WRITER – Raj Malhotra
बारिश उस रात ऐसे गिर रही थी जैसे आसमान किसी पुरानी चीज़ को धोकर मिटा देना चाहता हो।
सड़क पर दूर-दूर तक कोई नहीं था।
और उस बंद पड़े पावर हाउस की टूटी खिड़कियों में… हर बिजली की चमक के साथ कोई खड़ा दिखाई दे रहा था।
मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र की सीमा के पास जंगलों के बीच एक पुराना थर्मल पावर स्टेशन था — “शक्ति विद्युत केंद्र”।
अब वो सिर्फ एक खंडहर था।

सरकारी रिकॉर्ड में उसे “Unsafe Industrial Structure” घोषित किया जा चुका था, लेकिन आसपास के गांव वाले उसे सिर्फ एक नाम से जानते थे—
“मरने वाली जगह।”
Purana Power House Ki Sachchi Kahani करीब पंद्रह साल पहले वहाँ एक हादसा हुआ था।
रात की शिफ्ट में काम कर रहे सात लोग बॉयलर ब्लास्ट में जिंदा जल गए थे।
सरकारी रिपोर्ट ने उसे मशीन फेलियर कहा।
लेकिन गांव वाले आज भी कहते थे कि उस रात मशीनें बंद नहीं हुई थीं… उन्हें किसी ने बंद होने ही नहीं दिया।
दिसंबर की ठंडी शाम थी।
राघव अपनी पुरानी बोलेरो चलाते हुए हाईवे पार कर रहा था।
उसका काम था पुराने इंडस्ट्रियल इलाकों की electrical survey report बनाना। कंपनी ने उसे उसी बंद पड़े पावर हाउस का निरीक्षण करने भेजा था।
उसने कई बार मना किया था।
लेकिन पैसा अच्छा था।
और सच कहें तो… उसे पैसों की बहुत जरूरत थी।
पीछे सीट पर फाइलें पड़ी थीं।
मोबाइल नेटवर्क लगभग गायब था।
बारिश लगातार तेज हो रही थी।
तभी सड़क किनारे एक बूढ़ा आदमी हाथ देकर उसे रोकने लगा।
राघव ने गाड़ी रोकी।
बूढ़ा पूरी तरह भीगा हुआ था। हाथ में पुरानी लालटेन थी।
“कहाँ जा रहे हो बेटा?”
“शक्ति पावर हाउस।”
बूढ़े का चेहरा कुछ सेकंड के लिए बिल्कुल खाली हो गया।
फिर उसने धीरे से पूछा—
“रात में?”
“काम है।”
बूढ़ा खामोश रहा।
फिर उसने लालटेन ऊपर उठाई।
“अगर अंदर जाओ… तो सीटी की आवाज़ सुनकर पीछे मत मुड़ना।”
राघव हल्का सा हँस पड़ा।
“कोई prank है क्या?”
