दोपहर के लगभग साढ़े तीन बजे थे। शहर की सबसे व्यस्त सड़कों में से एक पर ट्रैफिक हमेशा की तरह धीरे-धीरे रेंग रहा था। फुटपाथ पर चलते लोग अपने-अपने कामों में इतने व्यस्त थे कि किसी के पास किसी को देखने का समय नहीं था। उसी भीड़ के बीच विवान शर्मा अपनी कार पार्क करके एक बहुमंजिला रिहायशी इमारत की ओर बढ़ा। उसके हाथ में केवल एक लेदर फोल्डर, कुछ रंगों के सैंपल और एक छोटा-सा मापने वाला टेप था। पिछले दस सालों से वह लक्ज़री इंटीरियर स्टाइलिस्ट के रूप में काम कर रहा था। उसके लिए हर घर सिर्फ ईंट-पत्थर का ढांचा नहीं होता था। वह मानता था कि हर घर की अपनी एक अलग पहचान, अपनी खुशबू और अपना स्वभाव होता है। कई बार वह केवल ड्रॉइंग रूम में पाँच मिनट बैठकर बता देता था कि घर में रहने वाले लोग खुले विचारों के हैं या हर समय तनाव में रहते हैं। उसके क्लाइंट अक्सर मज़ाक में कहते थे कि वह इंटीरियर डिज़ाइनर कम और लोगों के दिमाग पढ़ने वाला आदमी ज़्यादा लगता है। विवान हँसकर बात टाल देता, लेकिन सच यह था कि उसे जगहों को महसूस करने की आदत थी। Obsession Real Story

उस दिन उसे जिस अपार्टमेंट में जाना था, वह हाल ही में खरीदा गया एक पेंटहाउस था। मालिक का नाम निखिल सूद था, जिसने फोन पर केवल इतना कहा था कि वह पूरे घर का इंटीरियर बदलवाना चाहता है। बातचीत के दौरान निखिल की आवाज़ सामान्य थी, लेकिन उसमें एक अजीब-सी जल्दबाज़ी महसूस हो रही थी। जैसे वह किसी कारण से चाहता हो कि काम जितनी जल्दी हो सके शुरू हो जाए। विवान ने उस समय इस बात पर ज़्यादा ध्यान नहीं दिया था। बड़े क्लाइंट अक्सर ऐसे ही होते थे।
लिफ्ट से ऊपर पहुँचकर उसने डोरबेल बजाई। कुछ सेकंड बाद दरवाज़ा खुला। सामने करीब चालीस साल का एक व्यक्ति खड़ा था। चेहरे पर हल्की थकान, आँखों के नीचे गहरे काले घेरे और मुस्कुराने की कोशिश के बावजूद अजीब-सी बेचैनी साफ दिखाई दे रही थी।
“विवान?”
