आठ फीट लंबी रहस्यमयी औरत | Hachishakusama Horror Story

रात के ठीक 1 बजकर 48 मिनट पर होटल के कमरे की छत से किसी भारी चीज़ के घिसटने की आवाज़ आई।

रितेश ने पहले ध्यान नहीं दिया। पहाड़ी शहरों के पुराने होटलों में लकड़ी सिकुड़ने, पाइप हिलने और तेज हवा से खिड़कियां कांपने की आवाजें सामान्य थीं। उसने लैपटॉप की स्क्रीन पर खुली रिपोर्ट के आखिरी पन्ने को पढ़ा और कॉफी का कप उठाया। Hachishakusama Horror Story

Hachishakusama Horror Story

तभी वही आवाज़ दोबारा आई।

घ्रर्रर्र…

इस बार आवाज़ कमरे के एक कोने से दूसरे कोने तक गई, जैसे ऊपर कोई बहुत लंबी चीज़ झुककर चल रही हो और उसका सिर छत से रगड़ खा रहा हो।

रितेश ने कप मेज पर रख दिया।

उसका कमरा होटल की सबसे ऊपरी मंजिल पर था। उसके ऊपर न कोई कमरा था, न स्टोर रूम। केवल ढलवां टिन की छत और उसके ऊपर खुला आसमान।

उसने मोबाइल उठाकर रिसेप्शन पर कॉल किया।

तीन बार घंटी बजने के बाद एक बूढ़ी आवाज़ आई, “जी, साहब?”

“मेरे कमरे के ऊपर कोई चल रहा है।”

कुछ क्षण चुप्पी रही।

“आप कौन-से कमरे में हैं?”

“तीन सौ आठ।”

दूसरी तरफ से सांस लेने की आवाज़ अचानक रुक गई।

“साहब, खिड़की के पर्दे बंद हैं?”

रितेश ने चौंककर खिड़की की ओर देखा। मोटे भूरे पर्दे आधे खुले थे। बाहर पहाड़ी सड़क पर लगी पीली लाइट कमरे में आ रही थी।

“आधे खुले हैं। लेकिन इसका मेरी शिकायत से क्या संबंध है?”

रिसेप्शन वाला धीमे स्वर में बोला, “उन्हें पूरा बंद कर दीजिए।”

“क्यों?”

कॉल कट गया।

रितेश कुछ पल मोबाइल को देखता रहा। फिर झुंझलाकर उसने दोबारा कॉल मिलाया, लेकिन इस बार किसी ने फोन नहीं उठाया।

वह कुर्सी से उठा और खिड़की की ओर बढ़ा। होटल एक खड़ी पहाड़ी ढलान पर बना था। सामने देवदार के पेड़ थे और उनके पीछे धुंध में डूबा पुराना सैन्य संचार केंद्र दिखाई देता था।

उसी केंद्र का निरीक्षण करने के लिए रितेश यहां आया था।

वह एक निजी संरचनात्मक सुरक्षा कंपनी में इंजीनियर था। केंद्र पिछले सत्रह वर्षों से बंद पड़ा था। अब राज्य सरकार उसकी जमीन पर पर्वतीय अनुसंधान संस्थान बनाना चाहती थी। निर्माण से पहले उसकी इमारतों, सुरंगों और भूमिगत कमरों की जांच आवश्यक थी।

रितेश ने पर्दा पकड़कर खींचना चाहा, तभी उसकी नजर सड़क की दूसरी ओर पड़ी।

एक महिला वहां खड़ी थी।

उसका शरीर देवदार के पास लगी स्ट्रीट लाइट से भी ऊंचा दिखाई दे रहा था। उसने लंबा गहरे रंग का कोट पहन रखा था। चेहरा पेड़ों की छाया में था, लेकिन उसका सिर असामान्य रूप से ऊंचाई पर था।

रितेश ने सोचा कि शायद वह ढलान के ऊंचे हिस्से पर खड़ी है। पहाड़ी जमीन में दूरी और ऊंचाई का अंदाजा गलत हो जाना सामान्य बात थी।

महिला ने धीरे-धीरे सिर उठाया।

उसका चेहरा अब भी अंधेरे में था।

लेकिन रितेश को साफ महसूस हुआ कि वह सीधे तीसरी मंजिल की खिड़की की तरफ देख रही थी।

अचानक होटल की सड़क वाली लाइट बुझ गई।

कमरे में अंधेरा फैल गया।

रितेश ने तुरंत पर्दे बंद कर दिए।

उसी पल खिड़की के शीशे पर तीन हल्की चोटें पड़ीं।

टक…

टक…

टक…

रितेश का शरीर जम गया।

वह तीसरी मंजिल पर था। खिड़की के बाहर न बालकनी थी, न कोई पाइप, जिस पर चढ़कर कोई वहां तक पहुंच सके।