लेकिन बूढ़े ने कोई जवाब नहीं दिया।
बस बारिश में धीरे-धीरे पीछे हट गया।
राघव ने शीशा ऊपर किया और गाड़ी आगे बढ़ा दी।
कुछ सेकंड बाद उसने रियर व्यू मिरर में देखा—
वहाँ कोई नहीं था।
रात करीब साढ़े नौ बजे वो पावर हाउस पहुँचा।
मुख्य गेट आधा टूटा हुआ था।
लोहे की चादर हवा में टकराकर “ठक… ठक…” की आवाज़ कर रही थी।
अंदर पूरा परिसर अंधेरे में डूबा था।
Purana Power House Ki Sachchi Kahani
सिर्फ दूर कहीं लाल emergency light टिमटिमा रही थी।
“ये चालू कैसे है?” राघव खुद से बुदबुदाया।
उसने गाड़ी अंदर पार्क की।
जैसे ही बाहर निकला, एक अजीब गंध आई।
गीले लोहे… जले हुए तार… और किसी पुरानी चीज़ के सड़ने की।
बारिश की बूंदें टूटी पाइपों से गिर रही थीं।
हर तरफ जंग।
हर तरफ सन्नाटा।
लेकिन उस सन्नाटे के नीचे… कुछ चल रहा था।
जैसे बहुत दूर कोई भारी मशीन धीरे-धीरे घूम रही हो।
“घ्रररररर…”
राघव रुक गया।
उसने टॉर्च ऑन की।
आवाज़ तुरंत बंद हो गई।
मुख्य कंट्रोल रूम पहली मंजिल पर था।
सीढ़ियाँ पानी से भरी थीं।
दीवारों पर पुराने warning signs लगे थे।
“DANGER – HIGH VOLTAGE”
“AUTHORIZED STAFF ONLY”
एक जगह दीवार पर काले धुएँ के निशान थे… जैसे किसी इंसान को वहीं जलाया गया हो।
राघव ने नज़रें हटा लीं।
अंदर पहुँचकर उसने फाइल निकाली और नोट्स बनाने लगा।
कई मशीनें पूरी तरह जंग खा चुकी थीं।
लेकिन सबसे अजीब चीज़ थी—
कंट्रोल पैनल पर blinking green light।
“Impossible…”
उसने पास जाकर देखा।
स्क्रीन बंद थी।
फिर भी indicator blink कर रहा था।
टिक…
टिक…
टिक…
उसने हाथ बढ़ाकर स्विच छुआ।
और उसी पल—
पूरा कंट्रोल रूम अचानक चालू हो गया।
“भ्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र!”
पंखे घूमने लगे।
पुराने मॉनिटर जल उठे।
लाल warning lights चमकने लगीं।
राघव डरकर पीछे हट गया।
“ये क्या—”
फिर स्पीकर से आवाज़ आई।
पहले सिर्फ static।
फिर किसी आदमी की टूटी हुई चीख।
“वाल्व बंद करो!!!”
“प्रेशर बढ़ रहा है!!”
“दरवाजा खोलो—”
अचानक एक भयानक धमाका।
और फिर सन्नाटा।
राघव का गला सूख गया।
उसने जल्दी से main switch बंद करने की कोशिश की।
लेकिन सारे बटन पिघले हुए थे।
तभी पीछे से किसी के चलने की आवाज़ आई।
छप…
छप…
छप…
जैसे कोई गीले जूते पहनकर धीरे-धीरे उसकी तरफ आ रहा हो।
राघव ने पलटकर टॉर्च मारी।
कोई नहीं था।
लेकिन फर्श पर पानी में ताज़ा पैरों के निशान बने हुए थे।
और वो निशान… उसी की तरफ आ रहे थे।
उसकी सांसें तेज हो गईं।
“कौन है?”
कोई जवाब नहीं।
फिर वही आवाज़।
छप…
छप…
इस बार बिल्कुल पास।
राघव पीछे हटने लगा।
तभी टॉर्च की रोशनी सामने लगे काँच पर पड़ी।
और उसने देखा—
उसके पीछे कोई खड़ा था।
जला हुआ चेहरा।
आधी चमड़ी पिघली हुई।
आँखें पूरी सफेद।
राघव झटके से पलटा।
लेकिन वहाँ कुछ नहीं था।
उसका दिल इतनी तेजी से धड़क रहा था कि उसे खुद अपनी heartbeat सुनाई दे रही थी।
अचानक पूरे बिल्डिंग में एक लंबी सीटी गूंजी।
“फीईईईईईईईईईई…”
राघव जम गया।
उसे बूढ़े आदमी की बात याद आई।
“सीटी की आवाज़ सुनकर पीछे मत मुड़ना…”
सीटी फिर आई।
इस बार और करीब।
और उसके साथ… किसी के दौड़ने की आवाज़।
धप!
धप!
धप!
