रंटस: बर्फ के नीचे सोती औरत | Kashmiri Horror Story in Hindi

जनवरी की उस रात कश्मीर के गुरेज़ सेक्टर में तापमान शून्य से बारह डिग्री नीचे जा चुका था।

चारों ओर फैली बर्फ चांदनी में चमक रही थी। पहाड़ों के बीच से गुजरने वाली संकरी सड़क पर दूर-दूर तक किसी गाड़ी की रोशनी दिखाई नहीं दे रही थी। देवदार के पेड़ ठंडी हवा के झोंकों के साथ धीरे-धीरे हिल रहे थे और उनके बीच से निकलती सीटी जैसी आवाज़ पूरे इलाके को और भी सुनसान बना रही थी।

सीमा से लगभग पैंतीस किलोमीटर दूर स्थित खुरबत नाम का गांव सर्दियों में बाकी दुनिया से लगभग कट जाता था। गांव में मुश्किल से साठ घर थे। उनमें से आधे घर सर्दियों के दौरान बंद रहते थे, क्योंकि उनके मालिक परिवार सहित श्रीनगर या बांदीपोरा चले जाते थे।

Kashmiri Horror Story in Hindi

लेकिन इस बार गांव में बाहरी लोगों की मौजूदगी बढ़ गई थी। Kashmiri Horror Story in Hindi

सरकार पहाड़ के अंदर से गुजरने वाली एक नई जलविद्युत सुरंग की योजना बना रही थी। उसी परियोजना के शुरुआती सर्वेक्षण के लिए दिल्ली की एक निजी भूगर्भीय कंपनी ने पांच लोगों की टीम वहां भेजी थी।

टीम का नेतृत्व कर रहा था चौंतीस वर्षीय अर्जुन मलिक।

अर्जुन पेशे से जियोलॉजिकल इंजीनियर था। पहाड़ों, सुरंगों और बर्फीले इलाकों में काम करना उसके लिए नया नहीं था। पिछले दस वर्षों में वह हिमाचल, सिक्किम, लद्दाख और उत्तराखंड की कई कठिन परियोजनाओं पर काम कर चुका था।

वह भूत-प्रेत, टोना-टोटका या किसी भी अलौकिक शक्ति पर विश्वास नहीं करता था।

उसका मानना था कि हर रहस्य के पीछे कोई वैज्ञानिक कारण होता है। आवाज़ें पहाड़ों की हलचल से आती हैं, परछाइयां रोशनी के भ्रम से बनती हैं और भूत केवल इंसान के डर की कल्पना होते हैं।

टीम में अर्जुन के अलावा उसका सहायक निखिल, मशीन ऑपरेटर सादिक, सर्वेक्षण विशेषज्ञ भार्गव और मेडिकल ऑफिसर डॉ. सारा कुरैशी शामिल थे।

गांव के पुराने पंचायत भवन को अस्थायी गेस्ट हाउस में बदल दिया गया था। नीचे के हिस्से में उपकरण रखे गए थे और ऊपर की मंजिल पर टीम के रहने की व्यवस्था की गई थी।

उनके लिए खाना बनाने और स्थानीय रास्तों की जानकारी देने की जिम्मेदारी गांव के पचपन वर्षीय यूसुफ मीर को दी गई थी।

यूसुफ बहुत कम बोलता था।

उसके सफेद होते बाल, हमेशा झुकी रहने वाली नजरें और चेहरे पर मौजूद गंभीरता उसे उसकी वास्तविक उम्र से कहीं अधिक बूढ़ा दिखाती थीं।

टीम के गांव पहुंचने के पहले ही दिन यूसुफ ने उन्हें एक चेतावनी दी थी।

“शाम ढलने के बाद उत्तर वाले जंगल में मत जाना।”

निखिल ने हंसते हुए पूछा था, “क्यों चाचा? वहां तेंदुआ है क्या?”

यूसुफ ने उसकी तरफ देखे बिना कहा था, “तेंदुए से तो बचने का रास्ता होता है।”

“और वहां जिससे खतरा है, उससे बचने का रास्ता नहीं है?”

यूसुफ ने चूल्हे में लकड़ी डालते हुए जवाब दिया, “वह रास्ता खुद बनाकर तुम्हारे पास आती है।”

उस समय सबने उसकी बात को स्थानीय अंधविश्वास समझकर टाल दिया था।

सर्वेक्षण का काम गांव से सात किलोमीटर दूर स्थित शीन दर्रे के नीचे चल रहा था। पहाड़ के भीतर करीब दो सौ मीटर लंबी एक पुरानी परीक्षण सुरंग पहले से बनी हुई थी। परियोजना कई वर्ष पहले शुरू की गई थी, लेकिन लगातार दुर्घटनाओं के बाद बंद हो गई थी।

नई कंपनी को उसी सुरंग की जांच करके रिपोर्ट तैयार करनी थी।

पहले तीन दिन सामान्य रहे।

टीम सुबह आठ बजे गेस्ट हाउस से निकलती, दोपहर तक सुरंग के अंदर चट्टानों के नमूने लेती और अंधेरा होने से पहले गांव लौट आती।

चौथे दिन उन्हें सुरंग की पुरानी दीवार के पीछे एक खोखला हिस्सा मिला।

भार्गव ने स्कैनर की स्क्रीन देखते हुए कहा, “इसके पीछे कम से कम आठ मीटर खाली जगह है।”

अर्जुन ने दीवार पर हाथ मारा। भीतर से धीमी और गहरी आवाज़ आई।

“शायद पुराना प्राकृतिक कक्ष है।”

निखिल उत्साहित हो गया। “अगर रास्ता निकला तो परियोजना की दिशा बदल सकती है।”

दीवार का एक हिस्सा पहले से कमजोर था। मशीन की सहायता से करीब दो घंटे में उसमें इतना बड़ा छेद बना दिया गया कि एक व्यक्ति झुककर उसके अंदर जा सके।

छेद के पीछे पत्थरों से बनी एक प्राकृतिक गुफा थी।

अंदर की हवा सुरंग की तुलना में अधिक ठंडी थी। दीवारों पर काले रंग की नमी जमी हुई थी। छत से बर्फ की पतली नुकीली परतें लटक रही थीं।

सादिक ने टॉर्च घुमाते हुए कहा, “सर, यहां हवा आ रही है। इसका मतलब दूसरी तरफ कोई रास्ता जरूर है।”

अर्जुन, निखिल और सादिक गुफा में आगे बढ़े।

लगभग तीस मीटर बाद रास्ता चौड़ा हो गया। वहां जमीन पर पुराने पशुओं की हड्डियां बिखरी हुई थीं।

निखिल ने एक हड्डी उठाई।

“लगता है भेड़ की है।”

सादिक ने तुरंत कहा, “इसे नीचे रखो।”

“क्यों?”

“हड्डियां जहां पड़ी हों, वहीं रहने देना अच्छा होता है।”

निखिल हंस पड़ा। “तुम भी यूसुफ चाचा जैसी बातें करने लगे?”

