Kala Jadu Horror Story

गांव से करीब दो किलोमीटर दूर पुराने तालाब के पास एक उजड़ा हुआ देवस्थान था।

दिन में भी उस तरफ बहुत कम लोग जाते थे। चारों तरफ बबूल की झाड़ियां थीं और बीच में पत्थरों से बना एक छोटा-सा टूटा हुआ कमरा था।

उस रात आसमान में बादल छाए हुए थे।

Kala Jadu Horror Story

हवा बार-बार सूखे पत्तों को जमीन पर घसीट रही थी।

रात करीब साढ़े बारह बजे उसी खंडहर के अंदर एक औरत बैठी हुई थी।

उसके सामने जमीन पर एक पुरानी तस्वीर उल्टी रखी थी।

पास में कपड़े की एक छोटी गठरी और मिट्टी का बुझा हुआ दीपक पड़ा था।

औरत काफी देर तक बिना हिले तस्वीर को देखती रही।

फिर उसने तस्वीर सीधी की।

तस्वीर में एक आदमी अपनी पत्नी और बूढ़े माता-पिता के साथ मुस्कुराता दिखाई दे रहा था। Kala Jadu Horror Story

औरत की आंखों में गुस्सा उतर आया।

वह धीमी आवाज में बोली—

“बहुत सुख देख लिया तुम लोगों ने… अब देखते हैं ये हंसी कितने दिन रहती है।”

अचानक बाहर किसी जानवर के दौड़ने की आवाज आई।

औरत ने तुरंत पीछे मुड़कर देखा।

वहां कोई नहीं था।

लेकिन उसी समय उसके सामने रखा बुझा हुआ दीपक अपने आप जमीन पर गिर गया।

औरत कुछ पल उसे देखती रही।

फिर तस्वीर उठाकर अपनी थैली में रखी और अंधेरे में गायब हो गई।


रामपुरा गांव में हरिनारायण का परिवार पुराने और सम्मानित परिवारों में गिना जाता था।

हरिनारायण के दो बेटे थे।

बड़ा बेटा राघव और छोटा बेटा मोहन।

राघव बचपन से ही पढ़ाई में अच्छा था। कॉलेज पूरा करने के बाद वह नौकरी के लिए इंदौर चला गया।

कुछ साल नौकरी करने के बाद उसने अपने दोस्त के साथ मिलकर पैकेजिंग का छोटा-सा काम शुरू किया।

शुरुआत मुश्किल थी।

लेकिन धीरे-धीरे काम बढ़ता गया।

दस साल के अंदर राघव ने शहर में अपना अच्छा कारोबार खड़ा कर लिया।

उसने मकान खरीदा, गाड़ी ली और अपनी पत्नी नैना के साथ वहीं बस गया।

इसके बावजूद राघव गांव को कभी नहीं भूला।

उसके पिता हरिनारायण और मां कमला गांव में छोटे बेटे मोहन के साथ रहते थे।

मोहन खेती संभालता था।

उसकी पत्नी शोभा और उनकी बेटी पायल भी उसी घर में रहते थे।

हर महीने राघव गांव पैसे भेजता।

पिता की दवाइयां हों, खेती के लिए नया सामान लेना हो या घर की मरम्मत करवानी हो—राघव कभी पीछे नहीं हटता था।

यहां तक कि पायल की स्कूल फीस भी कई बार वही भर देता।

मोहन को इससे कभी परेशानी नहीं हुई।

वह अक्सर गांव वालों के सामने गर्व से कहता—

“भैया शहर में रहते जरूर हैं, लेकिन उनका दिल आज भी इसी घर में है।”

राघव जब गांव आता तो घर का माहौल बदल जाता।

कभी मिठाइयां आतीं, कभी कपड़े, कभी माता-पिता के लिए कोई नई चीज।

राघव की पत्नी नैना भी बहुत मिलनसार थी।

वह शोभा के लिए भी कुछ न कुछ जरूर लेकर आती।

एक बार उसने शोभा को नई साड़ी देते हुए कहा—

“पिछली बार आपने कहा था ना कि ये रंग आपको पसंद है? इसलिए देखते ही ले आई।”

शोभा मुस्कुराई।

“अरे दीदी, इसकी क्या जरूरत थी?”

