The Cursed Book | Horror Story in Hindi

कभी-कभी इंसान किसी चीज़ को इसलिए खरीद लेता है क्योंकि वह दुर्लभ होती है। बाद में उसे समझ आता है कि कुछ चीज़ें दुर्लभ इसलिए होती हैं क्योंकि उनसे हर कोई छुटकारा पाना चाहता है। The Cursed Book Horror Story in Hindi

अनिरुद्ध मेहता तीस वर्ष का था और पुणे में दुर्लभ किताबों की मरम्मत का काम करता था। फटी हुई पांडुलिपियों को दोबारा जीवित करना, पुराने कागज़ों से फफूंद हटाना और चमड़े के कवर को फिर से तैयार करना उसका पेशा था। उसके छोटे-से स्टूडियो में सैकड़ों साल पुरानी किताबें आती रहती थीं। उसके लिए हर किताब सिर्फ कागज़ और स्याही का संग्रह थी। किसी किताब में श्राप या रहस्य होने जैसी बातें उसे केवल कहानियां लगती थीं।

The Cursed Book Horror Story in Hindi

एक सोमवार सुबह उसके स्टूडियो के बाहर एक कूरियर बॉक्स मिला। उस पर कोई प्रेषक नहीं था। अंदर मोटे काले कपड़े में लिपटी एक भारी किताब रखी थी। चमड़े का कवर पूरी तरह काला था और उस पर कोई नाम नहीं लिखा था। केवल बीच में उभरा हुआ एक गोल निशान था, जैसे किसी ने गर्म लोहे से उसे दाग दिया हो।

साथ में एक छोटा-सा कागज़ रखा था।

“इसे मत खोलना। अगर खोलो… तो इसे कभी अकेला मत छोड़ना।”

अनिरुद्ध हंस पड़ा। उसे लगा किसी ने प्रचार के लिए यह नाटक किया है। उसने किताब उठाई। वह उम्मीद से कहीं ज्यादा भारी थी। जैसे उसके अंदर केवल पन्ने नहीं, पत्थर रखे हों।

उसने दस्ताने पहने और किताब खोलने की कोशिश की। लेकिन कवर नहीं खुला। ऐसा लग रहा था जैसे किसी अदृश्य चीज़ ने उसे बंद कर रखा हो।

उसने उसे शेल्फ पर रख दिया और दूसरे काम में लग गया।

शाम तक सब सामान्य रहा।

रात आठ बजे वह स्टूडियो बंद करने लगा। तभी उसे पीछे से पन्ने पलटने की आवाज़ सुनाई दी।

फड़… फड़… फड़…

उसने मुड़कर देखा।

किताब खुली हुई थी।

उसने साफ याद किया था कि वह खुली नहीं थी।

वह धीरे-धीरे उसके पास गया।

अंदर के पन्ने बिल्कुल खाली थे।

एक भी शब्द नहीं।

उसने किताब बंद की।

इस बार उसने उसके ऊपर पांच दूसरी भारी किताबें रख दीं।

घर पहुंचकर वह यह घटना लगभग भूल चुका था।

लेकिन रात दो बजे उसके फोन पर स्टूडियो के सीसीटीवी का मोशन अलर्ट आया।

उसने कैमरा खोला।

स्टूडियो खाली था।

फिर भी बीच वाले कैमरे में शेल्फ पर रखी वही किताब दिखाई दे रही थी।

और उसके पन्ने अपने आप पलट रहे थे।

कमरे में हवा तक नहीं थी।

The Cursed Book Horror Story in Hindi

सुबह वह दौड़ता हुआ स्टूडियो पहुंचा।

ऊपर रखी सारी किताबें फर्श पर गिरी हुई थीं।

काली किताब फिर से खुली थी।

लेकिन इस बार पन्ने खाली नहीं थे।

पहले पन्ने पर सिर्फ एक वाक्य लिखा था।

“तुमने मुझे जगा दिया।”

उसने घबराकर पन्ना पलटा।

दूसरे पन्ने पर लिखा था—

“अब मैं तुम्हें पढ़ूंगी।”

