WRITER – Rajeev Malhotra
उस रात अगर मैं सिर्फ पाँच मिनट पहले सो गया होता…
तो शायद आज ज़िंदा नहीं होता।
क्योंकि ठीक 2:13 बजे, मेरी खिड़की के बाहर कोई औरत खड़ी थी… जो पिछले तीस साल से मर चुकी थी।
मेरा नाम विवेक है। मैं मध्य प्रदेश के छोटे से कस्बे “चंदेरी” में रहता हूँ। पुरानी हवेलियाँ, तंग गलियाँ, टूटे मंदिर और रात में दूर सुनाई देने वाली ट्रेन की आवाज़… यही इस शहर की पहचान थी।

मैं profession से freelance video editor था। Work From Home करता था, इसलिए ज़्यादातर रातों में जागना मेरी आदत बन चुकी थी। उस समय मैं अपने नाना की पुरानी हवेली में अकेला रहता था। माँ-पापा इंदौर में थे और मैं यहाँ सिर्फ इसलिए आया था क्योंकि शहर के शोर से दूर मुझे content बनाने में शांति मिलती थी।
Banjaran horror story हवेली लगभग सौ साल पुरानी थी।
ऊँची छतें…
लकड़ी की चरमराती सीढ़ियाँ…
और हर कमरे में सीलन की बदबू।
लेकिन असली डर उस हवेली के पीछे वाले सूखे मैदान से था।
लोग उसे “बंजारों का मैदान” कहते थे।
कहा जाता था कि कई साल पहले वहाँ एक Banjaran औरत की लाश मिली थी। उसके पैरों में घुंघरू थे और आँखें खुली हुई थीं। पुलिस केस कभी solve नहीं हुआ।
मैं इन बातों पर विश्वास नहीं करता था।
कम से कम… पहले नहीं करता था।
दिसंबर की ठंडी रात थी।
करीब 1:45 बजे मैं अपने कमरे में Laptop पर horror documentary edit कर रहा था। बाहर तेज़ हवा चल रही थी। खिड़की के पुराने शीशे बार-बार हिल रहे थे।
“टक…टक…टक…”
मैंने headphones उतार दिए।
आवाज़ फिर आई।
“टक…टक…”
पहले लगा पेड़ की डाल होगी। लेकिन मेरे कमरे के बाहर कोई पेड़ नहीं था।
मैं धीरे से उठा और खिड़की के पास गया।
बाहर पूरा अंधेरा था।
सिर्फ दूर सड़क के खंभे की पीली रोशनी धुंध में तैर रही थी।
फिर अचानक…
मुझे लगा जैसे कोई परछाईं हिली हो।
मैंने आँखें सिकोड़कर देखा।
और तभी मेरा गला सूख गया।
खिड़की से लगभग दस कदम दूर… एक औरत खड़ी थी।
काले रंग का घाघरा…
सिर पर लाल चुन्नी…
और पैरों में चाँदी के घुंघरू।
वह बिल्कुल स्थिर खड़ी थी।
हवा इतनी तेज़ थी कि आसपास की सूखी घास हिल रही थी… लेकिन उसकी चुन्नी तक नहीं हिल रही थी।
मेरे शरीर में सिहरन दौड़ गई।
मैंने खुद को समझाया—
“कोई गाँव की औरत होगी।”
लेकिन रात के दो बजे?
इस सुनसान मैदान में?
मैंने खिड़की बंद करनी चाही तभी…
उस औरत ने धीरे-धीरे अपना चेहरा ऊपर उठाया।
उसकी आँखें पूरी सफेद थीं।
मेरे हाथ से खिड़की छूट गई।
“धड़ाम!”
मैं पीछे गिर पड़ा।
दिल इतनी तेज़ धड़क रहा था कि सांस लेना मुश्किल हो रहा था।
मैं दोबारा उठकर देखने की हिम्मत नहीं कर पाया।
करीब पाँच मिनट बाद जब मैंने फिर खिड़की की तरफ देखा…
वह गायब थी।
अगली सुबह मैंने खुद पर हँसने की कोशिश की।
“Late night editing का असर है।”
लेकिन अंदर कहीं डर बैठ चुका था।
मैं चाय लेने मोहल्ले की दुकान पर गया। वहाँ बूढ़े रमेश काका बैठे थे।
मैंने casually पूछा—
“काका… यहाँ पीछे मैदान में रात को कोई आता-जाता है क्या?”