कुछ सेकंड तक पूर्ण शांति रही।

फिर शीशे के ठीक दूसरी ओर से किसी महिला की फुसफुसाहट सुनाई दी।

“रितेश… पर्दा खोलो।”

वह पीछे हट गया।

आवाज बिल्कुल उसकी मां जैसी थी।

रितेश ने कई महीनों से मां से बात नहीं की थी। किसी पारिवारिक विवाद के बाद दोनों के बीच दूरी आ गई थी। मगर वह आवाज़ पहचानने में गलती नहीं कर सकता था।

“बेटा… मुझे ठंड लग रही है।”

उसने कांपते हाथ से मोबाइल निकाला और मां का नंबर मिलाया।

कॉल सीधे बंद बताने लगी।

खिड़की के बाहर से फिर वही आवाज़ आई।

“फोन क्यों कर रहे हो? मैं यहीं हूं।”

छत के ऊपर कुछ तेजी से रेंगा।

घ्रर्रर्र…

रितेश पीछे हटते हुए बिस्तर से टकराया। उसने कमरे की सारी लाइटें जला दीं। कुछ मिनट तक वह खिड़की को देखता रहा, लेकिन आवाजें बंद हो गईं।

उस रात वह सुबह तक नहीं सोया।

सुबह सात बजे जब वह नीचे आया तो रिसेप्शन पर एक युवक बैठा था। रात का बूढ़ा कर्मचारी वहां नहीं था।

“रात में ड्यूटी पर कौन था?” रितेश ने पूछा।

युवक ने रजिस्टर देखते हुए कहा, “मैं ही था, सर।”

“नहीं। मैंने करीब दो बजे फोन किया था। एक बूढ़े आदमी ने उठाया था।”

युवक ने उलझन से उसकी ओर देखा। “यहां रात की ड्यूटी मैं अकेला करता हूं। कोई बूढ़ा कर्मचारी नहीं है।”

“उसने मुझे पर्दे बंद करने को कहा।”

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युवक का चेहरा बदल गया।

“आप किस कमरे में थे?”

“तीन सौ आठ।”

युवक ने नजरें झुका लीं। “सर, मैनेजर से बात कीजिए।”

“क्यों?”

“वह कमरा आमतौर पर मेहमानों को नहीं दिया जाता।”

रितेश का गुस्सा बढ़ गया। “फिर मुझे क्यों दिया गया?”

“ऑनलाइन बुकिंग में गलती हो गई होगी।”

“कमरे में क्या समस्या है?”

युवक ने उत्तर नहीं दिया।

रितेश ने काउंटर पर हाथ मारा। “देखिए, मैं किसी भूत-प्रेत की कहानी सुनने नहीं आया। कल रात मेरी खिड़की के बाहर कोई था।”

रिसेप्शनिस्ट ने धीरे से कहा, “तीसरी मंजिल की खिड़की तक कोई इंसान नहीं पहुंच सकता, सर।”

“मुझे पता है।”

“इसीलिए वह कमरा बंद रखा जाता है।”

नाश्ता किए बिना रितेश होटल से निकल गया। बाहर सुबह की ठंडी धूप थी, लेकिन रात की घटना उसके दिमाग में अटकी रही। वह खुद को समझाता रहा कि थकान, अधिक कॉफी और ऊंचाई के कारण उसे भ्रम हुआ होगा।

पुराना सैन्य संचार केंद्र शहर से लगभग पांच किलोमीटर दूर था। मुख्य सड़क से एक संकरी पक्की पट्टी देवदार के जंगल के बीच ऊपर चढ़ती थी। केंद्र के चारों ओर जंग लगी तारबंदी और ऊंची पत्थर की दीवार थी।

मुख्य गेट पर उसका सहयोगी निखिल इंतजार कर रहा था।

निखिल इलेक्ट्रिकल सिस्टम विशेषज्ञ था। वह पिछली शाम दूसरे होटल में रुका था।

“तुम्हारा चेहरा ऐसा क्यों लग रहा है जैसे पूरी रात रिपोर्ट बनाते रहे?” निखिल ने पूछा।

“नींद नहीं आई।”

“पहाड़ी मौसम की वजह से?”

रितेश ने बात टाल दी। “काम शुरू करते हैं।”

उनके साथ स्थानीय प्रशासन का एक कर्मचारी भी था, जिसका नाम हरीश रावत था। उसके पास इमारतों की पुरानी चाबियां और सीमित नक्शे थे।

केंद्र में चार मुख्य इमारतें थीं। नियंत्रण भवन, कर्मचारियों के क्वार्टर, जनरेटर स्टेशन और एक लंबा पत्थर का ब्लॉक, जिसे नक्शे में केवल “इकाई आठ” लिखा गया था।

रितेश ने पूछा, “यह इकाई आठ किस काम आती थी?”

रावत ने कहा, “कागजों में संचार परीक्षण प्रयोगशाला लिखा है।”

“दरवाजा बंद क्यों है?”

