Kashmir Ghost Story in Hindi | डल झील की वह यात्रा जो खत्म नहीं हुई

उस सुबह श्रीनगर एयरपोर्ट पर उतरते ही सबसे पहले जो चीज़ विवेक सरीन ने महसूस की, वह ठंडी हवा नहीं थी। उसे लगा जैसे किसी ने बहुत देर तक उसे दूर से देखते रहने के बाद आखिरकार पहचान लिया हो। यह एहसास इतना हल्का था कि वह खुद भी उस पर हंस पड़ा। पिछले छह महीनों से लगातार काम करते-करते उसका दिमाग थक चुका था। वह मुंबई की एक बड़ी कंपनी में “इमर्सिव ट्रैवल एक्सपीरियंस डिज़ाइनर” था। उसका काम अलग-अलग राज्यों के पर्यटन विभागों के लिए ऐसे डिजिटल अनुभव तैयार करना था जिनमें लोग वीआर हेडसेट लगाकर किसी जगह को पहले ही महसूस कर सकें। विडंबना यह थी कि वह दूसरों के लिए यात्राएं डिजाइन करता था, लेकिन खुद कहीं जा नहीं पाता था। इस बार उसने पहली बार अकेले कश्मीर आने का फैसला किया था। कोई दोस्त नहीं, कोई ऑफिस कॉल नहीं, कोई कैमरा क्रू नहीं। सिर्फ एक बैकपैक, एक कैमरा और दस दिनों की छुट्टी। Kashmir Ghost Story in Hindi

Kashmir Ghost Story in Hindi

एयरपोर्ट के बाहर टैक्सी वालों की आवाज़ें लगातार गूंज रही थीं। कोई गुलमर्ग का पैकेज बता रहा था, कोई पहलगाम का। विवेक ने पहले से बुक की हुई टैक्सी ढूंढ़ ली। ड्राइवर का नाम यूसुफ था। उम्र पचास के आसपास होगी। चेहरे पर अजीब-सी शांति थी। उसने सामान डिक्की में रखते हुए सिर्फ इतना पूछा, “पहली बार आए हैं?”

“हाँ।”

“अच्छा है। पहली बार आने वाले लोग यहाँ की खूबसूरती देखते हैं। दूसरी बार आने वाले कुछ और देखने लगते हैं।”

विवेक मुस्कराया। “और तीसरी बार?”

यूसुफ ने इंजन स्टार्ट करते हुए शीशे में उसकी तरफ देखा।

“तीसरी बार बहुत कम लोग आते हैं।”

बात कहकर वह चुप हो गया।

रास्ते भर सड़क के दोनों तरफ चिनार के पेड़, दूर बर्फ से ढकी चोटियाँ और झीलों पर तैरती धूप किसी पोस्टकार्ड जैसी लग रही थी। विवेक बार-बार कैमरा निकालता, फिर रख देता। उसे लग रहा था कि तस्वीरें इस जगह के साथ न्याय नहीं कर पाएंगी।

उसका ठहरने का इंतज़ाम डल झील के किनारे एक पुराने लेकिन अच्छी तरह संभाले गए हाउसबोट में था। मालिक का नाम फ़ैज़ान था। लगभग चालीस साल का, विनम्र और बेहद बातचीत करने वाला इंसान। उसने कश्मीरी कहवा पिलाते हुए बताया कि यह हाउसबोट उसके दादा के समय से चल रही है।

“यहाँ रातें बहुत शांत होती हैं,” उसने मुस्कुराकर कहा।

“यही तो चाहिए।”

फ़ैज़ान ने जवाब नहीं दिया। उसने बस कुछ पल तक विवेक को देखा और फिर बाहर चला गया।

शाम होते-होते डल झील का रंग बदल गया। पानी पर पड़ती सुनहरी रोशनी धीरे-धीरे नीली होने लगी। दूर शिकारे तैर रहे थे। बच्चे हँस रहे थे। पर्यटक तस्वीरें खींच रहे थे। हर चीज़ बिल्कुल सामान्य थी।

विवेक देर तक डेक पर बैठा रहा। फिर कमरे में लौटकर लैपटॉप खोला ताकि दिनभर की तस्वीरें कॉपी कर सके।