“जी।”
“आइए… आपका ही इंतज़ार था।”
घर अंदर से उम्मीद से कहीं ज़्यादा सुंदर था। ऊँची छत, बड़े काँच के पैनल, दूर तक दिखाई देता शहर और महँगे फर्नीचर के बावजूद घर में कुछ अधूरापन था। ऐसा लग रहा था जैसे किसी ने सब कुछ सजाकर अचानक बीच में काम छोड़ दिया हो। सबसे ज़्यादा अजीब बात यह थी कि दीवारों पर एक भी तस्वीर नहीं लगी थी। इतने बड़े घर में एक भी फोटो फ्रेम न होना असामान्य था।
विवान आदतन हर कमरे को ध्यान से देखने लगा। वह दीवारों की बनावट, रोशनी का कोण, लकड़ी का रंग और खिड़कियों की दिशा नोट करता जा रहा था। तभी उसकी नज़र ड्रॉइंग रूम के एक कोने पर पड़ी।
वहाँ एक लकड़ी की पुरानी रॉकिंग चेयर रखी थी।
Obsession Real Story
बाकी पूरा घर आधुनिक था, लेकिन वह कुर्सी जैसे किसी दूसरी दुनिया से उठाकर यहाँ रख दी गई हो। उसकी लकड़ी पर महीन नक्काशी थी, किनारों पर हल्का घिसाव था और उसकी चमक बता रही थी कि कोई उसे बहुत संभालकर रखता रहा होगा।
विवान अनायास उसकी तरफ बढ़ गया।
“यह कुर्सी…?” उसने पूछा।
निखिल कुछ पल चुप रहा। फिर बोला, “इसे हटाना है।”
“इतनी खूबसूरत है। बाकी फर्नीचर से मेल नहीं खाती, लेकिन इसे रिस्टोर किया जाए तो शानदार लगेगी।”
निखिल ने तुरंत सिर हिला दिया।
“नहीं। इसे घर से बाहर करना है।”
उसने यह बात सामान्य लहजे में नहीं कही थी। उसमें एक तरह की घबराहट थी।
विवान ने मुस्कुराकर बात बदल दी। “ठीक है। अगर आप नहीं रखना चाहते तो हटवा देंगे।”
वह जैसे ही कुर्सी के पास पहुँचा, उसे एक हल्की-सी खुशबू महसूस हुई।
चमेली।
बहुत हल्की… लेकिन साफ।
उसने पूरे कमरे में नज़र दौड़ाई।
कहीं फूल नहीं थे।
कोई रूम फ्रेशनर भी नहीं।
फिर यह खुशबू आ कहाँ से रही थी?
“आपने कोई फ्रेगरेंस इस्तेमाल की है?” विवान ने पूछा।
निखिल ने बिना उसकी तरफ देखे जवाब दिया, “नहीं।”
विवान ने दोबारा कुर्सी की तरफ देखा।
खुशबू वहीं से आ रही थी।
उसने हाथ बढ़ाकर कुर्सी के हत्थे को छुआ।
लकड़ी बिल्कुल ठंडी थी।
इतनी ठंडी कि एक पल के लिए उसे लगा जैसे उसने लकड़ी नहीं, बर्फ को छू लिया हो।
उसने तुरंत हाथ पीछे खींच लिया।
“सब ठीक है?” निखिल ने पूछा।
“हाँ… बस लकड़ी थोड़ी ठंडी है।”
निखिल पहली बार उसकी आँखों में देखने लगा।
“आपको भी ठंडी लगी?”
विवान ने सहजता से कहा, “हाँ… शायद एसी की वजह से।”
निखिल ने कोई जवाब नहीं दिया।
उसकी चुप्पी सामान्य नहीं थी।
कुछ देर बाद दोनों घर का बाकी हिस्सा देखने लगे। बेडरूम, ड्रेसिंग एरिया, स्टडी, टैरेस… सब कुछ व्यवस्थित था। विवान अपने नोट्स लिखता जा रहा था, लेकिन बार-बार उसका ध्यान उसी कुर्सी की तरफ लौट रहा था। उसे समझ नहीं आ रहा था कि आखिर उसमें ऐसा क्या है जो उसका ध्यान बार-बार खींच रहा है।
करीब एक घंटे बाद मीटिंग खत्म हुई।
दरवाज़े तक छोड़ने आए निखिल ने अचानक कहा, “अगर संभव हो… तो उस कुर्सी को सबसे पहले हटवा दीजिए।”
“इतनी जल्दी?”
“हाँ।”
“कोई खास वजह?”
