दिल्ली के जामिया नगर में मौजूद उस पुरानी बिल्डिंग की चौथी मंज़िल पर पिछले छह महीनों में तीन लोग पागल हो चुके थे।
चौथे आदमी की लाश पानी की खाली टंकी में मिली थी… और उसके चेहरे पर ऐसा डर था जैसे मरने से पहले उसने कुछ ऐसा देख लिया हो, जिसे इंसानी दिमाग़ समझ ही नहीं सकता।
सबसे अजीब बात ये थी कि हर मौत से पहले एक ही चीज़ कॉमन थी — “नींद।”

अक्टूबर की उमस भरी शाम थी। हवा में अजीब-सी चिपचिपाहट थी। सड़क के किनारे गीले पत्ते चिपके पड़े थे और ऊपर आसमान में बादल ऐसे जमा थे जैसे बारिश बस फटने वाली हो।
सैफ ने ऑटो से उतरकर बिल्डिंग की तरफ देखा।
Scary Jinn Story पुरानी, जर्जर चार मंज़िला बिल्डिंग। दीवारों पर काले पानी के निशान। लोहे की बालकनियों पर जंग। नीचे पान की दुकान से आती बीड़ी और सिगरेट की मिली-जुली बदबू।
“भाई, यहीं रहना है?” ऑटो वाला बोला।
“हाँ।”
ऑटो वाला कुछ सेकंड तक बिल्डिंग को देखता रहा।
“रात में छत पर मत जाना।”
सैफ हल्का हँसा। “क्यों?”
ऑटो वाला बिना जवाब दिए चला गया।
उस वक्त सैफ को ये बस एक अजीब संयोग लगा।
लेकिन तीन दिन बाद… वही बात उसके दिमाग़ में हथौड़े की तरह बजने वाली थी।
सैफ पेशे से मेडिकल ट्रांसक्रिप्शनिस्ट था। रात की नौकरी। ज़्यादातर समय हेडफोन लगाकर विदेशी डॉक्टरों की रिकॉर्डिंग टाइप करता रहता।
उसे सस्ती जगह चाहिए थी और जामिया नगर में ये कमरा बाकी जगहों से आधे किराए पर मिल गया था।
बिल्डिंग का मालिक — यूसुफ़ अंकल — दुबला-पतला आदमी था। चेहरे पर थकान जमी रहती थी।
“बस एक बात याद रखना,” उसने चाबी देते हुए कहा, “अगर रात में कोई दरवाज़ा खटखटाए… तो मत खोलना।”
सैफ मुस्कराया। “क्यों? चोर हैं क्या?”
यूसुफ़ अंकल की आँखें कुछ पल के लिए खाली हो गईं।
“काश… सिर्फ़ चोर होते।”
कमरा छोटा था लेकिन ठीक-ठाक।
एक लोहे का पलंग।
पीली दीवारें।
छत का पुराना पंखा जो घूमते वक्त “टक…टक…टक…” की आवाज़ करता था।
खिड़की के बाहर दूसरी बिल्डिंग की दीवार थी, इसलिए कमरे में हमेशा हल्का अँधेरा बना रहता।
पहली रात सब नॉर्मल था।
दूसरी रात भी।
लेकिन तीसरी रात…
करीब 3:17 बजे सैफ की आँख खुली।
उसने महसूस किया कि उसका शरीर हिल नहीं रहा।
साँस चल रही थी… आँखें खुली थीं… लेकिन पूरा शरीर जैसे पत्थर बन चुका था।
स्लीप पैरालिसिस।
उसने इसके बारे में पढ़ रखा था।
लेकिन अगली चीज़ किताबों में नहीं लिखी थी।
कमरे के कोने में कोई खड़ा था।