कैमरे की पहली सौ तस्वीरें बिल्कुल सामान्य थीं।

एयरपोर्ट।

सड़क।

पहाड़।

चिनार।

डल झील।

लेकिन आखिरी तस्वीर पर आते ही उसका हाथ रुक गया।

तस्वीर उसी समय की थी जब टैक्सी एयरपोर्ट से निकल रही थी।

पीछे की सीट पर वह अकेला बैठा था।

फिर भी तस्वीर के सबसे बाएँ कोने में किसी का कंधा दिखाई दे रहा था।

काले ऊनी कपड़े जैसा कुछ।

विवेक ने तस्वीर ज़ूम की।

कंधे के साथ आधा हाथ भी दिख रहा था।

जैसे कोई बिल्कुल उसके बगल में बैठा हो।

उसने माथा सिकोड़ लिया।

शायद कैमरे की स्ट्रैप होगी।

उसने अगली तस्वीर खोली।

कंधा गायब था।

“अजीब है…”

उसने बात वहीं खत्म कर दी।

रात को लगभग ग्यारह बजे वह सो गया।

करीब डेढ़ घंटे बाद उसकी आँख खुली।

कोई आवाज़ नहीं थी।

फिर भी नींद टूट गई।

कमरे में पूरी खामोशी थी।

हाउसबोट हल्के-हल्के पानी पर हिल रही थी।

उसने करवट बदली।

उसी समय लकड़ी के फर्श से बेहद धीमी चरमराहट सुनाई दी।

जैसे कोई नंगे पैर धीरे-धीरे चल रहा हो।

विवेक ने सोचा शायद फ़ैज़ान होगा।

फिर याद आया…

फ़ैज़ान शाम को बता चुका था कि रात में वह किनारे बने अपने घर चला जाता है।

पूरा हाउसबोट सिर्फ विवेक के लिए था।

चरमराहट फिर सुनाई दी।

इस बार उसके कमरे के बाहर।

एक कदम।

फिर दूसरा।

फिर तीसरा।

आवाज़ दरवाज़े के ठीक सामने आकर रुक गई।

विवेक कुछ सेकंड तक चुप पड़ा रहा।

फिर उसने हिम्मत करके पूछा, “कौन है?”

Kashmir Ghost Story in Hindi

कोई जवाब नहीं।

उसने मोबाइल उठाकर समय देखा।

1:37 AM.

उसी क्षण दरवाज़े के दूसरी तरफ से किसी ने बहुत हल्के से लकड़ी पर उंगलियाँ रखीं।

ठक…

सिर्फ एक बार।

इतनी धीमी कि शायद भ्रम भी हो सकता था।

विवेक धीरे-धीरे बिस्तर से उतरा।

दरवाज़े तक गया।

कुछ सेकंड तक सुनता रहा।

बाहर फिर सन्नाटा।

उसने लॉक खोला और दरवाज़ा खोल दिया।

गलियारा खाली था।

लकड़ी के लंबे कॉरिडोर में लगी पीली लाइटें स्थिर जल रही थीं।

बाहर झील पर चाँद का प्रतिबिंब हिल रहा था।

कोई नहीं।

वह हल्का-सा मुस्कुराया।

“नई जगह… बस दिमाग खेल रहा है।”

वह वापस कमरे में लौटने ही वाला था कि उसकी नज़र फर्श पर पड़ी।

लकड़ी पर पानी के छोटे-छोटे गीले निशान बने हुए थे।

जैसे कोई भीगे पैरों से अभी-अभी वहाँ से गुज़रा हो।

निशान उसके दरवाज़े तक आते थे।

लेकिन वापस कहीं नहीं जाते थे।

वे ठीक उसके कमरे के सामने खत्म हो गए थे।

विवेक झुककर उन्हें देखने लगा।

हाथ लगाया।

पानी बिल्कुल ठंडा था।

इतना ठंडा कि उंगलियाँ सुन्न होने लगीं।

उसने तुरंत हाथ खींच लिया।

कुछ पल बाद फिर देखा…

फर्श पूरी तरह सूखा था।

जैसे वहाँ कभी कोई निशान थे ही नहीं।

वह देर तक वहीं खड़ा रहा।

फिर खुद को समझाकर कमरे में लौट आया।

सुबह जब उसकी आँख खुली तो सूरज निकल चुका था। पिछली रात की घटना उसे किसी अधूरे सपने जैसी लग रही थी। उसने तय किया कि पूरे दिन घूमेगा ताकि बेकार की बातें दिमाग से निकल जाएँ।

उसने सबसे पहले शंकराचार्य पहाड़ी की ओर जाने का कार्यक्रम बनाया। ऊपर से पूरा श्रीनगर किसी चित्र की तरह दिखाई देता था। लोग फोटो खींच रहे थे। हवा साफ थी। सब कुछ सामान्य।

वहीं एक स्थानीय फोटोग्राफर पर्यटकों की तस्वीरें खींच रहा था।

विवेक ने भी कुछ तस्वीरें खिंचवा लीं।

फोटोग्राफर ने कैमरा वापस देते हुए कहा, “सर, एक फोटो तो बहुत अलग आई है।”

“क्यों?”