अनिरुद्ध की रीढ़ में ठंडक दौड़ गई।

वह किताब बंद करना चाहता था।

लेकिन तभी स्याही खुद-ब-खुद चलने लगी।

उसकी आंखों के सामने नए शब्द बनने लगे।

“आज सुबह दस बजकर सैंतालीस मिनट पर तुम्हारे स्टूडियो में एक ग्राहक आएगा। वह नीली शर्ट पहने होगा। तुम उसे मना कर दोगे।”

अनिरुद्ध ने किताब बंद कर दी।

दस बजकर सैंतालीस मिनट पर सचमुच एक आदमी आया।

नीली शर्ट पहने।

उसने अपनी पुरानी डायरी ठीक करवाने की बात कही।

अनिरुद्ध को किताब की बात याद आई।

उसने बिना वजह काम लेने से मना कर दिया।

आदमी चुपचाप चला गया।

उसकी धड़कन तेज हो गई।

वह किताब फिर खोलने लगा।

नया वाक्य बन चुका था।

“तुमने पहला निर्णय वही लिया जो मैंने लिखा था।”

अब उसे बेचैनी होने लगी।

क्या उसने किताब के कारण फैसला लिया… या किताब ने पहले से उसका फैसला जान लिया था?

उस रात उसने किताब को लोहे की अलमारी में बंद कर दिया।

चाबी जेब में रखी।

घर पहुंचा।

रात के करीब तीन बजे उसकी नींद खुली।

ड्राइंग रूम से पन्ने पलटने की आवाज़ आ रही थी।

वह धीरे-धीरे बाहर आया।

सोफे पर वही किताब रखी थी।

उसने कांपते हुए अलमारी की चाबी निकाली।

चाबी अभी भी उसकी जेब में थी।

मतलब…

किताब स्टूडियो से उसके घर कैसे पहुंची?

उसने डरते हुए पहला पन्ना खोला।

अब उस पर लिखा था—

“तुमने मुझे बंद करने की कोशिश की। मुझे अच्छा नहीं लगा।”

अगले पन्ने पर—

“कल तुम अपने पुराने दोस्त रोहन से मिलोगे।”

अगले दिन सचमुच रोहन अचानक उसके स्टूडियो आ गया।

वर्षों बाद।

बिना किसी सूचना के।

रोहन ने किताब देखी।

“बेचोगे?”

“नहीं।”

“अजीब है… मुझे लग रहा है जैसे यह मुझे बुला रही हो।”

अनिरुद्ध ने तुरंत किताब कपड़े में लपेट दी।

रोहन चला गया।

शाम को खबर मिली कि घर लौटते समय उसकी कार का भीषण एक्सीडेंट हुआ।

अनिरुद्ध सन्न रह गया।

उसने किताब खोली।

नया वाक्य लिखा था—

“अगर वह किताब ले जाता… तो कहानी उसकी होती।”

उस दिन पहली बार उसे महसूस हुआ कि किताब घटनाएं नहीं लिख रही।

वह लोगों का चुनाव कर रही थी।

उसने फैसला किया कि किताब को नष्ट कर देगा।

उसने उसे आग में डाला।

चमड़ा जला ही नहीं।

एसिड डाला।

कोई निशान नहीं।

पानी में डुबोया।

पन्ने सूखे रहे।

आखिर उसने उसे औद्योगिक पेपर श्रेडर में डालने की कोशिश की।

मशीन चालू हुई।

तेज आवाज़ आई।

और अगले ही पल मशीन के ब्लेड टूटकर चारों तरफ बिखर गए।

किताब वैसी की वैसी बाहर निकल आई।

उसके कवर पर एक नई खरोंच भी नहीं थी।

अब किताब के पन्नों पर हर दिन नई बातें लिखी जाने लगीं।

लेकिन वे भविष्य नहीं बताती थीं।

वे उसके विचार लिखती थीं।

“आज तुम भागने के बारे में सोच रहे हो।”

“तुम पुलिस के पास जाना चाहते हो।”

“तुम सोच रहे हो कि शायद यह सपना है।”

उसने किसी को कुछ नहीं बताया।

फिर भी किताब सब जानती थी।

एक रात उसने तय किया कि वह बिना किताब लिए शहर छोड़ देगा।

सिर्फ एक बैग लेकर रेलवे स्टेशन पहुंच गया।

ट्रेन चलने लगी।

उसने राहत की सांस ली।

तभी सामने वाली सीट पर बैठे एक बुजुर्ग ने मुस्कुराकर पूछा—

“बेटा… इतनी जल्दी में थे कि अपनी किताब वहीं छोड़ आए?”

