उत्तराखंड के चमोली जिले में बन रही सुरंग संख्या सत्रह का काम पिछले ग्यारह दिनों से बंद पड़ा था।
कागज़ों में इसका कारण मशीनरी खराब होना लिखा गया था, लेकिन सुरंग में काम करने वाले मजदूरों ने मशीन के पास जाने से ही मना कर दिया था। उनका कहना था कि पहाड़ के भीतर से हर रात कोई भारी चीज़ रेंगते हुए बाहर आती है। कभी पत्थरों पर नाखून घिसने की आवाज़ सुनाई देती, कभी दीवारों के पीछे किसी के तेज़ सांस लेने की। Haunted Cave

शुरुआत में अधिकारियों ने इसे अफवाह मानकर अनदेखा किया। लेकिन जब दो सुरक्षा कैमरे एक ही रात टूटे मिले और तीसरे कैमरे की रिकॉर्डिंग में सुरंग की दीवार सांस लेती हुई दिखाई दी, तब निर्माण कंपनी ने बिना शोर किए एक विशेषज्ञ टीम बुलाने का निर्णय लिया।
उस टीम का नेतृत्व कर रहा था पैंतीस वर्षीय भूगर्भ वैज्ञानिक ईशान मल्होत्रा।
ईशान पहाड़ों के भीतर बनने वाली प्राकृतिक गुफाओं, गैस पॉकेट्स और जमीन के असामान्य कंपन का विशेषज्ञ था। वह भूत-प्रेत या दानव जैसी बातों में विश्वास नहीं करता था। उसके अनुसार हर रहस्य के पीछे भूगर्भीय, रासायनिक या मनोवैज्ञानिक कारण छिपा होता था।
उसके साथ तीन लोग और थे।
डॉक्टर मीरा सक्सेना, जो बंद और अंधेरी जगहों में मानव मस्तिष्क पर पड़ने वाले प्रभावों का अध्ययन करती थी।
कबीर राणा, एक अनुभवी पर्वतीय बचाव विशेषज्ञ।
और फैज़ल कुरैशी, जो भूमिगत संरचनाओं की थ्री-डी मैपिंग और ड्रोन सर्वे करता था।
शाम के करीब पांच बजे उनकी गाड़ी निर्माण स्थल पर पहुंची। बारिश कुछ देर पहले ही रुकी थी। पहाड़ों पर धुंध उतर रही थी और हवा में गीली मिट्टी की गंध घुली हुई थी।
सुरंग का मुंह एक ऊंची चट्टान के नीचे खुलता था। उसके आसपास पीली मशीनें, लोहे के पाइप और पत्थरों के ढेर पड़े थे। लेकिन पूरा क्षेत्र असामान्य रूप से शांत था।
लगभग साठ मजदूरों के रहने की व्यवस्था वहां थी, फिर भी किसी के बोलने या हंसने की आवाज़ नहीं आ रही थी।
साइट मैनेजर महेश ने ईशान से हाथ मिलाया। उसकी आंखों के नीचे काले घेरे थे।
“आप लोगों के रहने का इंतजाम ऊपर वाले कैंप में कर दिया है,” उसने कहा। “कल सुबह आप सुरंग देख सकते हैं।”
ईशान ने सामने अंधेरे प्रवेश द्वार की ओर देखा।
“अभी क्यों नहीं?”
महेश कुछ क्षण चुप रहा।
“शाम के बाद कोई अंदर नहीं जाता।”
कबीर हल्का-सा मुस्कराया।
“क्यों? नाइट शिफ्ट बंद है?”
महेश ने उसकी तरफ नहीं देखा।
“नाइट शिफ्ट के दो मजदूर गायब हैं।”
ईशान ने तुरंत पूछा, “पुलिस रिपोर्ट?”
“की गई थी। पुलिस ने आसपास का जंगल छाना। कोई निशान नहीं मिला।”
“वे आखिरी बार कहां देखे गए थे?”
महेश ने सुरंग की ओर इशारा किया।
“अंदर, आखिरी खुदाई वाले हिस्से के पास।”
फैज़ल ने अपना बैग नीचे रखा।
“कैमरा रिकॉर्डिंग दिखाई गई?”
