Mat Chhoona Isse! | Nimbu Mirchi Ka Shraap

WRITER – Manoj Kulkarni

पहली लाश जब कुएं से निकली, तब उसके मुंह में सड़ी हुई नींबू-मिर्च ठूंसी हुई थी।

गांव वालों ने पहले इसे suicide समझा… लेकिन उसी रात पूरे गांव में एक जैसी खटखटाहट सुनाई दी।

और अगले सात दिनों में, देवली गांव का कोई भी आदमी सूरज ढलने के बाद घर से बाहर नहीं निकला।


उत्तर प्रदेश के सोनभद्र जिले के जंगलों के बीच बसा छोटा-सा गांव था — देवली

एक ऐसा गांव जहां रात होते ही अंधेरा जमीन पर उतर आता था। सड़कें कच्ची थीं, बिजली अक्सर चली जाती थी, और दूर जंगलों से सियारों की आवाजें सुनाई देती थीं। गांव के चारों तरफ पुराने पीपल के पेड़ थे, जिनके नीचे शाम के बाद कोई नहीं बैठता था।

Nimbu Mirchi Ka Shraap

मैं उस गांव में पहली बार 2019 की बरसात में गया था।

मेरा नाम राघव मिश्रा है। मैं उस समय एक local news portal के लिए crime stories cover करता था। मुझे strange incidents और rural horror जैसी खबरें collect करने का शौक था। ज़्यादातर चीजें अफवाह निकलती थीं… लेकिन देवली में जो हुआ, उसने मेरी जिंदगी बदल दी।

उस रात लगातार बारिश हो रही थी।

मैं बाइक से गांव पहुंचा तो शाम के सात बज चुके थे। पूरे रास्ते कीचड़ था। मोबाइल network गायब था। गांव के बाहर एक टूटा हुआ बोर्ड लगा था—

“देवली ग्राम पंचायत में आपका स्वागत है।”

उसके नीचे किसी ने लाल रंग से लिखा था—

“सूरज ढलने के बाद बाहर मत निकलना।”

मैं हल्का-सा हंसा।

Nimbu Mirchi Ka Shraap

मुझे लगा किसी बच्चे की शरारत होगी।

लेकिन गांव में घुसते ही मुझे कुछ अजीब महसूस हुआ।

पूरा गांव असामान्य रूप से शांत था।

ना बच्चे खेल रहे थे… ना औरतों की बातें… ना कहीं टीवी की आवाज।

बस दूर कहीं लोहे के दरवाजे के हिलने की आवाज आ रही थी।

ठक… ठक… ठक…

मैंने बाइक रोकी।

तभी सामने से लगभग पचपन साल का दुबला आदमी लालटेन लेकर आया।

“कौन हो?” उसने घूरते हुए पूछा।

“मैं राघव… पत्रकार हूं। प्रधान जी से मिलने आया हूं।”

उसका चेहरा अचानक उतर गया।

“इस समय?”

“हां… क्या हुआ?”

वो कुछ सेकंड तक मुझे देखता रहा, फिर धीरे बोला—

“अगर जान प्यारी है तो रात होने से पहले लौट जाओ।”

उसकी आवाज में मजाक नहीं था।

मैंने हंसते हुए कहा, “इतना dangerous क्या है यहां?”

उसने जवाब नहीं दिया।

बस लालटेन ऊंची करके बोला—

“गांव में जो भी outsider रात में रुका… वो सुबह सही हालत में नहीं मिला।”

मेरे शरीर में हल्की सिहरन दौड़ गई।

लेकिन curiosity डर से ज्यादा थी।

मैं प्रधान के घर पहुंचा। उनका नाम था शिवबालक सिंह। लगभग साठ साल के भारी शरीर वाले आदमी।

उन्होंने मुझे अंदर बैठाया, चाय दी… लेकिन उनका चेहरा बेहद तनाव में था।

“आप लोग media वाले अब आए हैं?” उन्होंने कहा।

“मतलब?”

“तीन मौतें हो चुकी हैं।”

मैं चौक गया।

“Police?”

“आई थी… सबको natural death बोलकर चली गई।”

“लेकिन असली बात क्या है?”

प्रधान ने धीरे से दरवाजा बंद किया।

फिर फुसफुसाते हुए बोले—

“ये सब उस नींबू-मिर्च के बाद शुरू हुआ।”

कमरे में अचानक खामोशी छा गई।

बारिश की बूंदें टीन की छत पर तेज़ आवाज कर रही थीं।

“कौन-सा नींबू-मिर्च?”

