

मैंने गर्दन घुमाई।

आवाज़ cupboard से आई थी।

मेरे कमरे का पुराना wooden cupboard, जिसके दरवाज़े ठीक से बंद नहीं होते थे।

उसके अंदर से हल्की रोशनी आ रही थी।

मैंने कभी cupboard में light नहीं लगाई थी।

मैं उठकर उसके पास गया। हाथ आगे बढ़ाया। फिर रुक गया।

“खोल,” अंदर से आवाज़ आई।

इस बार आवाज़ मेरी नहीं थी।

एक लड़की की थी।

धीमी, थकी हुई, भीगी हुई।

“Please खोल.”

मेरा गला सूख गया।

मैंने पूछा, “कौन?”

अंदर से जवाब आया,
“जिसे तू सड़क पर छोड़ आया था.”

मेरे पैरों के नीचे जमीन खिसक गई।

तीन महीने पहले की memory फिर चमकी।

वो रात सच थी?

मैं office party से लौट रहा था। हल्का drunk नहीं, पर sleepy था। बारिश तेज़ थी। Shortcut लिया। अचानक एक लड़की सामने आई। Brake मारा। Bike फिसली। कुछ टकराया। मैं गिरा। Helmet फुटपाथ से टकराया।

जब उठा, सड़क पर कोई पड़ा था।

लड़की।

उसकी उम्र शायद पच्चीस-छब्बीस। लाल दुपट्टा पानी में फैला हुआ। हाथ में phone। होंठ हिल रहे थे।

मैंने उसके पास जाने की कोशिश की थी।

फिर पीछे से truck का horn आया। मैं डर गया। CCTV? Police? Career? मां?

मैं भाग गया।

नहीं।

नहीं, मैं भागा नहीं था।

मैंने ambulance call की थी।

क्या की थी?

मैंने याद करने की कोशिश की। Phone निकाला था। Screen टूटी थी। Battery dead थी। मैंने सोचा था main road जाकर help लाता हूं।

फिर मैं घर आया।

कपड़े बदले।

सो गया।

सुबह news check की थी?

नहीं।

मैंने उस रास्ते पर जाना बंद कर दिया था।

मैंने खुद को बताया था कि शायद कुछ हुआ ही नहीं था।

Cupboard के अंदर से फिर आवाज़ आई,
“मुझे ठंड लग रही थी, निखिल.”

मेरी आंखों से आंसू निकल पड़े।

“मैं… मैं डर गया था,” मैंने फुसफुसाया।

“मैं भी.”

Cupboard का दरवाज़ा धीरे-धीरे अपने आप खुला।

अंदर अंधेरा था। कोई रोशनी नहीं।

बस नीचे एक गीला लाल दुपट्टा पड़ा था।

मैं पीछे हट गया। मेरे घुटने कांप रहे थे।

दरवाज़े पर फिर knock हुआ।

इस बार normal.

“निखिल! मैं हूं समीर!” बाहर से आवाज़ आई।

Phone dead हो गया।

मैं peephole तक गया। समीर था। असली या नकली, कैसे पता चलता?

“तू अकेला है?” मैंने पूछा।

“हां. जल्दी खोल. नीचे watchman बोल रहा है तू चिल्ला रहा था.”

“तेरे हाथ में क्या है?”

“Helmet है, भाई. क्या हो गया तुझे?”

“मेरी मां का नाम क्या है?”

वो चुप हुआ, फिर बोला, “सविता आंटी. अब खोल!”

मैंने chain धीरे से हटाई। latch खोला।

दरवाज़ा खुलते ही समीर अंदर आया। उसका चेहरा सच में डरा हुआ था।

“भाई, तू कैसा लग रहा है!” उसने मुझे पकड़कर बैठाया। “क्या हुआ यहां?”

मैंने cupboard दिखाया। दुपट्टा नहीं था।

Floor सूखा था। Door के बाहर पानी नहीं था। Note भी गायब था।

समीर ने कहा, “तू panic attack में है. चल hospital चलते हैं.”

“नहीं,” मैंने कहा, “पहले mill road चल.”

“पागल है क्या?”

“Please. अभी.”