“जरूरत की क्या बात है? अपना ही घर है।”

नैना आगे बढ़ गई।

लेकिन शोभा के चेहरे की मुस्कान कुछ ही सेकंड में गायब हो गई।

उसने साड़ी को देखा।

फिर आंगन में बैठी दो पड़ोस की औरतों की बात उसके कान में पड़ी।

“हरिनारायण की किस्मत देखो। राघव जैसा बेटा सबको मिले।”

दूसरी बोली—

“बेटा ही नहीं, बहू भी देखो। शहर में इतना पैसा होने के बाद भी घमंड नहीं है।”

शोभा चुपचाप वहां से उठ गई।

उस दिन पहली बार उसके मन में एक सवाल आया—

हर बात में राघव और नैना ही क्यों?

उसका पति मोहन क्या इस घर के लिए कुछ नहीं करता?

साल भर खेत में मेहनत कौन करता है?

मां-बाप के पास गांव में कौन रहता है?

लेकिन तारीफ हमेशा राघव की।

धीरे-धीरे यही सवाल उसके मन में जलन बनकर बैठ गया।

कुछ महीनों बाद राघव गांव आया।

रात को पूरा परिवार खाना खा रहा था।

तभी उसने कहा—

“बाबूजी, एक बात सोच रहा हूं।”

हरिनारायण ने पूछा—

“क्या?”

“शहर वाला घर काफी बड़ा है। आप और मां भी हमारे साथ चलिए। वहां अस्पताल पास है। आपकी दवाइयों का भी ध्यान रहेगा।”

कमला तुरंत खुश हो गई।

“मैं तो कब से कह रही हूं तुम्हारे बाबूजी को।”

राघव हंस पड़ा।

फिर उसने मोहन की तरफ देखा।

“और तुम लोग भी कुछ दिन चलो। पायल की छुट्टियां होने वाली हैं।”

मोहन मुस्कुराया।

“देखते हैं भैया।”

लेकिन शोभा का चेहरा उतर गया।

उस रात कमरे में उसने मोहन से कहा—

“तुम्हें कुछ दिखाई नहीं देता?”

“क्या?”

“धीरे-धीरे मां-बाबूजी को अपने पास बुला रहे हैं।”

मोहन हैरान हुआ।

“तो इसमें गलत क्या है?”

“आज मां-बाबूजी जाएंगे। कल जमीन का फैसला भी वहीं बैठकर होगा।”

“तुम कैसी बातें कर रही हो?”

“मैं गलत कह रही हूं? शहर में पैसा है। बड़ा मकान है। गाड़ी है। सब उन्हीं के पास रहेगा तो मां-बाबूजी किसकी बात सुनेंगे?”

मोहन नाराज हो गया।

“भैया ने हमारा कब बुरा किया?”

शोभा ने मुंह फेर लिया।

“आज नहीं किया। इसका मतलब ये नहीं कि कल भी नहीं करेंगे।”

मोहन ने उस रात उसकी बात पर ध्यान नहीं दिया।

कुछ दिनों बाद हरिनारायण और कमला राघव के साथ शहर चले गए।

शुरुआत में एक महीने के लिए गए थे।

लेकिन वहां उन्हें अच्छा लगने लगा।

कमला हर दूसरे-तीसरे दिन फोन करके गांव की बातें करती।

“अरे शोभा, यहां तो नैना हमें कहीं बैठने ही नहीं देती। सब काम खुद करती है।”

कभी हरिनारायण फोन पर बताते—

“कल राघव हमें उज्जैन लेकर गया था।”

मोहन खुशी से सारी बातें शोभा को बताता।

लेकिन हर नई बात के साथ शोभा के अंदर कुछ और टूटता जाता।

एक शाम उसने गुस्से में कहा—

“बस करो! मुझे रोज उनके ऐश की कहानी मत सुनाया करो।”

मोहन चौंक गया।

“तुम्हें हुआ क्या है?”

“कुछ नहीं।”

“तो फिर?”

शोभा बिना जवाब दिए रसोई में चली गई।

उस रात उसे नींद नहीं आई।

बार-बार नैना का मुस्कुराता चेहरा उसकी आंखों के सामने आता रहा।

फिर गांव की औरतों की बातें।

“राघव जैसा बेटा…”

“नैना जैसी बहू…”

“हरिनारायण की किस्मत…”

शोभा ने आंखें बंद कर लीं।

उसके मन में सिर्फ एक बात घूम रही थी—

कभी हमारे बारे में भी कोई ऐसा क्यों नहीं बोलता?