महेश ने कोई उत्तर नहीं दिया। वह उन्हें साइट ऑफिस के भीतर ले गया।
ऑफिस के कोने में एक कंप्यूटर रखा था। महेश ने एक वीडियो खोला। रिकॉर्डिंग रात दो बजकर सोलह मिनट की थी।
कैमरे में सुरंग का अंतिम भाग दिखाई दे रहा था। दो मजदूर ड्रिलिंग मशीन के पास खड़े थे। उनमें से एक मशीन के कंट्रोल पैनल की जांच कर रहा था, जबकि दूसरा दीवार पर टॉर्च डाल रहा था।
अचानक दीवार की धूल नीचे गिरने लगी।
मजदूर ने पास जाकर हथेली दीवार पर रखी।
उसी क्षण वीडियो में तेज़ कंपन हुआ।
दीवार का एक हिस्सा धीरे-धीरे भीतर की ओर धंसने लगा और वहां एक काला छेद बन गया। वह किसी प्राकृतिक दरार जैसा नहीं था। उसका आकार ऐसा लग रहा था, मानो चट्टान के बीच किसी ने विशाल मुंह खोल दिया हो।
दोनों मजदूर पीछे हटे।
छेद के अंदर से एक लंबी, काली आकृति फर्श पर गिरी।
वीडियो की तस्वीर खराब होने लगी।
आकृति के चार हाथ दिखाई दिए। उसका सिर असामान्य रूप से छोटा था और पीठ पर किसी जानवर जैसी हड्डियां उभरी हुई थीं।
एक मजदूर भागा, लेकिन वह चीज़ इतनी तेजी से आगे बढ़ी कि कैमरे में केवल काली लकीर दिखाई दी।
दूसरे ही पल दोनों मजदूर गायब थे।
कैमरा कुछ सेकंड तक खाली सुरंग रिकॉर्ड करता रहा।
फिर वह आकृति कैमरे के ठीक नीचे आकर रुक गई।
उसका चेहरा दिखाई नहीं दे रहा था, लेकिन उसने धीरे-धीरे गर्दन ऊपर उठाई।
Haunted Cave
रिकॉर्डिंग बंद हो गई।
कमरे में सन्नाटा छा गया।
फैज़ल स्क्रीन के करीब गया।
“यह वीडियो एडिट किया गया है?”
महेश ने कहा, “हमने भी यही सोचा था।”
“मूल फाइल कहां है?”
“सर्वर में।”
ईशान ने वीडियो दोबारा चलाया। इस बार उसने दीवार पर ध्यान दिया। काला छेद बनने से ठीक पहले चट्टान पर किसी पुराने चिन्ह की हल्की आकृति दिखाई दी थी।
वह गोल आकार था, जिसके बीच चार टेढ़ी रेखाएं बनी थीं।
ईशान ने वीडियो रोक दिया।
“यह हिस्सा सुरंग के नक्शे में है?”
महेश ने टेबल से रोल किया हुआ नक्शा उठाया।
“नहीं। खुदाई के दौरान यह जगह अचानक मिली। मुख्य सुरंग से करीब सात मीटर नीचे एक प्राकृतिक गुफा है।”
“किसी ने अंदर जाकर देखा?”
महेश ने धीमी आवाज़ में कहा, “पहले दिन चार लोग गए थे।”
“फिर?”
“उनमें से तीन वापस आए। चौथा अंदर रह गया।”
“मृत मिला?”
“नहीं मिला।”
ईशान की आंखों में बेचैनी उभरी।
“तीनों ने क्या बताया?”
महेश ने खिड़की से बाहर मजदूर कैंप की ओर देखा।
“एक व्यक्ति बोलना बंद कर चुका है। दूसरा काम छोड़कर गांव चला गया। तीसरा यहीं है।”
कुछ देर बाद वे बलदेव नाम के उस मजदूर से मिले।
बलदेव लगभग पचास वर्ष का मजबूत आदमी था, लेकिन इस समय उसकी हालत किसी बीमार व्यक्ति जैसी लग रही थी। वह अपने बिस्तर पर बैठा लगातार हथेलियां रगड़ रहा था।
ईशान ने उसके सामने कुर्सी खींची।
“गुफा में क्या देखा था?”
बलदेव ने सिर नहीं उठाया।
“कुछ नहीं।”
“फिर आपका साथी वापस क्यों नहीं आया?”
“वह रुक गया।”
“क्यों?”
बलदेव की उंगलियां अचानक थम गईं।
“क्योंकि उसकी मां ने उसे बुलाया था।”
मीरा ने पूछा, “उसकी मां भी वहां थी?”
बलदेव ने पहली बार उनकी ओर देखा।
उसकी आंखें डर से फैली हुई थीं।
“उसकी मां को मरे चौदह साल हो चुके थे।”
कमरे की हवा भारी हो गई।
बलदेव ने कांपते हुए बताया कि उस दिन गुफा के अंदर उन्हें एक बहुत पुराना पत्थर का दरवाजा मिला था। दरवाजे पर वही चार टेढ़ी रेखाओं वाला चिन्ह बना हुआ था।
जैसे ही वे दरवाजे के पास पहुंचे, उनके साथी गजेंद्र ने कहा कि उसे अपनी मां की आवाज़ सुनाई दे रही है।
बाकी तीनों ने उसे पकड़ने की कोशिश की, लेकिन उसने उन्हें धक्का दिया और दरवाजे की दरार से भीतर चला गया।
उसके बाद दरवाजा अपने आप बंद हो गया।
“हमने उसे पुकारा,” बलदेव ने कहा। “वह अंदर से जवाब देता रहा। पहले अपनी आवाज़ में… फिर अपनी मां की आवाज़ में… और आखिर में…”
वह बोलते-बोलते रुक गया।
“आखिर में क्या?” मीरा ने पूछा।
बलदेव ने अपने कान दोनों हाथों से ढक लिए।
“आखिर में वह एक साथ बहुत सारे लोगों की आवाज़ में हंसने लगा।”
ईशान ने उसे शांत रहने को कहा।
“क्या आपने उस चीज़ को देखा?”