“आपके पीछे कोई खड़ा था क्या?”

“नहीं।”

उसने कैमरे की स्क्रीन दिखाई।

विवेक का चेहरा साफ था।

पीछे दूर घाटी दिख रही थी।

लेकिन उसकी परछाईं…

ज़मीन पर अकेली नहीं थी।

उसके साथ एक दूसरी परछाईं भी थी।

मानो कोई उसके बिलकुल पीछे खड़ा हो।

फोटोग्राफर हँस पड़ा।

“शायद लाइट का इफेक्ट होगा।”

विवेक भी मुस्कुरा दिया।

लेकिन उसने दोबारा तस्वीर देखी।

दूसरी परछाईं की गर्दन इंसान जैसी नहीं थी।

वह एक अजीब कोण पर झुकी हुई थी।

और सबसे विचित्र बात…

आसपास खड़े किसी भी दूसरे पर्यटक की ज़मीन पर कोई अतिरिक्त परछाईं नहीं थी।

सिर्फ उसकी।

उसने बिना कुछ कहे कैमरा बैग में रखा।

पहली बार उसे महसूस हुआ…

शायद कश्मीर की इस यात्रा में कोई ऐसी चीज़ उसके साथ चल पड़ी थी जिसे उसने अभी तक देखा नहीं था।

विवेक ने कैमरा बैग बंद किया, लेकिन उसके बाद पूरे दिन उसका ध्यान किसी भी खूबसूरत दृश्य पर टिक नहीं पाया। हर बार जब वह किसी पहाड़, झील या सड़क की तस्वीर लेने के लिए कैमरा उठाता, उसे लगता जैसे फ्रेम के बाहर कोई और भी मौजूद है। वह कई बार अचानक पीछे मुड़कर देखता, मगर हर बार वहाँ सामान्य पर्यटक, स्थानीय लोग या हवा में झूमते चिनार के पेड़ ही दिखाई देते।

शाम को वह डल झील लौटा तो फ़ैज़ान ने उसके चेहरे की बेचैनी पहचान ली।

“घूमना कैसा रहा?”

“अच्छा था… लेकिन एक अजीब बात हुई।”

विवेक ने कैमरे वाली तस्वीरें दिखा दीं।

फ़ैज़ान काफी देर तक स्क्रीन को देखता रहा। उसके चेहरे का रंग धीरे-धीरे बदलने लगा।

“ये तस्वीरें आपने किसी एडिटिंग ऐप से तो नहीं छेड़ी?”

“नहीं।”

“इनकी कॉपी किसी को मत देना।”

“क्यों?”

फ़ैज़ान ने सीधे जवाब नहीं दिया।

“अगर अगले दो-तीन दिन सब सामान्य रहे तो इन्हें भूल जाइए। अगर नहीं रहे… तब मुझसे दोबारा बात कीजिए।”

उस रात विवेक ने तय किया कि वह डर को खुद पर हावी नहीं होने देगा। उसने जल्दी खाना खाया और कमरे की सभी लाइटें जलाकर लैपटॉप पर फिल्म देखने लगा।