यहीं से उसके मन का गुस्सा धीरे-धीरे नफरत में बदलने लगा।

गांव के बाहर रहने वाली एक बूढ़ी औरत के बारे में तरह-तरह की बातें मशहूर थीं।

कोई उसे वैद्य कहता था तो कोई कहता था कि वह ऐसी शक्तियों के बारे में जानती है जिनसे दूर रहना ही अच्छा है।

एक दिन शोभा चुपके से उसके पास पहुंची।

फिर दूसरी बार गई।

फिर तीसरी बार।

वह वहां क्या सीखती या क्या करती थी, यह किसी को नहीं पता चला।

लेकिन उसके बाद शोभा अक्सर रात को घर से गायब रहने लगी।

मोहन पूछता—

“कहां गई थी?”

“पायल की सहेली की मां की तबीयत खराब है। वहीं गई थी।”

कभी कहती—

“मंदिर गई थी।”

मोहन ने कभी शक नहीं किया।

करीब तीन महीने बाद शोभा का व्यवहार अचानक बदल गया।

एक सुबह उसने खुद मोहन से कहा—

“भैया-भाभी को गांव बुला लो।”

मोहन ने आश्चर्य से उसकी तरफ देखा।

“तुम बुलाने को कह रही हो?”

“हां। आखिर परिवार हैं। पुरानी बातें कब तक मन में रखूंगी?”

मोहन खुश हो गया।

उसी शाम उसने राघव को फोन कर दिया।

कुछ दिनों बाद राघव और नैना गांव आ गए।

हरिनारायण और कमला भी साथ थे।

शोभा ने सबका खूब स्वागत किया।

नैना भी हैरान थी।

रात को उसने राघव से कहा—

“लगता है शोभा का गुस्सा खत्म हो गया।”

राघव हंस दिया।

“मैंने कहा था ना, दिल की बुरी नहीं है।”

लेकिन उसी रात करीब दो बजे…

शोभा धीरे से अपने कमरे से बाहर निकली।

पूरा घर सो रहा था।

वह दबे पांव राघव के कमरे के पास पहुंची।

कुछ सेकंड दरवाजे के बाहर खड़ी रही।

फिर वापस चली गई।

अगली सुबह उसने राघव के लिए खुद नाश्ता बनाया।

“भैया, आज आपको मेरे हाथ का खाना खाना पड़ेगा।”

राघव हंसते हुए बोला—

“अरे वाह! आज सूरज कहां से निकला?”

सब हंस पड़े।

सिर्फ शोभा नहीं हंसी।

उसने एक पल राघव को बहुत ध्यान से देखा।

उस शाम राघव को अपना रूमाल नहीं मिला।

नैना ने पूरा बैग देख लिया।

“कल तक तो यहीं था।”

“छोड़ो, दूसरा ले लूंगा।”

राघव ने बात खत्म कर दी।

उसे क्या पता था कि उसकी एक निजी चीज अब शोभा के पास पहुंच चुकी थी।

रात को शोभा फिर घर से निकली।

वही पुराना तालाब।

वही उजड़ा देवस्थान।

वही अंधेरा।

उसने थैली से राघव की तस्वीर निकाली।

फिर उसका रूमाल उसके पास रख दिया।

इसके बाद उसने जो किया, वह किसी सामान्य पूजा जैसा नहीं था।

कुछ देर बाद अचानक आसपास बैठे पक्षी एक साथ उड़ गए।

शोभा डर गई।

उसने पहली बार महसूस किया कि शायद वह जिस चीज से खेल रही है, उस पर उसका उतना नियंत्रण नहीं है जितना वह समझ रही थी।

फिर भी वह नहीं रुकी।

कुछ दिन बाद राघव परिवार के साथ शहर लौट गया।

पहला सप्ताह सामान्य बीता।

फिर उसके ऑफिस में अजीब समस्याएं शुरू होने लगीं।

जिस कंपनी से बड़ा ऑर्डर मिलने वाला था, उसने अचानक सौदा रोक दिया।

राघव ने अपने मैनेजर से पूछा—

“कारण क्या बताया?”

