रात के करीब साढ़े ग्यारह बज रहे थे।
हल्की बारिश लगभग एक घंटे पहले ही बंद हुई थी, लेकिन सड़क अब भी पूरी तरह गीली थी। स्ट्रीट लाइट की पीली रोशनी पानी में पड़कर चमक रही थी। आसमान में बादल छाए हुए थे और ठंडी हवा के साथ कभी-कभी पेड़ों से पानी की बूंदें नीचे गिर रही थीं।

अमित बस स्टैंड के बाहर अकेला खड़ा बार-बार मोबाइल में समय देख रहा था।
11:34 PM.
उसे किसी भी हालत में आज रात अपने गांव पहुंचना था।
सुबह उसकी जमीन से जुड़े कुछ जरूरी कागजों पर हस्ताक्षर होने थे। अगर वह समय पर नहीं पहुंचा, तो काम कई दिनों के लिए रुक सकता था।
उसने सोचा था कि ऑफिस से जल्दी निकलकर रात नौ बजे वाली बस पकड़ लेगा। लेकिन अचानक आए काम की वजह से उसे देर हो गई।
जब वह बस स्टैंड पहुंचा, तब तक आखिरी सरकारी बस जा चुकी थी। Raat Ka Aakhri Safar
उसने दो-तीन टैक्सी वालों से पूछा, लेकिन गांव लगभग सत्तर किलोमीटर दूर था और रात में उस रास्ते पर जाने के लिए कोई तैयार नहीं हुआ।
एक ड्राइवर ने तो गांव का नाम सुनते ही कहा—
“साहब, सुबह चले जाना। रात में उस तरफ गाड़ी लेकर जाना ठीक नहीं।”
अमित ने हंसकर पूछा—
“क्यों? सड़क खराब है क्या?”
ड्राइवर ने कुछ पल उसकी तरफ देखा।
“सड़क तो ठीक है… बस रात का समय ठीक नहीं।”
इतना कहकर वह अपनी गाड़ी में बैठ गया।
अमित को उसकी बात अजीब लगी, लेकिन उसने ज्यादा ध्यान नहीं दिया।
वह वापस बस स्टैंड के सामने आकर खड़ा हो गया।
कुछ देर बाद आसपास की दुकानें भी बंद होने लगीं।
तभी चाय की एक छोटी-सी दुकान पर बैठे बूढ़े आदमी ने उसे आवाज दी—
“कहां जाना है बेटा?”
अमित उसके पास गया।
“देवगढ़।”
बूढ़े के चेहरे का भाव अचानक बदल गया।
“आज ही जाना जरूरी है?”
“हां।”
“तो सामने पुराने बस स्टैंड पर देख लो। कभी-कभी बारह बजे के आसपास एक प्राइवेट बस निकलती है। वही देवगढ़ की तरफ जाती है।”
अमित को उम्मीद दिखाई दी।
“यहां से कितनी दूर है?”
“बस दस मिनट पैदल।”
अमित बैग उठाकर चलने लगा।
पीछे से बूढ़े ने आवाज दी—
“सुनो!”
अमित पलटा।
बूढ़ा कुछ कहना चाहता था, लेकिन दो-तीन सेकंड चुप रहने के बाद बोला—
“कुछ नहीं… बस अगर बस मिल जाए तो ड्राइवर से पूछकर बैठना।”
अमित मुस्कुरा दिया।
“ठीक है।”
वह वहां से निकल गया।
पुराना बस स्टैंड शहर के मुख्य रास्ते से थोड़ा अंदर था।
जैसे-जैसे अमित आगे बढ़ता गया, लोगों की आवाजाही कम होती गई।
कुछ मिनट बाद वह एक पुराने से बस स्टैंड के सामने खड़ा था।
वहां कोई यात्री नहीं था।
Raat Ka Aakhri Safar
एक टूटा हुआ बोर्ड हवा में हल्का-हल्का हिल रहा था। पास की दो दुकानें बंद थीं। बस स्टैंड के अंदर लगी ट्यूबलाइट बार-बार जल-बुझ रही थी।
अमित ने मोबाइल देखा।
11:51 PM.