गुफा के अंतिम हिस्से में पत्थर की एक दीवार थी। उस दीवार पर किसी नुकीली चीज़ से एक औरत की आकृति बनाई गई थी। आकृति के बाल जमीन तक लंबे थे और चेहरे की जगह केवल दो गहरे गोल निशान बने हुए थे।

आकृति के नीचे कुछ शब्द लिखे थे।

सारा ने मोबाइल से तस्वीर लेकर कहा, “यह कश्मीरी की पुरानी लिपि जैसी लग रही है।”

दीवार के सामने जमीन में आधा दबा हुआ तांबे का एक छोटा संदूक था।

अर्जुन ने दस्ताने पहनकर उसे बाहर निकाला।

संदूक का ढक्कन जंग खाकर कमजोर हो चुका था। थोड़ा जोर लगाते ही वह खुल गया।

अंदर काले कपड़े में लिपटा हुआ चांदी जैसा एक गोल आभूषण रखा था। वह किसी पुराने गले के हार का हिस्सा लग रहा था। उसके बीच में नीले रंग का पत्थर लगा था।

जैसे ही अर्जुन ने उसे उठाया, गुफा के भीतर अचानक हवा का तेज झोंका आया।

तीनों की टॉर्च एक साथ बुझ गईं।

अंधेरे में किसी औरत की धीमी सांस लेने की आवाज़ सुनाई दी।

सादिक घबराकर बोला, “सर… यहां कोई है।”

अर्जुन ने टॉर्च को थपथपाते हुए कहा, “बैटरी ठंड के कारण बंद हुई है।”

उसी समय अंधेरे में बहुत धीमी आवाज़ आई।

“मुझे… बाहर निकालो…”

तीनों कुछ क्षणों के लिए जड़ हो गए।

निखिल ने कांपती आवाज़ में पूछा, “आप दोनों ने भी सुना?”

अर्जुन ने जवाब नहीं दिया।

कुछ सेकंड बाद टॉर्च दोबारा जल उठीं।

गुफा खाली थी।

अर्जुन ने आभूषण को एक नमूना बैग में रखा और सभी वापस सुरंग की तरफ लौट गए।

उस दिन गांव पहुंचते-पहुंचते शाम के छह बज चुके थे।

Kashmiri Horror Story in Hindi

गेस्ट हाउस में घुसते ही यूसुफ की नजर अर्जुन के हाथ में मौजूद पारदर्शी बैग पर पड़ी। बैग में नीले पत्थर वाला आभूषण दिखाई दे रहा था।

यूसुफ के हाथ से चाय की केतली छूट गई।

“यह कहां मिला?”

अर्जुन ने सामान्य स्वर में कहा, “सुरंग के पीछे एक प्राकृतिक गुफा है। वहीं मिला।”

यूसुफ तुरंत आगे आया।

“इसे वापस रखकर आओ।”

निखिल ने कहा, “चाचा, यह पुरातात्विक वस्तु हो सकती है। कंपनी को जांच के लिए भेजना होगा।”

“यह तुम्हारी कंपनी की चीज़ नहीं है।”

अर्जुन ने बैग मेज पर रखते हुए पूछा, “आप जानते हैं यह क्या है?”

यूसुफ की नजर आभूषण पर टिकी रही।

“यह किसी औरत के गले का हार नहीं है। यह उसकी कैद का ताला है।”

कमरे में कुछ क्षण के लिए सन्नाटा छा गया।

निखिल मुस्कुराया। “अब आप कहेंगे कि हमने किसी चुड़ैल को आजाद कर दिया है।”

यूसुफ ने पहली बार सीधे उसकी आंखों में देखा।

“चुड़ैल इंसान को डराकर मारती है। वह तुम्हें डराएगी नहीं। वह तुम्हें ऐसा महसूस करवाएगी कि दुनिया में उससे खूबसूरत और जरूरी कोई नहीं है।”

अर्जुन ने कुर्सी खींचते हुए कहा, “ठीक है। हमें पूरी बात बताइए।”

यूसुफ ने बोलने से पहले दरवाजे और खिड़कियां बंद कर दीं।

“बहुत साल पहले इन पहाड़ों में एक ऐसी औरत के बारे में कहा जाता था, जो अकेले पुरुषों को अपना शिकार बनाती थी। वह कभी रास्ता भटकी हुई यात्री बनकर आती, कभी किसी की पत्नी, कभी किसी की पुरानी प्रेमिका। वह सामने वाले के मन में छिपी उस इच्छा का रूप लेती थी, जिसे वह दुनिया से छिपाकर रखता था।”

सारा ने पूछा, “उसका नाम क्या था?”

यूसुफ ने धीमी आवाज़ में कहा, “रंटस।”

नाम सुनते ही चूल्हे में जल रही एक लकड़ी अचानक टूटकर नीचे गिर गई।

“लोग कहते हैं कि रंटस इंसान का खून नहीं पीती। वह उसकी यादें, इच्छाएं और जीने की ताकत पीती है। आदमी हर मुलाकात के बाद थोड़ा कमजोर होता जाता है। पहले उसे नींद कम आती है, फिर खाना अच्छा नहीं लगता, फिर वह अपने लोगों से दूरी बनाने लगता है। अंत में उसके लिए केवल रंटस बचती है।”

“और सातवीं मुलाकात?” सादिक ने पूछा।

यूसुफ ने कहा, “सातवीं मुलाकात के बाद आदमी कभी वापस नहीं आता।”

निखिल ने हंसते हुए ताली बजाई।

“बहुत अच्छी कहानी है। इसे रिकॉर्ड करना चाहिए था।”

यूसुफ ने उसकी तरफ देखा। “आज से रात में कोई तुम्हारा नाम लेकर बाहर बुलाए, तो जवाब मत देना।”

अर्जुन ने नमूना बैग उठाया और अपने उपकरण वाले कमरे में रख दिया।

“कल सुबह इसे वापस गुफा में रख देंगे। फिलहाल मौसम खराब है।”

यूसुफ ने कहा, “सुबह तक बहुत देर हो सकती है।”

उस रात करीब साढ़े ग्यारह बजे अर्जुन अपने कमरे में रिपोर्ट तैयार कर रहा था।

बाहर बर्फ गिरनी शुरू हो गई थी। बाकी लोग अपने कमरों में जा चुके थे। केवल हवा की आवाज़ और कभी-कभी पुरानी लकड़ी की छत के चरमराने की ध्वनि सुनाई दे रही थी।

अचानक नीचे के मुख्य दरवाजे पर दस्तक हुई।

तीन धीमी चोटें।

अर्जुन ने घड़ी देखी।

रात के ग्यारह बजकर सैंतीस मिनट।

कुछ क्षण बाद फिर दस्तक हुई।

वह टॉर्च लेकर सीढ़ियां उतरने लगा। नीचे पहुंचते ही उसे याद आया कि यूसुफ ने दरवाजा न खोलने की चेतावनी दी थी।

अर्जुन ने दरवाजे के पास जाकर पूछा, “कौन है?”