निखिल ने होंठ खोले, जैसे कुछ कहना चाहता हो।
फिर उसने बात बदल दी।
“बस… उसे यहाँ नहीं रखना चाहता।”
विवान ने सिर हिलाया और बाहर निकल गया।
लिफ्ट नीचे उतर रही थी, लेकिन उसका मन ऊपर उसी अपार्टमेंट में अटका हुआ था। उसने खुद से कहा कि यह केवल एक पुरानी एंटीक कुर्सी है, इससे ज़्यादा कुछ नहीं। लेकिन जितना वह उसे भूलने की कोशिश करता, उतनी ही साफ उसकी तस्वीर दिमाग में उभर आती।
शाम तक उसने दो और क्लाइंट्स से मुलाकात की।
पहले घर में जब उसने लिविंग रूम का लेआउट देखा तो एक पल के लिए उसे लगा कि कमरे के कोने में वही रॉकिंग चेयर रखी है।
उसने दोबारा देखा।
वहाँ केवल एक साधारण आर्मचेयर थी।
वह हल्का-सा मुस्कुराया।
“लगता है आज ज़्यादा काम कर लिया।”
लेकिन बात वहीं खत्म नहीं हुई।
दूसरे घर में उसने एक दीवार की ओर देखा।
उसे साफ महसूस हुआ कि कोई महिला उस दीवार के पास खड़ी है।
सफेद नहीं…
काले कपड़ों में भी नहीं…
बस हल्के भूरे रंग का साधारण सूती कुर्ता पहने हुए।
चेहरा पूरी तरह दिखाई नहीं दे रहा था।
वह केवल एक पल के लिए दिखी।
अगले ही क्षण वहाँ कोई नहीं था।
“सर?” क्लाइंट की आवाज़ से वह चौंका।
“जी?”
“आप किसे देख रहे थे?”
विवान ने तुरंत सिर हिलाया।
“कुछ नहीं… बस दीवार का टेक्सचर देख रहा था।”
घर से निकलते समय उसने खुद को समझाया कि लगातार काम की वजह से दिमाग थक गया है।
लेकिन रात को जब वह अपने फ्लैट पहुँचा और कपड़े बदलकर सोफे पर बैठा, तब अचानक उसे फिर वही चमेली की खुशबू महसूस हुई।
इस बार इतनी स्पष्ट…
कि जैसे किसी ने अभी-अभी ताज़े फूल उसके बिल्कुल पास रख दिए हों।
उसने पूरा घर देख डाला।
बालकनी।
किचन।
बेडरूम।
स्टोर।
कुछ नहीं।
खुशबू धीरे-धीरे गायब हो गई।
वह पानी पीकर वापस सोफे पर बैठा ही था कि उसकी नज़र सामने रखी खाली झूलने वाली कुर्सी पर पड़ी।
वह कुर्सी उसकी अपनी थी।
लेकिन अगले दो सेकंड के लिए उसे पूरा यकीन हो गया…
कि उस पर कोई बैठा हुआ है।
वह आकृति धुंधली थी।
चेहरा दिखाई नहीं दे रहा था।
सिर्फ इतना लगा जैसे कोई बहुत शांत होकर उसकी तरफ देख रहा हो।
विवान पलक झपक भी नहीं पाया।
और अगले ही पल…
कुर्सी फिर से बिल्कुल खाली थी।
उस रात विवान को नींद आने में काफी समय लग गया। उसने कई बार खुद को समझाने की कोशिश की कि लगातार काम करने की वजह से उसका दिमाग थक गया है। इंसान जब एक ही दिन में कई घर देखता है, अलग-अलग रोशनी, रंग और माहौल से गुजरता है, तो भ्रम होना कोई असामान्य बात नहीं। यही सोचते-सोचते कब उसकी आँख लग गई, उसे पता ही नहीं चला।
सुबह जब उसकी नींद खुली तो सबसे पहले उसकी नज़र उसी झूलने वाली कुर्सी पर गई। कुर्सी बिल्कुल अपनी जगह थी। कमरे में हल्की धूप फैल चुकी थी और रात वाला अजीब एहसास जैसे कहीं गायब हो चुका था। उसने राहत की साँस ली, खुद पर हँसा और नाश्ता करके दिन के काम पर निकल गया।
लेकिन दिन सामान्य नहीं था।
पहला अपॉइंटमेंट शहर के पुराने हिस्से में बने एक बड़े बंगले में था। घर का मालिक एक बुज़ुर्ग दंपति था, जो अपने बेटे के विदेश जाने के बाद घर को नया रूप देना चाहते थे। विवान ने मुख्य दरवाज़ा पार करते ही वही आदत दोहराई—कमरे को महसूस करना। दीवारों का रंग, फर्नीचर की दूरी, हवा का बहाव, प्राकृतिक रोशनी… सब कुछ।
फिर उसकी नज़र ड्रॉइंग रूम की खिड़की पर गई।
खिड़की के बाहर, बगीचे की ओर मुँह करके एक महिला खड़ी थी।
हल्के भूरे रंग का वही सूती कुर्ता।
बाल कमर तक खुले हुए।
चेहरा दिखाई नहीं दे रहा था।
विवान को लगा शायद घर की कोई सदस्य होगी।
उसने मुस्कुराकर पूछा, “मैडम भी यहीं रहती हैं?”
