Maine Apni Hi Laash Dekhi | Hamzad True Story

दिल्ली की सर्दियों में धुंध सिर्फ सड़कों को नहीं ढकती…
कभी-कभी वो उन चीज़ों को भी छुपा लेती है जिन्हें इंसान देखना नहीं चाहता।

और कुछ साये…
सिर्फ पीछे नहीं चलते।
वो इंतज़ार करते हैं… सही वक्त का।


नोएडा सेक्टर 137 की उस पुरानी सोसाइटी के बारे में लोग ज्यादा बात नहीं करते थे। बाहर से देखने पर सब कुछ बिल्कुल normal लगता था — ऊँची बिल्डिंग्स, सिक्योरिटी गार्ड, बच्चों का पार्क, शाम को घूमते लोग।

लेकिन टावर C की आठवीं मंज़िल…

Hamzad True Story

वहाँ रहने वाले लोग ज़्यादा दिन नहीं टिकते थे।

Hamzad True Story किसी को आवाज़ें सुनाई देती थीं।
किसी को रात में अपने ही घर में किसी और के चलने की आहट।
और कुछ लोग… अचानक घर छोड़कर चले जाते थे, बिना किसी explanation के।

लेकिन असली वजह किसी को नहीं पता थी।

क्योंकि जो जानते थे… वो या तो पागल हो चुके थे…
या गायब।


जनवरी की एक ठंडी शाम थी।

अभिषेक टैक्सी से उतरकर सोसाइटी के गेट पर खड़ा था। हाथ में छोटा सा बैग, आँखों के नीचे हल्की थकान और चेहरे पर वो अजीब खालीपन जो लंबे अकेलेपन के बाद आ जाता है।

उसकी नई नौकरी गुरुग्राम में लगी थी। कंपनी ने temporary रहने का इंतज़ाम नहीं किया था। Budget कम था, इसलिए उसने जल्दी में ये फ्लैट ले लिया।

फ्लैट नंबर 808।

Broker ने चाबी देते वक्त बस इतना कहा था—

“Sir, previous tenant thoda weird tha… लेकिन tension की बात नहीं है।”

“क्या मतलब weird?”

Broker हँस पड़ा।

“बस… अकेले रहते-रहते लोग थोड़ा mentally disturb हो जाते हैं।”

उस वक्त अभिषेक ने बात को seriously नहीं लिया।

गलती वहीं हुई।


फ्लैट अंदर से surprisingly साफ था।

Drawing room बड़ा था। एक कोने में पुरानी लकड़ी की rocking chair रखी थी। दीवारों पर हल्की नमी थी। Balcony से पूरा expressway दिखता था जहाँ गाड़ियों की लाल-पीली lights धुंध में तैरती हुई लग रही थीं।