“चाबी नहीं है।”

निखिल ने ताला देखते हुए कहा, “यह नया ताला है। इमारत बंद होने के बाद लगाया गया होगा।”

रावत ने नजरें चुरा लीं। “हो सकता है।”

उन्होंने नियंत्रण भवन से निरीक्षण शुरू किया। भीतर मोटी धूल जमी थी। पुराने रेडियो पैनल, तारों के बंडल और टूटे मॉनिटर अब भी पड़े थे। अधिकांश उपकरण भारतीय कंपनियों के थे, लेकिन कुछ मशीनों पर जापानी भाषा में छोटे लेबल लगे थे।

एक कमरे में दीवार पर पेंसिल से लिखा हुआ मिला—

H-8

नीचे किसी ने हिंदी में लिखा था—

“आवाज सुनकर उत्तर मत देना।”

रितेश ने फोटो खींची।

“किसी कर्मचारी की शरारत होगी,” निखिल बोला।

रावत ने तुरंत कहा, “उस हिस्से का निरीक्षण छोड़ देते हैं।”

“क्यों?” रितेश ने पूछा।

“इमारत असुरक्षित है।”

रितेश ने छत और दीवारें देखकर कहा, “अभी तक तो संरचना स्थिर लग रही है।”

रावत ने कठोर स्वर में कहा, “आपको जितनी जगह दिखाई गई है, उतनी की रिपोर्ट बना दीजिए।”

रितेश को उसकी बेचैनी साफ दिखाई दे रही थी।

दोपहर तक उन्होंने पहली इमारत की जांच पूरी कर ली। भोजन के लिए बाहर निकलते समय निखिल ने एक गलियारे के अंत में बंद दरवाजा देखा।

“नक्शे में यहां सीढ़ियां होनी चाहिए।”

रितेश ने टैबलेट पर नक्शा खोला। निखिल सही था। दरवाजे के पीछे भूमिगत स्तर की ओर जाने वाली सीढ़ियां दिखाई गई थीं।

रावत ने कहा, “वह हिस्सा पानी से भर चुका है।”

“देखे बिना रिपोर्ट नहीं बन सकती,” रितेश बोला।

रावत ने चाबी देने से मना कर दिया। अंत में निखिल ने अपने औजार से पुराना ताला खोल दिया।

दरवाजे के पीछे नीचे उतरती पत्थर की सीढ़ियां थीं। वहां पानी नहीं था। केवल बेहद ठंडी हवा और सीलन की गंध थी।

तीनों मोबाइल की रोशनी में नीचे उतरे।

भूमिगत गलियारे की दीवारों पर मोटी ध्वनि-रोधी परत लगी थी। जगह-जगह गोल स्पीकर और माइक्रोफोन लगे थे। गलियारे के अंत में एक छोटा नियंत्रण कक्ष था।

टेबल पर पड़े रजिस्टर की तारीख बीस वर्ष पुरानी थी।

निखिल ने धूल हटाकर पहला पन्ना खोला।

अधिकांश प्रविष्टियां अंग्रेजी में थीं। वे किसी “दिशात्मक निम्न-आवृत्ति ध्वनि परीक्षण” से संबंधित थीं। परीक्षण का उद्देश्य ऐसी ध्वनि तरंगें विकसित करना था, जिन्हें सामान्य कान न सुन सके, लेकिन जो दूर बैठे व्यक्ति के मस्तिष्क में परिचित आवाज़ जैसी अनुभूति पैदा कर सकें।

रितेश ने पढ़ते हुए कहा, “यह मनोवैज्ञानिक संचार प्रयोग था।”

निखिल ने अगला पन्ना पलटा। “यह देखो—जापानी सलाहकार टीम।”

रजिस्टर में एक नाम बार-बार आया था—डॉ. मसाकी हारा।

और प्रोजेक्ट का आंतरिक नाम लिखा था—

HACHISHAKUSAMA PROTOCOL

रावत ने रजिस्टर छीन लिया।

“इसे यहीं छोड़िए।”

“आप इस बारे में जानते हैं?” रितेश ने पूछा।

“पुरानी फाइलें हैं। उनका वर्तमान इमारत से कोई संबंध नहीं।”

“कल रात होटल के बाहर मैंने एक असामान्य रूप से लंबी महिला देखी थी।”

रावत स्थिर हो गया।

निखिल हंसा, लेकिन रावत नहीं हंसा।

उसने धीमे स्वर में पूछा, “क्या उसने आपकी किसी परिचित की आवाज़ में बात की?”

रितेश का चेहरा गंभीर हो गया।

“आपको कैसे पता?”

रावत कुछ कह पाता, उससे पहले गलियारे में लगे पुराने स्पीकरों में से एक चालू हो गया।

पहले हल्की खरखराहट आई।

फिर एक आदमी की आवाज़ सुनाई दी।

“निखिल… नीचे मत आना।”

निखिल के हाथ से टॉर्च लगभग गिर गई।

“यह मेरे पिता की आवाज़ है,” उसने फुसफुसाया।

आवाज फिर आई।

“बेटा, रितेश पर भरोसा मत करना।”

निखिल ने स्पीकर की तरफ कदम बढ़ाया।

रितेश ने उसका हाथ पकड़ लिया। “यह रिकॉर्डिंग है।”

“मेरे पिता की कोई रिकॉर्डिंग यहां कैसे हो सकती है?”