बुज़ुर्ग महिला ने हैरानी से उसकी ओर देखा।
“कौन मैडम?”
“वो… बाहर खड़ी हैं।”
दोनों पति-पत्नी ने एक साथ खिड़की की तरफ देखा।
बगीचा पूरी तरह खाली था।
बुज़ुर्ग आदमी ने धीमे स्वर में कहा, “वहाँ तो कोई नहीं है बेटा।”
विवान ने दोबारा देखा।
सचमुच…
वहाँ कोई नहीं था।
उसने तुरंत बात बदल दी।
“शायद बाहर सड़क पर किसी को देखा होगा।”
लेकिन उसने झूठ बोला था।
उसे अच्छी तरह याद था कि वह महिला बगीचे के बीचोंबीच खड़ी थी।
पूरी मीटिंग के दौरान उसका ध्यान बार-बार उसी खिड़की की तरफ जाता रहा। हर बार जगह खाली मिलती।
घर से निकलने के बाद उसने पहली बार खुद से एक सवाल पूछा—
अगर यह केवल भ्रम है… तो हर बार वही महिला क्यों?
शाम को वह अपने स्टूडियो पहुँचा। वहाँ उसकी सहायक रिद्धिमा पिछले तीन वर्षों से उसके साथ काम कर रही थी। वह विवान के स्वभाव को अच्छी तरह जानती थी। उसने उसे देखते ही कहा,
“सर, आज कुछ ठीक नहीं लग रहे।”
“ऐसा क्यों?”
“आपने पिछले दस मिनट में तीन बार एक ही ड्रॉइंग बनाई है।”
विवान ने सामने रखे स्केच की तरफ देखा।
वह सच कह रही थी।
उसने एक ही लिविंग रूम का लेआउट तीन अलग-अलग शीट्स पर लगभग एक जैसा बना दिया था।
उसे याद भी नहीं था कि उसने ऐसा कब किया।
रिद्धिमा ने हँसते हुए कहा, “लगता है छुट्टी चाहिए आपको।”
विवान भी मुस्कुरा दिया।
लेकिन तभी उसकी नज़र ड्रॉइंग शीट के कोने पर पड़ी।
वहाँ पेंसिल से बहुत हल्की रेखाओं में किसी ने एक झूलने वाली कुर्सी बना रखी थी।
इतनी बारीकी से कि लकड़ी की नक्काशी तक दिखाई दे रही थी।
विवान कुछ सेकंड तक उसे देखता रहा।
“ये तुमने बनाया?”
रिद्धिमा ने शीट उठाई।
“नहीं तो।”
“पक्का?”
“सर, मैं तो अभी आपके सामने बैठी हूँ।”
विवान ने शीट को पलटकर देखा।
पीछे कुछ नहीं था।
जब उसने दोबारा सामने देखा…
कुर्सी का स्केच गायब था।
पूरा कोना बिल्कुल खाली था।
उसके हाथ अपने-आप ठंडे पड़ गए।
उसने बिना कुछ कहे शीट मोड़कर डस्टबिन में डाल दी।
रिद्धिमा अब उसकी तरफ गंभीरता से देख रही थी।
“सर… सब ठीक है?”
