भूतिया रिक्शा की आखिरी सवारी | Haunted Rickshaw Horror Story

शहर के पश्चिमी हिस्से में स्थित विशाल कॉर्पोरेट पार्क रात के समय बिल्कुल अलग दुनिया जैसा लगता था। दिन में जहाँ हजारों कर्मचारी आते-जाते दिखाई देते थे, वहीं रात के बाद केवल सुरक्षा गार्ड, कुछ सफाई कर्मचारी और देर तक काम करने वाले चुनिंदा लोग ही बचते थे।

अभिषेक उन्हीं लोगों में से एक था।

 Haunted Rickshaw Horror Story

उसकी उम्र लगभग बत्तीस वर्ष थी और वह एक डेटा रिकवरी कंपनी में काम करता था। उसका काम था खराब हार्ड ड्राइव, सर्वर और डिजिटल स्टोरेज से खोया हुआ डेटा वापस निकालना। अधिकांश लोग उसके काम को उबाऊ मानते थे, लेकिन उसे यह पसंद था। हर डिवाइस के अंदर किसी न किसी की अधूरी कहानी छिपी होती थी।

उस रात भी वह ऑफिस में अकेला बैठा था।

घड़ी में रात के साढ़े बारह बज रहे थे। Haunted Rickshaw Horror Story

कंपनी को एक सरकारी टेंडर मिला था और अगले दिन सुबह रिपोर्ट जमा करनी थी। इसलिए उसे देर तक रुकना पड़ा।

करीब एक बजे जब उसने आखिरकार कंप्यूटर बंद किया, तब उसकी आँखों में जलन होने लगी थी।

बाहर निकलकर उसने राहत की साँस ली।

जून की गर्म रात थी।

सड़क पर ट्रैफिक लगभग खत्म हो चुका था।

कॉर्पोरेट पार्क के बाहर टैक्सी स्टैंड खाली पड़ा था।

उसने मोबाइल निकाला और कैब बुक करने लगा।

लेकिन नेटवर्क बार-बार गायब हो रहा था।

उसने कई बार कोशिश की।

कुछ नहीं हुआ।

उसे याद आया कि मुख्य सड़क लगभग डेढ़ किलोमीटर दूर थी जहाँ रात भर वाहन मिल जाते थे।

वह पैदल चलने लगा।

सड़क के दोनों ओर ऊँची ऑफिस बिल्डिंग्स थीं जिनकी अधिकांश खिड़कियाँ अंधेरी हो चुकी थीं।

लगभग दस मिनट बाद उसने पीछे से घंटी जैसी आवाज सुनी।

टिन…

टिन…

उसने मुड़कर देखा।

एक पुराना साइकिल रिक्शा उसकी ओर आ रहा था।

शहर में अब ऐसे रिक्शे लगभग गायब हो चुके थे।

अधिकतर ई-रिक्शा या ऑटो चलते थे।

रिक्शा चलाने वाला आदमी दुबला-पतला था। उम्र पचास के आसपास होगी। उसके बाल पूरी तरह सफेद थे।

वह अभिषेक के सामने आकर रुका।

“कहाँ जाना है साहब?”

अभिषेक कुछ पल उसे देखता रहा।

“आप यहाँ? इतनी रात को?”

रिक्शावाला हल्का मुस्कुराया।

“रात में भी लोगों को घर जाना होता है।”

बात सही थी।

अभिषेक ने पता बताया।

रिक्शावाले ने बिना सोचे सिर हिला दिया।

“बैठ जाइए।”

किराया भी सामान्य था।

अभिषेक बैठ गया।

रिक्शा चल पड़ा।

शुरुआत में सब सामान्य लगा।

लेकिन कुछ मिनट बाद उसे महसूस हुआ कि रास्ता अजीब है।

यह वह सड़क नहीं थी जो उसके घर की तरफ जाती थी।

“भाईसाहब, यह कौन-सा रास्ता है?”

रिक्शावाले ने बिना पीछे देखे कहा—

“शॉर्टकट है।”

अभिषेक ने खिड़की जैसी खुली जगह से बाहर झाँका।

आसपास ऐसे इलाके आ रहे थे जिन्हें उसने पहले कभी नहीं देखा था।

पुराने गोदाम।

बंद फैक्ट्रियाँ।

सड़क किनारे टूटे हुए बोर्ड।

लेकिन सबसे अजीब बात थी सन्नाटा।

इतने बड़े शहर में भी इतनी खामोशी असामान्य थी।

उसने मोबाइल निकाला।

स्क्रीन पर नेटवर्क गायब था।

GPS भी काम नहीं कर रहा था।

उसे हल्की बेचैनी हुई।

“कितनी देर लगेगी?”

