Highway Par Mili Ek Bhootia Dulhan | Raat Ki Dulhan Horror Story

शादी-ब्याह की कहानियाँ आमतौर पर खुशियों से भरी होती हैं। लोग नए रिश्तों, नई उम्मीदों और नए जीवन की शुरुआत की बातें करते हैं। लेकिन जिस दुल्हन की कहानी मैं आपको सुनाने जा रहा हूँ, उसका नाम हमारे इलाके में आज भी फुसफुसाकर लिया जाता है। क्योंकि लोग कहते हैं कि वह दुल्हन कभी अपने ससुराल पहुँची ही नहीं।

और शायद आज भी रास्ते में कहीं भटक रही है।

Raat Ki Dulhan Horror Story

यह घटना लगभग पंद्रह साल पुरानी है।

तब मैं एक छोटे से कस्बे में रहता था। कस्बे के बाहर कई गाँव थे और उन गाँवों को जोड़ने वाली सड़कें रात होते ही लगभग सुनसान हो जाती थीं।

उन दिनों मैं एक ट्रांसपोर्ट कंपनी में काम करता था। Raat Ki Dulhan Horror Story

कई बार देर रात तक सामान पहुँचाने जाना पड़ता था।

ऐसी ही एक रात थी।

दिसंबर का महीना था।

ठंड अपने पूरे जोर पर थी।

रात के करीब साढ़े ग्यारह बज रहे थे।

मैं अपनी पुरानी बोलेरो चलाते हुए एक गाँव से वापस लौट रहा था।

सड़क के दोनों तरफ खेत फैले हुए थे।

दूर-दूर तक कोई घर दिखाई नहीं दे रहा था।

सिर्फ हेडलाइट की रोशनी सड़क के एक छोटे से हिस्से को उजागर कर रही थी।

बाकी सब कुछ अंधेरे में डूबा हुआ था।

रेडियो भी बंद था।

इंजन की आवाज और ठंडी हवा की सीटी ही मेरे साथी थे।

तभी मुझे सड़क के किनारे कुछ दिखाई दिया।

पहले लगा शायद कोई पेड़ का तना होगा।

लेकिन जैसे-जैसे गाड़ी पास पहुँची, मुझे महसूस हुआ कि वहाँ कोई इंसान खड़ा है।

मैंने गाड़ी की स्पीड कम की।

हेडलाइट सीधी उस आकृति पर पड़ी।

और अगले ही पल मेरे हाथ स्टीयरिंग पर कस गए।

वह एक लड़की थी।

नहीं…

एक दुल्हन।

लाल जोड़ा।

सिर पर घूँघट।

हाथों में चूड़ियाँ।

गले में भारी हार।

बिल्कुल वैसे जैसे कोई अभी-अभी शादी करके निकली हो।

लेकिन रात के साढ़े ग्यारह बजे…

जंगलों और खेतों के बीच…

एक सुनसान सड़क पर…

अकेली?

यह बात समझ से बाहर थी।

मैं कुछ सेकंड तक उसे देखता रहा।

फिर गाड़ी रोक दी।

खिड़की नीचे करके मैंने पूछा,

“बहन जी… आप यहाँ क्या कर रही हैं?”

Raat Ki Dulhan Horror Story

कोई जवाब नहीं मिला।

वह बस खड़ी रही।

हवा चल रही थी।

उसके घूँघट का किनारा हल्का-सा हिल रहा था।

लेकिन वह खुद बिल्कुल स्थिर थी।

मुझे अजीब महसूस हुआ।

फिर मैंने थोड़ा जोर से कहा,

“सुनिए… आपको कहीं जाना है क्या?”

इस बार धीरे से आवाज आई।

“मुझे घर जाना है।”

उसकी आवाज बहुत धीमी थी।

जैसे दूर कहीं से आ रही हो।

मैंने पूछा,

“कौन-सा गाँव?”

कुछ पल की खामोशी के बाद उसने एक गाँव का नाम बताया।

वह गाँव यहाँ से करीब बीस किलोमीटर दूर था।

मैं चौंक गया।

“इतनी रात को आप यहाँ अकेली कैसे?”