बाहर से एक महिला की आवाज़ आई।

“दरवाजा खोलिए। मेरी गाड़ी फंस गई है।”

आवाज़ में घबराहट थी।

अर्जुन ने खिड़की के पर्दे को थोड़ा हटाकर बाहर देखा।

दरवाजे के सामने एक युवती खड़ी थी। उसने लंबा भूरा कोट पहन रखा था और सिर पर ऊनी टोपी थी। उसके कंधों और बालों पर बर्फ जमी हुई थी।

वह सामान्य इंसान जैसी ही दिखाई दे रही थी।

अर्जुन ने दरवाजा खोल दिया।

युवती ठंड से कांप रही थी।

“मेरा नाम मीरा है। मैं वन विभाग की टीम के साथ आई थी। हमारी जीप करीब दो किलोमीटर पीछे बर्फ में फंस गई। फोन में नेटवर्क नहीं है।”

अर्जुन ने उसे अंदर आने दिया।

“आपकी टीम के बाकी लोग कहां हैं?”

“ड्राइवर जीप के पास है। उसने मुझे गांव से मदद लाने भेजा।”

अर्जुन ने अंगीठी में लकड़ी डाली और उसे कुर्सी पर बैठाया।

कुछ ही देर में सारा और निखिल भी नीचे आ गए।

मीरा ने बताया कि वह श्रीनगर में वन्यजीव शोधकर्ता है और दुर्लभ हिमालयी लोमड़ी पर काम कर रही है।

उसकी बातें सामान्य थीं। उसके पास पहचान पत्र भी था।

सारा ने कार्ड देखा।

उस पर नाम लिखा था—डॉ. मीरा कौल, वाइल्डलाइफ रिसर्च डिवीजन।

निखिल ने पूछा, “हम आपकी गाड़ी तक चलें?”

मीरा ने खिड़की से बाहर देखा। बर्फ बहुत तेज हो चुकी थी।

“अब जाना खतरनाक होगा। सुबह मदद भेज दीजिएगा। मैं यहां कहीं बैठ जाऊंगी।”

सारा ने अपने कमरे में उसके लिए जगह बना दी।

अर्जुन ऊपर जाने लगा तो मीरा ने उसे आवाज़ दी।

“अर्जुन।”

वह रुक गया।

उसने मीरा को अपना नाम नहीं बताया था।

मीरा मुस्कुराई। “आपके जैकेट पर कंपनी का कार्ड लगा है।”

अर्जुन ने नीचे देखा। उसके जैकेट पर वास्तव में नाम लिखा था।

“गुड नाइट,” मीरा ने कहा।

अर्जुन अपने कमरे में चला गया, लेकिन काफी देर तक उसे नींद नहीं आई।

सुबह जब वह नीचे आया, मीरा जा चुकी थी।

सारा रसोई में चाय बना रही थी।

अर्जुन ने पूछा, “वह इतनी सुबह चली गई?”

सारा ने हैरानी से उसकी तरफ देखा।

“कौन?”

“मीरा।”

“कौन मीरा?”

अर्जुन कुछ क्षण उसे देखता रहा।

“रात को जो महिला यहां रुकी थी।”

सारा ने कप नीचे रखा। “अर्जुन, रात को यहां कोई महिला नहीं आई।”

अर्जुन को लगा कि सारा मजाक कर रही है।

“तुम उसका पहचान पत्र देख रही थीं।”

“मैं रात दस बजे अपने कमरे में चली गई थी। उसके बाद बाहर नहीं निकली।”

अर्जुन ने तुरंत निखिल को बुलाया।

निखिल ने भी किसी मीरा को देखने से इनकार कर दिया।

मुख्य दरवाजा अंदर से बंद था। फर्श पर बर्फ या गीले जूतों का कोई निशान नहीं था।

लेकिन अंगीठी के पास वाली कुर्सी पर एक लंबा काला बाल पड़ा हुआ था।

अर्जुन ने उसे उठाकर देखा।

उसी समय यूसुफ वहां पहुंच गया।

बाल देखकर उसके चेहरे की रंगत बदल गई।

“उसने तुम्हें देख लिया है।”

अर्जुन ने कठोर स्वर में कहा, “हो सकता है मुझे कोई सपना आया हो।”

“सपने में दरवाजा खुला नहीं रहता।”

अर्जुन ने पीछे देखा।

मुख्य दरवाजे की कुंडी टूटी हुई थी।

उस दिन खराब मौसम के कारण टीम सुरंग तक नहीं जा सकी।

अर्जुन ने मीरा के पहचान पत्र की बात याद करके इंटरनेट पर वन विभाग की वेबसाइट देखने की कोशिश की, लेकिन नेटवर्क बहुत कमजोर था।

शाम करीब चार बजे फोन में थोड़ी देर के लिए सिग्नल आया। उसने मीरा कौल का नाम खोजा।

एक पुराना समाचार सामने आया।

“वन्यजीव शोधकर्ता मीरा कौल हिमस्खलन में लापता।”

समाचार छह वर्ष पुराना था।

तस्वीर में वही महिला थी, जो पिछली रात गेस्ट हाउस में आई थी।

अर्जुन ने फोन तुरंत बंद कर दिया।

उसने खुद को समझाया कि उसने दिन में कहीं यह तस्वीर देखी होगी और रात को दिमाग ने वही चेहरा सपने में बना दिया।

शाम ढलते ही उसके सिर में हल्का दर्द शुरू हो गया।

रात करीब नौ बजे उसे खिड़की के बाहर किसी के चलने की आवाज़ सुनाई दी।

बर्फ पर दबते कदमों की साफ चरमराहट।

उसने पर्दा हटाया।

मीरा सड़क के दूसरी तरफ खड़ी थी।

इस बार उसने सफेद रंग का लंबा वस्त्र पहन रखा था। उसके सिर पर टोपी नहीं थी। लंबे काले बाल हवा में हिल रहे थे, लेकिन उसके वस्त्र पर बर्फ का एक कण भी नहीं टिक रहा था।

अर्जुन तुरंत पीछे हट गया।

तभी उसका फोन बजा।

स्क्रीन पर कोई नंबर नहीं था।

उसने कॉल उठाई।

“आपने मुझे पहचाना नहीं?” मीरा की आवाज़ आई।

अर्जुन ने खिड़की की तरफ देखा। वह अब भी वहीं खड़ी थी, लेकिन उसके हाथ में कोई फोन नहीं था।

“तुम कौन हो?”

“जिसे आपने पहाड़ के अंदर से बाहर निकाला।”

फोन कट गया।

अर्जुन ने कमरे का दरवाजा बंद किया और पूरी रात लाइट जलाकर बैठा रहा।

अगली सुबह निखिल ने उसे देखकर कहा, “तुम्हारा चेहरा इतना पीला क्यों है?”