राघव भागने लगा।
सीढ़ियाँ उतरते हुए उसका पैर फिसला।
वो जोर से गिरा।
घुटना छिल गया।
पीछे से आवाज़ आ रही थी—
जैसे कई लोग एक साथ दौड़ रहे हों।
और उनके गले जले हुए हों।
“बचा लो…”
“दरवाजा खोलो…”
“गर्मी… बहुत गर्मी…”
राघव दर्द से उठकर भागा।
नीचे corridor में अंधेरा था।
सिर्फ emergency light की लाल चमक।
उस लाल रोशनी में दीवारों पर अजीब निशान दिख रहे थे।
किसी ने नाखूनों से दीवारें खुरची थीं।
कुछ जगह खून जैसे भूरे दाग थे।
फिर उसने देखा—
दीवार पर कोयले से लिखा था:
“उन्होंने हमें अंदर बंद कर दिया था।”
राघव रुक गया।
“किसने?”
तभी उसके पीछे किसी ने बहुत धीरे से कहा—
“तुम्हारे पिताजी ने।”
उसका पूरा शरीर सुन्न पड़ गया।
वो धीरे-धीरे पलटा।
इस बार वहाँ सच में कोई खड़ा था।
पुरानी worker uniform।
जला हुआ चेहरा।
लेकिन आँखें… इंसानी थीं।
और उनमें सिर्फ दर्द था।
राघव के पिता उसी पावर स्टेशन में chief engineer थे।
लेकिन उन्होंने कभी हादसे के बारे में खुलकर बात नहीं की।
बस इतना कहते थे—
“Industrial accidents होते रहते हैं।”
तीन साल पहले उनकी मौत हो चुकी थी।
राघव ने कांपते हुए पूछा—
“तुम… कौन हो?”
वो आदमी धीरे से मुस्कुराया।
उसकी जली हुई त्वचा फटने लगी।
“हम सात लोग थे।”
“Boiler leak पहले ही शुरू हो चुका था।”
“लेकिन production बंद करने से करोड़ों का नुकसान होता…”
“तुम्हारे पिता ने emergency लॉक लगा दिया।”
राघव की आँखें फैल गईं।
“झूठ…”
“उन्होंने हमें बाहर नहीं निकलने दिया।”
पीछे अचानक बाकी छह परछाइयाँ दिखाई देने लगीं।
सभी जले हुए।
सभी आधे पिघले हुए।
लेकिन उनकी आँखों में गुस्से से ज्यादा दर्द था।
एक महिला की आवाज़ आई—
“हम मरना नहीं चाहते थे…”
अचानक पूरा corridor गर्म होने लगा।
लोहे की दीवारें तपने लगीं।
राघव की सांस घुटने लगी।
उसे लगा जैसे पूरा पावर हाउस फिर से उसी रात में बदल रहा हो।
सायरन बजने लगे।
“WARNING! CORE PRESSURE CRITICAL!”
भाप हर तरफ फैलने लगी।
और उन सातों की चीखें एक साथ गूंजने लगीं।
“दरवाजा खोलो!!!”
राघव कान बंद करके चिल्लाया—
“मैंने कुछ नहीं किया!”
तभी एक जली हुई औरत उसके बिल्कुल पास आ गई।
उसके चेहरे की चमड़ी टपक रही थी।
उसने फुसफुसाकर कहा—
“लेकिन तुम उसी खून से हो…”
राघव भागते-भागते turbine hall तक पहुँच गया।
वो जगह विशाल थी।
ऊपर टूटे शीशों से बारिश अंदर गिर रही थी।
बीच में पुरानी टरबाइन अंधेरे में खड़ी थी।
लेकिन सबसे डरावनी चीज़ थी—
टरबाइन चल रही थी।
धीरे-धीरे।
“घ्रररररर…”
इतने साल बाद भी।
राघव पीछे हटने लगा।
तभी ऊपर catwalk पर किसी की परछाई दिखी।
सूट पहने एक आदमी।
Chief engineer helmet।
उसके पिता।
राघव की सांस रुक गई।
“पापा…?”