करीब बारह बजे अचानक इंटरनेट बंद हो गया।

उसने मोबाइल उठाया।

नेटवर्क भी गायब था।

ठीक उसी समय कमरे के बाहर पानी में किसी शिकारे के धीरे-धीरे गुजरने की आवाज़ आई।

यह सामान्य बात थी।

लेकिन कुछ सेकंड बाद उसे एहसास हुआ कि शिकारा आगे नहीं बढ़ रहा था।

आवाज़ लगातार एक ही जगह से आ रही थी।

जैसे कोई हाउसबोट के बिल्कुल पास खड़ा होकर चप्पू को सिर्फ पानी में हिला रहा हो।

वह खिड़की तक गया।

बाहर पूरा अंधेरा था।

झील पर हल्का कोहरा उतर आया था।

बहुत ध्यान से देखने पर उसे एक शिकारा दिखाई दिया।

उसमें सिर्फ एक व्यक्ति बैठा था।

उसने लंबा गहरा फ़ेरन पहन रखा था।

चेहरा दिखाई नहीं दे रहा था।

विवेक ने सोचा शायद कोई मछुआरा होगा।

लेकिन अगले ही पल उस आदमी ने चप्पू चलाना बंद कर दिया।

धीरे-धीरे उसने अपना सिर ऊपर उठाया।

दोनों के बीच मुश्किल से बीस-पच्चीस मीटर की दूरी रही होगी।

फिर भी चेहरा साफ नहीं दिख रहा था।

ऐसा लग रहा था जैसे कोहरा सिर्फ उसी चेहरे के आसपास जमा हो।

विवेक ने मोबाइल निकालकर ज़ूम करने की कोशिश की।

स्क्रीन पर शिकारा दिखाई दे रहा था।

लेकिन जहाँ आदमी बैठा था, वहाँ सिर्फ धुंध थी।

उसने कैमरा नीचे किया।

अब वह आदमी फिर दिखाई दे रहा था।

विवेक का दिल तेज़ी से धड़कने लगा।

उसने दोबारा स्क्रीन देखी।

फिर वही खाली जगह।

जैसे कैमरा उस इंसान को रिकॉर्ड ही नहीं कर पा रहा हो।

अचानक शिकारा बिना चप्पू चले पीछे की ओर खिसकने लगा।

धीरे-धीरे…

फिर कोहरे में पूरी तरह गायब हो गया।

अगली सुबह उसने तय किया कि अब हाउसबोट बदल देगा।

लेकिन फ़ैज़ान ने कहा कि सीज़न के कारण आसपास सब कुछ पहले से बुक है।

“अगर चाहें तो दो दिन बाद दूसरी जगह मिल सकती है।”

विवेक ने अनमने मन से हामी भर दी।

उस दिन वह गुलमर्ग के लिए निकल गया।

रास्ते में पहाड़ों के बीच बर्फ के छोटे-छोटे टुकड़े अब भी दिखाई दे रहे थे। पर्यटक घुड़सवारी कर रहे थे, बच्चे हँस रहे थे, केबल कार की लंबी लाइन लगी थी। कुछ घंटों के लिए उसे सचमुच लगा कि पिछली दो रातें सिर्फ मानसिक थकान का असर थीं।

वह एक ऊँचे व्यू-पॉइंट पर पहुँचा और कैमरे को ट्राइपॉड पर रखकर टाइमर मोड में अपनी तस्वीर लेने लगा।

कैमरा क्लिक हुआ।

वह तस्वीर देखने लगा।

इस बार उसका खून जैसे जम गया।

तस्वीर में वह अकेला नहीं था।

उसके दाईं ओर वही गहरे रंग का फ़ेरन पहने आदमी खड़ा था।

चेहरा अब भी धुंधला था।

लेकिन पहली बार उसकी एक चीज़ साफ दिखाई दे रही थी।

उसके पैरों के नीचे बर्फ बिल्कुल साफ थी।

कोई निशान नहीं।

जबकि विवेक के जूतों के गहरे निशान साफ दिखाई दे रहे थे।

वह घबराकर पीछे मुड़ा।

वहाँ कोई नहीं था।

उसी समय उसका कैमरा अपने आप बंद हो गया।

नई बैटरी होने के बावजूद।

उस रात वह वापस श्रीनगर लौटा तो पहली बार उसने फ़ैज़ान से साफ-साफ कहा, “मुझे सच बताइए।”

फ़ैज़ान काफी देर तक चुप रहा।

फिर बोला, “करीब सात साल पहले सर्दियों में एक पर्यटक यहाँ अकेला ठहरा था। वह भी कैमरे से हर जगह तस्वीरें खींचता था। उसने दावा किया था कि कोई आदमी हर तस्वीर में आ रहा है। सबने मज़ाक समझा। तीसरी रात वह गायब हो गया।”

“मिला नहीं?”

“मिला था…”

“कहाँ?”

“यहीं… इसी कमरे में।”

विवेक की साँस रुक गई।

“लेकिन अजीब बात यह थी कि दरवाज़ा अंदर से बंद था। कमरे में किसी के आने-जाने का कोई निशान नहीं था। और…”

फ़ैज़ान रुक गया।

“और?”

“उसके कैमरे की आखिरी तस्वीर में बिस्तर पर कोई नहीं सो रहा था।”

“मतलब?”