लंबा।
Scary Jinn Story
असामान्य रूप से लंबा।
उसका सिर छत को छू रहा था।
चेहरा पूरी तरह अंधेरे में था… लेकिन उसकी आँखें दिखाई दे रही थीं।
पीली।
बिलकुल जानवर जैसी।
सैफ का गला सूख गया।
वो चीखना चाहता था… लेकिन आवाज़ नहीं निकल रही थी।
फिर वो चीज़ धीरे-धीरे उसके करीब आने लगी।
पैरों की आवाज़ नहीं।
बस कपड़े घिसटने जैसी फुसफुसाहट।
“स्स्स्स्स…”
सैफ की धड़कन इतनी तेज़ हो गई कि उसे लगा सीना फट जाएगा।
वो चीज़ उसके बिल्कुल पास आकर झुकी।
और तभी…
उसे एक बदबू महसूस हुई।
गीली मिट्टी… सड़ा हुआ मांस… और किसी पुराने कब्रिस्तान जैसी सीलन।
उसके कान के पास किसी ने फुसफुसाया—
“सो जाओ…”
अगले ही सेकंड उसका शरीर अचानक हिलने लगा।
वो जोर से उठ बैठा।
कमरा खाली था।
पंखा घूम रहा था।
लेकिन उसकी टी-शर्ट पसीने से पूरी भीग चुकी थी।
सुबह उसने खुद को समझाया कि ये सिर्फ़ स्लीप पैरालिसिस था।
दिमाग़ का खेल।
लेकिन उसी दिन नीचे पान वाले ने अचानक पूछा—
“भाई… रात में कुछ दिखा क्या?”
सैफ रुक गया।
“क्या मतलब?”
पान वाला धीरे बोला—
“ऊपर वाले कमरे में पहले जो लड़का रहता था… वो भी यही बोलता था। रात में कोई आता है।”
सैफ हँस पड़ा। “आप लोग ज़्यादा हॉरर फिल्में देखते हो।”
पान वाला मुस्कराया नहीं।
“उसकी लाश टंकी में मिली थी।”
उस रात सैफ ने जानबूझकर देर तक जागने का फैसला किया।
हेडफोन लगाए वो काम करता रहा।
करीब 2 बजे बारिश शुरू हो गई।
खिड़की पर पानी की बूंदें टकराने लगीं।
“ठक…ठक…ठक…”
कमरे में सिर्फ़ लैपटॉप की हल्की नीली रोशनी थी।
तभी…
दरवाज़े पर दस्तक हुई।
धीमी।
“ठक…”
सैफ ने स्क्रीन से नज़र हटाई।
फिर दूसरी दस्तक।
“ठक…ठक…”
उसका गला सूख गया।
यूसुफ़ अंकल की बात याद आई।
अगर रात में कोई दरवाज़ा खटखटाए… तो मत खोलना।
बाहर से धीमी आवाज़ आई—
“दरवाज़ा खोलो…”
आवाज़ औरत की थी।
कमज़ोर।
रोती हुई।
“प्लीज़… मदद करो…”
सैफ कुछ सेकंड तक जमे खड़ा रहा।
फिर धीरे-धीरे दरवाज़े के पास गया।
“कौन?”
कोई जवाब नहीं।
फिर वही आवाज़…
लेकिन इस बार बहुत करीब से।
“मुझे अंदर आने दो…”
सैफ ने नीचे देखा।
दरवाज़े के नीचे से किसी की परछाईं दिख रही थी।
लेकिन कुछ गड़बड़ थी।
परछाईं उल्टी दिशा में थी।
जैसे बाहर खड़ा इंसान सामान्य नहीं… बल्कि छत पर चिपका हो।
सैफ पीछे हट गया।
उसकी रीढ़ में बर्फ उतर गई।
फिर अचानक…
दरवाज़े पर जोर-जोर से थपथपाहट शुरू हुई।
धड़ाम!
धड़ाम!
धड़ाम!