“सर, कुछ नहीं। बस कहा अभी डील आगे नहीं बढ़ानी।”

दो दिन बाद मशीन खराब हो गई।

फिर एक पुराने ग्राहक का भुगतान अटक गया।

एक सप्ताह के अंदर तीन ऑर्डर कैंसिल हो गए।

राघव परेशान रहने लगा।

नैना ने कहा—

“थोड़ा समय दो। बिजनेस में ऐसा होता रहता है।”

लेकिन बात सिर्फ बिजनेस तक सीमित नहीं रही।

राघव का स्वभाव बदलने लगा।

वह छोटी-छोटी बातों पर चिढ़ जाता।

एक शाम कमला ने सिर्फ इतना पूछा—

“बेटा खाना खाएगा?”

राघव अचानक चिल्ला पड़ा—

“मां, हर पांच मिनट में कोई ना कोई सवाल क्यों पूछता रहता है?”

पूरा कमरा शांत हो गया।

कमला उसे देखती रह गई।

राघव को तुरंत अपनी गलती महसूस हुई।

“मां… मेरा वो मतलब नहीं था।”

वह अपने कमरे में चला गया।

नैना पीछे आई।

“आपको क्या हो रहा है?”

राघव ने सिर पकड़ लिया।

“मुझे खुद नहीं पता।”

रात को उसकी नींद भी टूटने लगी।

कभी ठीक 2:40 पर।

कभी तीन बजे।

कभी उसे लगता कोई उसके कमरे के बाहर चल रहा है।

एक रात उसकी आंख खुली।

दरवाजा थोड़ा-सा खुला था।

बाहर गलियारे में अंधेरा था।

उसे लगा कोई दरवाजे के पीछे खड़ा है।

“कौन है?”

कोई जवाब नहीं।

वह उठकर बाहर गया।

गलियारा खाली था।

अगली रात फिर वही हुआ।

इस बार उसे किसी औरत की बहुत धीमी हंसी सुनाई दी।

राघव ने तुरंत लाइट जलाई।

कुछ नहीं।

धीरे-धीरे उसका काम और खराब होने लगा।

बैंक की किश्तें अटकने लगीं।

कर्मचारियों की तनख्वाह देने में परेशानी होने लगी।

जिस आदमी को कभी अपने फैसलों पर पूरा भरोसा था, अब वह एक साधारण कागज पर हस्ताक्षर करने से पहले दस बार सोचता।

हरिनारायण ने मोहन को फोन किया।

“पता नहीं बेटे को क्या हो गया है। व्यापार भी खराब चल रहा है और उसका स्वभाव भी बदल गया है।”

मोहन परेशान हो गया।

उसने फोन रखने के बाद शोभा को बताया।

शोभा सब्जी काट रही थी।

उसका हाथ रुक गया।

“कितना नुकसान हुआ?”

मोहन ने उसकी तरफ देखा।

“तुम नुकसान पूछ रही हो?”

“मेरा मतलब… ज्यादा परेशानी तो नहीं है?”

मोहन ने गहरी सांस ली।

“भैया बहुत परेशान हैं।”

शोभा ने सिर नीचे कर लिया।

लेकिन उसके होंठों पर बहुत हल्की मुस्कान आ गई।

उस रात वह फिर तालाब के पास गई।

लेकिन इस बार वहां पहुंचते ही कुछ अजीब हुआ।

खंडहर के अंदर कदम रखते ही उसे पीछे किसी के चलने की आवाज आई।

वह रुकी।

आवाज भी रुक गई।

वह आगे बढ़ी।

फिर वही कदम।

शोभा ने पीछे देखा।

कोई नहीं।

“कौन है?”

सन्नाटा।

उसने जल्दी से अपना काम खत्म किया और वहां से लौट आई।

अब उसे डर लगने लगा था।

लेकिन राघव की बर्बादी देखकर मिलने वाली संतुष्टि उसके डर से बड़ी थी।

कुछ ही दिनों बाद राघव बीमार पड़ गया।

पहले कमजोरी।

फिर लगातार बुखार।

डॉक्टर बदले गए।

टेस्ट करवाए गए।

दवाइयां बदली गईं।

लेकिन कोई स्पष्ट कारण सामने नहीं आया।

रात को उसकी हालत सबसे ज्यादा खराब होती।

एक रात नैना की नींद किसी आवाज से खुली।

राघव बिस्तर पर बैठा था।

उसकी आंखें बंद थीं।

वह किसी से बात कर रहा था।

“नहीं… मैं वहां नहीं आऊंगा।”

नैना ने उसे हिलाया।

“राघव?”

वह नहीं जागा।

“राघव!”

अचानक उसने आंखें खोल दीं।

“कौन था?”