“नींद नहीं हुई।”

सारा ने उसका ब्लड प्रेशर और ऑक्सीजन स्तर जांचा।

“ऑक्सीजन सामान्य है, लेकिन पल्स काफी धीमी है। आज तुम आराम करो।”

अर्जुन ने मना कर दिया।

“हमें वह चीज़ वापस रखनी है।”

मौसम खुल चुका था। टीम दोपहर से पहले सुरंग पहुंच गई।

अर्जुन ने उपकरण वाले डिब्बे से नमूना बैग निकालना चाहा।

बैग खाली था।

नीले पत्थर वाला आभूषण गायब था।

सभी ने पूरा सामान देखा, लेकिन वह कहीं नहीं मिला।

सादिक ने कहा, “हम वापस गांव चलते हैं।”

“क्यों?” निखिल ने पूछा।

“क्योंकि जिसे यह चीज़ चाहिए थी, वह इसे ले चुकी है।”

अर्जुन ने गुफा में जाकर दीवार की आकृति देखी।

अब उस आकृति के चेहरे पर बने दोनों गोल निशानों के बीच एक तीसरा निशान दिखाई दे रहा था।

वह निशान किसी ने अभी-अभी बनाया हो, ऐसा लग रहा था।

अर्जुन ने उस पर हाथ रखा।

पीछे से मीरा की आवाज़ आई।

“मुझे इतनी जल्दी वापस क्यों भेज रहे हो?”

वह पलटा।

गुफा के दूसरे छोर पर मीरा खड़ी थी।

अर्जुन ने टॉर्च उसकी तरफ की।

वह मुस्कुरा रही थी।

“तुम यहां कैसे आई?”

“मैं यहीं रहती हूं।”

अर्जुन ने पीछे देखा। उसके साथ आए निखिल और सादिक कहीं दिखाई नहीं दे रहे थे।

उसने आवाज़ लगाई, “निखिल!”

गुफा में उसकी आवाज़ गूंजती रही।

मीरा धीरे-धीरे उसकी तरफ बढ़ी।

“तुम हमेशा दूसरों को साबित करते रहते हो कि तुम्हें किसी की जरूरत नहीं है। लेकिन सच यह है कि तुम बहुत अकेले हो।”

अर्जुन का गला सूख गया।

“तुम मेरे बारे में कुछ नहीं जानती।”

“तुम्हारी पत्नी तुम्हें छोड़कर इसलिए गई क्योंकि हर बार काम तुम्हारे लिए उससे ज्यादा जरूरी था।”

अर्जुन के चेहरे का रंग उड़ गया।

उसके तलाक के बारे में टीम में किसी को जानकारी नहीं थी।

मीरा उसके बेहद करीब आ गई।

“तुमने आखिरी बार उसे एयरपोर्ट पर रोते हुए देखा था। उसने कहा था—एक दिन तुम्हें समझ आएगा कि खाली घर कितना डरावना होता है।”

अर्जुन ने पीछे हटना चाहा, लेकिन उसके पैर नहीं हिले।

मीरा ने उसके चेहरे पर हाथ रखा।

उसका हाथ बर्फ से भी अधिक ठंडा था।

“मैं तुम्हें कभी अकेला नहीं छोड़ूंगी।”

अर्जुन की आंखों के सामने अंधेरा छा गया।

जब उसे होश आया, वह सुरंग के मुख्य रास्ते में पड़ा था।

निखिल उसके चेहरे पर पानी छिड़क रहा था।

“सर! आंखें खोलिए।”

अर्जुन ने उठने की कोशिश की।

“मीरा कहां है?”

निखिल और सादिक ने एक-दूसरे को देखा।

“यहां कोई नहीं था। आप अचानक गुफा के अंदर चले गए। हम पीछे आए तो आप जमीन पर बेहोश पड़े थे।”

गांव लौटने के बाद अर्जुन को तेज बुखार हो गया।

सारा ने उसकी गर्दन जांची। बाईं तरफ नीले रंग का एक छोटा गोल निशान बन गया था। वह चोट जैसा नहीं था। ऐसा लग रहा था जैसे त्वचा के नीचे स्याही फैल गई हो।

अगले दो दिनों तक अर्जुन कमरे से बाहर नहीं निकला।

वह खाना नहीं खा रहा था। किसी से बात नहीं करता था। रात होते ही खिड़की के पास बैठ जाता और उत्तर वाले जंगल की तरफ देखता रहता।

तीसरी रात निखिल की नींद अचानक खुली।

उसे ऊपर वाले गलियारे में किसी के चलने की आवाज़ आई।

वह बाहर निकला तो अर्जुन सीढ़ियां उतर रहा था।

“सर, कहां जा रहे हैं?”

अर्जुन ने जवाब नहीं दिया।

निखिल ने उसका हाथ पकड़ लिया।

अर्जुन ने इतनी तेजी से उसे धक्का दिया कि वह दीवार से जा टकराया।

अर्जुन की आंखें खुली थीं, लेकिन उनमें कोई भाव नहीं था।

वह मुख्य दरवाजा खोलकर बर्फ में निकल गया।

निखिल ने तुरंत बाकी लोगों को जगाया।

सभी टॉर्च लेकर उसके पीछे दौड़े।

अर्जुन के पैरों के निशान उत्तर वाले जंगल की तरफ जा रहे थे।

करीब आधा किलोमीटर बाद वे निशान अचानक समाप्त हो गए।

उनके सामने बर्फ का बिल्कुल समतल मैदान था।

सादिक ने घबराकर कहा, “इंसान हवा में गायब नहीं हो सकता।”

तभी दूर पेड़ों के बीच एक सफेद आकृति दिखाई दी।

उसके साथ अर्जुन चल रहा था।

निखिल ने आवाज़ लगाई, “सर!”

अर्जुन ने पलटकर नहीं देखा।

सारा आगे बढ़ने लगी, लेकिन यूसुफ ने उसका रास्ता रोक दिया।

“उसके पीछे मत जाओ।”

“वह उसे लेकर जा रही है!”

“अभी उसकी चौथी रात है। वह आज उसे नहीं मारेगी।”

निखिल ने यूसुफ का कॉलर पकड़ लिया।

“आपको सब पता था! आपने हमें पहले क्यों नहीं रोका?”

यूसुफ ने उसका हाथ हटाते हुए कहा, “मैंने चेतावनी दी थी। तुम लोगों ने उसकी कैद तोड़ी।”

सुबह होने से पहले अर्जुन खुद वापस लौट आया।

उसे याद नहीं था कि वह कहां गया था।

उसके जूतों पर लाल मिट्टी लगी थी, जबकि पूरा इलाका बर्फ से ढका हुआ था।

उसकी जेब में एक सूखा हुआ नीला फूल मिला।

यूसुफ ने फूल देखते ही कहा, “यह गुफा के भीतर उगता है।”

सारा ने पूछा, “हम उसे कैसे बचाएं?”

यूसुफ ने जवाब दिया, “जिस आदमी को रंटस चुन ले, वह अपनी इच्छा से उसके पास जाता है। उसे बांधकर भी रखोगे तो वह खुद को नुकसान पहुंचाकर निकल जाएगा।”

“कोई तरीका तो होगा।”

यूसुफ कुछ देर चुप रहा।

“रंटस का शरीर इस दुनिया में नहीं होता। वह उन यादों से शरीर बनाती है, जो शिकार के मन में सबसे गहरी होती हैं। उसे किसी सामान्य हथियार से नहीं मारा जा सकता।”

निखिल ने पूछा, “फिर उसे पहले गुफा में कैसे बंद किया गया था?”