उसे लगा शायद बूढ़े आदमी ने गलत जानकारी दे दी।
तभी दूर से किसी भारी वाहन के इंजन की आवाज सुनाई दी।
कुछ ही सेकंड में मोड़ से एक पुरानी बस दिखाई दी।
बस की हेडलाइट की रोशनी गीली सड़क पर फैलती हुई उसकी तरफ बढ़ रही थी।
अमित ने राहत की सांस ली।
बस उसके सामने आकर रुक गई।
उसके आगे एक पुराना बोर्ड लगा था—
देवगढ़
दरवाजा खुला।
अंदर से कंडक्टर ने पूछा—
“देवगढ़?”
“हां।”
“बैठ जाओ।”
अमित बस में चढ़ गया।
अंदर कदम रखते ही उसे कुछ अजीब महसूस हुआ।
बस काफी पुरानी थी।
सीटों के कवर जगह-जगह से फटे हुए थे। खिड़कियों के किनारों पर जंग लगी थी और अंदर हल्की सी सीलन की गंध थी।
बस में लगभग दस-बारह यात्री बैठे थे।
लेकिन इतनी रात होने के बावजूद कोई सो नहीं रहा था।
सब चुपचाप अपनी सीटों पर बैठे थे।
कोई खिड़की से बाहर देख रहा था, कोई सामने।
अमित पीछे की तरफ जाकर खिड़की के पास बैठ गया।
कंडक्टर टिकट देने आया।
“कहां तक?”
“देवगढ़।”
“अस्सी रुपये।”
अमित ने पैसे दिए।
कंडक्टर ने टिकट उसके हाथ में रख दिया।
बस चल पड़ी।
कुछ देर बाद शहर की रोशनी पीछे छूट गई।
अब दोनों तरफ केवल अंधेरा था।
सड़क के किनारे घने पेड़ दिखाई दे रहे थे।
अमित ने मोबाइल निकाला।
नेटवर्क काफी कमजोर था।
उसने घर फोन करने की कोशिश की, लेकिन कॉल नहीं लगी।
उसने मोबाइल जेब में रख दिया।
करीब बीस मिनट बाद बस एक छोटे से गांव के पास रुकी।
अमित ने खिड़की से बाहर देखा।
वहां बस स्टॉप पर एक आदमी खड़ा था।
बस का दरवाजा खुला।
लेकिन वह आदमी अंदर नहीं आया।
कुछ सेकंड बाद बस फिर चल पड़ी।
अमित को लगा शायद वह इस बस का इंतजार नहीं कर रहा था।
थोड़ी देर बाद उसने महसूस किया कि उसके आगे वाली सीट पर बैठा आदमी बार-बार पीछे मुड़कर उसे देख रहा है।
करीब पचास साल का वह आदमी सफेद शर्ट पहने था।
अमित ने पहले नजरअंदाज किया।
लेकिन तीसरी बार जब वह आदमी पीछे मुड़ा तो अमित ने पूछ लिया—
“कुछ चाहिए?”
आदमी ने धीरे से सिर हिलाया।
“नहीं।”
फिर वह सामने देखने लगा।
दो मिनट बाद उसने बिना पीछे देखे पूछा—
“पहली बार इस बस में बैठे हो?”
“हां।”
“देवगढ़ जा रहे हो?”
“हां।”
आदमी चुप हो गया।
अमित को उसका व्यवहार अजीब लगा।
“क्यों?”
आदमी ने कोई जवाब नहीं दिया।
बस आगे बढ़ती रही।
कुछ देर बाद सड़क और सुनसान हो गई।
अब स्ट्रीट लाइट भी नहीं थीं।
केवल बस की हेडलाइट सामने की सड़क दिखा रही थी।
अचानक बस एक जोरदार झटके के साथ रुक गई।
सभी यात्री एक साथ सामने देखने लगे।
अमित ने खिड़की से बाहर झांककर देखा।
सड़क के बीच एक औरत खड़ी थी।
उसने हल्के रंग की साड़ी पहन रखी थी और उसके हाथ में एक छोटा बैग था।
ड्राइवर ने दरवाजा खोल दिया।
वह औरत धीरे-धीरे बस में चढ़ी।
अजीब बात यह थी कि इतनी रात, इतनी सुनसान सड़क और आसपास कोई घर तक नहीं था।
फिर भी किसी यात्री ने उसकी तरफ ध्यान नहीं दिया।
औरत ने कंडक्टर को पैसे दिए और अमित से दो सीट आगे बैठ गई।
बस दोबारा चल पड़ी।
करीब पांच मिनट बाद अमित की नजर उस औरत के पैरों पर गई।
उसकी साड़ी का निचला हिस्सा पूरी तरह भीगा हुआ था।
जैसे वह काफी देर पानी में खड़ी रही हो।
अमित ने खिड़की से बाहर देखा।
लेकिन आसपास तो कहीं पानी था ही नहीं।
तभी सामने बैठा सफेद शर्ट वाला आदमी धीरे से पीछे मुड़ा।
इस बार उसके चेहरे पर घबराहट थी।
उसने अमित को आंखों से चुप रहने का इशारा किया।
अमित कुछ समझ नहीं पाया।
उसने बहुत धीमी आवाज में पूछा—
“क्या हुआ?”