बलदेव ने सिर हिलाया।
“पूरा नहीं देखा। जब हम वापस आ रहे थे, तब छत पर कुछ चल रहा था। उसके हाथ पीछे की ओर मुड़े हुए थे। चेहरा नहीं था। सिर्फ एक लंबा गड्ढा था… जैसे किसी ने चेहरे की जगह मुंह बना दिया हो।”
रात तक टीम ने सुरंग में जाने की तैयारी कर ली।
महेश ने उन्हें रोकने की कोशिश की, लेकिन ईशान निर्णय ले चुका था।
चारों ने हेलमेट, बॉडी कैमरा, ऑक्सीजन मीटर, रस्सियां, गैस सेंसर और थर्मल कैमरे पहन लिए। फैज़ल ने छोटे आकार का उड़ने वाला ड्रोन भी तैयार किया।
रात नौ बजकर दस मिनट पर वे सुरंग के भीतर दाखिल हुए।
प्रवेश द्वार से कुछ दूरी तक बिजली की लाइटें लगी थीं। आगे बढ़ने के साथ रोशनी कम होती गई। लगभग एक किलोमीटर बाद केवल उनकी टॉर्चें ही अंधेरे को काट रही थीं।
दीवारों से पानी टपक रहा था।
फर्श पर मशीनों के निशान थे, लेकिन किसी इंसान के ताजा पैरों के निशान नहीं दिखाई दे रहे थे।
कुछ समय बाद मीरा ने कहा, “क्या तुम्हें भी आवाज़ सुनाई दे रही है?”
सभी रुक गए।
दूर कहीं धातु घसीटने जैसी आवाज़ आ रही थी।
कबीर ने सामने रोशनी डाली।
रास्ता खाली था।
“शायद कोई ढीला पाइप होगा,” ईशान ने कहा।
वे आगे बढ़े।
करीब पंद्रह मिनट बाद सुरंग का मुख्य रास्ता खत्म हुआ। सामने विशाल ड्रिलिंग मशीन खड़ी थी। उसके दाईं ओर दीवार में काला छेद खुला था।
यही प्राकृतिक गुफा का प्रवेश था।
फैज़ल ने ड्रोन चालू किया।
ड्रोन धीरे-धीरे छेद के भीतर चला गया। उसकी लाइव स्क्रीन पर एक संकरी ढलान दिखाई दी, जो नीचे एक बड़े कक्ष में खुल रही थी।
गुफा की दीवारें सामान्य चट्टान जैसी नहीं थीं। उन पर काले रंग की चिकनी परत जमी हुई थी, जो रोशनी पड़ने पर चमक रही थी।
कुछ दूरी पर जमीन पर कई गोल पत्थर रखे थे।
“ये प्राकृतिक संरचना नहीं है,” ईशान ने कहा। “किसी ने इन्हें व्यवस्थित तरीके से रखा है।”
ड्रोन आगे बढ़ा।
अचानक स्क्रीन पर एक पत्थर का दरवाजा दिखाई दिया।
उसकी ऊंचाई लगभग दस फुट थी। बीच में गोल चिन्ह और चार टेढ़ी रेखाएं बनी थीं।
फैज़ल ने कैमरा ज़ूम किया।
दरवाजे के नीचे कुछ पड़ा था।
वह एक हेलमेट था।
उसके पास इंसानी कपड़े और जूते दिखाई दे रहे थे, लेकिन शरीर नहीं था।
कबीर ने कहा, “ड्रोन को ऊपर घुमाओ।”
कैमरा ऊपर उठा।
दरवाजे की छत पर कुछ काला चिपका हुआ था।
शुरुआत में वह चट्टान जैसा लगा। फिर उसने हाथ हिलाया।
ड्रोन का कैमरा अचानक घूम गया।
एक लंबी उंगली स्क्रीन के सामने आई और अगले ही पल वीडियो बंद हो गया।
फैज़ल ने कंट्रोल दोबारा चालू करने की कोशिश की।
“सिग्नल कट गया।”
“ड्रोन गिरा होगा,” ईशान ने कहा।
“नहीं। गिरने से पहले उसका कैमरा बंद किया गया है।”
कबीर ने रस्सी निकाली।
“अब हमें खुद नीचे जाना पड़ेगा।”
चारों ढलान से नीचे उतरने लगे। रास्ता फिसलन भरा था। कुछ स्थानों पर उन्हें घुटनों के बल रेंगना पड़ा।
नीचे पहुंचते ही तापमान अचानक बदल गया।
सुरंग में ठंड थी, लेकिन इस कक्ष में हवा गर्म और नम थी।
मीरा ने ऑक्सीजन मीटर देखा।