“कौन?”

“वो औरत।”

नैना के शरीर में सिहरन दौड़ गई।

“यहां कोई नहीं है।”

राघव ने कमरे के कोने की तरफ इशारा किया।

“अभी वहीं खड़ी थी।”

अगली सुबह नैना ने कमला को सारी बात बता दी।

कमला पहले से परेशान थी।

अब उसके मन में पुरानी घटनाएं जुड़ने लगीं।

राघव पहली बार गांव से लौटकर आया—व्यापार बिगड़ा।

दूसरी बार गांव से आया—स्वभाव बदला।

और अब बीमारी।

कमला ने मोहन को फोन किया।

“एक बात सच-सच बताना।”

“क्या हुआ मां?”

“राघव जब गांव आया था तब घर में कुछ हुआ था?”

“क्या मतलब?”

“कोई झगड़ा? कोई बाहर का आदमी? कोई अजीब चीज?”

मोहन ने काफी सोचा।

“नहीं।”

कमला कुछ पल चुप रही।

तभी पीछे से शोभा की आवाज आई—

“किससे बात कर रहे हो?”

मोहन ने फोन स्पीकर पर कर दिया।

“मां पूछ रही हैं भैया के आने पर यहां कुछ हुआ था क्या।”

शोभा का चेहरा बदल गया।

उसने तुरंत फोन हाथ में लिया।

“मांजी, आप कहना क्या चाहती हैं?”

“मैं सिर्फ पूछ रही हूं।”

“या आपको लगता है हमने कुछ किया है?”

कमला चौंकी।

“मैंने तुम्हारा नाम कब लिया?”

“नाम लेने की जरूरत क्या है? आपका इशारा साफ है।”

शोभा ने गुस्से में फोन काट दिया।

कमला फोन हाथ में लिए बैठी रह गई।

एक सवाल उसके दिमाग में अटक गया—

जब मैंने उसका नाम लिया ही नहीं तो वह इतनी डर क्यों गई?

उसी शाम कमला ने हरिनारायण से बात की।

फिर दोनों ने एक फैसला किया।

वे राघव को कुछ दिनों के लिए शहर से बाहर ले जाएंगे।

लेकिन इस बार गांव वाले घर में नहीं।

गांव से लगभग बीस किलोमीटर दूर पहाड़ी के नीचे एक पुराना आश्रम था।

वहां रहने वाले एक बुजुर्ग साधक को हरिनारायण कई वर्षों से जानते थे।

अगले दिन कमला राघव को लेकर वहां पहुंची।

राघव बहुत कमजोर हो चुका था।

आश्रम के अंदर पहुंचते ही वह अचानक रुक गया।

“मां… वापस चलते हैं।”

“क्यों?”

“बस चलो यहां से।”

“इतनी दूर आए हैं। पहले बाबा से मिल लेते हैं।”

राघव ने कमला का हाथ कसकर पकड़ लिया।

“नहीं।”

कमला ने पहली बार उसकी आंखों में ऐसा डर देखा।

अंदर से बुजुर्ग साधक बाहर आए।

उन्होंने राघव को कुछ देर देखा।

फिर कमला से सिर्फ इतना कहा—

“इसे अंदर लेकर आओ।”

राघव पीछे हटने लगा।

“मुझे नहीं जाना!”

उसकी आवाज अचानक तेज हो गई।

कमला घबरा गई।

दो लोगों की मदद से उसे अंदर बैठाया गया।

बुजुर्ग ने उसके सामने कुछ प्रार्थनाएं शुरू कीं।

कुछ ही मिनट बाद राघव बेचैन होने लगा।

उसकी सांस तेज हो गई।

वह बार-बार दरवाजे की तरफ देखने लगा।

फिर अचानक बोला—

“वो यहां आ जाएगी।”

कमला ने पूछा—

“कौन?”

राघव ने कोई जवाब नहीं दिया।

उसने दोनों कान बंद कर लिए।

“चुप हो जाओ… चुप हो जाओ…”

कमला रोने लगी।

कुछ देर बाद राघव अचानक बेहोश होकर जमीन पर गिर पड़ा।

जब उसकी आंख खुली तो वह बहुत कमजोर था।

लेकिन पहली बार कई दिनों बाद उसकी आंखों में वही पुराना भाव दिखाई दे रहा था।

बुजुर्ग ने कमला से कहा—

“तुम्हारे बेटे के मन और जीवन पर किसी अपने की गहरी नकारात्मकता बैठी हुई है।”

कमला का दिल बैठ गया।

“कौन?”