आदमी ने होंठों पर उंगली रख दी।
बस में अचानक लगी एक लाइट बुझ गई।
फिर दूसरी।
कुछ सेकंड में बस का आधा हिस्सा अंधेरे में डूब गया।
केवल आगे ड्राइवर के पास लगी छोटी पीली लाइट जल रही थी।
उसी समय अमित को अपने मोबाइल में कंपन महसूस हुआ।
स्क्रीन पर एक मैसेज आया था।
अनजान नंबर से।
अगले स्टॉप पर उतर जाना।
अमित कुछ पल स्क्रीन देखता रहा।
उसे लगा शायद किसी ने मजाक किया है।
उसने नंबर पर कॉल किया।
तुरंत सामने बैठे सफेद शर्ट वाले आदमी की जेब में मोबाइल बजने लगा।
आदमी ने घबराकर फोन काट दिया।
अमित उसके पास जाने के लिए उठा।
तभी आदमी ने हाथ से इशारा किया—
“बैठे रहो।”
अमित वापस बैठ गया।
कुछ सेकंड बाद दूसरा मैसेज आया।
कुछ भी हो, पीछे मत देखना।
अमित का दिल तेजी से धड़कने लगा।
क्योंकि उसी समय उसे अपनी सीट के पीछे से किसी के सांस लेने की आवाज सुनाई दी।
बहुत धीमी…
लेकिन बिल्कुल साफ।
उसकी सीट बस की आखिरी सीट से केवल एक लाइन आगे थी।
जब वह बैठा था, तब पीछे कोई नहीं था।
अब सांसों की आवाज लगातार आ रही थी।
उसके हाथ ठंडे पड़ गए।
उसने सामने बैठे आदमी की तरफ देखा।
वह लगातार उसे ही देख रहा था।
अचानक अमित के कंधे के पास किसी ने बहुत धीमी आवाज में कहा—
“भैया…”
अमित का पूरा शरीर सिहर गया।
आवाज बिल्कुल उसके कान के पीछे से आई थी।
“भैया… देवगढ़ कब आएगा?”
अमित ने जवाब नहीं दिया।
उसने सामने देखना जारी रखा।
फिर वही आवाज—
“सुन रहे हो ना?”
अमित ने अपनी आंखें बंद कर लीं।
तभी बस अचानक रुक गई।
कंडक्टर जोर से बोला—
“पीपल मोड़!”
सफेद शर्ट वाला आदमी तुरंत उठ गया।
उसने अमित का हाथ पकड़ा।
“उतरो!”
“लेकिन देवगढ़—”
“अभी उतरो!”
उसकी आवाज में इतना डर था कि अमित बिना सवाल किए उसके साथ बस से उतर गया।
दोनों के उतरते ही बस आगे बढ़ गई।
अमित सड़क किनारे खड़ा बस को जाते हुए देखता रहा।
उसने राहत की सांस ली।
फिर सफेद शर्ट वाले आदमी की तरफ देखा।
“आखिर हुआ क्या था?”
आदमी कुछ देर चुप रहा।
फिर पूछा—
“तुम्हें पीछे से किसी ने आवाज दी थी?”
अमित का चेहरा उतर गया।
“आपको कैसे पता?”
आदमी ने गहरी सांस ली।
“क्योंकि मेरे साथ भी हुआ था।”
“क्या?”
“तीन साल पहले।”
अमित समझ नहीं पाया।
“तीन साल पहले?”