“ऑक्सीजन सामान्य है, लेकिन कार्बन डाइऑक्साइड का स्तर थोड़ा ज्यादा है।”
फैज़ल ने थर्मल कैमरा चालू किया।
“दीवारों से गर्मी निकल रही है।”
ईशान ने चट्टान छुई। वह किसी जीवित शरीर की त्वचा जैसी गर्म थी।
“शायद नीचे जियोथर्मल गतिविधि हो,” उसने कहा, लेकिन उसकी अपनी आवाज़ में आत्मविश्वास कम था।
वे गोल पत्थरों के बीच से होकर दरवाजे के पास पहुंचे।
जमीन पर पड़ा ड्रोन पूरी तरह कुचला हुआ था।
फैज़ल ने उसे उठाया।
“इसे किसी ने हाथ से तोड़ा है।”
कबीर ने दरवाजे के किनारों पर टॉर्च डाली।
“इसे खोलने का कोई तरीका?”
ईशान चिन्ह के पास गया। वहां पुराने अक्षरों जैसी आकृतियां बनी थीं। उसने उन पर उंगली फिराई।
दरवाजे के भीतर से हल्की-सी ठक-ठक की आवाज़ आई।
सभी पीछे हटे।
तीन बार आवाज़ हुई।
फिर चुप्पी।
कुछ सेकंड बाद दोबारा तीन चोटें सुनाई दीं।
कबीर ने दरवाजे पर हाथ रखकर पूछा, “अंदर कौन है?”
पहले कोई उत्तर नहीं मिला।
फिर अंदर से बहुत कमजोर आवाज़ आई।
“दरवाजा खोलो…”
महेश ने बताया था कि गायब मजदूरों में से एक का नाम दिनेश था।
ईशान ने पूछा, “तुम कौन हो?”
“दिनेश…”
आवाज रोने लगी।
“मैं इतने दिनों से अंदर फंसा हूं। वह मुझे अंधेरे में रखता है। जल्दी खोलो।”
मीरा दरवाजे के करीब गई।
“तुम्हारे साथ और कौन है?”
अंदर से अचानक चुप्पी छा गई।
फिर दिनेश की आवाज़ बदल गई।
“मीरा…”
मीरा का चेहरा सफेद पड़ गया।
“इसे मेरा नाम कैसे पता?”
दरवाजे के दूसरी तरफ से एक महिला की आवाज़ आई।
“मीरा, मैं हूं।”
मीरा पीछे हट गई।
ईशान ने उसकी बांह पकड़ ली।
“किसकी आवाज़ है?”
मीरा की आंखों में आंसू भर आए।
“मेरी बड़ी बहन की।”
कबीर ने पूछा, “वह कहां है?”
मीरा ने धीमी आवाज़ में कहा, “सात साल पहले उसकी मौत हो गई थी।”
दरवाजे के भीतर से महिला की आवाज़ फिर आई।
“तुम अस्पताल क्यों नहीं आई थीं, मीरा? मैं तुम्हारा इंतजार करती रही।”
मीरा ने अपने कान ढक लिए।
ईशान जोर से बोला, “यह ध्वनि की नकल कर रहा है। कोई भ्रम पैदा करने वाली गैस या इंफ्रासाउंड हो सकता है। किसी को जवाब मत देना।”
उसी समय फैज़ल ने पीछे मुड़कर टॉर्च घुमाई।
गोल पत्थरों के बीच एक व्यक्ति खड़ा था।
उसने मजदूरों वाली नीली वर्दी पहन रखी थी।
उसका चेहरा दूसरी ओर था।
कबीर ने आवाज़ लगाई, “कौन है?”
वह व्यक्ति धीरे-धीरे पलटा।
उसका चेहरा गजेंद्र का था।
लेकिन उसकी आंखें पूरी तरह काली थीं और होंठ अस्वाभाविक रूप से चौड़े फैले हुए थे।
“बलदेव कहां है?” उसने पूछा।
अगले ही पल उसकी गर्दन एक तरफ झुक गई। इतनी ज्यादा कि हड्डी टूटने की आवाज़ आई।
मीरा चीख पड़ी।
कबीर ने फ्लेयर जलाकर उसकी ओर फेंका।
लाल रोशनी फैलते ही वह व्यक्ति पीछे हटा। उसका शरीर कांपने लगा। त्वचा कपड़े की तरह ढीली पड़ गई और उसके भीतर से चार लंबे हाथ बाहर निकले।
वह इंसान नहीं था।
उसकी पीठ फटते हुए ऊपर उठी। सिर पीछे धंस गया और चेहरे की जगह एक गहरा काला मुंह खुल गया।
वह छत पर चढ़ गया।
कबीर ने चिल्लाकर कहा, “बाहर की तरफ भागो!”