“नाम मैं नहीं बता सकता। लेकिन जिसने किया है वह बहुत दूर का नहीं है।”

कमला के दिमाग में शोभा का चेहरा घूम गया।

अगले दो दिन राघव वहीं रहा।

धीरे-धीरे उसका बुखार कम होने लगा।

तीसरी रात उसने बिना डर के नींद ली।

उधर गांव में शोभा की हालत बदलने लगी।

उस रात वह अचानक नींद से जागी।

उसे लगा आंगन में कोई चल रहा है।

खट…

खट…

खट…

“मोहन?”

कोई जवाब नहीं।

मोहन उसके पास ही सो रहा था।

शोभा उठी।

दरवाजा खोला।

आंगन खाली था।

जैसे ही वह वापस मुड़ी, पीछे से किसी ने बहुत धीमी आवाज में कहा—

“शोभा…”

वह जम गई।

धीरे से पीछे देखा।

कोई नहीं।

उसने तुरंत दरवाजा बंद कर दिया।

अगली सुबह वह उसी बूढ़ी औरत के घर गई जिससे वह महीनों से मिलती थी।

लेकिन घर पर ताला लगा था।

पड़ोसी ने बताया—

“तीन दिन पहले गांव छोड़कर चली गई।”

“कहां?”

“पता नहीं।”

शोभा के पैरों तले जमीन खिसक गई।

उसी शाम कमला राघव को लेकर अचानक गांव पहुंच गई।

किसी को उनके आने की खबर नहीं थी।

मोहन दौड़कर बाहर आया।

“भैया!”

राघव कमजोर था लेकिन पहले से काफी ठीक लग रहा था।

शोभा दरवाजे पर खड़ी थी।

राघव की नजर उस पर पड़ी।

कुछ सेकंड दोनों एक-दूसरे को देखते रहे।

कमला सीधे शोभा के सामने पहुंची।

“एक सवाल पूछूंगी।”

शोभा चुप रही।

“मेरे बेटे ने तुम्हारा क्या बिगाड़ा था?”

मोहन हैरान रह गया।

“मां?”

शोभा तुरंत बोली—

“फिर वही इल्जाम?”

कमला ने अपने बैग से एक पुराना रूमाल निकाला।

वही रूमाल जो गांव की पिछली यात्रा में राघव का गायब हुआ था।

शोभा का चेहरा सफेद पड़ गया।

कमला बोली—

“ये हमें पुराने तालाब के पास मिला।”

असल में कमला सुबह आश्रम से निकलने से पहले साधक की सलाह पर उस पुराने देवस्थान तक गई थी।

वहां झाड़ियों के बीच उन्हें राघव की कुछ पुरानी चीजें और तस्वीर मिली थीं।

मोहन ने रूमाल देखा।

फिर शोभा की तरफ देखा।

“ये तुम्हारे पास कैसे पहुंचा?”

“मुझे नहीं पता।”

“शोभा…”

“मैंने कहा ना मुझे नहीं पता!”

तभी पायल कमरे से बाहर आ गई।

वह अपनी मां को देखकर डर गई।

मोहन ने बेटी की तरफ देखा और फिर शोभा से कहा—

“पायल की कसम खाकर कहो कि तुम्हें कुछ नहीं पता।”

शोभा की आवाज बंद हो गई।

“बोलो।”

उसकी आंखों में आंसू भरने लगे।

“कसम खाओ।”

शोभा अचानक जमीन पर बैठ गई।

कुछ सेकंड तक सिर्फ रोने की आवाज आती रही।

फिर उसने धीरे से कहा—

“हां… मैंने किया।”

मोहन पीछे हट गया।

“क्या?”

“मुझसे उनकी खुशी देखी नहीं जाती थी।”

राघव चुपचाप उसे देख रहा था।

शोभा रोते हुए बोलती गई—

“हर जगह भैया… हर जगह भाभी… गांव में उनकी तारीफ… घर में उनकी तारीफ… मां-बाबूजी भी उन्हीं की बातें करते थे।”

मोहन चिल्लाया—

“उन्होंने हमारा क्या छीना था?”

“मुझे लगता था एक दिन सब छीन लेंगे!”

“किसने कहा था?”