परछाई धीरे-धीरे नीचे देखने लगी।
फिर उसने खुद अपना चेहरा नोचना शुरू किया।
और नीचे से जला हुआ मांस दिखाई देने लगा।
“मैंने उन्हें मारा…”
आवाज़ बिल्कुल उसके पिता की थी।
“उन्होंने मुझे भी बाहर नहीं निकलने दिया…”
राघव समझ नहीं पाया।
“क्या मतलब?”
परछाई हँसी।
धीमी… टूटी हुई हँसी।
“जिस रात blast हुआ… लॉक बाहर से नहीं लगा था।”
“अंदर से लगाया गया था।”
राघव के पैरों तले जमीन खिसक गई।
“नहीं…”
“तुम्हारे पिता ने सबको बंद किया।”
“और जब pressure बढ़ा…”
“उन्हें खुद बाहर निकलने का समय नहीं मिला।”
अचानक पूरी turbine hall में जलने की बदबू भर गई।
राघव की आँखों में पानी आने लगा।
ऊपर खड़ी परछाई अचानक जलने लगी।
आग उसके पूरे शरीर में फैल गई।
और वो चीखने लगा।
“मुझे बाहर निकालो!!!”
“राघव!!!”
“दरवाजा खोलो!!!”
आवाज़ इतनी असली थी कि राघव टूट गया।
वो रोते हुए चिल्लाया—
“मैं क्या करूँ?!”
तभी पीछे से सातों आवाजें एक साथ आईं—
“सच बाहर ले जाओ…”
अचानक सब शांत हो गया।
मशीनें बंद।
सायरन बंद।
सिर्फ बारिश की आवाज़।
राघव काँपता हुआ जमीन पर बैठ गया।
सुबह होने लगी थी।
उसने किसी तरह बाहर निकलकर गाड़ी स्टार्ट की।
जाते समय उसने आखिरी बार पीछे देखा।
ऊपर कंट्रोल रूम की टूटी खिड़की में सात लोग खड़े थे।
और उनके बीच…
उसके पिता।
तीन महीने बाद।
राष्ट्रीय अखबारों में एक पुरानी खबर वायरल हुई।
“शक्ति पावर स्टेशन हादसा — Internal Documents Reveal Deliberate Negligence.”
कई पुराने अधिकारी गिरफ्तार हुए।
राघव ने सारे रिकॉर्ड मीडिया को दे दिए थे।
लेकिन उसके बाद वो पूरी तरह बदल गया।
उसने नौकरी छोड़ दी।
लोग कहते थे कि वो ठीक नहीं रहा।
क्योंकि हर रात ठीक 2:17 बजे…
उसे सीटी की आवाज़ सुनाई देती थी।
“फीईईईईईईई…”
और उसके कमरे की दीवारों पर पानी में जले हुए पैरों के निशान दिखाई देते थे।
एक साल बाद…
उस पावर हाउस को पूरी तरह तोड़ने का फैसला हुआ।
Demolition team अंदर गई।
करीब बीस लोग थे।
सुबह सब सामान्य था।
लेकिन शाम तक किसी का संपर्क नहीं हुआ।
जब पुलिस अंदर पहुँची…
पूरा परिसर खाली था।
सिर्फ control room चालू था।
Green indicator blink कर रहा था।
टिक…
टिक…
टिक…
और स्पीकर से एक रिकॉर्डिंग बार-बार चल रही थी—
“दरवाजा खोलो…”
“बहुत गर्मी है…”
“हमें बाहर निकलने दो…”
लेकिन सबसे डरावनी बात रिकॉर्डिंग नहीं थी।
बल्कि वो नई CCTV footage थी…
जिसमें demolition workers खुद दरवाजा अंदर से बंद करते दिखाई दे रहे थे।
और बंद करने के बाद…
सभी लोग एक साथ कैमरे की तरफ मुड़े।
उनके चेहरे पूरी तरह जले हुए थे।
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