अचानक गलियारे के सारे स्पीकर एक साथ चालू हो गए।

हर स्पीकर से अलग आवाज़ आने लगी। किसी में महिला रो रही थी, किसी में बच्चा हंस रहा था, किसी में कोई सैनिक आदेश दे रहा था।

उन आवाजों के बीच एक गहरी स्त्री आवाज़ बार-बार एक ही शब्द बोल रही थी—

“ऊंचा…”

“ऊंचा…”

“ऊंचा…”

रावत चिल्लाया, “बाहर चलो!”

वे तेजी से सीढ़ियों की ओर भागे। उनके पीछे स्पीकरों की आवाजें तेज होती गईं। रितेश को बीच-बीच में अपनी मां की पुकार सुनाई दे रही थी।

जैसे ही वे ऊपर पहुंचे, दरवाजा अपने आप बंद हो गया।

कुछ देर तीनों वहीं खड़े हांफते रहे।

निखिल ने रावत का कॉलर पकड़ लिया। “यह क्या था?”

रावत ने उसका हाथ हटाया। “मैंने आपको चेतावनी दी थी।”

“हाचिशाकुसामा क्या है?” रितेश ने पूछा।

रावत ने बंद दरवाजे की ओर देखा।

“पहले यह केवल एक प्रोजेक्ट था।”

“और अब?”

रावत ने उत्तर देने के बजाय कहा, “आज का काम समाप्त कीजिए। इस केंद्र में सूर्यास्त के बाद रहना सुरक्षित नहीं है।”

रितेश ने उसकी बात नहीं मानी।

इंजीनियर होने के कारण उसे हर घटना का तकनीकी कारण खोजने की आदत थी। उसने अनुमान लगाया कि भूमिगत प्रणाली का कुछ हिस्सा अभी भी बिजली से जुड़ा है। संभव है कि किसी ने स्पीकर में रिकॉर्डिंग चला दी हो। मगर परिचित आवाजें कैसे उत्पन्न हुईं, इसका उत्तर उसके पास नहीं था।

निखिल वापस शहर जाना चाहता था, पर रितेश ने उसे जनरेटर स्टेशन जांचने के लिए मना लिया।

जनरेटर भवन में उन्हें एक पुरानी बैकअप पावर लाइन चालू मिली। वह सीधे भूमिगत प्रयोगशाला और इकाई आठ की तरफ जा रही थी।

“किसी ने सिस्टम बंद नहीं किया,” निखिल ने कहा। “यह बहुत कम ऊर्जा पर अब भी चल रहा है।”

“क्या स्पीकर अपने आप सक्रिय हो सकते हैं?”

“पुरानी रिकॉर्डिंग चल सकती है, लेकिन हमारे परिवार की आवाज़ नहीं।”

उसी समय निखिल के मोबाइल पर उसकी बहन का कॉल आया।

उसने कॉल उठाया। दूसरी तरफ से घबराई हुई आवाज़ आई, “भैया, पापा अस्पताल में हैं।”

निखिल का चेहरा सफेद पड़ गया।

“क्या हुआ?”

“अचानक बेहोश हो गए। डॉक्टर कह रहे हैं जल्दी आ जाओ।”

निखिल बाहर जाने लगा।

रितेश ने उसे रोका। “एक मिनट। अपनी बहन से कोई ऐसी बात पूछो जो केवल तुम दोनों जानते हो।”

निखिल ने फोन में कहा, “हमारी पुरानी बिल्ली का नाम क्या था?”

कुछ क्षण खामोशी रही।

फिर दूसरी तरफ से आवाज़ बदली।

वह अब उसकी बहन जैसी नहीं थी।

बहुत गहरी, खिंची हुई आवाज़ बोली, “दरवाजा खोलो।”

कॉल कट गया।

निखिल ने तुरंत अपनी असली बहन को फोन किया। उसने बताया कि पिता घर पर बिल्कुल ठीक थे और उसने कोई कॉल नहीं किया था।

अब दोनों के भीतर तकनीकी जिज्ञासा से ज्यादा भय था।

रावत उन्हें केंद्र से बाहर ले जाने लगा। लेकिन मुख्य गेट का इलेक्ट्रॉनिक लॉक बंद हो चुका था। बाहर जाने वाली सड़क पर लोहे का अवरोध नीचे गिर गया था।