समीर ने मुझे देखा। शायद मेरी हालत देखकर बहस नहीं की।

हम नीचे आए। Watchman कुर्सी पर सो रहा था। उसने कहा, “साहब, अभी-अभी तो आप ऊपर गए थे.”

समीर रुका। “मैं?”

Watchman ने आंखें मलीं, “नहीं… निखिल साहब. सफेद shirt में. अभी थोड़ी देर पहले.”

मैंने नीचे देखा। मैंने तो grey t-shirt पहन रखी थी।

हम दोनों बिना कुछ बोले बाहर निकले।

रात और भारी हो चुकी थी। सड़क पर हवा तेज़ थी। समीर ने अपनी bike start की, मैं पीछे बैठा। Mill road तक पहुंचते-पहुंचते 4:02 AM हो गए।

वही सड़क। वही बंद godown। वही पत्तों की आवाज़।

लेकिन इस बार सड़क के बीचोंबीच कोई नहीं था।

समीर ने कहा, “अब बता.”

मैंने उसे पूरी घटना बताई। तीन महीने पहले वाली भी। बोलते-बोलते मेरी आवाज़ टूट रही थी।

समीर काफी देर चुप रहा।

फिर बोला, “तूने मुझे ये पहले क्यों नहीं बताया?”

“क्योंकि मैं खुद मानना नहीं चाहता था.”

हमने bike side में लगाई। Phone की flashlight से सड़क के किनारे देखने लगे। बारिश नहीं थी, फिर भी उस जगह की मिट्टी गीली थी।

एक टूटी दीवार के पास कुछ पड़ा था।

पुराना, गंदा, आधा मिट्टी में दबा।

लाल दुपट्टे का टुकड़ा।

समीर ने धीरे से कहा, “Police को बताना पड़ेगा.”

मैंने सिर हिलाया।

तभी पीछे से किसी लड़की की आवाज़ आई—

“अब याद आया?”

हम दोनों पलटे।

कोई नहीं।

समीर ने मेरा हाथ कसकर पकड़ा। “चल. अभी चल.”

मैंने कहा, “रुक.”

मुझे सड़क के पार एक पुराना board दिखा—
“Shanti Industrial Compound”

उसके अंदर एक abandoned security cabin था। Cabin की खिड़की टूटी हुई। अंदर अंधेरा।

मुझे लगा कोई हमें वहां से देख रहा है।

मैं आगे बढ़ा। समीर ने रोका, “मत जा.”

लेकिन इस बार भागना possible नहीं था। मैंने बहुत भाग लिया था।

Cabin के अंदर बदबू थी। पुरानी beedi, गीली लकड़ी, और किसी बंद चीज़ की सड़न। जमीन पर plastic bottles, torn register, पुराने newspaper।

दीवार पर एक calendar था। तीन महीने पुराना। वही date गोल घिरी हुई थी।

उस date के नीचे लिखा था—

“6:17”

मेरे हाथ सुन्न हो गए।

समीर ने कहा, “ये किसने लिखा?”

मैंने जवाब नहीं दिया।

Cabin के कोने में एक पुराना CCTV monitor पड़ा था। टूटा हुआ, बंद। उसके पास DVR box था, dust से ढका।

समीर video editing जानता था। उसने box उठाया। “इसमें कुछ हो सकता है.”

हम उसे लेकर मेरे office गए। वहां backup power था। सुबह 5:05 AM तक हम DVR connect कर चुके थे।

मेरे हाथ कांप रहे थे। समीर ने footage निकाली। Date set की। Time around 12:40 AM.

Screen पर mill road दिखी। बारिश। वही road। वही रात।

मैं screen से आंख नहीं हटा पा रहा था।

Footage में मेरी bike आई। Speed ज्यादा नहीं थी। सामने से लड़की दौड़ती हुई road cross कर रही थी। Bike फिसली। टक्कर हुई। लड़की गिरी। मैं भी गिरा।

मैं उठा।

लड़की हिल रही थी। उसने हाथ उठाया।

मैं उसके पास गया।

मैंने उसका phone उठाया।

मैंने ambulance नहीं call की।

मैंने उसका phone पानी में फेंक दिया।

मेरी सांस रुक गई।

“नहीं…” मैंने कहा, “ये मैं नहीं कर सकता.”