यूसुफ ने अर्जुन की तरफ देखा।

“मेरे दादा ने उसे बंद किया था।”

कमरे में मौजूद सभी लोग चुप हो गए।

यूसुफ ने बताया कि लगभग सत्तर वर्ष पहले गांव से लगातार जवान पुरुष गायब हो रहे थे। प्रत्येक व्यक्ति गायब होने से पहले एक खूबसूरत महिला से मिलने की बात करता था।

यूसुफ के दादा, रहमान मीर, जड़ी-बूटियों और पुराने लोक अनुष्ठानों के जानकार थे। उन्होंने रंटस को मारने की जगह उसकी शक्ति को एक नीले पत्थर में बांध दिया था।

उस पत्थर को तांबे के संदूक में रखकर गुफा में दबा दिया गया था।

“लेकिन वह आभूषण गायब हो गया,” सारा ने कहा।

“वह गायब नहीं हुआ। उसने उसे किसी को पहना दिया होगा।”

“किसे?”

यूसुफ ने उत्तर नहीं दिया।

उसी रात गेस्ट हाउस के बाहर एक महिला मिली।

वह बेहोश हालत में बर्फ पर पड़ी थी।

सादिक और भार्गव उसे उठाकर अंदर लाए।

महिला लगभग तीस वर्ष की थी। उसके चेहरे पर खरोंचें थीं और कपड़े कई जगह से फटे हुए थे।

होश में आने पर उसने अपना नाम हिना बताया।

हिना के अनुसार वह पास के दावर कस्बे से गांव आ रही थी। रास्ते में उसका वाहन फिसलकर खाई के किनारे फंस गया। ड्राइवर मदद लेने गया, लेकिन वापस नहीं आया। वह पैदल गांव की तरफ चल पड़ी और ठंड के कारण बेहोश हो गई।

सारा ने उसकी जांच की। शरीर का तापमान कम था, लेकिन कोई गंभीर चोट नहीं थी।

यूसुफ उसे लगातार शक की नजर से देख रहा था।

उसने धीमे से सारा से कहा, “इसके गले को देखो।”

हिना के गले में ऊनी कपड़ा लिपटा हुआ था।

सारा ने पट्टी हटाने की कोशिश की तो हिना ने उसका हाथ पकड़ लिया।

“यह पुरानी चोट है।”

यूसुफ ने कठोर स्वर में पूछा, “चोट है या हार?”

हिना की आंखों में एक क्षण के लिए क्रोध चमका।

उसने कपड़ा हटाया।

गले में कोई हार नहीं था। केवल जली हुई त्वचा का पुराना निशान था।

हिना ने यूसुफ से पूछा, “आपको मुझसे क्या परेशानी है?”

यूसुफ ने कोई जवाब नहीं दिया।

अगली सुबह मौसम फिर बिगड़ गया। रास्ते बंद हो गए और हिना को गेस्ट हाउस में ही रुकना पड़ा।

अर्जुन पहली बार अपने कमरे से नीचे आया।

हिना को देखते ही वह रुक गया।

उसके चेहरे पर ऐसा भाव आया जैसे उसने किसी पहचाने हुए व्यक्ति को देख लिया हो।

“नैना?”

हिना ने हैरानी से कहा, “मेरा नाम हिना है।”

नैना अर्जुन की पूर्व पत्नी का नाम था।

निखिल ने अर्जुन को संभाला।

अर्जुन कुछ क्षण हिना को देखता रहा, फिर वापस कमरे में चला गया।

हिना ने पूछा, “ये ठीक हैं?”

सारा ने बात टाल दी।

उस शाम यूसुफ ने सभी को अलग-अलग कमरों में रहने और दरवाजे बंद रखने के लिए कहा।

लेकिन रात करीब बारह बजे भार्गव गायब हो गया।

उसका कमरा खुला था। बिस्तर पर एक छोटा नीला फूल पड़ा था।

गेस्ट हाउस के पीछे बर्फ में उसके पैरों के निशान मिले। निशानों के साथ किसी महिला के कदम भी थे।

दोनों निशान जंगल की तरफ गए थे।

टीम ने उसे खोजने की कोशिश की, लेकिन तेज बर्फबारी के कारण आगे जाना संभव नहीं था।

सुबह भार्गव गांव के पुराने कब्रिस्तान के पास मिला।

वह जीवित था, लेकिन उसकी हालत बेहद खराब थी।

उसके बालों का एक हिस्सा सफेद हो चुका था। आंखों के नीचे गहरे काले घेरे थे और शरीर इतना कमजोर था कि वह खड़ा भी नहीं हो पा रहा था।

सारा ने पूछा, “तुम्हारे साथ क्या हुआ?”

भार्गव लगातार एक ही बात दोहरा रहा था।

“वह मेरी मां थी… वह कह रही थी कि मैं उसे छोड़कर क्यों चला गया…”

भार्गव की मां की मृत्यु दस वर्ष पहले हो चुकी थी।

यूसुफ ने कहा, “अब वह केवल अर्जुन को नहीं चाहती। कैद टूटने के बाद उसकी भूख बढ़ गई है।”

निखिल ने पूछा, “क्या हिना भी वही हो सकती है?”

हिना उस समय दूसरे कमरे में सो रही थी।

यूसुफ ने कहा, “रंटस एक समय में कई रूप बना सकती है, लेकिन उनमें से केवल एक रूप छाया डालता है।”

सभी ने कमरे की दरार से अंदर देखा।

दीपक की रोशनी में हिना की छाया साफ दिखाई दे रही थी।

सारा ने राहत की सांस ली। “मतलब वह इंसान है।”

यूसुफ ने कहा, “या वह चाहती है कि हम यही मानें।”

उसी दिन दोपहर को हिना ने अर्जुन के कमरे का दरवाजा खटखटाया।

अर्जुन ने दरवाजा खोला।

“आपने मुझे किसी नैना के नाम से बुलाया था,” हिना ने कहा।

“मुझे भ्रम हुआ था।”

“वह आपकी पत्नी थीं?”

“इससे आपका कोई संबंध नहीं।”

हिना जाने लगी, फिर रुककर बोली, “कभी-कभी जिन लोगों को हम पीछे छोड़ आते हैं, पहाड़ उन्हें हमारे सामने वापस खड़ा कर देते हैं।”

अर्जुन ने उसकी तरफ देखा।

“यह बात तुमसे किसने कही?”

हिना मुस्कुराई। “मेरी दादी कहा करती थीं।”

उस रात अर्जुन ने सपना देखा कि वह अपने पुराने दिल्ली वाले फ्लैट में है।

नैना रसोई में खाना बना रही थी। सब कुछ वैसा ही था जैसा तलाक से पहले हुआ करता था।

नैना ने पीछे मुड़कर कहा, “तुम पहाड़ों से वापस आ गए?”

अर्जुन ने उसे गले लगा लिया।

कुछ क्षण बाद उसने महसूस किया कि नैना का शरीर बेहद ठंडा है।

उसने पीछे हटकर देखा।

नैना का चेहरा मीरा के चेहरे में बदल चुका था।

मीरा ने मुस्कुराकर कहा, “बस दो रातें और।”

अर्जुन की नींद खुली।

हिना उसके बिस्तर के पास खड़ी थी।

अर्जुन घबराकर उठा।

“तुम मेरे कमरे में कैसे आई?”