घर में घुसते ही उसे एक अजीब smell महसूस हुई।

गीली मिट्टी… और कुछ जला हुआ।

जैसे पुराने कपड़े आग में जले हों।

Hamzad True Story

उसने सोचा शायद बंद घर की smell होगी।

रात तक उसने थोड़ा सामान सेट किया, खाना order किया और Netflix चलाकर बैठ गया।

करीब 11 बजे अचानक इंटरनेट चला गया।

TV screen black।

पूरा घर एकदम शांत।

फिर…

टक…

टक…

टक…

किसी के लकड़ी पर धीरे-धीरे चलने की आवाज़।

उसने तुरंत TV mute किया।

आवाज़ फिर आई।

टक…

टक…

टक…

जैसे कोई नंगे पैर corridor में चल रहा हो।

अभिषेक बाहर निकला।

पूरा floor खाली था।

सिर्फ दूर लगी emergency light blink कर रही थी।

उसने वापस आकर दरवाज़ा बंद किया।

लेकिन उस रात उसे पहली बार महसूस हुआ…

घर में वो अकेला नहीं है।


अगले कुछ दिन normal रहे।

Office, traffic, exhaustion।

लेकिन धीरे-धीरे छोटी चीज़ें शुरू हुईं।

Bathroom का tap अपने आप खुल जाना।

Kitchen में रखे बर्तन सुबह दूसरी जगह मिलना।

और सबसे अजीब…

Rocking chair।

हर सुबह उसका angle बदला होता था।

पहले उसने सोचा शायद खुद move हुई होगी।

फिर एक रात उसने chair के नीचे tape से निशान लगा दिया।

सुबह chair दो फीट आगे थी।

निशान वहीं।

उसके हाथ ठंडे पड़ गए।


उस रात उसने पहली बार वो सपना देखा।

वो अपने ही फ्लैट में खड़ा था।
पूरा घर अंधेरे में डूबा हुआ।

सिर्फ balcony से हल्की सफेद रोशनी आ रही थी।

और balcony में…

कोई खड़ा था।

पीठ उसकी तरफ।

बिल्कुल उसकी ही height।
उसके जैसे बाल।
उसके जैसे कपड़े।

अभिषेक धीरे-धीरे आगे बढ़ा।

“कौन है?”

वो आदमी धीरे से मुड़ा।

और अभिषेक की साँस रुक गई।

वो… खुद था।

लेकिन उसकी आँखें पूरी काली थीं।

चेहरे पर एक अजीब मुस्कान।

फिर उसने फुसफुसाकर कहा—

“मैं पहले से यहाँ रहता हूँ…”

अभिषेक चीखते हुए उठा।

पूरा शरीर पसीने में भीगा हुआ।

Clock में 3:03 AM।

और rocking chair…

धीरे-धीरे खुद हिल रही थी।

चीं…

चीं…

चीं…


उसके बाद चीज़ें तेज़ी से बिगड़ने लगीं।

एक रात office से लौटते वक्त lift में उसे अपने पीछे किसी की साँस महसूस हुई।

उसने पीछे देखा।

कोई नहीं।

लेकिन lift के mirror में…

उसके पीछे कोई खड़ा था।

धुंधला सा चेहरा।

वो पलटकर पीछे मुड़ा—

खाली।

फिर mirror देखा।

वो आकृति अभी भी वहीं थी।

इस बार मुस्कुरा रही थी।

Lift अचानक झटके से रुक गई।

Lights blink करने लगीं।

और उसी moment उसे अपने कान के बिल्कुल पास एक आवाज़ सुनाई दी—

“तू बहुत देर से आया…”


अगले दिन उसने सोसाइटी के पुराने guard से बात की।

बूढ़ा आदमी कुछ देर चुप रहा।

फिर बोला—

“808 अच्छा घर नहीं है।”

“क्यों?”

Guard ने आसपास देखा, फिर धीरे से बोला—

“दस साल पहले वहाँ एक आदमी रहता था। नाम था करण मल्होत्रा।”

“क्या हुआ था उसे?”

“लोग कहते हैं वो अपने हमज़ाद को देखता था।”

अभिषेक चुप हो गया।

“हमज़ाद?”

Guard ने बीड़ी जलाई।

“हर इंसान का एक साया होता है… जो उसके साथ पैदा होता है। लेकिन कुछ साये… इंसान नहीं होते।”

ठंडी हवा चली।

Guard की आवाज़ और धीमी हो गई।

“करण बोलता था रात में उसका दूसरा रूप घर में घूमता है। पहले उसने मज़ाक समझा। फिर mirrors ढकने लगा। Cameras लगाए।”

“फिर?”

“एक दिन अचानक गायब।”

“Body मिली?”

Guard ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा—

“Body घर के अंदर थी… लेकिन चेहरा उसका नहीं था।”


उस रात अभिषेक सो नहीं पाया।

उसने internet पर “Hamzaad” search किया।

पुराने सूफी texts, Middle Eastern folklore, Persian occult references…

हर जगह एक जैसी बातें लिखी थीं।

हमज़ाद इंसान की spiritual duplicate entity होती है।

कुछ लोग उसे invisible companion मानते हैं।

लेकिन कई cultures में…

उसे dangerous माना गया है।

क्योंकि अगर हमज़ाद इंसान पर हावी हो जाए…

तो वो उसकी identity ले सकता है।

धीरे-धीरे।

उसकी आदतें।
उसकी आवाज़।
उसका चेहरा।

और फिर…

उसकी जगह।


उस रात 2:47 AM पर उसे kitchen से आवाज़ आई।

किसी के बर्तन रखने की।

वो डरते हुए बाहर निकला।

Kitchen खाली था।

लेकिन sink के ऊपर लगे mirror पर उँगलियों से लिखा था—

“मुझे याद है तू।”