उन्होंने कांपते हाथ से बीड़ी जलाई।

“पिछले महीने गांव के बाहर पुराने कुएं के पास किसी ने तंत्र-मंत्र वाला नींबू-मिर्च फेंका था। उसके ऊपर काला धागा बंधा था… और उसमें कीलें घुसी थीं।”

“तो?”

“जिसने उसे हटाया… वो अगले दिन मर गया।”

मैंने पूछा, “कैसे?”

प्रधान ने मेरी आंखों में देखा।

“उसका मुंह पूरा फटा हुआ था… जैसे किसी ने अंदर से चीर दिया हो।”

मेरे हाथ अपने आप रुक गए।

“उसके बाद?”

“जिसने लाश को हाथ लगाया… वो भी मर गया।”

मैं अब पूरी तरह serious हो चुका था।

“कोई बीमारी हो सकती है।”

प्रधान हल्का हंसे।

“बीमारी दरवाजे पर रात में खटखटाती नहीं।”

उसी समय…

ठक… ठक… ठक…

कमरे का दरवाजा धीरे-धीरे बजा।

हम दोनों चुप हो गए।

प्रधान का चेहरा सफेद पड़ गया।

“कौन?” उन्होंने कांपती आवाज में पूछा।

बाहर से कोई जवाब नहीं आया।

फिर वही आवाज—

ठक… ठक… ठक…

धीरे… लेकिन बेहद साफ।

प्रधान अचानक उठे और मेरा हाथ पकड़ लिया।

“दरवाजा मत खोलना।”

“लेकिन—”

“चुप!”

कमरे की हवा भारी हो चुकी थी।

मेरे कानों में अपनी heartbeat सुनाई दे रही थी।

बाहर बारिश बंद हो चुकी थी।

अब सिर्फ वो खटखटाहट थी।

कुछ सेकंड बाद आवाज रुक गई।

प्रधान धीरे-धीरे खिड़की की तरफ बढ़े।

उन्होंने पर्दा थोड़ा हटाया… और तुरंत पीछे हट गए।

उनकी आंखें डर से फैल चुकी थीं।

“क्या हुआ?”

उन्होंने जवाब नहीं दिया।

बस कांपते हुए बोले—

“वो फिर आ गई…”

“कौन?”

उन्होंने धीरे से कहा—

“जिसके मुंह में नींबू-मिर्च था।”

मेरी रीढ़ में ठंड उतर गई।

मैं तुरंत खिड़की के पास गया।

लेकिन बाहर कोई नहीं था।

बस मिट्टी में गीले पैरों के निशान बने थे।

और उन निशानों के बीच… एक सड़ा हुआ नींबू पड़ा था।

जिसमें सात हरी मिर्चें बंधी थीं।


उस रात मैं प्रधान के घर ही रुका।

करीब बारह बजे अचानक मेरी नींद खुली।

बाहर किसी औरत के रोने की आवाज आ रही थी।

धीमी… दर्द भरी…

जैसे कोई बहुत दूर से मदद मांग रहा हो।

मैंने मोबाइल की flashlight ऑन की।

कमरे में प्रधान नहीं थे।

दरवाजा आधा खुला था।

मैं बाहर निकला।

पूरा आंगन अंधेरे में डूबा था।

सिर्फ बारिश के बाद की मिट्टी की गंध और कहीं दूर कुत्तों के भौंकने की आवाज।

तभी मुझे दिखा—

आंगन के बीचोंबीच कोई औरत खड़ी थी।

उसके लंबे गीले बाल चेहरे पर चिपके हुए थे।

सफेद साड़ी पूरी कीचड़ में सनी थी।

और उसके हाथ में… वही नींबू-मिर्च थी।

मेरा गला सूख गया।

“क… कौन हो तुम?”

उसने धीरे-धीरे सिर उठाया।

उसका चेहरा देखकर मेरे पैरों से ताकत निकल गई।

उसका मुंह पूरी तरह फटा हुआ था।

जैसे जबड़े को दोनों तरफ से चीर दिया गया हो।

और उस कटे हुए मुंह के अंदर… कई नींबू और मिर्चें ठूंसी हुई थीं।

उसकी आंखें पूरी सफेद थीं।

मैं पीछे हटने लगा।

तभी पीछे से किसी ने मेरा कंधा पकड़ा।

मैं चीख पड़ा।

वो प्रधान थे।

उन्होंने तुरंत मेरा मुंह दबाया।

“पागल हो गए हो क्या?”

“वो… वो औरत…”

प्रधान ने सामने देखा।

वहां कुछ नहीं था।

सिर्फ खाली आंगन।

मैं कांप रहा था।

“मैंने अपनी आंखों से देखा!”