चारों ढलान की ओर दौड़े।
उनके ऊपर चट्टानों पर तेज़ खरोंचने की आवाज़ गूंज रही थी। वह जीव छत पर उनके साथ-साथ चल रहा था।
फैज़ल पीछे रह गया।
उसके पैर में रस्सी फंस गई और वह गिर पड़ा।
ईशान और कबीर उसे उठाने के लिए लौटे।
उसी क्षण ऊपर से एक लंबा हाथ नीचे आया और फैज़ल के कंधे को पकड़ लिया।
कबीर ने चाकू निकालकर उस हाथ पर वार किया।
हाथ से खून नहीं निकला। उसके भीतर से काला, गाढ़ा द्रव बाहर आया, जिसकी गंध सड़े हुए लोहे जैसी थी।
जीव ने तेज़ चीख मारी।
उसकी आवाज़ इतनी तीखी थी कि सभी के हेलमेट में लगे संचार उपकरण बंद हो गए।
कबीर ने फैज़ल को छुड़ाया और वे ढलान पर चढ़ने लगे।
पीछे से अलग-अलग आवाज़ें उन्हें पुकार रही थीं।
कभी महेश की आवाज़ आती।
कभी बलदेव की।
कभी उनके अपने परिवार वालों की।
ईशान को अचानक अपने पिता की आवाज़ सुनाई दी।
“ईशान, मुझे अकेला छोड़कर मत जाओ।”
उसके कदम रुक गए।
उसके पिता की मौत पहाड़ों में हुए एक हादसे में हुई थी। ईशान अंतिम समय में उनसे बात नहीं कर पाया था।
आवाज़ बिल्कुल वैसी ही थी।
“एक बार पीछे देख लो।”
ईशान की आंखें भर आईं।
तभी मीरा ने उसका हाथ पकड़कर जोर से खींचा।
“वह तुम्हारे पिता नहीं हैं।”
ईशान ने पीछे देखे बिना दौड़ना जारी रखा।
चारों मुख्य सुरंग तक पहुंच गए। कबीर ने पास पड़ा लोहे का लीवर उठाकर गुफा के प्रवेश में फंसा दिया। ऊपर से चट्टान का एक हिस्सा टूटकर गिरा और छेद आधा बंद हो गया।
कुछ सेकंड तक अंदर से भारी टक्करें आती रहीं।
फिर सब शांत हो गया।
जब वे बाहर पहुंचे, रात के बारह बज चुके थे।
महेश ने उनकी हालत देखकर तुरंत मेडिकल सहायता बुलाई। फैज़ल के कंधे पर पांच गहरे निशान थे, लेकिन हड्डी नहीं टूटी थी।
मीरा ने सभी की जांच की।
कुछ देर बाद ईशान ने महेश से पूछा, “इस पहाड़ का कोई पुराना सर्वे रिकॉर्ड है?”
महेश ने बताया कि परियोजना शुरू होने से पहले पुरातत्व विभाग ने आसपास के गांवों से कुछ दस्तावेज लिए थे। उनमें पहाड़ के भीतर मौजूद एक प्रतिबंधित गुफा का उल्लेख था।
अगली सुबह महेश पुराने कागज़ लेकर आया।
उनमें एक पीले कपड़े में लिपटी पांडुलिपि भी थी। उसकी भाषा प्राचीन गढ़वाली और संस्कृत का मिश्रण थी।
ईशान ने स्थानीय इतिहास के जानकार प्रोफेसर देवेंद्र नौटियाल को बुलाया।
प्रोफेसर ने चिन्ह देखते ही पांडुलिपि बंद कर दी।
“आपने यह कहां देखा?”
ईशान ने उत्तर दिया, “गुफा के दरवाजे पर।”
प्रोफेसर के चेहरे से रंग उतर गया।
उन्होंने बताया कि लगभग चार सौ वर्ष पहले आसपास के कई गांव अचानक खाली हो गए थे। लोगों के गायब होने के बाद एक साधु ने दावा किया था कि पहाड़ के भीतर रहने वाला कोई जीव मनुष्यों की यादें खाकर उनका रूप धारण करता है।
स्थानीय भाषा में उसे “अनुकारी दानव” कहा गया था।
वह शिकार को मारने से पहले उसकी सबसे गहरी याद खोजता था। फिर किसी प्रिय व्यक्ति की आवाज़ और चेहरा बनाकर उसे अपने पास बुलाता था।
“लेकिन वह गुफा में बंद कैसे हुआ?” मीरा ने पूछा।
प्रोफेसर ने पांडुलिपि खोली।
“लोगों ने उसे मारा नहीं था। वे उसे मार ही नहीं सकते थे। उन्होंने एक विशेष ध्वनि और अग्नि के प्रयोग से उसे पत्थर के कक्ष में बंद किया था।”
“किस ध्वनि से?”