उसके पैरों तले जमीन खिसक गई।

उसने trembling hands से mirror साफ किया।

और तभी पीछे से आवाज़ आई—

“मत मिटा…”

वो घूम गया।

Drawing room में कोई नहीं था।

लेकिन rocking chair अब उसकी तरफ facing थी।

धीरे-धीरे हिल रही थी।

चीं…

चीं…

चीं…


अगले दिन उसने फ्लैट छोड़ने का फैसला किया।

लेकिन जाने से पहले वो broker को फोन करने लगा।

Phone नहीं लगा।

उसने office जाना भी बंद कर दिया।

पूरे घर में एक अजीब heaviness थी।

जैसे हवा thick हो गई हो।

उस रात उसने suitcases पैक किए।

सुबह निकल जाएगा।

करीब 1 बजे doorbell बजी।

उसका दिल जोर से धड़का।

इतनी रात को कौन?

उसने peephole से देखा।

कोई नहीं।

लेकिन नीचे floor पर पानी जैसा कुछ फैला था।

गहरा काला।

धीरे-धीरे अंदर की तरफ आता हुआ।

उसने डरकर पीछे कदम लिया।

फिर…

डोर के दूसरी तरफ से उसकी अपनी आवाज़ आई—

“दरवाज़ा खोल…”

अभिषेक जम गया।

“मैं बाहर हूँ…”

उसकी साँस अटक गई।

क्योंकि वो आवाज़… बिल्कुल उसकी थी।

फिर धीरे से हँसी सुनाई दी।

बहुत हल्की।

बहुत ठंडी।


उस रात उसने पहली बार शराब पीकर खुद को सुलाने की कोशिश की।

लेकिन करीब 3 बजे उसकी आँख खुल गई।

पूरा घर अंधेरे में था।

सिर्फ bathroom की light जल रही थी।

और अंदर…

कोई खड़ा था।

उसकी silhouette दिखाई दे रही थी।

अभिषेक frozen खड़ा रहा।

फिर bathroom का mirror crack होने लगा।

टक…

टक…

टक…

जैसे अंदर से कोई मार रहा हो।

फिर वो आकृति धीरे-धीरे mirror के अंदर चली गई।

और mirror में अब सिर्फ अभिषेक खड़ा था।

लेकिन reflection…

उसकी movements copy नहीं कर रहा था।

Reflection मुस्कुरा रहा था।

जबकि अभिषेक नहीं।


अब उसे समझ आ गया था।

ये hallucination नहीं था।

कुछ उसके साथ घर में था।

कुछ ऐसा… जो उसे replace करना चाहता था।


अगली शाम उसने पुराने tenant करण की details निकालने की कोशिश की।

बहुत मुश्किल से उसे करण की छोटी बहन का नंबर मिला।

उसने call किया।

कुछ सेकंड silence रहा।

फिर लड़की बोली—

“आप 808 में रहते हो?”

अभिषेक के हाथ काँप गए।

“हाँ…”

उधर से सिर्फ एक sentence आया—

“तुरंत घर छोड़ दो।”

“लेकिन—”

“वो पहले डराता है। फिर imitate करता है। फिर…” उसकी आवाज़ टूट गई, “फिर लोग खुद को पहचानना बंद कर देते हैं।”

“करण के साथ क्या हुआ था?”

फोन पर रोने की आवाज़ आई।

“जिस दिन वो गायब हुआ… उसने मुझे video call की थी।”

“क्या देखा आपने?”

कुछ सेकंड silence।

फिर बहुत धीमी आवाज़—

“दो करण थे।”


उस रात बाहर बहुत घना कोहरा था।

Expressway की lights भी barely दिख रही थीं।

अभिषेक ने decide किया कि अभी निकल जाएगा।

उसने bag उठाया।

Main door खोला।

और जम गया।

बाहर corridor में…

वो खुद खड़ा था।

Same clothes।

Same face।

लेकिन आँखें पूरी काली।

उसकी copy धीरे-धीरे मुस्कुराई।

“अब कहाँ जाएगा?”