“बस पहुँच गए।”

Haunted Rickshaw Horror Story

रिक्शावाले ने वही जवाब दिया।

अगले बीस मिनट तक वही जवाब मिलता रहा।

बस पहुँच गए।

लेकिन वे कहीं नहीं पहुँचे।

अब अभिषेक सचमुच परेशान हो गया।

“रोकिए।”

रिक्शा नहीं रुका।

“मैंने कहा रोकिए।”

रिक्शा फिर भी चलता रहा।

पहली बार उसे गुस्सा आया।

वह सीट से उठकर आगे झुका।

“सुनाई नहीं दे रहा क्या?”

तभी उसकी नजर रिक्शावाले के हाथों पर पड़ी।

हैंडल पकड़ने वाले दोनों हाथ असामान्य रूप से स्थिर थे।

इतने स्थिर कि जैसे कोई मूर्ति हो।

और तभी उसने कुछ और देखा।

रिक्शे की घंटी अपने आप बज रही थी।

टिन…

टिन…

टिन…

रिक्शावाला उसे छू भी नहीं रहा था।

अभिषेक का गला सूख गया।

“आप… कौन हैं?”

इस बार कोई जवाब नहीं मिला।

रिक्शा चलता रहा।

अचानक सड़क खत्म हो गई।

सामने एक विशाल मैदान दिखाई दिया।

मैदान के बीच एक पुरानी इमारत खड़ी थी।

उसके ऊपर कोई बोर्ड नहीं था।

सिर्फ टूटी हुई दीवारें और बंद खिड़कियाँ।

रिक्शा वहीं जाकर रुक गया।

अभिषेक तुरंत नीचे कूद पड़ा।

“ये कहाँ ले आए मुझे?”

रिक्शावाले ने पहली बार उसकी तरफ देखा।

उसकी आँखें बेहद थकी हुई थीं।

जैसे कई दिनों से सोया न हो।

“तुम्हें यहाँ आना था।”

“मैं यहाँ किसी को नहीं जानता।”

“फिर भी आना था।”

अभिषेक पीछे हट गया।

उसने जेब से पैसे निकालकर देने चाहे।

लेकिन रिक्शावाले ने हाथ नहीं बढ़ाया।

“किराया बाद में देना।”

“किस बात का?”

“जब सफर पूरा हो जाए।”

अभिषेक ने कुछ समझा नहीं।

वह मुड़ा और वापस सड़क की तरफ चलने लगा।

तभी उसके पीछे से आवाज आई।

“तुम्हारे पास जो हार्ड ड्राइव है… उसे खोलना मत।”

अभिषेक जम गया।

उसने किसी को नहीं बताया था कि वह ऑफिस से एक हार्ड ड्राइव घर ले जा रहा है।

वह धीरे-धीरे पलटा।

रिक्शा वहीं था।

लेकिन रिक्शावाला गायब था।

पूरी तरह गायब।

खाली सीट।

खाली सड़क।

और मैदान में बहती ठंडी हवा।

उसका दिल तेजी से धड़कने लगा।

वह बिना पीछे देखे दौड़ पड़ा।

करीब पंद्रह मिनट बाद उसे मुख्य सड़क मिली।

यह कैसे हुआ, उसे समझ नहीं आया।

उसने तुरंत ऑटो लिया और घर पहुँच गया।

घर पहुँचकर उसने राहत की साँस ली।

लेकिन असली समस्या अगले दिन शुरू हुई।

जिस हार्ड ड्राइव के बारे में उस अजनबी ने कहा था, वह एक पुराने पुलिस केस से जुड़ी थी।