प्रोफेसर ने पांडुलिपि की पंक्ति पढ़ी।
“चार दिशाओं से एक साथ बजने वाली धातु की ध्वनि। शायद बड़े घंटों या धातु की प्लेटों से।”
कबीर ने पूछा, “और अग्नि?”
“देवदार के तेल और नमक से उत्पन्न नीली लौ।”
ईशान ने नक्शा फैलाया।
“ड्रिलिंग ने उस कक्ष की बाहरी दीवार तोड़ दी। दानव पूरी तरह बाहर नहीं आया है, लेकिन अब उसके पास सुरंग तक पहुंचने का रास्ता है।”
महेश ने पूछा, “हम प्रवेश बंद कर दें?”
“सिर्फ पत्थर डालने से वह नहीं रुकेगा। उसने पहले ही दो लोगों को बाहर खींच लिया है। अगली बार वह मुख्य सुरंग तक पहुंच सकता है।”
योजना बनाई गई कि गुफा में वापस जाकर पत्थर के दरवाजे को फिर से स्थायी रूप से बंद किया जाएगा।
इस बार वे खाली हाथ नहीं जाने वाले थे।
चार स्टील की बड़ी प्लेटें तैयार की गईं। उन्हें गुफा के चार कोनों में लगाया जाना था। रिमोट सिस्टम से सभी प्लेटों पर एक साथ प्रहार होगा।
देवदार के तेल, नमक और मैग्नीशियम से नीली लौ बनाने की व्यवस्था की गई।
कक्ष के ऊपर नियंत्रित विस्फोटक लगाए जाने थे, ताकि दानव दरवाजे के भीतर जाने के बाद प्रवेश पूरी तरह बंद किया जा सके।
लेकिन सबसे बड़ा प्रश्न था—दानव को वापस दरवाजे के भीतर कैसे भेजा जाए?
प्रोफेसर ने कहा, “वह यादों की ओर आकर्षित होता है। उसे किसी ऐसी स्मृति का रूप देना होगा, जिसे वह अधूरा समझता हो।”
मीरा ने ईशान की ओर देखा।
“वह हममें से हर व्यक्ति की याद पढ़ चुका है।”
ईशान ने गंभीर स्वर में कहा, “तब हमें उसे अपनी तरफ बुलाने देना होगा।”
उस रात टीम दोबारा गुफा में उतरी।
इस बार उनके साथ महेश नहीं था। केवल ईशान, मीरा, कबीर और फैज़ल गए।
फैज़ल का कंधा अभी घायल था, लेकिन उसने बाहर रहने से मना कर दिया।
“मेरा ड्रोन उसने तोड़ा था,” उसने कहा। “हिसाब बराबर करना है।”
मुख्य सुरंग में प्रवेश करते ही उन्हें बदलाव महसूस हुआ।
दीवारों पर लंबी खरोंचें थीं।
कुछ स्थानों पर काले द्रव की बूंदें जमी थीं।
गुफा का प्रवेश, जिसे उन्होंने पत्थरों से बंद किया था, पूरी तरह खुला मिला।
लोहे का लीवर बीच से मुड़ा हुआ था।
वे नीचे पहुंचे और चारों स्टील प्लेटें अलग-अलग स्थानों पर लगाने लगे।
पत्थर का दरवाजा अब थोड़ा खुला था।
उसकी दरार से ठंडी हवा बाहर आ रही थी।
अंदर पूर्ण अंधकार था।
फैज़ल ने थर्मल कैमरा दरार की ओर किया।
स्क्रीन पर कई मानव आकार दिखाई दिए।
“अंदर चार लोग हैं,” उसने कहा।
कबीर ने पूछा, “गायब मजदूर?”