प्रधान ने भारी सांस लेते हुए कहा—

“जिसे वो दिख जाती है… उसकी मौत तय होती है।”


अगली सुबह गांव में चौथी मौत हुई।

मरने वाला था — बद्री साहू

उसकी किराने की दुकान थी।

जब लोग सुबह पहुंचे तो वो दुकान के अंदर मरा पड़ा था।

उसकी आंखें बाहर निकली हुई थीं।

और गले में नींबू-मिर्च का हार पड़ा था।

मैंने पहली बार इतनी डरावनी लाश देखी थी।

Police आई।

उन्होंने body उठाई।

लेकिन जाते-जाते एक constable ने मुझसे धीरे से कहा—

“भाई साहब… रात में यहां मत रुकना।”

“क्यों?”

उसने जेब से ताबीज निकाला।

“कल रात मैंने भी उसे देखा था।”


मैंने investigation शुरू की।

गांव के सबसे बूढ़े आदमी रामचरन बाबा से मिलने गया।

उनकी उम्र लगभग नब्बे साल थी।

वो गांव के बाहर टूटे मंदिर में रहते थे।

जब मैंने नींबू-मिर्च वाली बात बताई, तो उनके हाथ कांपने लगे।

“तुम लोगों ने उसे जगा दिया…”

“किसे?”

उन्होंने मेरी तरफ देखा।

“चुड़ैल नहीं है वो… इंसान थी।”

मैं चुप रहा।

उन्होंने कहना शुरू किया—

“करीब तीस साल पहले इस गांव में एक औरत रहती थी… नाम था सावित्री।”

“क्या हुआ था उसके साथ?”

“उस पर डायन होने का आरोप लगा था।”

“क्यों?”

“गांव में बच्चों की मौतें हो रही थीं। लोग डर गए थे। किसी तांत्रिक ने कहा कि सावित्री अशुभ है।”

मैंने पूछा, “फिर?”

रामचरन बाबा की आंखें भर आईं।

“लोगों ने उसे पीट-पीटकर गांव के कुएं के पास बांध दिया।”

मेरे शरीर में झुरझुरी दौड़ गई।

“उसके मुंह में जबरदस्ती नींबू-मिर्च ठूंसी गई… ताकि उसकी ‘बुरी आत्मा’ बाहर ना निकले।”

मैं सन्न रह गया।

“फिर उसे जिंदा जला दिया गया।”

हवा अचानक भारी लगने लगी।

मंदिर के बाहर पेड़ जोर से हिल रहे थे।

रामचरन बाबा फुसफुसाए—

“मरते समय उसने कहा था… ‘जिसने मुझे मारा है, उनका पूरा गांव खत्म होगा।’”


उस रात गांव में बिजली चली गई।

पूरा देवली अंधेरे में डूब गया।

मैं प्रधान के घर बैठा recording सुन रहा था।

तभी बाहर से बच्चों के हंसने की आवाज आई।

धीमी… लेकिन अजीब।

प्रधान की बहू रोने लगी।

“वो फिर आ गई…”

अचानक सारे कुत्ते एक साथ चिल्लाने लगे।

फिर…

ठक… ठक… ठक…

इस बार आवाज सिर्फ दरवाजे पर नहीं थी।

पूरा घर जैसे किसी ने चारों तरफ से घेर लिया हो।

खिड़कियां हिलने लगीं।

छत पर कदमों की आवाज आने लगी।

प्रधान ने भगवान की फोटो पकड़ ली।

मैंने हिम्मत करके दरवाजा खोला।

और जो मैंने देखा…

आज तक भूल नहीं पाया।

पूरा गांव सड़क पर खड़ा था।

लेकिन सबकी आंखें बंद थीं।

जैसे वो सो रहे हों।

और हर आदमी के हाथ में नींबू-मिर्च थी।

धीरे-धीरे सबने एक साथ सिर उठाया।

उनकी आंखें सफेद थीं।

और सब एक साथ बोले—

“वो भूखी है…”

मेरी सांस रुक गई।

तभी भीड़ के पीछे से वही औरत बाहर आई।

सावित्री।

उसके शरीर से जली हुई चमड़ी लटक रही थी।

वो मुस्कुरा रही थी।

उसके कटे हुए मुंह से खून टपक रहा था।

फिर उसने मेरी तरफ उंगली उठाई।

और बोली—

“अब तेरी बारी है…”

मैंने तुरंत दरवाजा बंद किया।

लेकिन बाहर जोर-जोर से धमाके होने लगे।

प्रधान चीख रहे थे।

उनकी बहू बेहोश हो चुकी थी।

अचानक पीछे वाले कमरे से बच्चे के रोने की आवाज आई।

प्रधान दौड़े।

मैं भी पीछे गया।

कमरे में उनका पांच साल का पोता खड़ा था।

उसके हाथ में नींबू-मिर्च थी।

और वो मुस्कुरा रहा था।

“दादी बुला रही है…”