तीन साल पहले एक पत्रकार रहस्यमय परिस्थितियों में लापता हो गया था।

उसका लैपटॉप बरामद हुआ था लेकिन हार्ड ड्राइव बुरी तरह क्षतिग्रस्त थी।

अब अदालत के आदेश पर डेटा रिकवरी की जा रही थी।

अभिषेक को उसी फाइल पर काम करना था।

अगले दिन उसने ड्राइव को सिस्टम से जोड़ा।

रिकवरी प्रक्रिया शुरू हुई।

कुछ घंटों बाद डेटा वापस आने लगा।

फोटो।

वीडियो।

दस्तावेज।

और फिर एक फोल्डर मिला।

नाम था—

LAST SAFARI

अभिषेक ने फोल्डर खोला।

उसके अंदर सिर्फ एक वीडियो था।

वीडियो चलाते ही स्क्रीन पर वही रिक्शा दिखाई दिया…

वही पुराना साइकिल रिक्शा…

और कैमरे के सामने खड़ा व्यक्ति बिल्कुल वही था जिसने पिछली रात उसे सफर कराया था।

लेकिन वीडियो की तारीख तीन साल पुरानी थी।

वीडियो कुछ सेकंड तक बिल्कुल स्थिर रहा।

स्क्रीन पर वही पुराना रिक्शा खड़ा था। उसके पीछे कोई सड़क नहीं, कोई दुकान नहीं, कोई पहचानने लायक इमारत नहीं। बस एक लंबी, खाली गली थी जिसकी दीवारों पर पुराने पोस्टर आधे उखड़े हुए चिपके थे। कैमरा शायद किसी छुपे हुए मोबाइल से रिकॉर्ड किया गया था, क्योंकि फ्रेम थोड़ा तिरछा था और आवाज भी दबकर आ रही थी।

फिर कैमरे के सामने एक आदमी आया।

दाढ़ी बढ़ी हुई, आँखों के नीचे गहरे काले घेरे, हाथ में छोटा बैग।

अभिषेक ने वीडियो रोक दिया।

वह पत्रकार था।

राघव मेहरा।

तीन साल पहले गायब हुआ वही आदमी।

अभिषेक ने उसके बारे में अखबारों में पढ़ा था। राघव एक इन्वेस्टिगेटिव जर्नलिस्ट था। वह बड़े लोगों पर स्टोरी करता था, फर्जी कंपनियों, पुलिस फाइलों और सरकारी घोटालों की तह तक जाता था। उसके गायब होने के बाद कुछ दिनों तक मामला मीडिया में चला, फिर धीरे-धीरे सब शांत हो गया। पुलिस ने अंतिम बयान यही दिया था कि शायद वह खुद कहीं चला गया था।

लेकिन स्क्रीन पर दिख रहा राघव किसी ऐसे आदमी जैसा नहीं लग रहा था जो कहीं जाने की योजना बनाकर निकला हो।

वह डरा हुआ था।

वीडियो फिर चलने लगा।

राघव रिक्शे वाले से कह रहा था, “मुझे स्टेशन रोड छोड़ दो। जल्दी।”

रिक्शावाले ने धीमी आवाज में पूछा, “पीछे कौन है?”

राघव ने तुरंत मुड़कर देखा। कैमरा भी थोड़ा हिला। गली खाली थी।

“तुम बस चलो,” राघव ने कहा।

रिक्शा चल पड़ा।

कुछ देर तक सिर्फ पहिए की चर्र-चर्र सुनाई देती रही। फिर राघव ने मोबाइल कैमरे को अपनी तरफ मोड़ा।

“अगर यह वीडियो किसी को मिले,” उसने फुसफुसाते हुए कहा, “तो समझ लेना कि मेरी मौत हादसा नहीं थी। मैं जिस केस पर काम कर रहा हूँ, उसमें पुलिस, अस्पताल और एक प्राइवेट ट्रांसपोर्ट कंपनी शामिल है। शहर में जो लोग रात को गायब हुए हैं, उन्हें किसी ने उठाया नहीं… उन्हें पहुँचाया गया है।”

अभिषेक की रीढ़ में ठंडक उतर गई।

राघव आगे कुछ कहने वाला था, तभी रिक्शा अचानक रुक गया।

वीडियो में अंधेरा फैल गया।

कुछ आवाजें आईं।

किसी के जूते सड़क पर घिसटने की आवाज।

किसी का दबा हुआ रोना।

फिर रिक्शावाले की आवाज आई—

“साहब, यहाँ से वापस नहीं जाते।”

वीडियो वहीं बंद हो गया।

अभिषेक बहुत देर तक स्क्रीन को देखता रहा।

उसका कमरा शांत था, लेकिन उसे लग रहा था जैसे किसी ने उसके कान के पास आकर धीरे से साँस ली हो।

उसने तुरंत वीडियो की कॉपी बनाई और सिस्टम बंद कर दिया।

तभी उसके फोन पर एक नोटिफिकेशन आया।

कोई नंबर नहीं।

सिर्फ एक मैसेज।

“तुमने खोल दिया।”