“बिजली काटो,” रितेश ने कहा।

निखिल जनरेटर स्टेशन की ओर भागा। उसने मुख्य पावर लीवर बंद कर दिया।

पूरा केंद्र अंधेरे में डूब गया।

लेकिन इकाई आठ की इमारत में एक सफेद रोशनी जल उठी।

तीनों उसकी ओर देखने लगे।

इमारत की सबसे ऊंची खिड़की के पीछे कोई आकृति खड़ी थी।

वह इतनी लंबी थी कि उसका सिर छत से झुका हुआ था।

रावत ने फुसफुसाकर कहा, “उसने किसी को चुन लिया है।”

“किसे?” निखिल ने पूछा।

रावत ने रितेश की ओर देखा।

“उसे।”

रितेश गुस्से से बोला, “यह सब क्या है? साफ-साफ बताइए।”

रावत कुछ देर चुप रहा, फिर उन्हें पास के सुरक्षा कक्ष में ले गया। उसने दरवाजा बंद किया और पुरानी अलमारी से एक फाइल निकाली।

“यह केंद्र केवल सैन्य रेडियो के लिए नहीं बना था,” उसने कहा। “करीब पच्चीस साल पहले कुछ वैज्ञानिकों ने यहां एक खास प्रयोग शुरू किया। वे ऐसी ध्वनि बनाना चाहते थे, जो सीधे इंसान के डर और स्मृति को प्रभावित करे। जापान से डॉ. मसाकी हारा इस प्रोजेक्ट में शामिल हुए थे।”

“हाचिशाकुसामा नाम उन्होंने दिया?” रितेश ने पूछा।

“हां। उनकी दादी उन्हें बचपन में एक लंबी औरत की लोककथा सुनाती थीं। ऐसी औरत जो परिचित आवाज़ों से लोगों को बुलाती थी। इसलिए उन्होंने इस प्रणाली को वही नाम दे दिया।”

रावत ने फाइल खोली।

“प्रयोगों के दौरान मशीनों ने केवल आवाज़ें उत्पन्न नहीं कीं। कर्मचारियों ने एक आकृति देखनी शुरू की। पहले सपनों में। फिर शीशों में। फिर इमारतों के बाहर।”

निखिल ने कहा, “सामूहिक भ्रम।”

“शायद। लेकिन भ्रम लोगों के साथ घर तक गया। कई कर्मचारियों ने अपनी मां, पत्नी या बच्चों की आवाज़ें सुनीं। कुछ लोग रात में दरवाजे खोलकर बाहर चले गए और वापस नहीं आए।”

“उनके साथ क्या हुआ?”

“किसी का पता नहीं चला।”

रितेश ने पूछा, “सिस्टम बंद क्यों नहीं किया?”

“किया गया था। लेकिन जब भी बिजली पूरी तरह काटी जाती, आसपास के शहर में लोग परिचित आवाज़ें सुनने लगते। जैसे वह चीज़ केंद्र की सीमा से बाहर फैल रही हो। इसलिए सिस्टम को बहुत कम ऊर्जा पर चालू रखा गया, ताकि वह इकाई आठ में सीमित रहे।”

“आप इसे कोई जीव समझते हैं?”

रावत ने कहा, “मुझे नहीं पता वह क्या है। मशीनों ने उसे बनाया, या मशीनों ने केवल उसे यहां आने का रास्ता दिया।”

सुरक्षा कक्ष की खिड़की पर लंबी उंगलियों की छाया दिखाई दी।

तीनों एक साथ चुप हो गए।

खिड़की जमीन से लगभग दस फीट ऊपर थी।

बाहर कोई बहुत लंबी आकृति खड़ी थी।

उसने शीशे पर धीरे से नाखून घसीटा।

कीईईई…

रितेश की मां की आवाज़ आई, “बेटा, मैंने गलती की थी। मुझसे बात कर लो।”

रितेश के भीतर दबा अपराधबोध अचानक जाग गया। कुछ महीने पहले उसने मां के कई कॉल नहीं उठाए थे। उसे लगा था कि वह बाद में बात कर लेगा, लेकिन उनके बीच संवाद लगातार कम होता गया।

आवाज रोने लगी।

“एक बार पर्दा हटा दो।”

रावत ने उसका कंधा पकड़ लिया। “उसकी बात मत सुनो।”

निखिल ने खिड़की की ओर देखा। “वह बाहर कैसे खड़ी है?”

“वह पूरी तरह बाहर नहीं है,” रावत बोला। “वह वहीं दिखाई देती है जहां कोई उसे देखने लगता है।”

कमरे की दूसरी खिड़की पर भी वही लंबी छाया उभर आई।

फिर तीसरी पर।

जैसे एक ही आकृति एक साथ कई दिशाओं में मौजूद हो।

रावत ने फाइल से एक कागज निकाला। उस पर हाथ से बनाया गया इकाई आठ का नक्शा था।

“केंद्र को बंद करने का एक तरीका था,” उसने कहा। “लेकिन पिछली टीम उसे पूरा नहीं कर सकी।”

“क्या करना होगा?” रितेश ने पूछा।

“इकाई आठ के मुख्य ध्वनि कक्ष में जाकर मूल आवृत्ति जनरेटर नष्ट करना होगा।”