हिना ने कहा, “आप चीख रहे थे। दरवाजा खुला था।”

अर्जुन ने देखा कि दरवाजा वास्तव में खुला हुआ था।

हिना के हाथ में पानी का गिलास था।

वह गिलास मेज पर रखकर बाहर चली गई।

अर्जुन ने खिड़की के शीशे में उसकी परछाईं देखी।

हिना के पीछे चलते हुए लंबे बालों वाली एक दूसरी औरत की परछाईं दिखाई दे रही थी।

वह तुरंत गलियारे में निकला।

वहां केवल हिना थी।

अगली सुबह अर्जुन के गले पर दूसरा नीला निशान बन चुका था।

सारा ने कहा, “आज छठी रात है। हमारे पास ज्यादा समय नहीं है।”

यूसुफ उन्हें गांव के अंतिम छोर पर बने अपने पुराने घर में ले गया।

घर के तहखाने में लकड़ी के कई संदूक रखे थे। एक संदूक से उसने पुराने कपड़े में लिपटी हुई डायरी निकाली।

वह डायरी उसके दादा रहमान की थी।

डायरी में रंटस को बांधने की पूरी प्रक्रिया लिखी थी।

रंटस को रोकने के लिए तीन चीजें जरूरी थीं।

पहली—उसका नीला पत्थर।

दूसरी—उसके असली रूप का प्रतिबिंब।

तीसरी—उस व्यक्ति की स्वेच्छा, जिसे उसने अपना अंतिम शिकार चुना हो।

निखिल ने पूछा, “प्रतिबिंब से क्या मतलब है?”

यूसुफ ने कहा, “रंटस किसी आईने में अपना बनाया हुआ रूप दिखा सकती है। लेकिन बर्फ के नीचे जमे पुराने पानी में उसका असली चेहरा दिखाई देता है।”

“और नीला पत्थर कहां है?”

तभी पीछे से हिना की आवाज़ आई।

“शायद मेरे पास।”

सभी पलटे।

हिना तहखाने की सीढ़ियों पर खड़ी थी।

उसने अपने कोट की जेब से वही नीले पत्थर वाला आभूषण निकाला।

अर्जुन ने पूछा, “यह तुम्हें कहां मिला?”

हिना ने कहा, “जिस रात मैं यहां आई, यह मेरी मुट्ठी में था। मुझे नहीं पता कैसे।”

यूसुफ ने पीछे हटते हुए कहा, “इसे जमीन पर रख दो।”

हिना ने आभूषण को देखा।

“यह मुझे बुलाता है। हर रात कहता है कि इसे गुफा तक लेकर जाऊं।”

निखिल ने तुरंत उसके हाथ से आभूषण छीन लिया।

हिना दर्द से चीख पड़ी।

उसकी हथेली पर नीले रंग का गोल निशान बन चुका था।

यूसुफ ने कहा, “रंटस इसके भीतर अपना रास्ता बना रही है। यह लड़की अभी इंसान है, लेकिन सातवीं रात तक इसका शरीर उसका हो जाएगा।”

अर्जुन ने पूछा, “तो वह मुझे और हिना दोनों को इस्तेमाल कर रही है?”

“तुम उसकी शक्ति का भोजन हो। यह उसका नया शरीर है।”

योजना बनाई गई कि सातवीं रात से पहले सभी गुफा में जाएंगे। वहां जमी प्राचीन भूमिगत झील के पानी में रंटस का वास्तविक प्रतिबिंब दिखाकर उसकी शक्ति को फिर से पत्थर में बांधा जाएगा।

लेकिन इसके लिए अर्जुन को अपनी इच्छा से रंटस को गुफा तक बुलाना था।

शाम होते-होते बर्फीला तूफान शुरू हो गया।

भार्गव की हालत खराब थी, इसलिए सारा उसके साथ गांव में रुक गई। अर्जुन, निखिल, सादिक, यूसुफ और हिना गुफा की तरफ निकल पड़े।

हिना के हाथ बांधे गए थे, क्योंकि हर कुछ मिनट बाद वह गुफा की ओर भागने की कोशिश करने लगती थी।

सुरंग तक पहुंचते-पहुंचते अंधेरा हो गया।

अंदर प्रवेश करते ही सभी के रेडियो बंद हो गए।

गुफा की दीवारों से धीमी फुसफुसाहट सुनाई देने लगी।

कभी किसी की मां की आवाज़, कभी पत्नी की, कभी किसी मृत मित्र की।

सादिक ने अपने कान बंद कर लिए।

“कोई मुझे बुला रहा है।”

यूसुफ ने कहा, “किसी आवाज़ का जवाब मत देना।”

वे उस जगह पहुंचे जहां औरत की आकृति बनी थी।

अब दीवार पर केवल एक नहीं, बल्कि पांच आकृतियां थीं।

हर आकृति के नीचे टीम के एक सदस्य का नाम खरोंचकर लिखा गया था।

अर्जुन।

निखिल।

सादिक।

भार्गव।

हिना।

गुफा के अंतिम छोर पर बर्फ की मोटी परत थी। यूसुफ और निखिल ने औजारों से उसे तोड़ा।

नीचे काला, स्थिर पानी दिखाई दिया।

पानी किसी आईने की तरह साफ था।

अर्जुन ने नीला पत्थर अपने हाथ में लिया और गुफा के बीच खड़ा हो गया।

“मीरा!” उसने आवाज़ लगाई।

कोई जवाब नहीं आया।

उसने दोबारा कहा, “तुम मुझे चाहती हो तो सामने आओ।”

गुफा में तेज हवा चलने लगी।

सभी टॉर्च बुझ गईं।

अंधेरे में हिना चीखने लगी।

उसके शरीर में तेज झटके आने लगे। उसकी हड्डियों से टूटने जैसी आवाज़ें आने लगीं।

निखिल ने टॉर्च दोबारा जलाई।

हिना के बाल तेजी से लंबे हो रहे थे। उसकी उंगलियों के नाखून काले और नुकीले हो चुके थे। चेहरे की त्वचा कई जगह से फट रही थी।

अचानक उसने रस्सियां तोड़ दीं।

सादिक ने उसे पकड़ने की कोशिश की, लेकिन हिना ने उसे उठाकर दीवार से दे मारा।

अर्जुन के सामने पहले मीरा प्रकट हुई।

फिर उसका चेहरा नैना में बदल गया।

नैना की आंखों से आंसू बह रहे थे।

“तुमने मुझे फिर अकेला छोड़ दिया।”

अर्जुन की आंखों में भी नमी आ गई।

“तुम नैना नहीं हो।”

“तुम चाहते हो कि मैं वही बनूं।”

उसने अर्जुन का हाथ पकड़ लिया।

“मेरे साथ चलो। तुम्हें फिर कभी किसी को खोना नहीं पड़ेगा।”

अर्जुन उसके साथ आगे बढ़ने लगा।

निखिल चिल्लाया, “सर! पानी की तरफ देखिए!”