अभिषेक पीछे हट गया।

Door बंद करना चाहा।

लेकिन door अपने आप बंद हो गया।

धड़ाम!

पूरा घर suddenly freezing cold हो गया।

Lights flicker।

TV अपने आप on।

Screen पर static।

फिर धीरे-धीरे image बनी।

CCTV footage।

उसी घर की।

और footage में…

अभिषेक सो रहा था।

लेकिन दूसरा अभिषेक उसके bed के पास खड़ा उसे देख रहा था।

हर रात।

हर दिन।

कई दिनों से।

उसकी चीख निकल गई।

TV screen अचानक black।

और पीछे से आवाज़—

“मैं तुझे बहुत पहले से देख रहा हूँ…”


अभिषेक भागकर balcony की तरफ गया।

आठवीं मंज़िल।

नीचे धुंध।

उसने पीछे देखा।

वो entity धीरे-धीरे उसकी तरफ आ रही थी।

उसकी चाल इंसानों जैसी नहीं थी।

बहुत smooth।

बहुत unnatural।

“तू अकेला था…”
वो बोली।
“इसलिए मुझे जगह मिल गई…”

अभिषेक रोने लगा।

“तू क्या चाहता है?”

Entity उसके बिल्कुल सामने आ गई।

अब उसका चेहरा slowly बदल रहा था।

जैसे molten wax।

फिर वापस अभिषेक जैसा।

“बस… जीना।”

और तभी…

अभिषेक को realization हुआ।

वो चीज़ उसके घर आने के बाद नहीं आई थी।

वो हमेशा से उसके साथ थी।

बचपन के वो moments जब उसे लगता था कोई उसे देख रहा है…

Mirror में half-second delay…

अकेले कमरे में अपनी ही आवाज़…

सब वही था।

हमज़ाद।


Entity ने हाथ बढ़ाया।

“थक गया ना?”

उसकी आवाज़ surprisingly gentle थी।

“मैं सब संभाल लूँगा।”

अभिषेक की आँखों में आँसू आ गए।

कई महीनों से वो depression, loneliness और anxiety से लड़ रहा था।

किसी से बात नहीं।

कोई family नहीं।

कोई दोस्त नहीं।

और शायद…

यही weakness थी।

हमज़ाद इंसान के अंदर खाली जगह ढूँढता है।

जहाँ दर्द ज्यादा हो।

जहाँ इंसान खुद से नफरत करने लगे।

वहीं से वो अंदर आता है।


Entity उसके करीब आई।

“बस एक बार मान ले…”

अभिषेक के कानों में अचानक अपनी माँ की आवाज़ गूँजी।

बचपन की।

“डर को जितना खिलाओगे… वो उतना बड़ा होगा।”

उसने आँखें बंद कीं।

और पहली बार पूरी ताकत से चिल्लाया—

“तू मैं नहीं है!”

पूरा घर जोर से काँप उठा।

Lights फट गईं।

Mirror crack।

Entity का चेहरा distort होने लगा।

वो चीखने लगी।

लेकिन उसकी चीख… अभिषेक की ही आवाज़ थी।

“तू अकेला मर जाएगा!”

अभिषेक रोते हुए चिल्लाया—

“लेकिन मैं रहूँगा!”

और उसी पल…

पूरा घर अंधेरे में डूब गया।


सुबह।

सोसाइटी वालों ने balcony के पास अभिषेक को बेहोश पाया।

घर के सारे mirrors टूटे हुए थे।

TV smashed।

लेकिन अंदर कोई दूसरा नहीं मिला।

Police आई।

Investigation हुई।

कुछ prove नहीं हुआ।

कुछ दिनों बाद अभिषेक वो शहर छोड़कर चला गया।

किसी को कुछ नहीं बताया।


तीन महीने बाद।

पुणे।

नई नौकरी।

नई जिंदगी।

सब normal लग रहा था।

एक रात वो bathroom में shave कर रहा था।

Mirror पर पानी की बूंदें थीं।

उसने चेहरा धोया।

फिर ऊपर देखा।

Reflection… मुस्कुरा रहा था।

जबकि वो नहीं।

और mirror पर धीरे-धीरे उँगलियों से शब्द उभरे—

“मैं अभी भी यहाँ हूँ…”

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