निखिल बोला, “आपने कहा बिजली काटने से वह बाहर फैलती है।”

“जनरेटर नष्ट करने से पहले उसकी आवृत्ति उलटनी होगी। सिस्टम खुद की तरंग को रद्द कर देगा।”

“यह तकनीकी रूप से संभव है,” निखिल ने कहा, “लेकिन हमें नियंत्रण पैनल तक पहुंचना होगा।”

“वही इकाई आठ के भीतर है।”

बाहर से अचानक दरवाजे पर तीन चोटें पड़ीं।

टक…

टक…

टक…

फिर रितेश की ही आवाज़ सुनाई दी।

“दरवाजा खोलो। मैं बाहर हूं।”

कमरे के भीतर खड़ा रितेश स्थिर रह गया।

निखिल ने डर से उसकी ओर देखा।

बाहर से फिर वही आवाज़ आई, “अंदर जो खड़ा है, वह मैं नहीं हूं।”

निखिल एक कदम रितेश से दूर हट गया।

“मेरी तरफ देखो,” रितेश बोला। “मैं शुरू से तुम्हारे साथ हूं।”

बाहर की आवाज़ हंसने लगी।

कुछ ही क्षण में वह हंसी निखिल की, फिर रावत की, फिर रितेश की मां की आवाज़ में बदल गई।

रावत ने कहा, “यही उसकी ताकत है। वह लोगों को एक-दूसरे पर संदेह करने पर मजबूर करती है।”

उन्होंने सुरक्षा कक्ष का पिछला दरवाजा खोला और अंधेरे में इकाई आठ की तरफ बढ़े।

इमारत का ताला पहले ही खुल चुका था।

अंदर असामान्य रूप से ऊंचा गलियारा था। दीवारों पर ध्वनि-रोधी काले पैनल लगे थे। छत करीब पंद्रह फीट ऊंची थी, फिर भी ऐसा लग रहा था जैसे कोई ऊपर झुककर उनके पीछे चल रहा है।

हर कुछ कदम बाद किसी परिचित की आवाज़ सुनाई देती।

कभी रितेश के पिता, जो कई साल पहले गुजर चुके थे।

कभी निखिल की बहन।

कभी रावत की पत्नी।

रावत सबसे ज्यादा विचलित हो रहा था। उसकी पत्नी की आवाज़ बार-बार कह रही थी, “तुमने मुझे यहां अकेला क्यों छोड़ा?”

रितेश ने पूछा, “आपकी पत्नी भी इस प्रोजेक्ट में थीं?”

रावत ने चलते-चलते कहा, “वह भाषाविज्ञान विशेषज्ञ थीं। परिचित आवाज़ों की पहचान पर काम करती थीं।”

“उनका क्या हुआ?”

“सत्रह वर्ष पहले वह इसी इमारत में गायब हुईं।”

रितेश रुक गया। “इसीलिए आप यहां रहते हैं।”

रावत ने सिर हिलाया। “मुझे हमेशा लगा वह अब भी भीतर कहीं जीवित हैं। हर रात उनकी आवाज़ सुनता हूं। पहले समझ नहीं पाया कि वह सच हैं या वह चीज़।”

गलियारे के अंत में गोलाकार ध्वनि कक्ष था। बीच में विशाल धातु का जनरेटर लगा था। उसके चारों ओर दर्जनों स्पीकर और तार थे।

निखिल नियंत्रण पैनल पर काम करने लगा।

“सिस्टम बहुत पुराना है। मुझे मूल आवृत्ति ढूंढनी होगी।”

रितेश और रावत दरवाजे पर खड़े रहे।

कमरे की रोशनी झपकने लगी।

फिर सामने लगे कांच के पीछे एक महिला दिखाई दी।

वह साधारण कद की थी। उम्र लगभग पचास वर्ष। उसने वैज्ञानिकों वाली सफेद जैकेट पहनी थी।

रावत की सांस अटक गई।

“मीरा…”

महिला ने कांच पर हाथ रखा।

“हरीश, मुझे बाहर निकालो।”

रावत कांच के पास चला गया।

रितेश ने उसका हाथ पकड़ लिया। “यह वही नहीं है।”

महिला रोने लगी। “मैंने सत्रह साल इंतजार किया है।”

रावत ने कहा, “उसकी आवाज़… बिल्कुल वही है।”

कांच के पीछे महिला का शरीर धीरे-धीरे लंबा होने लगा।

पहले उसका सिर छत तक पहुंचा।

फिर गर्दन अस्वाभाविक रूप से खिंच गई।

चेहरा ऊपर अंधेरे में छिप गया।

उसकी उंगलियां कांच पर नीचे तक फैल गईं।

रावत पीछे हट गया।

लंबी आकृति ने मीरा की आवाज़ में कहा, “तुम मुझे पहचान भी नहीं पाए।”