फैज़ल ने स्क्रीन ध्यान से देखी।
“नहीं। ये स्थिर नहीं हैं। इनके शरीर आपस में मिल रहे हैं।”
दरवाजे के भीतर से एक साथ कई आवाज़ें आईं।
“ईशान…”
“मीरा…”
“कबीर…”
“फैज़ल…”
चारों के नाम अलग-अलग आवाज़ों में गूंजने लगे।
ईशान ने रिमोट प्रणाली जांची।
“सब अपनी जगह तैयार रहो।”
अचानक दरवाजा पूरी तरह खुल गया।
अंदर से चार लोग बाहर आए।
ईशान के सामने उसके पिता खड़े थे।
मीरा के सामने उसकी बहन।
कबीर के सामने उसका पुराना बचाव साथी, जो एक हिमस्खलन में मारा गया था।
और फैज़ल के सामने उसकी मां, जो इस समय जीवित थी और दिल्ली में रहती थी।
फैज़ल चौंका।
“मेरी मां मरी नहीं है।”
उसकी मां जैसी दिख रही आकृति मुस्कराई।
“लेकिन अभी मर सकती हूं।”
फैज़ल का मोबाइल बज उठा।
स्क्रीन पर उसकी मां का नंबर था।
उसने घबराकर कॉल उठाया।
दूसरी ओर से उसकी मां की आवाज़ आई।
“फैज़ल, घर के बाहर कोई खड़ा है।”
गुफा में मौजूद आकृति उसी समय बोली, “और वह दरवाजा खोलने वाली है।”
फैज़ल का ध्यान टूट गया।
आकृति अचानक लंबी होकर उसकी ओर झपटी।
कबीर ने फ्लेयर चलाया। नीली चमक में चारों नकली मानव रूप पिघलने लगे और एक विशाल शरीर में बदल गए।
इस बार दानव पहले से कहीं बड़ा था।
उसका शरीर लगभग बारह फुट लंबा था। चार मुख्य हाथों के अलावा उसकी पसलियों के बीच से छोटे-छोटे हाथ निकल रहे थे। उसकी गर्दन के चारों ओर अलग-अलग चेहरों की परतें चिपकी थीं।
हर चेहरा किसी गायब व्यक्ति का था।
गजेंद्र।
दिनेश।
दूसरा मजदूर।
और कई अनजान लोग।
दानव ने सभी चेहरों से एक साथ बोलना शुरू किया।
“तुम हमें बंद नहीं कर सकते।”
कबीर ने उसे दरवाजे की तरफ मोड़ने के लिए जलता हुआ देवदार तेल फेंका।
दानव पीछे हटा।
मीरा ने दूसरी ओर से नीली लौ जलाई।
दानव दोनों आग के बीच फंस गया।
ईशान ने स्टील प्लेटों का रिमोट उठाया।
तभी उसके पिता का चेहरा दानव की छाती से बाहर निकला।
“ईशान, तुम जानते हो मेरी मौत तुम्हारी वजह से हुई।”
ईशान के हाथ कांप गए।
“झूठ।”
“तुमने उस दिन फोन उठाया होता, तो मैं उस रास्ते पर नहीं जाता।”
ईशान की आंखों के सामने पुरानी याद उभर आई।
उसके पिता ने हादसे से कुछ मिनट पहले उसे फोन किया था। ईशान एक मीटिंग में था और उसने कॉल काट दी थी।
दानव ने उसी अपराधबोध को पकड़ लिया था।
वह धीरे-धीरे ईशान के करीब आने लगा।
“तुम मुझे बचा सकते थे।”
ईशान ने रिमोट नीचे कर दिया।
मीरा चिल्लाई, “उसकी तरफ मत देखो!”
दानव का एक हाथ ईशान के सिर तक पहुंच गया।
उसी समय फैज़ल ने अपना मोबाइल दानव की ओर फेंका।
फोन पर उसकी असली मां की आवाज़ आ रही थी।
“फैज़ल? क्या हुआ? बोल क्यों नहीं रहे?”
दानव अचानक रुक गया।
उसकी गर्दन फैज़ल की तरफ मुड़ गई।
शायद जीवित व्यक्ति की वास्तविक आवाज़ और उसकी नकल के बीच टकराव से वह भ्रमित हो गया था।
ईशान ने मौका देखकर रिमोट दबाया।
चारों स्टील प्लेटों पर एक साथ प्रहार हुआ।
गुफा में इतनी तेज़ धातु की आवाज़ गूंजी कि चट्टानें हिल गईं।
दानव ने भयानक चीख मारी।
उसके शरीर पर चिपके सभी चेहरे एक साथ मुंह खोलकर रोने लगे।
वह पीछे हटने लगा।
कबीर और मीरा ने देवदार के तेल में नमक डालकर नीली लपटों का घेरा बनाया।
दानव के हाथ जलने लगे।
उसका काला शरीर सिकुड़ता गया।
लेकिन दरवाजे से ठीक पहले उसने अपनी लंबी उंगली ईशान के पैर में लपेट दी।
ईशान जमीन पर गिर गया।
दानव उसे खींचते हुए अंधेरे कक्ष की ओर ले जाने लगा।
कबीर ने रस्सी ईशान की कमर में बांधकर पूरी ताकत से खींची।
मीरा ने जलता हुआ तेल दानव के हाथ पर डाला।
हाथ ढीला पड़ गया।
ईशान छूटकर बाहर की ओर लुढ़क गया।
दानव पत्थर के दरवाजे के भीतर पहुंच चुका था, लेकिन उसके छोटे हाथ बाहर की जमीन पकड़कर खुद को रोक रहे थे।
फैज़ल ने विस्फोटक का ट्रिगर उठाया।
“दरवाजा बंद नहीं हो रहा!”