“हाँ… बस थोड़ा सिर दर्द है।”
उस दिन उसने बाकी सारे काम रद्द कर दिए।
रात होने तक वह अपने फ्लैट लौट आया।
उसने तय किया कि आज जल्दी सो जाएगा।
लेकिन जैसे ही उसने बेडरूम की लाइट बंद की, ड्रॉइंग रूम से हल्की-सी आवाज़ आई।
टक…
एक सेकंड का अंतर।
टक…
आवाज़ इतनी धीमी थी कि कोई और शायद उस पर ध्यान भी न देता।
विवान उठकर बाहर आया।
पूरा कमरा शांत था।
फिर वही आवाज़ आई।
टक…
इस बार उसने स्रोत पहचान लिया।
उसकी झूलने वाली कुर्सी।
वह अपने-आप बहुत हल्के से आगे-पीछे हिल रही थी।
कमरे की सारी खिड़कियाँ बंद थीं।
पंखा भी बंद था।
फिर भी कुर्सी धीरे-धीरे झूल रही थी।
विवान उसके सामने जाकर खड़ा हो गया।
कुछ सेकंड बाद कुर्सी रुक गई।
उसने झुककर नीचे देखा।
पहियों या पैरों में कोई खराबी नहीं थी।
उसने हाथ से हल्का-सा धक्का दिया।
कुर्सी दो बार झूली और रुक गई।
“यही होगा,” उसने खुद से कहा, “शायद पहले से हिल रही थी।”
वह वापस मुड़ा ही था कि पीछे से एक बेहद धीमी आवाज़ आई।
“मत…”
विवान वहीं रुक गया।
उसने साँस रोक ली।
आवाज़ इतनी हल्की थी कि शायद वह शब्द भी नहीं था।
लेकिन उसे साफ सुनाई दिया था।
“मत…”
वह तुरंत पलटा।
कमरा खाली था।
कुर्सी बिल्कुल स्थिर।
उसका गला सूखने लगा।
उसने पूरा फ्लैट देख डाला।
मुख्य दरवाज़ा अंदर से बंद था।
बालकनी बंद।
किचन खाली।
वॉशरूम खाली।
कोई नहीं।
रात भर उसने टीवी चलाकर रखा, लेकिन नींद नहीं आई।
सुबह लगभग पाँच बजे उसकी आँख लग गई।
करीब सात बजे मोबाइल की घंटी से उसकी नींद टूटी।
स्क्रीन पर निखिल सूद का नाम चमक रहा था।
“हैलो?”
दूसरी तरफ कुछ क्षण तक कोई आवाज़ नहीं आई।
फिर निखिल बहुत धीमे स्वर में बोला,
“विवान… आपने उस कुर्सी को हटवाया?”
“अभी नहीं। कल टीम भेजने वाला था।”
कुछ सेकंड की खामोशी।
फिर निखिल ने कहा,
“मत भेजिए।”
“क्यों?”
उसकी साँसें तेज़ सुनाई दे रही थीं।
“क्योंकि… आज सुबह जब मैं उठा…”
वह बीच में रुक गया।
“क्या हुआ?”
“वो… कुर्सी अब ड्रॉइंग रूम में नहीं है।”
विवान का दिल एक पल के लिए जैसे रुक गया।
“क्या मतलब?”
“मैंने उसे कल रात खुद लॉक करके उसी कमरे में छोड़ा था।”
“तो अब कहाँ है?”
दूसरी तरफ से जवाब आने में कई सेकंड लगे।
जब निखिल ने आखिरकार बोलना शुरू किया…
उसकी आवाज़ काँप रही थी।
“वो… मेरे बेडरूम के ठीक बाहर रखी है।”
“और…”
“उस पर… किसी के बैठने के ताज़ा निशान हैं।”