Footage चलती रही।

मैंने चारों तरफ देखा। फिर लड़की को घसीटकर सड़क से हटाया। दीवार के पीछे। अंधेरे में। उसका दुपट्टा road पर रह गया। फिर मैं bike उठाकर चला गया।

समीर ने मुझे देखा। उसकी आंखों में डर नहीं, घृणा थी।

“निखिल…”

मैं रो पड़ा। “मुझे याद नहीं था. मैं कसम खाता हूं मुझे याद नहीं था.”

“तूने उसके साथ क्या किया?”

“मुझे नहीं पता!”

Footage fast-forward हुई। 6:17 AM.

Screen पर वही road थी। सुबह की हल्की रोशनी। एक सफेद shirt वाला आदमी आया।

मैं।

लेकिन उस सुबह मैं घर में था।

Screen पर दिख रहा आदमी दीवार के पीछे गया। कुछ देर बाद वापस आया। उसके हाथ खून से भरे थे।

फिर उसने CCTV camera की तरफ देखा।

सीधा हमारी तरफ।

और मुस्कुराया।

Monitor अपने आप बंद हो गया।

Room में एकदम silence.

समीर पीछे हट गया। “ये क्या था?”

मैंने सिर पकड़ लिया। अब memory टूट-टूटकर वापस आ रही थी।

उस रात accident के बाद मैं घर गया था। लेकिन रात में वापस भी गया था। 6:17 पर। मुझे लगा था लड़की मर चुकी होगी। लेकिन वो जिंदा थी। उसने मुझे देखा था। पहचान लिया था। उसने मेरा नाम बोला था—मेरे ID card से।

मैंने…

मैंने क्या किया?

मेरे पेट में उल्टी उठी।

मैं bathroom की तरफ भागा और sink में उल्टी कर दी। पानी चलाया। Mirror में खुद को देखा।

गर्दन पर हल्का काला निशान था।

ठीक वही निशान जो सड़क पर दिखे मेरे “कल सुबह वाले” रूप की गर्दन पर था।

समीर door पर खड़ा था। “Police चलते हैं. अभी.”

मैंने सिर हिलाया। “हां.”

तभी office की सारी lights blink करने लगीं।

एक-एक करके monitors on हुए।

हर screen पर वही footage।

6:17.

6:17.

6:17.

फिर सभी screens पर एक ही live feed आया—मेरा घर।

मेरा कमरा।

मेरा bed।

और bed पर कोई लेटा था।

मैं।

सफेद shirt में।

गर्दन पर काला निशान।

आंखें खुली हुईं।

मरा हुआ।

समीर ने पीछे हटते हुए कहा, “निखिल… ये live कैसे हो सकता है?”

मैंने time देखा—5:58 AM.

मेरे पास सिर्फ 19 minute थे।

हम office से बाहर भागे। सड़क पर morning milk vans आने लगी थीं। शहर जाग रहा था, लेकिन मेरे लिए सब आवाज़ें धुंधली थीं।

समीर ने कहा, “Police station चल.”

मैंने कहा, “नहीं. पहले उस जगह.”

“क्यों?”

“क्योंकि शायद वो अभी भी वहीं है.”

“कौन?”

मैंने जवाब नहीं दिया।

Mill road पर लौटते हुए आसमान नीला होने लगा था। Birds की आवाज़ आ रही थी। लेकिन उस road पर अभी भी रात बची हुई थी।

हम दीवार के पीछे गए।

वहां मिट्टी थोड़ी उभरी हुई थी।

समीर ने कांपते हुए कहा, “निखिल…”

मैं घुटनों के बल बैठ गया और हाथों से मिट्टी हटाने लगा। मिट्टी गीली थी। बदबू तेज़ होती जा रही थी। कुछ मिनट बाद मेरी उंगलियों से कपड़ा टकराया।

लाल कपड़ा।

मैं रोते हुए पीछे हट गया।

समीर ने Police को call किया।

Call connect हुआ।

उसने location बताई।

मैं खड़ा हुआ। मेरी सांस तेज चल रही थी। Time 6:13.

हवा अचानक बंद हो गई।

सड़क के उस पार वो लड़की खड़ी थी।

लाल दुपट्टा, भीगे बाल, चेहरा पीला। लेकिन उसकी आंखों में गुस्सा नहीं था।

बस थकान थी।

मैंने धीरे से कहा, “मुझे माफ कर दो.”