“कैमरा कमरे के कोने में रखा था। तस्वीर में बिस्तर खाली था… लेकिन वह आदमी उसी समय उसी बिस्तर पर मृत मिला।”

विवेक ने कुछ नहीं कहा।

उस रात उसने सोने की कोशिश भी नहीं की।

करीब तीन बजे कमरे का तापमान अचानक गिर गया।

साँस से धुआँ निकलने लगा।

बिना हवा के भी परदे हिलने लगे।

कमरे के बीचोंबीच रखी कुर्सी बहुत धीरे-धीरे अपनी जगह से खिसकने लगी।

लकड़ी घिसटने की आवाज़ पूरे कमरे में गूँजने लगी।

विवेक पीछे हट गया।

कुर्सी अपने आप रुक गई।

फिर किसी अदृश्य व्यक्ति के बैठने की तरह उसका गद्दा हल्का-सा दब गया।

अब कमरे में कोई दिखाई नहीं दे रहा था…

लेकिन कुर्सी पर कोई मौजूद था।

विवेक ने काँपते हाथों से मोबाइल का कैमरा ऑन किया।

स्क्रीन पर कुर्सी खाली नहीं थी।

उस पर वही फ़ेरन पहने आदमी बैठा था।

इस बार उसका चेहरा धीरे-धीरे साफ होने लगा।

विवेक की आँखें फैल गईं।

वह चेहरा उसी का था।

लेकिन बहुत बूढ़ा।

सफेद बाल।

झुर्रियाँ।

सूनी आँखें।

मोबाइल उसके हाथ से छूट गया।

जब उसने दोबारा ऊपर देखा…

कुर्सी खाली थी।

सुबह होते ही उसने बिना एक मिनट गंवाए हाउसबोट छोड़ दिया और सीधे एयरपोर्ट पहुँच गया।

किसी तरह पहली उपलब्ध फ्लाइट में सीट मिली।

जैसे ही विमान ने उड़ान भरी, उसे पहली बार लगा कि सब खत्म हो गया।

मुंबई लौटकर उसने खुद को काम में झोंक दिया।

धीरे-धीरे डर कम होने लगा।

उसने कैमरे की सारी तस्वीरें हार्ड ड्राइव में सेव कर दीं और कैमरा अलमारी में रख दिया।

करीब चार महीने बाद एक दिन उसे एक ईमेल मिला।

भेजने वाले का नाम नहीं था।

सिर्फ एक अटैचमेंट।

उसने फ़ाइल खोली।

वह एक तस्वीर थी।

लेकिन यह तस्वीर उसने कभी नहीं खींची थी।

उसमें उसका मुंबई वाला फ्लैट दिखाई दे रहा था।

खिड़की के बाहर रात थी।

कमरे के अंदर वह लैपटॉप पर काम कर रहा था।

और उसके पीछे…

ठीक उसकी कुर्सी से कुछ कदम दूर…

वही फ़ेरन पहने आकृति खड़ी थी।

इस बार उसका चेहरा पूरी तरह साफ था।

वह कोई अजनबी नहीं था।

वह स्वयं विवेक था।

लेकिन उम्र लगभग अस्सी वर्ष।

आँखों में अजीब-सी खाली मुस्कान।

तस्वीर के नीचे सिर्फ एक पंक्ति लिखी थी—

“यात्राएँ कभी खत्म नहीं होतीं… कुछ जगहें लौटने का इंतज़ार नहीं करतीं, वे तुम्हारे साथ लौट आती हैं।”

घबराकर विवेक अपने पीछे मुड़ा।

कमरा खाली था।

उसने तुरंत फिर स्क्रीन की ओर देखा।

तस्वीर बदल चुकी थी।

अब उसमें सिर्फ उसका खाली कमरा दिखाई दे रहा था।

अगले दिन उसने वह ईमेल फिर खोलना चाहा।

इनबॉक्स में ऐसा कोई संदेश था ही नहीं।

उसने हार्ड ड्राइव खोली।

कश्मीर की पूरी फ़ोल्डर गायब थी।

कैमरा निकाला।

उसकी मेमोरी कार्ड भी बिल्कुल खाली थी।

मानो वह यात्रा कभी हुई ही न हो।

सिर्फ एक चीज़ बची थी।

उसके मोबाइल की गैलरी में एक धुंधली-सी सेल्फी।

वह तस्वीर एयरपोर्ट की थी।

उतरने के कुछ मिनट बाद की।

विवेक मुस्कुरा रहा था।

और उसके ठीक पीछे…

भीड़ के बीच…

वही बूढ़ा चेहरा कैमरे की तरफ देख रहा था।

इस बार धुंध नहीं थी।

उसकी मुस्कान बिल्कुल साफ दिखाई दे रही थी।

और सबसे डरावनी बात…

तस्वीर के मेटाडेटा में समय दर्ज था—

चार महीने बाद की एक तारीख।

यानी वह तस्वीर उस दिन ली ही नहीं गई थी…

जिस दिन विवेक कश्मीर पहुँचा था।

वह किसी ऐसे दिन ली गई थी…

जो उस समय अभी आया ही नहीं था।

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