अर्जुन ने नीचे जमी झील में देखा।

पानी में नैना या मीरा का चेहरा नहीं था।

प्रतिबिंब में एक लंबी, अस्थियों जैसी पतली औरत खड़ी थी। उसकी त्वचा जली हुई लकड़ी जैसी काली थी। आंखों की जगह गहरे खाली गड्ढे थे। उसका मुंह ठुड्डी से लेकर कानों तक फटा हुआ था और उसके भीतर छोटे-छोटे सैकड़ों दांत दिखाई दे रहे थे।

उसके लंबे बालों के बीच कई सूखे हुए चेहरे फंसे थे।

वे उन पुरुषों के चेहरे थे, जिन्हें उसने वर्षों में अपना शिकार बनाया था।

अर्जुन ने तुरंत अपना हाथ छुड़ा लिया।

नैना का चेहरा विकृत हो गया।

“तुमने मुझे छोड़ दिया था!”

उसकी आवाज़ एक साथ कई औरतों की आवाज़ में बदल गई।

हिना पूरी तरह रंटस में बदलने लगी।

यूसुफ ने डायरी में लिखे शब्द पढ़ने शुरू किए। निखिल ने नीले पत्थर को पानी के ऊपर रखा।

रंटस ने चीखते हुए हमला किया।

सादिक बीच में आया। उसके नाखून सादिक की जैकेट फाड़ते हुए सीने तक पहुंच गए। वह जमीन पर गिर गया।

यूसुफ ने चिल्लाकर कहा, “अर्जुन! इसे स्वीकार करना होगा कि यह तुम्हारी इच्छा नहीं है!”

रंटस ने फिर नैना का रूप ले लिया।

“मैं अभी भी तुमसे प्यार करती हूं।”

अर्जुन की आंखों के सामने अपनी पुरानी जिंदगी के दृश्य आने लगे। नैना का हंसना, घर में उसके साथ चाय पीना, एयरपोर्ट पर अंतिम मुलाकात और खाली फ्लैट में अकेली रातें।

वह कमजोर पड़ने लगा।

रंटस उसके करीब आई।

“बस मेरा हाथ पकड़ लो।”

अर्जुन ने आंखें बंद कर लीं।

“मैं नैना को वापस चाहता था।”

रंटस मुस्कुराई।

“लेकिन तुम नैना नहीं हो।”

उसने नीला पत्थर रंटस के सीने पर रख दिया।

रंटस भयानक आवाज़ में चीखी।

उसका बनाया हुआ चेहरा पिघलने लगा।

काली त्वचा, खाली आंखें और असंख्य दांत बाहर दिखाई देने लगे।

यूसुफ मंत्र जैसे पुराने शब्द बोलता रहा।

पत्थर नीली रोशनी से चमकने लगा।

रंटस का शरीर धुएं में बदलकर पत्थर की तरफ खिंचने लगा।

लेकिन तभी हिना ने अर्जुन का गला पकड़ लिया।

उसकी आंखें पूरी तरह काली थीं।

“तुम केवल मेरे एक रूप को बांध रहे हो।”

अर्जुन ने महसूस किया कि असली शक्ति हिना के शरीर में प्रवेश कर चुकी है।

मीरा का रूप केवल ध्यान भटकाने के लिए था।

हिना ने उसे उठाकर बर्फीले पानी में फेंक दिया।

अर्जुन पानी के भीतर चला गया।

पानी इतना ठंडा था कि उसका शरीर तुरंत सुन्न पड़ गया।

नीचे उसे दर्जनों मृत लोगों की परछाइयां दिखाई दीं। सभी के शरीर बर्फ के भीतर कैद थे।

उनके बीच मीरा कौल का वास्तविक शरीर भी मौजूद था।

उसके गले में तांबे की एक पतली जंजीर थी।

अर्जुन ने जंजीर खींची।

उसके अंतिम सिरे पर नीले पत्थर जैसा दूसरा, छोटा टुकड़ा लगा था।

अब उसे समझ आया।

आभूषण के दो हिस्से थे।

पहला हिस्सा रंटस की शक्ति को बांधता था, लेकिन दूसरा हिस्सा उसके शरीर को नियंत्रित करता था।

अर्जुन जंजीर लेकर पानी से बाहर आया।

हिना निखिल को मारने वाली थी।

अर्जुन ने पीछे से जंजीर उसके गले में डाल दी।

हिना का शरीर अकड़ गया।

उसके भीतर से रंटस की वास्तविक चीख निकली।

गुफा की दीवारें कांपने लगीं। छत से बड़े-बड़े पत्थर गिरने लगे।

यूसुफ ने दोनों नीले टुकड़ों को एक साथ जोड़ दिया।

तेज नीली रोशनी पूरी गुफा में फैल गई।

रंटस का असली रूप हिना के शरीर से बाहर खिंचने लगा।

वह बेहद विशाल थी। उसका सिर लगभग गुफा की छत से लग रहा था। उसके बाल जीवित सांपों की तरह हिल रहे थे। उनमें फंसे मृत चेहरों के मुंह खुले हुए थे और सभी एक साथ चीख रहे थे।

रंटस ने अर्जुन की तरफ हाथ बढ़ाया।

“तुमने मुझे बाहर निकाला था। अब तुम भी मेरे साथ रहोगे।”

अर्जुन ने जंजीर को पूरी ताकत से खींचा।

“मैंने तुम्हें बाहर निकाला था। इसलिए वापस भी मैं ही भेजूंगा।”

यूसुफ ने दोनों पत्थरों को तांबे के संदूक में डाल दिया।

निखिल ने ढक्कन बंद किया।

उसी क्षण रंटस का पूरा शरीर धुएं में बदलकर संदूक के भीतर समा गया।

गुफा में अचानक सन्नाटा छा गया।

हिना बेहोश होकर जमीन पर गिर पड़ी।

दीवार पर बनी सभी आकृतियां एक-एक करके मिटने लगीं।

केवल अर्जुन की आकृति रह गई।

उसके नीचे लिखे नाम पर ताजा खून जैसी लाल बूंदें उभर आईं।

यूसुफ ने कहा, “हमें यहां से निकलना होगा।”

सभी घायल सादिक और बेहोश हिना को लेकर बाहर की तरफ भागे।

उनके निकलते ही गुफा का प्रवेश द्वार पत्थरों के नीचे दब गया।

अगले तीन दिनों तक गांव का संपर्क बाहरी दुनिया से कटा रहा।

मौसम साफ होने पर सेना की सहायता से घायलों को बांदीपोरा अस्पताल भेजा गया।

हिना को कई दिनों बाद होश आया। उसे गुफा, रंटस या उस रात की कोई घटना याद नहीं थी।

भार्गव धीरे-धीरे ठीक हो गया, लेकिन उसके बालों का सफेद हुआ हिस्सा कभी दोबारा काला नहीं हुआ।

सादिक ने उस घटना के बाद पहाड़ी परियोजनाओं पर काम करना छोड़ दिया।

निखिल ने कंपनी की आधिकारिक रिपोर्ट में लिखा कि गुफा भूगर्भीय हलचल के कारण ढह गई थी। भीतर मिले आभूषण या रंटस का कोई उल्लेख नहीं किया गया।