आदमी सड़क किनारे पड़े पत्थर पर बैठ गया।
“मैं भी तुम्हारी तरह रात में देवगढ़ जा रहा था। इसी बस में बैठा था। रास्ते में एक औरत चढ़ी थी। फिर किसी ने पीछे से मुझे आवाज दी।”
अमित ने तुरंत पूछा—
“फिर?”
आदमी ने अंधेरी सड़क की तरफ देखा।
“मैंने पीछे देख लिया था।”
अमित कुछ बोल पाता, उससे पहले दूर से किसी गाड़ी की रोशनी दिखाई दी।
एक छोटा ट्रक उनकी तरफ आ रहा था।
आदमी तुरंत खड़ा हो गया।
“इसे रोकना। यहां ज्यादा देर मत रुकना।”
अमित ने सड़क पर हाथ दिया।
ट्रक रुक गया।
ड्राइवर ने खिड़की से पूछा—
“कहां जाना है?”
“देवगढ़।”
“बैठ जाओ। रास्ते में ही है।”
अमित ने राहत की सांस ली।
उसने पीछे मुड़कर सफेद शर्ट वाले आदमी को बुलाना चाहा।
लेकिन वहां कोई नहीं था।
सड़क खाली थी।
“अरे… वो आदमी कहां गया?”
ट्रक ड्राइवर ने पूछा—
“कौन आदमी?”
“मेरे साथ एक आदमी खड़ा था।”
ड्राइवर ने आसपास देखा।
“यहां तो कोई नहीं है।”
अमित का दिल बैठ गया।
वह जल्दी से ट्रक में बैठ गया।
ट्रक आगे बढ़ा।
कुछ मिनट तक वह चुप रहा।
फिर ड्राइवर ने पूछा—
“इतनी रात यहां कैसे पहुंचे?”
“बस से आया था।”
“कौन सी बस?”
“शहर से देवगढ़ वाली।”
ड्राइवर ने अचानक उसकी तरफ देखा।
“कितने बजे?”
“करीब बारह बजे।”
ड्राइवर के चेहरे से मुस्कान गायब हो गई।
“कौन सी कंपनी की बस थी?”
“पता नहीं। काफी पुरानी थी।”
ड्राइवर कुछ सेकंड चुप रहा।
फिर बोला—
“उस बस का रंग नीला था?”
अमित ने उसकी तरफ देखा।
“हां।”
ड्राइवर ने तुरंत ट्रक की रफ्तार थोड़ी बढ़ा दी।
“क्या हुआ?”
“कुछ नहीं।”
“आप जानते हैं उस बस को?”
ड्राइवर ने जवाब नहीं दिया।
अमित ने फिर पूछा।
तब ड्राइवर बोला—
“करीब तीन साल पहले इसी रास्ते पर एक प्राइवेट बस चलती थी। शहर से देवगढ़।”
अमित ध्यान से सुनने लगा।
“एक रात तेज बारिश थी। पीपल मोड़ से करीब आठ किलोमीटर आगे बस का एक्सीडेंट हो गया।”
अमित के हाथ सुन्न पड़ गए।
ड्राइवर ने आगे कहा—
“बस सड़क से नीचे चली गई थी। कई लोग मारे गए थे।”
अमित ने कांपती आवाज में पूछा—
“कितने?”
“ठीक से याद नहीं… लेकिन ड्राइवर, कंडक्टर और ज्यादातर यात्री।”
अमित को सामने बैठे सफेद शर्ट वाले आदमी का चेहरा याद आया।
“क्या आपको उन यात्रियों के बारे में कुछ पता है?”
“नहीं।”
“कोई फोटो… खबर?”