पूरा दरवाज़ा काँपने लगा।
और उसी के साथ एक अजीब आवाज़…
जैसे कोई जानवर हँस रहा हो।
सैफ ने तुरंत कुरान शरीफ का ऐप मोबाइल में खोला और आयत चलानी शुरू की।
कुछ सेकंड बाद आवाज़ बंद हो गई।
पूरा कमरा फिर से शांत।
सिर्फ़ बारिश।
और सैफ की काँपती साँसें।
अगले दिन उसने बिल्डिंग छोड़ने का फैसला कर लिया।
लेकिन शाम को ऑफिस से लौटते वक्त उसे नीचे सीढ़ियों में एक बूढ़ी औरत मिली।
सफेद दुपट्टा।
धँसी हुई आँखें।
वो उसे देखते ही बोली—
“उसने तुझे देख लिया है।”
सैफ ठिठक गया।
“कौन?”
बूढ़ी औरत फुसफुसाई—
“स्वप्नपिशाच।”
“क्या?”
“जिन्न… जो सपनों में आता है। पहले डराता है। फिर नींद छीनता है। फिर इंसान को अपने साथ ले जाता है।”
सैफ चिढ़ गया। “ये सब बकवास है।”
बूढ़ी औरत ने उसकी आँखों में देखा।
“आज रात अगर कोई तेरा नाम लेकर बुलाए… जवाब मत देना।”
उस रात बिजली चली गई।
पूरा कमरा अंधेरे में डूब गया।
बाहर कहीं दूर कुत्ते रो रहे थे।
सैफ ने मोबाइल की टॉर्च ऑन की।
तभी…
उसे अपने पलंग के नीचे से आवाज़ सुनाई दी।
धीमी खरोंच।
“खररर…”
उसका दिल धड़क उठा।
आवाज़ फिर आई।
जैसे कोई लकड़ी पर नाखून घिस रहा हो।
“खररर…”
सैफ धीरे-धीरे नीचे झुका।
मोबाइल की रोशनी पलंग के नीचे डाली।
कुछ नहीं।
सिर्फ़ अंधेरा।
वो वापस सीधा होने ही वाला था कि अचानक—
किसी ने उसका हाथ पकड़ लिया।
बर्फ जैसा ठंडा।
सैफ चीख पड़ा और पीछे गिर गया।
मोबाइल दूर जा गिरा।
कमरा फिर अंधेरे में डूब गया।
और उसी अंधेरे में…
उसे किसी के रेंगने की आवाज़ सुनाई दी।
धीरे-धीरे।
उसकी तरफ।
“छप…छप…”
जैसे गीले हाथ ज़मीन पर घिसट रहे हों।
सैफ दीवार से चिपक गया।
उसकी साँसें टूट रही थीं।
फिर अचानक बिजली वापस आ गई।
कमरा खाली था।
लेकिन फर्श पर गीले हाथों के निशान बने हुए थे।
सीधे उसके पलंग तक।
अब उसे समझ आने लगा था कि कुछ सच में गलत है।
उसने इंटरनेट पर रिसर्च शुरू की।
मिडिल ईस्ट, अफ्रीका, इंडोनेशिया, तुर्की… हर जगह एक जैसी कहानियाँ थीं।
एक ऐसा जिन्न जो नींद के दौरान हमला करता है।
लोग उसे अलग-अलग नामों से बुलाते थे—
कराबासन।
ओल्ड हैग।
मारा।
लेकिन असल चीज़ एक ही थी।
एक ऐसी सत्ता जो इंसान के डर पर पलती थी।
और जितना ज्यादा इंसान डरता… वो उतनी ताकतवर होती जाती।
सैफ पूरी रात जागता रहा।
लेकिन सुबह करीब पाँच बजे उसकी आँख लग गई।
और तभी सपना शुरू हुआ।
वो खुद को उसी बिल्डिंग की छत पर खड़ा देख रहा था।
चारों तरफ धुंध थी।
हवा में अजीब-सी बदबू।
छत के बीचोंबीच पानी की टंकी रखी थी।
टंकी का ढक्कन धीरे-धीरे हिल रहा था।
“ठक…”
“ठक…”
“ठक…”
सैफ के पैर अपने आप उसकी तरफ बढ़ने लगे।
उसका शरीर उसके कंट्रोल में नहीं था।
जैसे कोई उसे खींच रहा हो।
वो टंकी के पास पहुँचा।
ढक्कन खुद-ब-खुद खुल गया।
अंदर काला पानी था।
और उस पानी में…
कई चेहरे तैर रहे थे।
सड़े हुए।
सूजी हुई आँखें।
खुले मुँह।
और उनमें से एक चेहरा अचानक आँखें खोलकर बोला—
“भाग…”
तभी पानी के अंदर से दो लंबे हाथ निकले और सैफ की गर्दन पकड़ ली।
वो चीखा—
और उसकी आँख खुल गई।
लेकिन इस बार कुछ अलग था।
उसकी गर्दन पर उँगलियों के निशान बने हुए थे।
नीले।
ताज़ा।
अगले दिन सैफ सीधा पुरानी दिल्ली में रहने वाले एक मौलवी के पास गया।
मौलवी ने सब सुनने के बाद काफी देर तक चुप्पी साधे रखी।
फिर पूछा—
“उसने तुझे सपने में पानी दिखाया?”