उनका चेहरा अचानक उतर गया।
“तूने कुछ देखा क्या?”
मैं थोड़ा हिचकिचाया।
“एक औरत थी शायद…”
काका ने तुरंत मेरी बात काट दी।
“रात को अगर घुंघरू सुनाई दें… तो खिड़की मत खोलना।”
मेरे हाथ ठंडे पड़ गए।
“क्यों?”
उन्होंने धीरे से कहा—
“क्योंकि वो इंसान नहीं है।”
दुकान पर अचानक सन्नाटा छा गया।
पास बैठा लड़का भी चाय पीना रोककर मुझे देखने लगा।
काका ने बीड़ी सुलगाई और धीमी आवाज़ में बोले—
“तीस साल पहले एक Banjaran टोली यहाँ रुकी थी। उनमें एक लड़की थी—शायरा। बहुत सुंदर… लेकिन थोड़ी अजीब।”
“अजीब मतलब?”
“वो रात को लोगों के घरों के बाहर खड़ी रहती थी। बिना कुछ बोले। बस देखती रहती थी।”
मैं हँसने ही वाला था कि काका ने गंभीर होकर कहा—
“फिर एक रात वो गायब हो गई।”
“और?”
“तीन दिन बाद उसकी लाश मैदान में मिली। आँखें खुली थीं… और पैरों के घुंघरू गायब थे।”
मेरे अंदर अजीब बेचैनी होने लगी।
“Police?”
“कुछ नहीं मिला। लेकिन उसके बाद… रात को लोगों ने उसे देखना शुरू किया।”
मैंने मज़ाक में पूछा—
“Ghost?”
काका ने मेरी आँखों में देखते हुए कहा—
“जिसे वो दिखती है… उसके घर कोई ना कोई मरता ज़रूर है।”
उस रात मैं जल्दी सोना चाहता था।
लेकिन डर इंसान को सोने नहीं देता।
करीब 12 बजे बिजली चली गई।
पूरा घर अंधेरे में डूब गया।
मैंने phone की flashlight ऑन की।
हवेली में अचानक अजीब आवाज़ें आने लगीं।
लकड़ी की सीढ़ियों पर जैसे कोई धीरे-धीरे चल रहा हो।
“चर्र… चर्र…”
मैंने खुद को समझाया—
“पुराना घर है।”
फिर नीचे से घुंघरुओं की हल्की आवाज़ आई।
“छन… छन…”
मेरी रीढ़ जम गई।
आवाज़ धीरे-धीरे सीढ़ियों की तरफ बढ़ने लगी।
“छन… छन… छन…”
मैंने कमरे का दरवाज़ा बंद कर लिया।
सांस तेज़ हो चुकी थी।
अचानक दरवाज़े के बाहर किसी के रुकने की आवाज़ आई।
पूरी हवेली में मौत जैसा सन्नाटा छा गया।
फिर…
“टक…टक…”
दरवाज़े पर दस्तक हुई।
मैं चुप रहा।
दूसरी बार—
“टक…टक…टक…”
और फिर एक औरत की धीमी आवाज़ आई—
“खिड़की क्यों बंद कर ली…?”
मेरे हाथ काँपने लगे।
वह आवाज़ इंसानी थी… लेकिन उसमें कुछ ऐसा था जो सीधा दिमाग के अंदर उतर रहा था।
मैंने कोई जवाब नहीं दिया।
अचानक दरवाज़े के नीचे से किसी की उँगलियाँ दिखाई दीं।
लंबी… गंदी… मिट्टी से भरी हुई।
मैं डर के मारे पीछे हट गया।
फिर धीरे-धीरे वे उँगलियाँ वापस खिंच गईं।
कुछ सेकंड बाद…
सीढ़ियों से नीचे उतरने की आवाज़ आने लगी।
“छन… छन…”
और फिर सब शांत।
उस रात मैं सुबह तक नहीं सोया।
अगले दिन मैंने तय किया कि हवेली छोड़ दूँगा।
लेकिन उसी शाम माँ का फोन आया।
“नाना जी की तबीयत बहुत खराब है।”
मैं तुरंत अस्पताल पहुँचा।
नाना ICU में थे। बहुत बूढ़े और कमजोर।
उन्होंने मुझे देखते ही हाथ पकड़ लिया।
“तू हवेली में रह रहा है?”
“हाँ।”
उनकी आँखों में डर उतर आया।
“वहाँ से निकल जा।”
मैं चौंका।
“क्यों?”