अभिषेक के हाथ से फोन लगभग गिर गया।

उसने तुरंत खिड़की से बाहर देखा।

नीचे उसकी अपार्टमेंट सोसायटी का गेट दिखाई दे रहा था।

और गेट के बाहर, स्ट्रीट लाइट की आधी रोशनी में, वही पुराना रिक्शा खड़ा था।

इस बार रिक्शे पर कोई बैठा नहीं था।

सिर्फ उसकी घंटी अपने आप हिल रही थी।

टिन…

टिन…

टिन…

अभिषेक ने परदा खींच दिया।

उस रात उसने नींद की कोशिश नहीं की।

सुबह होते ही वह सीधे ऑफिस गया। उसने अपने सीनियर, निधि मैम, को सारी बात बताने की कोशिश की। लेकिन जैसे ही उसने “रिक्शा” और “वीडियो” कहा, निधि का चेहरा बदल गया।

“यह फाइल बंद कर दो,” उन्होंने धीमी आवाज में कहा।

“मैम, यह कोर्ट ऑर्डर वाली रिकवरी है।”

“मुझे पता है। लेकिन हर चीज जो recover हो सकती है, उसे recover करना जरूरी नहीं होता।”

अभिषेक चुप रह गया।

निधि ने केबिन का दरवाजा बंद किया।

“तीन साल पहले यही ड्राइव हमारी कंपनी में आई थी। उस समय इसे संभालने वाला इंजीनियर था—सौरभ। उसने भी एक वीडियो पाया था। दो दिन बाद वह नौकरी छोड़कर चला गया। किसी से बात नहीं की। एक महीने बाद उसकी बॉडी रेलवे ट्रैक के पास मिली। पुलिस ने इसे accident कहा।”

“तो आपने ये बात छुपाई?”

“मैंने अपनी टीम को बचाया,” निधि बोलीं, लेकिन उनकी आवाज में आत्मविश्वास नहीं था।

अभिषेक को पहली बार समझ आया कि वह किसी साधारण केस में नहीं फँसा था। यह कोई भूतिया किस्सा नहीं लग रहा था। इसके पीछे लोग थे। असली लोग। ऐसे लोग जो सबूत मिटा सकते थे, लोगों को गायब कर सकते थे और मौत को हादसा बना सकते थे।

लेकिन फिर रिक्शा क्या था?

वह आदमी कौन था?

और उसे हार्ड ड्राइव के बारे में कैसे पता था?

उसी शाम अभिषेक ने राघव मेहरा के पुराने लेख खोजने शुरू किए। इंटरनेट पर ज्यादा कुछ नहीं था। कुछ लिंक हट चुके थे। कुछ आर्टिकल unavailable थे। लेकिन एक cached पेज में उसे एक नाम मिला—

“शांतिधाम नाइट ट्रांसफर सर्विस।”

यह कंपनी अस्पतालों और पुलिस विभाग के लिए रात में शव, मरीज और जब्त सामान ले जाने का काम करती थी।

अभिषेक ने कंपनी का पुराना पता देखा।

वही इलाका।

वही बंद फैक्ट्रियों वाला हिस्सा।

वही मैदान।

जहाँ पिछली रात रिक्शा उसे ले गया था।

वह अकेला वहाँ जाने वाला नहीं था।

उसने अपनी पुरानी कॉलेज दोस्त मीरा को फोन किया। मीरा अब लीगल रिसर्चर थी और कोर्ट रिकॉर्ड्स खंगालने का काम करती थी।

“तू हमेशा मुसीबत में क्यों मिलता है?” मीरा ने फोन उठाते ही कहा।

“इस बार मजाक मत कर। मुझे सच में मदद चाहिए।”

“किस चीज में?”

“तीन साल पुराने missing journalist case में।”

फोन के दूसरी तरफ कुछ सेकंड खामोशी रही।

फिर मीरा बोली, “राघव मेहरा?”

अभिषेक हैरान हुआ। “तुझे कैसे पता?”

“क्योंकि उस केस की एक sealed petition मैंने पिछले साल देखी थी। उसमें दावा था कि राघव ने मरने से पहले किसी को evidence भेजा था। लेकिन evidence कभी court में पहुँचा ही नहीं।”

“किसे भेजा था?”