सैफ का चेहरा उतर गया।
“हाँ…”
मौलवी की आँखों में डर उतर आया।
“ये बहुत पुरानी चीज़ है।”
“क्या मतलब?”
“कुछ जिन्न इंसानों के डर से जुड़े होते हैं… लेकिन कुछ नींद से। ये इंसान को धीरे-धीरे सपनों में खींचते हैं।”
“क्यों?”
मौलवी धीमे बोले—
“क्योंकि सपनों में इंसान की रूह सबसे कमजोर होती है।”
कमरे में सन्नाटा छा गया।
फिर मौलवी ने पूछा—
“तू उस बिल्डिंग में जाने से पहले कहीं गया था? कोई पुरानी जगह? कब्रिस्तान? खंडहर?”
सैफ अचानक चुप हो गया।
उसे याद आया।
तीन हफ्ते पहले वो अपने दोस्तों के साथ राजस्थान के एक वीरान किले में गया था।
वहाँ एक बंद तहखाना था।
उसके दोस्तों ने मज़ाक में दरवाज़ा खोल दिया था।
अंदर अजीब बदबू थी।
दीवारों पर अरबी जैसी लिखावट।
और कोने में जली हुई हड्डियाँ।
उस रात लौटते वक्त पहली बार उसे वही सपना आया था।
मौलवी ने तुरंत कहा—
“तू उसे अपने साथ लाया है।”
सैफ का खून जम गया।
“अब क्या करूँ?”
मौलवी ने एक कागज़ पर कुछ आयतें लिखीं।
“आज रात अगर वो आए… तो उसकी आँखों में मत देखना।”
उस रात हवा बिल्कुल बंद थी।
कमरा दम घोंटने जैसा लग रहा था।
घड़ी में 3:03 बजे थे।
और तभी…
पंखा खुद-ब-खुद रुक गया।
कमरे का तापमान अचानक गिर गया।
सैफ ने महसूस किया कि कोई उसके पीछे खड़ा है।
उसने धीरे-धीरे पलटकर देखा।
वो वहीं था।
इस बार पहले से ज्यादा साफ।
लंबा।
काला।
उसकी त्वचा जली हुई लकड़ी जैसी थी।
चेहरे पर इंसान जैसी कोई चीज़ नहीं थी।
सिर्फ़ दो पीली आँखें।
और होंठों की जगह लंबी दरार।
उस दरार से आवाज़ निकली—
“तूने मुझे जगाया…”
सैफ काँपते हुए पीछे हटने लगा।
जिन्न धीरे-धीरे आगे बढ़ा।
कमरे की दीवारों पर अजीब परछाइयाँ बनने लगीं।
जैसे दर्जनों लोग रेंग रहे हों।
फिर अचानक सैफ को महसूस हुआ कि उसका शरीर फिर जाम हो रहा है।
स्लीप पैरालिसिस।
लेकिन वो जाग रहा था।
जिन्न उसके बिल्कुल पास आ गया।
उसकी बदबू इतनी भयानक थी कि सैफ का जी मिचलाने लगा।
फिर उसने फुसफुसाया—
“अब तेरी बारी है…”
तभी…
सैफ को मौलवी की बात याद आई।
उसने आँखें बंद कर लीं और आयत पढ़ने लगा।
कमरे में अचानक चीख गूँज उठी।
इतनी तेज़ कि खिड़की का शीशा टूट गया।
हवा का भयानक झोंका आया।
और फिर…
सब शांत।
सुबह हुई।
सूरज निकला।
सैफ ने राहत की साँस ली।
उसे लगा सब खत्म हो गया।
उसने सामान पैक किया और बिल्डिंग छोड़ने लगा।
नीचे जाते वक्त यूसुफ़ अंकल उसे घूर रहे थे।
“जा रहे हो?”