अर्जुन दिल्ली लौट आया।

पहले कुछ सप्ताह सब सामान्य रहा।

उसने मनोचिकित्सक से भी मुलाकात की। डॉक्टर ने पूरी घटना को अत्यधिक ठंड, ऑक्सीजन की कमी और सामूहिक भ्रम का परिणाम बताया।

अर्जुन ने भी यही मानने की कोशिश की।

लेकिन हर रात ठीक ग्यारह बजकर सैंतीस मिनट पर उसकी नींद खुल जाती।

उसे खिड़की के बाहर बर्फ पर चलने जैसे कदम सुनाई देते, जबकि दिल्ली में उस समय बारिश तक नहीं हो रही थी।

एक रात उसके फोन पर अनजान नंबर से कॉल आया।

दूसरी तरफ कई सेकंड तक कोई नहीं बोला।

फिर मीरा की आवाज़ सुनाई दी।

“तुमने मेरा केवल एक हिस्सा बंद किया है।”

अर्जुन ने फोन काट दिया।

अगली सुबह उसके मुख्य दरवाजे के बाहर एक सूखा हुआ नीला फूल पड़ा था।

उसने तुरंत यूसुफ को फोन किया।

कई प्रयासों के बाद कॉल उठा।

दूसरी तरफ यूसुफ नहीं था।

एक महिला ने कहा, “यूसुफ अब बात नहीं कर सकता।”

“कौन बोल रहा है?”

महिला हंसी।

“जिसे उसने सारी जिंदगी कैद करके रखा।”

कॉल कट गया।

अर्जुन ने उसी दिन कश्मीर जाने का फैसला किया।

लेकिन श्रीनगर पहुंचने पर उसे पता चला कि खुरबत गांव के लिए जाने वाला रास्ता भारी हिमस्खलन के कारण बंद है।

उसने सेना के एक अधिकारी से यूसुफ मीर के बारे में पूछा।

अधिकारी ने पुराने रिकॉर्ड देखने के बाद कहा, “इस नाम का आदमी खुरबत में रहता था, लेकिन उसकी मृत्यु तो आठ साल पहले हो चुकी है।”

अर्जुन के पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई।

“यह संभव नहीं है। मैं पिछले महीने उसके साथ था।”

अधिकारी ने कंप्यूटर स्क्रीन उसकी तरफ घुमाई।

स्क्रीन पर यूसुफ की तस्वीर थी।

वही चेहरा, वही सफेद बाल और वही गंभीर आंखें।

मृत्यु का कारण लिखा था—शीन दर्रे के पास लापता।

शव कभी नहीं मिला।

अर्जुन ने निखिल को फोन किया, लेकिन नंबर बंद था।

सारा, सादिक और भार्गव के फोन भी बंद मिले।

वह परियोजना कंपनी के कार्यालय पहुंचा।

रिसेप्शन पर मौजूद कर्मचारी ने कहा, “खुरबत परियोजना के लिए तो केवल आपको भेजा गया था।”

“मेरे साथ चार लोग और थे।”

कर्मचारी ने रिकॉर्ड दिखाया।

दस्तावेज में केवल अर्जुन का नाम था।

निखिल, सारा, सादिक या भार्गव का कहीं कोई उल्लेख नहीं था।

अर्जुन ने अपने फोन की तस्वीरें देखीं।

सुरंग, गेस्ट हाउस और गुफा की सभी तस्वीरों में वह अकेला था।

जिन तस्वीरों में उसे अपने साथियों के खड़े होने की याद थी, उनमें केवल खाली जगह दिखाई दे रही थी।

एक तस्वीर में गेस्ट हाउस की सीढ़ियों पर पांच धुंधली परछाइयां खड़ी थीं।

उन परछाइयों के पीछे मीरा दिखाई दे रही थी।

उसके गले में पूरा जुड़ा हुआ नीला आभूषण था।

अर्जुन का फोन फिर बजा।

इस बार स्क्रीन पर निखिल का नाम था।

उसने कांपते हाथ से कॉल उठाई।

“निखिल, तुम कहां हो?”

दूसरी तरफ से निखिल की आवाज़ आई।

“सर, हम सब वहीं हैं जहां आपने हमें छोड़ दिया था।”

“कहां?”

“बर्फ के नीचे।”

अर्जुन के सामने अचानक गुफा की भूमिगत झील का दृश्य घूम गया।

पानी के नीचे दिखाई देने वाले शवों में केवल पुराने शिकार नहीं थे।

उनके बीच निखिल, सारा, सादिक और भार्गव भी थे।

जिस पूरी टीम के साथ वह गांव से लौटा था, वह शायद कभी जीवित बाहर आई ही नहीं थी।

फोन पर निखिल की आवाज़ बदलने लगी।

वह मीरा की आवाज़ बन गई।

“सातवीं मुलाकात अभी पूरी नहीं हुई, अर्जुन।”

कॉल कट गया।

अर्जुन ने धीरे-धीरे सामने लगे शीशे की तरफ देखा।

शीशे में वह अकेला नहीं था।

उसके पीछे नैना खड़ी थी।

उसने वही कपड़े पहन रखे थे, जो एयरपोर्ट पर उनकी अंतिम मुलाकात के समय पहने थे।

नैना की आंखों से आंसू बह रहे थे।

“इस बार मुझे छोड़कर मत जाना।”

अर्जुन ने पलटकर देखा।

पीछे कोई नहीं था।

लेकिन शीशे में नैना अब भी मौजूद थी।

धीरे-धीरे उसके होंठों पर मुस्कान फैलने लगी। आंखें काली हो गईं और मुंह दोनों कानों तक फट गया।

उसने शीशे के भीतर से अपना हाथ बाहर निकाला।

अर्जुन पीछे हटना चाहता था, लेकिन उसके पैर जम चुके थे।

कमरे की दीवारों पर बर्फ फैलने लगी।

फर्श के नीचे से नीले फूल निकलने लगे।

रंटस ने उसके चेहरे को छुआ और फुसफुसाई—

“पहाड़ों से कोई अकेला वापस नहीं आता।”

अगली सुबह कंपनी के कर्मचारियों को अर्जुन का कमरा खाली मिला।

दरवाजा अंदर से बंद था। खिड़कियां भी बंद थीं।

मेज पर उसका फोन, बटुआ और कश्मीर से लाई गई सभी फाइलें रखी थीं।

कमरे के बीचों-बीच बर्फ से बने दो पैरों के निशान थे।

वे निशान शीशे के सामने जाकर समाप्त हो रहे थे।

शीशे की अंदरूनी सतह पर किसी नुकीली चीज़ से एक नई आकृति बनाई गई थी।

एक आदमी की आकृति।

उसके पीछे जमीन तक लंबे बालों वाली एक औरत खड़ी थी।

आकृति के नीचे केवल एक शब्द लिखा था—

आठवां।

Jammu and Kashmir Tourism Department:
https://jandktourism.jk.gov.in/

नृत्यांगना – एक श्राप | अधूरे नृत्य का डरावना रहस्य | हिंदी हॉरर स्टोरी

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