उसने कोई जवाब नहीं दिया।

मैंने सोचा शायद किसी वजह से बारात या गाड़ी छूट गई होगी।

या घरवालों से बिछड़ गई होगी।

आखिर इंसानियत के नाते मदद करना जरूरी था।

मैंने दरवाजा खोला।

“आ जाइए। मैं छोड़ देता हूँ।”

कुछ सेकंड बाद वह धीरे-धीरे गाड़ी की तरफ बढ़ी।

उसके पैरों की पायल की हल्की आवाज सुनाई दे रही थी।

वह पीछे वाली सीट पर बैठ गई।

मैंने गाड़ी आगे बढ़ा दी।

शुरुआत में सब सामान्य लगा।

लेकिन करीब पाँच मिनट बाद मुझे एक अजीब बात महसूस हुई।

गाड़ी के अंदर अचानक बहुत ज्यादा ठंड हो गई थी।

इतनी ठंड कि मेरे हाथ सुन्न होने लगे।

मैंने हीटर बढ़ा दिया।

फिर भी कोई फर्क नहीं पड़ा।

मैंने रियर व्यू मिरर में देखा।

दुल्हन चुपचाप बैठी थी।

उसका चेहरा अभी भी घूँघट से ढका हुआ था।

मैंने बातचीत शुरू करने की कोशिश की।

“आपकी शादी आज हुई है?”

कोई जवाब नहीं।

“घर वाले कहाँ हैं?”

खामोशी।

“फोन है आपके पास?”

फिर भी कोई जवाब नहीं।

अब मुझे बेचैनी होने लगी।

लेकिन मैंने खुद को समझाया।

शायद सदमे में होगी।

शायद किसी वजह से परेशान होगी।

सड़क आगे बढ़ती रही।

करीब दस मिनट बाद हम एक पुराने पुल के पास पहुँचे।

और तभी पहली बार कुछ ऐसा हुआ जिसने मेरे अंदर डर की एक हल्की लहर पैदा कर दी।

रियर व्यू मिरर में मुझे लगा कि पीछे वाली सीट खाली है।

मैंने तुरंत गर्दन घुमाई।

दुल्हन वहीं बैठी थी।

मैंने फिर शीशे में देखा।

सीट खाली।

फिर पीछे देखा।

वह मौजूद।

मेरा दिल तेजी से धड़कने लगा।

मैंने सोचा शायद रोशनी का भ्रम होगा।

लेकिन अब मैं पूरी तरह असहज हो चुका था।

मैंने गाड़ी की स्पीड थोड़ा बढ़ा दी।

कुछ देर बाद अचानक पीछे से आवाज आई।

“क्या आपको पता है… यह वही रास्ता है?”

मेरे हाथ स्टीयरिंग पर जम गए।

पहली बार उसने खुद बात की थी।

मैंने पूछा,

“कौन-सा रास्ता?”

कुछ सेकंड की खामोशी।

फिर उसकी धीमी आवाज आई,

“जिस रास्ते पर मैं मरी थी।”

उस एक वाक्य ने पूरे शरीर में सिहरन दौड़ा दी।

मेरे पैर ब्रेक पर जाने ही वाले थे।

लेकिन किसी तरह मैंने खुद को संभाला।

मैंने हँसने की कोशिश की।

“क्या मतलब?”