प्रधान रो पड़े।

“नहीं बेटा… नहीं…”

तभी बच्चे ने अपना मुंह खोला।

और उसके अंदर से सैकड़ों मिर्चें गिरने लगीं।


मैं अब समझ चुका था।

ये कोई simple haunting नहीं थी।

पूरा गांव किसी श्राप में फंस चुका था।

अगली सुबह गांव खाली होने लगा।

लोग ट्रैक्टर, बस, जो मिला उसमें भागने लगे।

लेकिन शाम तक जो भी गांव छोड़कर गया था…

वो वापस मिला।

मरा हुआ।

हर लाश के मुंह में वही नींबू-मिर्च।


मैंने तय किया कि इस curse को खत्म करना होगा।

रामचरन बाबा ने कहा—

“जिस जगह सावित्री को जलाया गया था… वहां उसकी हड्डियां अब भी दबी हैं।”

“तो क्या करना होगा?”

“उन्हें सम्मान से जलाना होगा… वरना कोई नहीं बचेगा।”

उस रात मैं, प्रधान और बाबा कुएं के पास पहुंचे।

चारों तरफ घना अंधेरा था।

हवा में सड़े मांस जैसी बदबू थी।

हमने खुदाई शुरू की।

कुछ देर बाद फावड़ा किसी चीज से टकराया।

हड्डियां।

काली… जली हुई।

तभी पीछे से आवाज आई—

“मत छुओ उन्हें…”

हमने पलटकर देखा।

सावित्री खड़ी थी।

लेकिन इस बार वो अकेली नहीं थी।

उसके पीछे पूरे गांव की लाशें खड़ी थीं।

उन सबके मुंह में नींबू-मिर्च भरी थी।

प्रधान डर से जमीन पर गिर पड़े।

रामचरन बाबा मंत्र पढ़ने लगे।

मैंने कांपते हाथों से मिट्टी का तेल डाला।

और हड्डियों में आग लगा दी।

सावित्री अचानक चीखने लगी।

इतनी भयानक चीख… कि मेरे कानों से खून निकलने लगा।

पूरा कुआं हिलने लगा।

हवा तूफान जैसी चलने लगी।

गांव वाले एक-एक करके जमीन पर गिरने लगे।

फिर अचानक…

सब शांत हो गया।

सावित्री गायब थी।


अगली सुबह पहली बार गांव में शांति थी।

कोई खटखटाहट नहीं।

कोई रोने की आवाज नहीं।

लोगों ने राहत की सांस ली।

मैंने अपनी पूरी रिपोर्ट लिखी।

सोचा मामला खत्म हो गया।

लेकिन असली डर अभी बाकी था।

मैं शहर लौट आया।

करीब दो हफ्ते बाद…

एक रात मेरे फ्लैट के बाहर अचानक वही आवाज आई।

ठक… ठक… ठक…

मेरा खून जम गया।

मैंने धीरे से दरवाजा खोला।

बाहर कोई नहीं था।

सिर्फ एक छोटा-सा packet पड़ा था।

मैंने कांपते हाथों से उसे खोला।

अंदर एक नींबू था।

जिसमें सात हरी मिर्चें बंधी थीं।

और एक कागज।

उस पर लिखा था—

“गांव तो बच गया… लेकिन जिसने कहानी बाहर निकाली, अब वो बचेगा नहीं।”

मेरे हाथ कांपने लगे।

तभी पीछे kitchen से किसी औरत के हंसने की आवाज आई।

धीमी…

टूटी हुई…

और बेहद पास।

मैंने धीरे-धीरे पीछे मुड़कर देखा।

फ्रिज के ऊपर…

सावित्री बैठी थी।

उसका फटा हुआ मुंह मुस्कुरा रहा था।

और इस बार…

उसकी सफेद आंखें सीधे मेरी आंखों में देख रही थीं।

उसने धीरे से कहा—

“अब तू कहीं नहीं भागेगा…”

उस रात के बाद मैंने कभी वो कहानी publish नहीं की।

क्योंकि आज भी…

हर मंगलवार रात…

मेरे दरवाजे पर वही खटखटाहट होती है।

और सुबह दरवाजे के बाहर हमेशा एक ताज़ा नींबू-मिर्च पड़ी मिलती है।

अगर तुम्हें कभी सड़क पर बिना वजह पड़ा नींबू-मिर्च दिखे…

तो उसे कभी मत छूना।

क्योंकि कुछ चीजें अंधविश्वास नहीं होतीं।

कुछ चीजें… इंतजार कर रही होती हैं।

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