“पुरानी बात है। इंटरनेट पर मिल जाए शायद।”
अमित ने तुरंत मोबाइल निकाला।
अब नेटवर्क आ चुका था।
उसने सर्च किया—
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कुछ पुराने समाचार दिखाई दिए।
उसने पहला लिंक खोला।
तीन साल पुरानी खबर थी।
बारिश के दौरान एक निजी बस के दुर्घटनाग्रस्त होने की जानकारी थी।
नीचे कुछ मृत यात्रियों की तस्वीरें थीं।
अमित तस्वीरें देखने लगा।
तीसरी तस्वीर देखते ही उसकी सांस अटक गई।
सफेद शर्ट।
वही चेहरा।
वही आदमी जो कुछ देर पहले बस में उसके सामने बैठा था।
उसका नाम था—
महेश चौहान।
अमित ने कांपते हाथों से खबर आगे पढ़ी।
महेश की मौत उसी दुर्घटना में हुई थी।
अमित कुछ सेकंड तक मोबाइल की स्क्रीन देखता रहा।
फिर अचानक उसे कुछ याद आया।
वह औरत।
उसने खबर में नीचे स्क्रॉल किया।
एक जगह दुर्घटना के कारण का जिक्र था।
एक स्थानीय व्यक्ति के बयान के अनुसार बस चालक ने सड़क पर अचानक आई एक महिला को बचाने के लिए गाड़ी मोड़ी थी।
बस अनियंत्रित होकर नीचे चली गई।
अमित के शरीर में सिहरन दौड़ गई।
करीब चालीस मिनट बाद ट्रक देवगढ़ पहुंच गया।
अमित ने ड्राइवर को धन्यवाद दिया और घर चला गया।
लेकिन पूरी रात उसे नींद नहीं आई।
सुबह उसने सबसे पहले अपनी जेब से बस का टिकट निकाला।
वह टिकट देखकर चौंक गया।
रात में उस पर साफ अक्षर दिखाई दे रहे थे।
अब टिकट का कागज पीला और बहुत पुराना लग रहा था।
उस पर छपी तारीख पढ़कर अमित के हाथ कांपने लगे।
तारीख तीन साल पुरानी थी।
वही रात…
जिस रात बस का एक्सीडेंट हुआ था।
अमित ने तुरंत वह अनजान नंबर खोला जिससे उसे मैसेज आए थे।
उसने कॉल लगाया।
फोन बंद था।
कुछ देर बाद उसने इंटरनेट पर महेश चौहान का नाम खोजा।
एक पुरानी सोशल मीडिया पोस्ट मिली।
उसमें महेश की तस्वीर के नीचे परिवार के किसी सदस्य ने उसका पुराना मोबाइल नंबर लिखा था।
अमित ने नंबर देखा।
वही नंबर था।
जिससे रात में उसे मैसेज आया था—
अगले स्टॉप पर उतर जाना।
अमित काफी देर तक चुप बैठा रहा।
उसे अब समझ आ रहा था कि महेश उसे नुकसान पहुंचाने नहीं आया था।
शायद वह उसे उस जगह तक पहुंचने से रोक रहा था, जहां तीन साल पहले वह खुद नहीं बच पाया था।
लेकिन एक सवाल अब भी बाकी था।
अगर बस में बैठे लोग तीन साल पहले मर चुके थे…
तो वह औरत कौन थी?
अगले दिन अमित ने गांव के एक बुजुर्ग से उस दुर्घटना के बारे में पूछा।
बुजुर्ग ने बताया कि उस रास्ते पर दुर्घटना से कुछ महीने पहले एक महिला रात में घर लौटते समय लापता हो गई थी।
आखिरी बार उसे पीपल मोड़ के आसपास देखा गया था।
उसके बाद उसका कोई पता नहीं चला।
और बस दुर्घटना वाली रात ड्राइवर ने अचानक सड़क के बीच किसी महिला को देखकर बस मोड़ दी थी।
लेकिन दुर्घटना के बाद आसपास किसी महिला का शव नहीं मिला था।
अमित ने उसके बाद कभी उस रास्ते पर आधी रात के बाद सफर नहीं किया।
समय बीतता गया।
करीब छह महीने बाद एक रात वह शहर में अपने कमरे पर बैठा था।
रात के ठीक 11:51 बजे उसके मोबाइल पर एक मैसेज आया।
उसी अनजान नंबर से।
अमित ने कांपते हाथों से मैसेज खोला।
लिखा था—
आज बस फिर निकली है।
अमित कुछ सेकंड स्क्रीन देखता रहा।
फिर दूसरा मैसेज आया—
इस बार कोई और देवगढ़ जा रहा है।
और उसके तुरंत बाद तीसरा मैसेज—
उम्मीद है वह भी पीछे नहीं देखेगा।
National Highways Authority of India (NHAI) — सड़क/हाईवे से संबंधित आधिकारिक जानकारी के लिए।