फिर उसने कांच पर सिर मारा।

पूरा कक्ष कांप उठा।

निखिल चिल्लाया, “आवृत्ति मिल गई! लेकिन इसे उलटने के लिए मैनुअल ट्रांसमीटर चालू करना होगा। वह कांच के दूसरी तरफ है।”

कांच के पीछे वही आकृति खड़ी थी।

“दूसरा रास्ता?” रितेश ने पूछा।

“नहीं।”

रावत ने कहा, “मैं जाऊंगा।”

“वह आपको आपकी पत्नी की आवाज़ से रोक लेगी।”

“इसीलिए मुझे जाना चाहिए। मैं सत्रह साल से उसी आवाज़ का इंतजार कर रहा हूं। अब मैं जानता हूं कि वह मीरा नहीं है।”

उसने आपातकालीन दरवाजा खोला और कांच के पीछे वाले हिस्से में प्रवेश किया।

अंदर रोशनी बहुत कम थी। लंबी आकृति पीछे हटकर अंधेरे में गायब हो गई।

रावत ट्रांसमीटर की ओर बढ़ा।

मीरा की आवाज़ आई, “हरीश, मत करो। सिस्टम बंद हुआ तो मैं हमेशा के लिए चली जाऊंगी।”

रावत की चाल धीमी हो गई।

“मैं सच में यहां हूं,” आवाज़ बोली। “उस रात मैं मरी नहीं थी। मेरी चेतना इस मशीन में फंस गई।”

रावत की आंखों में आंसू आ गए।

“तुम मुझे घर ले जा सकते हो।”

रितेश ने कांच के दूसरी ओर से चिल्लाया, “मत सुनिए!”

रावत ने कांपते हाथ से ट्रांसमीटर का लीवर पकड़ लिया।

तभी अंधेरे से एक लंबा हाथ निकला और उसके कंधे पर रखा।

रावत का शरीर जम गया।

आकृति उसके पीछे खड़ी थी। उसका चेहरा अब छत के अंधेरे में था।

मीरा की आवाज़ उसके कान के पास आई।

“बस एक बार मेरी तरफ देखो।”

रावत ने आंखें बंद कर लीं।

उसने लीवर नीचे खींच दिया।

सिस्टम से तीखी कंपन निकली।

निखिल ने नियंत्रण पैनल पर उलटी आवृत्ति सक्रिय कर दी।

सारे स्पीकर एक साथ चीख उठे।

लंबी आकृति का शरीर धुएं की तरह कांपने लगा। उसके भीतर दर्जनों चेहरे उभरने लगे—पुरुष, महिलाएं, सैनिक, वैज्ञानिक और वे सभी लोग जो वर्षों में उसकी आवाज़ सुनकर गायब हुए थे।

रितेश ने अपनी मां का चेहरा भी देखा।

वह जानता था कि मां जीवित थी, फिर भी उस चेहरे ने उसे देखकर कहा, “बेटा, मुझे छोड़कर मत जाओ।”

रितेश ने नजरें हटा लीं।

जनरेटर की गति बढ़ती गई।

निखिल चिल्लाया, “ओवरलोड होने वाला है! हमें बाहर निकलना होगा।”

रावत अभी भी कांच के दूसरी ओर था।

रितेश ने आपातकालीन दरवाजा खोला और उसे खींचकर बाहर लाया।

तीनों गलियारे की ओर भागे।

उनके पीछे लंबी आकृति छत से रेंगती हुई आ रही थी। उसके हाथ दीवारों तक फैले थे और उसके शरीर से परिचित आवाज़ें निकल रही थीं।

“रितेश…”

“निखिल…”

“हरीश…”

हर आवाज़ किसी ऐसे व्यक्ति की थी, जिसे वे खोने से डरते थे।

इमारत के बाहर पहुंचते ही भीतर विस्फोट जैसी आवाज़ हुई।

इकाई आठ की खिड़कियां टूट गईं। सफेद रोशनी आसमान तक उठी और अचानक बुझ गई।

पूरा केंद्र शांत हो गया।

मुख्य गेट का अवरोध ऊपर उठ गया।

तीनों बिना पीछे देखे बाहर निकल गए।

अगली सुबह प्रशासन ने केंद्र को पूरी तरह सील कर दिया। आधिकारिक रिपोर्ट में घटना का कारण पुरानी विद्युत प्रणाली में शॉर्ट सर्किट बताया गया।

रितेश ने अपनी तकनीकी रिपोर्ट में इमारत को ध्वस्त करने की सिफारिश की।

रावत ने उसी दिन नौकरी से इस्तीफा दे दिया। जाते समय उसने रितेश से कहा, “सत्रह वर्षों में पहली बार कल रात मैंने मीरा की आवाज़ नहीं सुनी।”

“शायद अब सब खत्म हो गया।”

रावत ने उत्तर नहीं दिया।

रितेश ने होटल बदल लिया। उसने अपनी मां को फोन किया और लंबे समय बाद उनसे खुलकर बात की। उसे लगा कि जिस अपराधबोध को वह महीनों से टाल रहा था, उससे सामना करना जरूरी था।

दो दिन बाद वह शहर से वापस चला गया।

कई सप्ताह तक कोई असामान्य घटना नहीं हुई।

फिर एक रात उसके शहर वाले फ्लैट में बिजली चली गई।

रितेश मोबाइल की टॉर्च लेकर लिविंग रूम में आया। बाहर तेज हवा नहीं थी, फिर भी खिड़की का पर्दा धीरे-धीरे हिल रहा था।

उसका फोन बजा।

स्क्रीन पर “मां” लिखा था।

उसने कॉल उठा लिया।

“हैलो?”