उन्होंने काँपती आवाज़ में कहा—
“वो वापस आ गई है…”
मेरे पैरों तले ज़मीन खिसक गई।
“आप जानते हो उसे?”
नाना चुप हो गए।
फिर धीरे से बोले—
“उसकी मौत accident नहीं थी।”
मैं अवाक रह गया।
“मतलब?”
उनकी आँखों में आँसू आ गए।
“उसे मैंने मारा था…”
मेरा दिमाग सुन्न पड़ गया।
ICU की मशीनों की बीप अचानक बहुत तेज़ सुनाई देने लगी।
“क्या…?”
उन्होंने टूटती आवाज़ में कहा—
“वो गर्भवती थी… और बच्चा मेरा था…”
मेरी सांस रुक गई।
“उस रात उसने कहा था कि वो सबको सच बता देगी। मुझे डर लग गया। मैंने गुस्से में उसका गला दबा दिया…”
मेरे पूरे शरीर में झटके दौड़ गए।
“फिर?”
“मैंने उसकी लाश मैदान में फेंक दी…”
मैं कुछ बोल नहीं पाया।
नाना रोने लगे।
“लेकिन मरने से पहले उसने कहा था—
‘जिस घर में तू रहेगा… वहाँ मैं वापस आऊँगी…’”
उस रात मैं हवेली लौटा तो सब कुछ बदल चुका था।
हवा में अजीब बदबू थी।
जैसे गीली मिट्टी और सड़ा हुआ मांस।
मैंने सामान पैक करना शुरू किया।
तभी ऊपर वाले बंद कमरे से आवाज़ आई।
“ठक…”
मैं जम गया।
वो कमरा सालों से बंद था।
धीरे-धीरे आवाज़ फिर आई।
“ठक… ठक…”
मैंने खुद को रोकने की कोशिश की।
लेकिन इंसान की सबसे बड़ी कमजोरी curiosity होती है।
मैं टॉर्च लेकर ऊपर गया।
दरवाज़े पर जंग लगा ताला था… लेकिन खुला हुआ।
मेरे हाथ काँप रहे थे।
मैंने दरवाज़ा धक्का देकर खोला।
कमरे में धूल और मकड़ी के जाले थे।
दीवारों पर पुराने फोटो टंगे थे।
और कमरे के बीचोंबीच…
एक लकड़ी का पालना रखा था।
वह खुद-ब-खुद हिल रहा था।
“चीं… चीं…”
मेरा दिल बैठ गया।
मैं धीरे-धीरे आगे बढ़ा।
पालने के अंदर कुछ था।
मैंने टॉर्च अंदर डाली—
Banjaran horror story
और चीख निकल गई।
अंदर एक छोटा कंकाल पड़ा था।
बच्चे का कंकाल।
उसके पैरों में छोटे-छोटे घुंघरू बंधे थे।
उसी पल पीछे से किसी ने फुसफुसाया—
“मेरा बच्चा…”
मैंने पलटकर देखा।
वो Banjaran औरत दरवाज़े पर खड़ी थी।
इस बार उसका चेहरा साफ दिख रहा था।
आधी त्वचा सड़ी हुई…
आँखों से काला पानी बह रहा था…
और गर्दन पर उँगलियों के निशान।
मेरे पैरों ने जवाब दे दिया।
वो धीरे-धीरे मेरी तरफ बढ़ने लगी।
“तुम सब एक जैसे हो…”
घुंघरुओं की आवाज़ पूरे कमरे में गूंज रही थी।
मैं किसी तरह भागा।
सीढ़ियाँ उतरते वक्त पीछे मुड़कर देखा—
वो अब भी वहीं खड़ी थी।
लेकिन उसकी मुस्कान…
इंसानी नहीं थी।
मैं हवेली से बाहर भागा और सीधे अस्पताल पहुँचा।
लेकिन वहाँ पहुँचकर पता चला…
नाना मर चुके थे।
उनकी मौत ठीक 2:13 बजे हुई थी।
वही समय… जब मैंने पहली बार उसे देखा था।
मैंने उसी रात फैसला किया कि सुबह होते ही चंदेरी छोड़ दूँगा।
लेकिन कहानी वहीं खत्म नहीं हुई।
सुबह करीब 5 बजे मैं आखिरी बार हवेली में सामान लेने गया।
सूरज निकलने वाला था। हल्की धुंध फैली हुई थी।
मैं जल्दी-जल्दी बैग पैक कर रहा था तभी…
मुझे कमरे में किसी बच्चे के रोने की आवाज़ सुनाई दी।
“ऊँ… ऊँ…”
मेरे हाथ रुक गए।
आवाज़ ऊपर वाले कमरे से आ रही थी।
मैंने खुद से कहा—
“नहीं। अब नहीं।”
लेकिन फिर वही रोना।
इस बार और तेज़।
मेरे अंदर अजीब खिंचाव होने लगा।
जैसे कोई मुझे ऊपर बुला रहा हो।
मैं धीरे-धीरे सीढ़ियाँ चढ़ गया।
कमरा खुला हुआ था।
अंदर वही पालना हिल रहा था।
लेकिन इस बार…
पालने में बच्चा था।
जिंदा।
उसकी आँखें पूरी सफेद थीं।
और वो मुझे देखकर मुस्कुरा रहा था।
अचानक पीछे से दरवाज़ा बंद हो गया।
“धड़ाम!”