“हाँ।”
यूसुफ़ अंकल कुछ सेकंड चुप रहे।
फिर बोले—
“अच्छा है।”
सैफ बाहर निकल गया।
बारिश के बाद सड़क गीली थी।
लोग अपनी-अपनी जिंदगी में व्यस्त थे।
सब नॉर्मल लग रहा था।
बहुत नॉर्मल।
तीन महीने बाद।
नोएडा।
नई नौकरी।
नई बिल्डिंग।
नई जिंदगी।
सैफ ने धीरे-धीरे सब भूलना शुरू कर दिया।
उसे लगने लगा शायद वो सब ट्रॉमा था।
दिमाग़ का खेल।
फिर एक रात…
करीब 3:17 बजे उसकी आँख खुली।
कमरा अंधेरा था।
लेकिन इस बार उसे सबसे पहले एक आवाज़ सुनाई दी।
“टक…टक…टक…”
छत से।
सैफ धीरे-धीरे ऊपर देखने लगा।
और उसका दिल रुक गया।
कोई चीज़ छत पर उल्टी चिपकी हुई थी।
दो पीली आँखें।
फटी हुई मुस्कान।
और फिर…
वो चीज़ इंसानी आवाज़ में बोली—
“तू समझा… मैं वहीं रह गया?”
सैफ चीख पड़ा।
लेकिन असली डर अभी बाकी था।
क्योंकि उसी पल उसके मोबाइल पर नोटिफिकेशन आया।
एक अनजान नंबर से फोटो।
उसने काँपते हाथों से फोटो खोली।
उस फोटो में वो खुद सो रहा था।
अभी।
इसी कमरे में।
और फोटो लेने वाला…
उसके बिस्तर के बिल्कुल पास खड़ा था।
अगली सुबह पुलिस को सैफ का कमरा अंदर से बंद मिला।
वो जिंदा था।
लेकिन उसकी हालत पागलों जैसी हो चुकी थी।
वो लगातार एक ही बात दोहरा रहा था—
“सोना मत…”
“वो सपनों में इंतज़ार करता है…”
“सोना मत…”
पुलिस रिपोर्ट में लिखा गया कि मानसिक आघात की वजह से उसकी हालत बिगड़ गई।
लेकिन केस फाइल में एक चीज़ कभी दर्ज नहीं हुई।
कमरे की छत पर मिले वो गीले हाथों के निशान…
जो इंसान के नहीं थे।
आज भी जामिया नगर की उस पुरानी बिल्डिंग में चौथी मंज़िल वाला कमरा बंद पड़ा है।
लोग कहते हैं रात के बाद वहाँ से कभी-कभी खरोंचने की आवाज़ आती है।
और अगर कोई देर रात उस दरवाज़े के पास खड़ा हो…
तो अंदर से बहुत धीमी फुसफुसाहट सुनाई देती है—
“सो जाओ…”
लेकिन सबसे डरावनी बात कुछ और है।
पिछले साल वहाँ रहने आए एक नए लड़के ने मरने से पहले अपने दोस्त को सिर्फ़ एक मैसेज भेजा था।
उस मैसेज में सिर्फ़ तीन शब्द थे—
“वो जाग गया।”
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