दूसरी तरफ से मां की सामान्य आवाज़ आई, “बेटा, सो गए थे?”

रितेश ने राहत की सांस ली। “नहीं। यहां बिजली चली गई है।”

“अच्छा सुनो, अगले हफ्ते घर आ जाना।”

“हां, आऊंगा।”

बात करते समय छत से घिसटने की हल्की आवाज़ आई।

घ्रर्रर्र…

रितेश चुप हो गया।

मां ने पूछा, “क्या हुआ?”

उसने छत की ओर देखा।

आवाज कमरे के एक कोने से दूसरे कोने तक गई।

“कुछ नहीं,” रितेश बोला।

तभी फोन पर मां की आवाज़ के पीछे एक दूसरी फुसफुसाहट सुनाई दी।

बहुत धीमी।

बहुत लंबी सांसों के बीच।

“पर्दा खोलो…”

रितेश ने फोन कान से दूर किया।

“मां, आपके पास कोई है?”

“नहीं तो।”

खिड़की के शीशे पर तीन चोटें पड़ीं।

टक…

टक…

टक…

रितेश पीछे हट गया।

वह सातवीं मंजिल पर रहता था।

पर्दे के नीचे से दो असामान्य रूप से लंबे पैरों की छाया दिखाई दे रही थी।

फोन पर उसकी मां बोलती रही, “रितेश? तुम सुन रहे हो?”

लेकिन अब उसी आवाज़ का दूसरा रूप खिड़की के बाहर से भी आ रहा था।

“बेटा… पर्दा खोलो।”

रितेश ने अपनी आंखें बंद कर लीं और फोन पर मां से बात करता रहा। वह जानता था कि बाहर खड़ी चीज़ उत्तर की प्रतीक्षा कर रही है।

कुछ देर बाद खिड़की के पास की छाया गायब हो गई।

लेकिन छत पर घिसटने की आवाज़ बंद नहीं हुई।

अगली सुबह रितेश ने निखिल को फोन किया।

निखिल ने उसकी पूरी बात सुनी और फिर बहुत देर तक चुप रहा।

“मेरे घर पर भी कल रात ऐसा हुआ,” उसने कहा।

“तुमने पर्दा खोला?”

“नहीं।”

“रावत से बात हुई?”

“उसका नंबर बंद है।”

दोनों ने उसी दिन पहाड़ी शहर के स्थानीय थाने से संपर्क किया। जानकारी मिली कि हरीश रावत तीन दिन पहले अपने घर से गायब हो गया था।

उसके कमरे में संघर्ष का कोई निशान नहीं था।

केवल खिड़की खुली थी।

और छत पर काले रंग से एक वाक्य लिखा था—

“तुमने मशीन बंद की है, दरवाजा नहीं।”

कुछ महीनों बाद पुराने संचार केंद्र को ध्वस्त कर दिया गया। भूमिगत प्रयोगशाला मिट्टी और कंक्रीट से भर दी गई। सरकारी रिकॉर्ड से हाचिशाकुसामा प्रोटोकॉल की अधिकांश फाइलें हटा दी गईं।

लेकिन उस शहर में आज भी कुछ होटल सूर्यास्त के बाद ऊपरी मंजिल के कमरे किराए पर नहीं देते।

स्थानीय लोग कहते हैं कि धुंध भरी रातों में देवदार के पेड़ों के पीछे कोई बहुत लंबी महिला दिखाई देती है। वह किसी अनजान भाषा में बात नहीं करती।

वह हमेशा उसी आवाज़ का इस्तेमाल करती है, जिस पर आप सबसे ज्यादा भरोसा करते हैं।

पहले वह आपको नाम से बुलाती है।

फिर आपकी किसी पुरानी गलती की याद दिलाती है।

फिर खिड़की पर तीन बार दस्तक देती है।

और अगर आपने पर्दा खोल दिया, तो अगली सुबह कमरे में कोई नहीं मिलता।

केवल छत पर घिसटने के लंबे निशान रह जाते हैं।

और बंद मोबाइल में एक अंतिम रिकॉर्डिंग मिलती है—

“मैं बाहर नहीं हूं।

मैं अब तुम्हारी आवाज़ के अंदर हूं।”

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