मीरा ने धीरे से कहा, “एक रिक्शावाले को।”

अभिषेक के मुँह से शब्द नहीं निकले।

मीरा ने आगे बताया कि राघव उस रात भागते समय एक पुराने साइकिल रिक्शे में बैठा था। रिक्शावाले का नाम था गणपत कदम। वह पहले अस्पतालों के बाहर मरीजों के रिश्तेदारों को ले जाने का काम करता था। लोग उसे भरोसेमंद मानते थे। राघव ने उसे अपना बैग दिया था और कहा था कि अगर वह वापस न आए तो बैग पुलिस के एक ईमानदार अधिकारी तक पहुँचा देना।

लेकिन गणपत भी उसी रात गायब हो गया।

दो दिन बाद उसका रिक्शा मिला।

खाली।

बैग गायब।

गणपत गायब।

राघव गायब।

“तो दोनों मारे गए?” अभिषेक ने पूछा।

“शायद,” मीरा बोली। “लेकिन रिकॉर्ड में गणपत का कोई death certificate नहीं है। वह legally missing है।”

उस रात अभिषेक और मीरा शांतिधाम नाइट ट्रांसफर सर्विस के पुराने पते पर पहुँचे। उन्होंने किसी को बताए बिना जाना बेहतर समझा। वहाँ अब कंपनी नहीं थी। जंग लगे गेट पर सिर्फ टूटा हुआ बोर्ड बचा था। अंदर पुराने एम्बुलेंस के ढाँचे, लोहे के स्ट्रेचर और प्लास्टिक के बॉक्स पड़े थे।

मीरा ने मोबाइल की टॉर्च जलाई।

“यहाँ आना बहुत खराब आइडिया है,” उसने कहा।

“मुझे पता है।”

“फिर भी आए हैं?”

“क्योंकि कोई मुझे यहाँ लाया था।”

वे अंदर बढ़े।

ऑफिस रूम में फाइलें बिखरी हुई थीं। ज्यादातर खराब हो चुकी थीं। लेकिन एक अलमारी बंद थी। अभिषेक ने लोहे की रॉड से उसे खोला।

अंदर पुराने रजिस्टर थे।

नाइट ट्रांसफर लॉग।

अभिषेक पन्ने पलटने लगा।

कई नामों के आगे सिर्फ कोड लिखे थे।

N-17.

C-42.

R-09.

मीरा ने एक पन्ने पर उंगली रखी।

“ये देख।”

तारीख वही थी जिस रात राघव गायब हुआ था।

एंट्री में लिखा था—

“Special transfer. No documentation. Route: Last Safari.”

ड्राइवर के नाम की जगह खाली थी।

लेकिन नीचे पेंसिल से हल्का सा लिखा था—

“G.K. refused.”

गणपत कदम ने मना किया था।

मना किस बात से?

तभी बाहर से घंटी की आवाज आई।

टिन…

दोनों जम गए।

टिन…

मीरा ने फुसफुसाकर कहा, “यह क्या है?”

अभिषेक ने जवाब नहीं दिया।

वे धीरे-धीरे बाहर आए।

गेट के पास वही रिक्शा खड़ा था।

इस बार रिक्शे की सीट पर एक पुराना कपड़े का बैग रखा था।

अभिषेक उसके पास गया।

बैग पर सूखे हुए कीचड़ के निशान थे। अंदर एक पुराना मेमोरी कार्ड, कुछ कागज और एक छोटी डायरी थी।

डायरी गणपत की थी।

उसमें साफ-साफ लिखा था कि शांतिधाम कंपनी रात में सिर्फ मरीज या शव नहीं ले जाती थी। कई बार वे जिंदा लोगों को “unclaimed body” दिखाकर निजी अस्पतालों और गैरकानूनी मेडिकल लैब्स तक पहुँचाते थे। गरीब मजदूर, बेघर लोग, नशे में मिले लोग, और ऐसे लोग जिनकी गुमशुदगी पर कोई शोर न मचे।

राघव ने यह सब पकड़ लिया था।

उस रात वह सबूत लेकर भागा।

गणपत ने उसे रिक्शे में छुपाया, लेकिन कंपनी के लोगों ने दोनों को पकड़ लिया।

डायरी की आखिरी लाइन पढ़कर अभिषेक के हाथ काँप गए—

“अगर मैं बच गया तो सच बताऊँगा। अगर नहीं बचा, तो मेरा रिक्शा बताएगा किसे कहाँ उतरना है।”

मीरा ने धीमी आवाज में कहा, “यह किसी ने रखकर हमें दिया है।”

अभिषेक ने रिक्शे की तरफ देखा।

“या किसी ने लौटाया है।”

तभी उसके फोन पर फिर वही बिना नंबर वाला मैसेज आया।

“सफर अभी पूरा नहीं हुआ।”

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