मैंने घबराकर पलटा।
वो Banjaran मेरे बिल्कुल पीछे खड़ी थी।
उसने पहली बार सामान्य आवाज़ में कहा—
“तुझे पता है सबसे डरावनी बात क्या है?”
मैं जड़ हो चुका था।
वो मुस्कुराई।
“मैं बदला लेने नहीं आई…”
उसने धीरे से बच्चे को उठाया।
“मैं अपना परिवार लेने आई हूँ।”
मेरी सांस अटक गई।
“क्या मतलब?”
उसकी आँखें मेरी आँखों में धँस गईं।
“तेरी माँ… मेरी बेटी थी।”
पूरा कमरा घूमने लगा।
“झूठ…”
“तेरे नाना ने सच छुपा दिया। मुझे मारने के बाद… मेरे बच्चे को भी यहीं बंद कर दिया। फिर दुनिया को बताया कि उनकी बेटी पैदा हुई है।”
मेरे पैरों से ताकत खत्म हो गई।
“नहीं…”
मेरे दिमाग में अचानक बचपन की बातें घूमने लगीं।
माँ का हमेशा कहना—
“तेरी आँखें हमारे परिवार जैसी नहीं हैं…”
नाना का मुझे देखकर अजीब डरना…
सब कुछ।
Banjaran औरत रोने लगी।
उसकी आवाज़ अब डरावनी नहीं… दर्द से भरी थी।
“तीस साल मैं अपने बच्चे को ढूँढती रही…”
फिर उसने मेरी तरफ हाथ बढ़ाया।
“चल मेरे साथ…”
मैं पीछे हट गया।
“नहीं!”
तभी अचानक बच्चे ने चीख मारी।
पूरा कमरा हिलने लगा।
दीवारों से मिट्टी गिरने लगी।
खिड़कियाँ अपने आप खुल गईं।
और मुझे महसूस हुआ…
कमरे में सिर्फ हम तीन नहीं थे।
चारों तरफ अंधेरे में दर्जनों लोग खड़े थे।
सफेद आँखें…
घुंघरुओं की आवाज़…
और सब मुझे घूर रहे थे।
Banjaran ने धीरे से कहा—
“अब तू अकेला नहीं रहेगा…”
मैं पूरी ताकत से दरवाज़े की तरफ भागा।
दरवाज़ा खुल गया और मैं सीढ़ियों से नीचे गिरता हुआ बाहर निकल आया।
पीछे से उसकी आवाज़ आई—
“रात को खिड़की बंद मत करना…”
उस घटना के बाद मैंने चंदेरी छोड़ दिया।
अब मैं भोपाल में रहता हूँ।
लेकिन हर रात ठीक 2:13 बजे…
मेरी खिड़की पर हल्की दस्तक होती है।
“टक…टक…”
और कभी-कभी…
नीचे सड़क पर घुंघरुओं की आवाज़ सुनाई देती है।
मैंने कई बार खुद को समझाया कि ये trauma है।
Hallucination है।
लेकिन पिछले हफ्ते…
मेरे apartment के बाहर CCTV में एक औरत रिकॉर्ड हुई।
काले घाघरे में।
सिर पर लाल चुन्नी।
और सबसे डरावनी बात?
कैमरे में उसका चेहरा नहीं दिख रहा था…
लेकिन वो सीधा मेरी खिड़की की तरफ देख रही थी।