अनिरुद्ध का गला सूख गया।

उसने नीचे देखा।

उसके पैरों के पास वही काली किताब रखी थी।

उसने उसे छुआ भी नहीं था।

फिर भी वह वहां थी।

उसने स्टेशन आते ही ट्रेन छोड़ दी।

अब उसके चेहरे पर डर साफ दिखाई देने लगा था।

दिन बीतते गए।

किताब मोटी होती जा रही थी।

लेकिन उसने उसमें कभी नए पन्ने जोड़ते नहीं देखे।

एक रात उसने हिम्मत करके आखिरी पन्ना खोलने की कोशिश की।

आखिरी पन्ना पहले खाली था।

अब उस पर सिर्फ एक तारीख लिखी थी।

वह तारीख तीन दिन बाद की थी।

नीचे समय लिखा था।

रात 11:58।

और उसके नीचे—

“पाठक बदल जाएगा।”

उसने तीन दिन खुद को कमरे में बंद रखा।

कोई ग्राहक नहीं।

कोई कॉल नहीं।

घड़ी में रात 11:58 हुए।

कुछ नहीं हुआ।

बारह बज गए।

वह मुस्कुराया।

उसे लगा आखिरकार किताब गलत साबित हुई।

तभी स्टूडियो का दरवाज़ा खुला।

एक युवती अंदर आई।

उसने कहा, “माफ़ कीजिए… मुझे पुरानी किताबों की मरम्मत करवानी थी।”

अनिरुद्ध ने राहत की सांस ली।

“कल आइए। आज दुकान बंद है।”

युवती की नज़र मेज़ पर रखी काली किताब पर गई।

“यह कितनी सुंदर है… क्या मैं इसे देख सकती हूं?”

अनिरुद्ध चिल्लाया—

“नहीं!”

लेकिन देर हो चुकी थी।

उसने किताब खोल दी।

पहला पन्ना खाली था।

दूसरा भी।

तीसरा भी।

युवती ने हैरानी से कहा, “इसमें तो कुछ लिखा ही नहीं है।”

अनिरुद्ध ने किताब छीनी।

उसी पल उसके हाथों से किताब फिसल गई।

पन्ने तेजी से पलटने लगे।

और पहली बार…

उन सभी पन्नों पर लिखे शब्द गायब होने लगे।

जैसे किसी ने पूरी किताब मिटा दी हो।

कुछ ही सेकंड में वह फिर पूरी तरह खाली हो गई।

केवल आखिरी पन्ने पर एक नया वाक्य उभर आया।

“यह कहानी समाप्त हुई। अगला पाठक शुरू हो चुका है।”

अनिरुद्ध ने घबराकर युवती की तरफ देखा।

वह मुस्कुरा रही थी।

लेकिन उसकी मुस्कान अजीब तरह से स्थिर थी।

उसने धीरे से किताब बंद की, उसे अपनी बाहों में दबाया और बिना कुछ कहे बाहर निकल गई।

अनिरुद्ध उसके पीछे भागा।

सड़क पर पहुंचते ही वह गायब थी।

न कोई गाड़ी।

न कोई मोड़।

न कोई इंसान।

सिर्फ फुटपाथ पर एक छोटा-सा कागज़ उड़ता हुआ उसके पैरों से आकर चिपक गया।

उसने उसे उठाया।

उस पर केवल एक पंक्ति लिखी थी—

“इसे मत खोलना। अगर खोलो… तो इसे कभी अकेला मत छोड़ना।”

उसने कांपते हुए चारों ओर देखा।

इस बार उसे समझ आ गया था कि श्राप किताब में नहीं था।

श्राप उस चेतावनी में था… जिसे हर नया इंसान हमेशा पढ़ता है, लेकिन कभी मानता नहीं।

National Digital Library of India (Rare Books): https://ndl.iitkgp.ac.in/

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