लेकिन इस बार पीछे से कोई जवाब नहीं आया।

सिर्फ खामोशी।

और वह खामोशी पहले से कहीं ज्यादा डरावनी थी।

मुझे अचानक महसूस हुआ कि गाड़ी के अंदर तापमान और भी गिर गया है।

मेरी साँसों से धुंध निकलने लगी थी।

जबकि हीटर पूरी ताकत से चल रहा था।

मैंने फिर शीशे में देखा।

और इस बार…

मेरे हाथ काँप उठे।

क्योंकि पीछे वाली सीट पर बैठी दुल्हन का घूँघट धीरे-धीरे ऊपर उठ रहा था…

घूँघट धीरे-धीरे ऊपर उठ रहा था।

मेरे हाथ स्टीयरिंग पर जमे हुए थे।

दिल इतनी तेजी से धड़क रहा था कि उसकी आवाज मुझे खुद सुनाई दे रही थी।

मैं बार-बार खुद को समझाने की कोशिश कर रहा था कि शायद मैं थका हुआ हूँ।

शायद यह सिर्फ मेरा भ्रम है।

लेकिन अगले ही पल घूँघट थोड़ा और ऊपर उठा।

मैंने शीशे में देखने की हिम्मत की।

और जो चेहरा दिखाई दिया, उसे देखकर मेरे पूरे शरीर में ठंड दौड़ गई।

वह चेहरा किसी भूतिया फिल्म जैसा नहीं था।

न आँखों से खून बह रहा था।

न कोई डरावना मेकअप।

असल डर किसी और चीज़ में था।

उसका चेहरा बिल्कुल पीला था।

इतना पीला जैसे शरीर में खून ही न बचा हो।

उसकी आँखें असामान्य रूप से शांत थीं।

और सबसे अजीब बात…

वह मुझे नहीं देख रही थी।

वह खिड़की के बाहर अंधेरे में कहीं देख रही थी।

जैसे सड़क के किनारे किसी चीज़ का इंतजार कर रही हो।

मैंने तुरंत नजरें हटा लीं।

अब मुझे पछतावा होने लगा था कि मैंने उसे गाड़ी में बैठाया ही क्यों।

लेकिन अब बीच रास्ते में उसे उतारने की हिम्मत भी नहीं थी।

सड़क लगातार आगे बढ़ रही थी।

दूर-दूर तक कोई वाहन दिखाई नहीं दे रहा था।

कुछ मिनट बाद उसने फिर बात की।

“क्या तुम डर रहे हो?”

मेरे गले में जैसे शब्द अटक गए।

मैंने किसी तरह कहा,

“नहीं… बस थोड़ा परेशान हूँ।”

उसके बाद पीछे से हल्की-सी हँसी सुनाई दी।

वह हँसी सामान्य नहीं थी।

उसमें खुशी नहीं थी।

दुख भी नहीं था।

ऐसा लग रहा था जैसे कोई बहुत पुरानी याद पर मुस्कुरा रहा हो।

फिर उसने पूछा,

“तुम्हें पता है लोग मुझे क्या कहते हैं?”

मैंने जवाब नहीं दिया।

वह खुद बोलने लगी।

“वे मुझे रहस्यमयी दुल्हन कहते हैं।”

मेरा दिल एक पल के लिए रुक गया।

यह नाम मैंने पहले सुना था।

बहुत साल पहले।

चाय की दुकान पर बैठे कुछ बुजुर्गों से।

लेकिन मैंने कभी उन बातों पर ध्यान नहीं दिया था।

मुझे याद आया कि लोग कहते थे एक दुल्हन शादी की रात गायब हो गई थी।

कोई नहीं जानता था कि उसके साथ क्या हुआ।

कुछ लोग कहते थे वह भाग गई।

कुछ कहते थे उसका अपहरण हो गया।

और कुछ लोग दावा करते थे कि उसकी आत्मा अब भी उस सड़क पर दिखाई देती है।

मैंने उन कहानियों को हमेशा अफवाह समझा था।

लेकिन इस समय मेरी गाड़ी की पिछली सीट पर बैठी लड़की वही कहानी जीवित कर रही थी।

मैंने काँपती आवाज में पूछा,

“तुम कौन हो?”

कुछ देर तक कोई जवाब नहीं आया।

फिर उसने धीरे से कहा,

“मैं वही हूँ जिसे कभी घर पहुँचने नहीं दिया गया।”

गाड़ी के अंदर अचानक एक अजीब गंध फैलने लगी।

पहले मुझे लगा शायद खेतों से आ रही होगी।

लेकिन वह गंध मिट्टी जैसी नहीं थी।

वह गीले फूलों की गंध थी।

जैसे कई दिनों पुराने शादी के हार सड़ने लगे हों।

अब मेरी बेचैनी बढ़ती जा रही थी।

मैंने मोबाइल निकालने की कोशिश की।

सोचा किसी को फोन करूँ।

लेकिन स्क्रीन देखते ही मेरे होश उड़ गए।

नेटवर्क पूरी तरह गायब था।

बैटरी भी अचानक एक प्रतिशत पर आ गई थी।

जबकि कुछ देर पहले पचास प्रतिशत से ज्यादा थी।

मैंने फोन वापस रख दिया।

तभी उसने कहा,

“आगे जो बरगद का पेड़ आएगा… वहाँ गाड़ी मत रोकना।”

मैंने चौंककर पूछा,

“क्यों?”

इस बार उसकी आवाज पहले से अलग थी।

ज्यादा गंभीर।

“क्योंकि वे अभी भी वहीं हैं।”

मेरे शरीर में सिहरन दौड़ गई।

“कौन?”