वो बोली,
“मैंने उस रात भी यही कहा था—मुझे बचा लो.”

मैं टूट गया।

“मैं डर गया था.”

“डर इंसान को कातिल नहीं बनाता, निखिल. फैसला बनाता है.”

मेरे पीछे समीर किसी से phone पर बात कर रहा था। उसे कुछ दिख नहीं रहा था।

मैंने पूछा, “अब क्या होगा?”

लड़की ने सड़क के दूसरी तरफ इशारा किया।

वहां मैं खड़ा था। सफेद shirt वाला। मेरी मौत वाला चेहरा।

उसने घड़ी दिखाई।

6:16.

मैं समझ गया।

मैं भाग सकता था। Police आने वाली थी। मैं confess कर सकता था। Jail जा सकता था। शायद ज़िंदगी बच जाती।

लेकिन क्या सच में?

जिस आदमी ने एक मरती लड़की का phone फेंक दिया, उसे road से घसीटा, उसे मिट्टी में दबाया… वो पहले ही मर चुका था।

मैं सड़क के बीच में चला गया।

समीर चिल्लाया, “निखिल! हट!”

दूर से truck आ रहा था। सुबह की supply truck। Speed ज्यादा नहीं थी, पर road गीली थी।

मैंने truck की headlights में अपनी परछाईं देखी।

फिर अचानक मेरे सामने वही लड़की आ गई।

उसने मेरा हाथ पकड़ा।

उसका हाथ बर्फ जैसा ठंडा था।

वो बोली, “नहीं. मौत आसान है.”

Truck मेरे बिल्कुल पास आकर brake लगाकर रुक गया। Driver गाली देता हुआ उतरा।

समीर मुझे खींचकर side में ले गया। “तू पागल हो गया है क्या?”

Police siren दूर से सुनाई देने लगी।

Time 6:17.

कुछ नहीं हुआ।

मैं जिंदा था।

मैं रो रहा था।

मैंने सोचा शायद यही सजा है। जिंदा रहना। याद रखना। बताना।

Police आई। जगह खोदी गई। शरीर मिला। तीन महीने पुराना। लड़की का नाम था—माया कदम। वो Parel के एक छोटे clinic में nurse थी। उस रात night duty से लौट रही थी।

मेरी confession record हुई। CCTV DVR दिया गया। मुझे arrest कर लिया गया।

लेकिन कहानी यहां खत्म नहीं हुई।

Jail में पहली रात, मुझे नींद नहीं आई। Cell में पसीने, लोहे और पुराने पेशाब की गंध थी। दूर से किसी कैदी की खांसी आती रही। एक bulb जल रहा था, जिस पर कीड़े टकरा रहे थे।

मैंने सोचा, अब hallucination बंद हो जाएंगे। सच बाहर आ गया है।

रात 3 बजे के आसपास मेरी आंख लगी।

और फिर मैंने सपना देखा।

मैं अपने घर में था। वही room। वही bed। वही darkness।

Door के नीचे से एक कागज़ अंदर आया।

मैंने उठाया।

उस पर लिखा था—

“अब तू नहीं मरेगा.”

मैंने राहत की सांस ली।

फिर नीचे छोटी लाइन दिखी—

“हर सुबह 6:17 पर तू वही रात दोबारा देखेगा.”

मैं जाग गया।

Cell की दीवार के कोने में कोई खड़ा था।

सफेद shirt, काली pant।

मैं।

लेकिन इस बार उसकी गर्दन पर निशान नहीं था।

उसके हाथों पर मिट्टी लगी थी।

वो धीरे से मुस्कुराया और बोला—

“याद रखना शुरू करें?”

तभी jail के corridor में clock ने 6:17 बजाए।

और मेरे पैरों के नीचे फिर वही गीली सड़क आ गई।

बारिश।

Horn।

Brake।

लड़की की चीख।

और मैं…
मैं फिर वही फैसला लेने वाला था।

कहते हैं, कुछ मौतें शरीर को खत्म करती हैं।
कुछ मौतें आत्मा को।
और कुछ मौतें इंसान को जिंदा छोड़ देती हैं… ताकि वो हर दिन अपनी ही मौत देखे।

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