ईशान ने देखा कि पत्थर के दरवाजे के बीच दानव का एक हाथ फंसा है।
वह लोहे की रॉड लेकर आगे बढ़ा और पूरी ताकत से हाथ पर मारा।
हाथ टूटकर अलग गिर गया।
दरवाजा बंद होने लगा।
अंदर से दानव ने आखिरी बार ईशान के पिता की आवाज़ में कहा—
“मैं फिर तुम्हें फोन करूंगा।”
दरवाजा बंद हो गया।
ईशान ने चिल्लाकर कहा, “अब!”
फैज़ल ने ट्रिगर दबा दिया।
नियंत्रित विस्फोट हुआ।
छत से विशाल चट्टानें गिरीं और पत्थर का दरवाजा पूरी तरह दब गया।
चारों ढलान की ओर भागे।
पीछे गुफा का पूरा कक्ष ढह रहा था।
वे मुख्य सुरंग तक पहुंचे ही थे कि एक तेज़ हवा का झोंका पीछे से आया। सभी लाइटें बुझ गईं।
अंधेरे में किसी के रेंगने की आवाज़ सुनाई दी।
कबीर ने टॉर्च जलाई।
फर्श पर दानव का टूटा हुआ हाथ पड़ा था।
वह उंगलियों के सहारे तेजी से उनकी ओर रेंग रहा था।
मीरा ने नीली लौ वाला आखिरी कंटेनर उसके ऊपर फेंक दिया।
हाथ आग में जलने लगा।
उसमें बने छोटे मुंह से इंसानी चीखें निकलती रहीं।
कुछ सेकंड बाद वह राख में बदल गया।
टीम सुरंग से बाहर निकली।
कुछ ही दिनों में परियोजना को स्थायी रूप से बंद कर दिया गया। आधिकारिक रिपोर्ट में कारण पहाड़ की अस्थिर भूगर्भीय संरचना बताया गया।
प्रवेश द्वार पर कई टन कंक्रीट डालकर उसे सील कर दिया गया।
गायब मजदूर कभी नहीं मिले।
ईशान ने पूरी घटना की रिपोर्ट तैयार की, लेकिन कंपनी ने उसे सार्वजनिक करने से मना कर दिया। रिकॉर्डिंग, नमूने और सभी उपकरण सरकारी जांच के लिए ले लिए गए।
घटना के लगभग तीन महीने बाद ईशान दिल्ली में अपने फ्लैट में था।
रात के दो बजकर सोलह मिनट पर उसका मोबाइल बजा।
स्क्रीन पर कोई नंबर नहीं था।
उसने कॉल काट दी।
फोन दोबारा बजा।
इस बार स्क्रीन पर नाम दिखाई दिया—
“पापा।”
ईशान का शरीर सुन्न पड़ गया।
उसके पिता का नंबर वर्षों पहले बंद हो चुका था।
फोन लगातार बजता रहा।
उसने कांपते हाथ से कॉल उठाई, लेकिन कुछ नहीं बोला।
दूसरी ओर कुछ देर तक केवल भारी सांसों की आवाज़ आती रही।
फिर उसके पिता की आवाज़ सुनाई दी।
“ईशान…”
उसने फोन कान से दूर कर लिया।
आवाज़ बहुत धीरे से बोली—
“तुमने केवल दरवाजा बंद किया था।”
कुछ सेकंड की खामोशी के बाद फोन के भीतर से पत्थर पर नाखून घिसने की आवाज़ आई।
“रास्ता नहीं।”
कॉल कट गई।
उसी समय ईशान के बेडरूम की दीवार से धूल नीचे गिरी।
उसने टॉर्च उठाकर दीवार पर रोशनी डाली।
वहां नमी के बीच एक गोल आकृति बन चुकी थी।
उस गोल आकृति के बीच चार टेढ़ी रेखाएं थीं।
दीवार के दूसरी तरफ से तीन बार दस्तक हुई।
ठक।
ठक।
ठक।
ईशान पीछे हट गया।
कमरे की सारी लाइटें बंद हो गईं।
अंधेरे में दीवार के भीतर से उसके पिता की आवाज़ आई—
“इस बार दरवाजा तुम खोलोगे।”
और फिर पूरी दीवार किसी विशाल जीव की छाती की तरह धीरे-धीरे सांस लेने लगी।
Geological Survey of India – भारत की चट्टानों और भूगर्भीय संरचनाओं से संबंधित आधिकारिक जानकारी