लेकिन उसने जवाब नहीं दिया।

करीब पाँच मिनट बाद मुझे सड़क के किनारे एक विशाल बरगद दिखाई दिया।

उसकी टहनियाँ सड़क के ऊपर तक फैली हुई थीं।

रात के अंधेरे में वह किसी विशाल जीव जैसा लग रहा था।

मैंने अनजाने में एक्सीलेटर दबा दिया।

मैं उस जगह से जितनी जल्दी हो सके निकल जाना चाहता था।

लेकिन तभी इंजन ने झटका खाया।

फिर दूसरा।

और अगले ही पल गाड़ी बंद हो गई।

सड़क के बिल्कुल बीच में।

मैंने कई बार चाबी घुमाई।

कुछ नहीं हुआ।

दिल की धड़कनें और तेज हो गईं।

मैंने पीछे देखा।

दुल्हन पहली बार सीधे मेरी तरफ देख रही थी।

उसकी आँखों में ऐसा डर था जो पहले नहीं था।

वह फुसफुसाई,

“वे आ गए।”

मेरी रीढ़ में बिजली-सी दौड़ गई।

मैंने तुरंत बाहर देखा।

सड़क खाली थी।

कोई नहीं।

लेकिन फिर मुझे कुछ दिखाई दिया।

बरगद के पीछे।

जैसे कोई खड़ा हो।

फिर दूसरा।

फिर तीसरा।

धीरे-धीरे कई आकृतियाँ अंधेरे से बाहर आने लगीं।

उनकी चाल सामान्य नहीं थी।

वे बहुत धीरे चल रही थीं।

लेकिन हर सेकंड सड़क के और करीब पहुँच रही थीं।

मैंने आँखें मलीं।

सोचा शायद भ्रम है।

लेकिन नहीं।

वे सचमुच वहाँ थीं।

लगभग दस-बारह लोग।

सबके शरीर धुंधले।

चेहरे पहचान में नहीं आ रहे थे।

जैसे किसी ने उनकी आकृतियों को धुएँ से बना दिया हो।

मेरा गला सूख गया।

“ये कौन हैं?”

मैंने पूछा।

दुल्हन की नजरें उन आकृतियों पर जमी थीं।

उसकी आवाज काँप रही थी।

“मेरी बारात।”

मैं कुछ समझ नहीं पाया।

उसने आगे कहा,

“जिस रात मैं मरी थी… वे भी मारे गए थे।”

मेरे हाथ बर्फ जैसे ठंडे हो गए।

दूर खड़ी वे आकृतियाँ अब सड़क पर फैल चुकी थीं।

और तभी मुझे एक बात समझ आई।

उन सबने शादी वाले कपड़े पहन रखे थे।

कुछ के सिर पर साफे थे।

कुछ के कंधों पर शॉल।

कुछ के हाथों में अब भी मुरझाई मालाएँ थीं।

लेकिन उनके चेहरे…

चेहरे पूरी तरह अंधेरे में डूबे हुए थे।

अचानक उनमें से एक आकृति ने अपना सिर उठाया।

और सीधे मेरी तरफ देखने लगी।

उसी क्षण गाड़ी का हॉर्न अपने आप बज उठा।

लगातार।

बिना रुके।

मैंने घबराकर हाथ हटाए।

मैं हॉर्न को छू भी नहीं रहा था।

लेकिन वह लगातार बज रहा था।

पूरी सुनसान सड़क में उसकी आवाज गूँजने लगी।

और तभी उन सभी आकृतियों ने एक साथ हमारी तरफ बढ़ना शुरू कर दिया।

पहले धीरे।

फिर तेजी से।

बहुत तेजी से।

इतनी तेजी से कि कुछ ही सेकंड में वे सड़क के बीच तक पहुँच गईं।

मैंने घबराकर फिर चाबी घुमाई।

एक बार।

दो बार।

तीन बार।

फिर अचानक इंजन स्टार्ट हो गया।

मैंने पूरी ताकत से एक्सीलेटर दबाया।

गाड़ी आगे उछली।

पीछे मुड़कर देखने की हिम्मत नहीं हुई।

लेकिन कुछ सेकंड बाद मुझे एहसास हुआ कि पीछे वाली सीट पर बैठी दुल्हन लगातार खिड़की से बाहर देख रही थी।

उसकी आँखों में आँसू थे।

और वह बहुत धीमी आवाज में एक ही बात दोहरा रही थी।

“उन्होंने मुझे छोड़कर नहीं जाना चाहा था…”

मैं कुछ पूछ पाता उससे पहले अचानक उसने मेरी तरफ देखा।

और पहली बार उसके चेहरे पर डर नहीं…

बल्कि चेतावनी थी।

“वे हमारे पीछे आ रहे हैं।”

मैंने तुरंत रियर व्यू मिरर में देखा।

और अगले ही पल मेरे हाथों की पकड़ स्टीयरिंग पर ढीली पड़ गई।

क्योंकि सड़क के पीछे…

हेडलाइट की रोशनी से बहुत दूर…

दर्जनों धुंधली आकृतियाँ हमारी गाड़ी के पीछे दौड़ रही थीं।

और वे इंसानों की तरह नहीं दौड़ रही थीं।

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