शोभा के पास जवाब नहीं था।

“भैया ने पायल की फीस भरी। खेती में पैसा दिया। हमारे लिए हमेशा खड़े रहे और तुमने उनके साथ ये किया?”

मोहन की आंखों से आंसू निकल आए।

राघव आगे आया।

मोहन ने गुस्से में शोभा की तरफ बढ़ना चाहा।

राघव ने उसे रोक लिया।

“बस।”

“भैया छोड़ो मुझे!”

“नहीं।”

“इसने आपको बर्बाद कर दिया!”

राघव ने मोहन को कसकर पकड़ लिया।

“तू गुस्से में ऐसा कुछ मत कर जिसका पछतावा जिंदगी भर रहे।”

मोहन वहीं बैठकर रोने लगा।

उस दिन के बाद घर पहले जैसा नहीं रहा।

मोहन ने शोभा से अलग रहने का फैसला कर लिया।

पायल कुछ समय के लिए अपने दादा-दादी के साथ शहर चली गई।

राघव भी धीरे-धीरे ठीक होने लगा।

व्यापार को संभलने में काफी समय लगा, लेकिन उसने फिर से शुरुआत की।

दूसरी तरफ शोभा उसी गांव वाले घर में रह गई।

पहले कुछ दिन सामान्य रहे।

फिर रात में वही कदमों की आवाज लौट आई।

खट…

खट…

खट…

कभी आंगन से।

कभी छत से।

कभी उसके कमरे के बिल्कुल बाहर से।

एक रात करीब दो बजे उसकी नींद खुली।

कमरे में कोई उसके बिस्तर के पास खड़ा था।

अंधेरे में चेहरा दिखाई नहीं दे रहा था।

शोभा चीखते हुए उठी और लाइट जला दी।

वहां कोई नहीं था।

अगली रात उसके कमरे की दीवार पर किसी की परछाई दिखाई दी।

लेकिन कमरे में उसके अलावा कोई नहीं था।

अब शोभा रात होने से डरने लगी।

उसने कई बार मोहन को फोन किया।

मोहन ने फोन नहीं उठाया।

फिर एक रात…

उसे वही आवाज सुनाई दी जो तालाब वाले खंडहर में पहली बार सुनाई दी थी।

बहुत धीमी।

उसके कान के बिल्कुल पास।

“जिसे बुलाया था… उसे वापस भेजना इतना आसान नहीं होता।”

शोभा कांप गई।

वह पीछे मुड़ी।

कमरे में कोई नहीं था।

अचानक आंगन का दरवाजा जोर से बंद हुआ।

पूरे घर की बिजली चली गई।

शोभा अंधेरे में चीखती रही।

अगली सुबह पड़ोसियों ने देखा कि उसके घर का मुख्य दरवाजा खुला हुआ है।

शोभा आंगन में बेहोश पड़ी थी।

उसकी जान बच गई।

लेकिन उस घटना के बाद उसका मानसिक संतुलन पहले जैसा नहीं रहा।

वह बार-बार एक ही बात कहती—

“मैंने सिर्फ उनका सुख छीनना चाहा था… मुझे नहीं पता था वो मेरे पीछे भी आएगा।”

कुछ महीनों बाद मोहन ने वह पुराना घर बेच दिया।

परिवार ने उस घटना के बारे में दोबारा कभी बात नहीं की।

राघव का कारोबार धीरे-धीरे फिर खड़ा हो गया।

हरिनारायण और कमला उसके साथ शहर में रहने लगे।

मोहन ने भी खेती छोड़कर शहर में छोटा व्यवसाय शुरू किया।

लेकिन रामपुरा के पुराने तालाब के पास मौजूद वह टूटा हुआ देवस्थान आज भी खाली पड़ा है।

गांव वाले कहते हैं कि बरसात की कुछ रातों में वहां से किसी औरत के रोने की आवाज आती है।

और कभी-कभी…

अंधेरे में किसी के कदम तालाब से निकलकर गांव की तरफ आते सुनाई देते हैं।

खट…

खट…

खट…

इसलिए गांव के बुजुर्ग आज भी एक बात कहते हैं—

दूसरे इंसान की खुशी देखकर पैदा हुई जलन शुरुआत में सिर्फ एक विचार होती है। लेकिन अगर इंसान उसे अपने अंदर पालता रहे, तो एक दिन वही जलन सबसे पहले उसी का घर जला देती है।

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2 thoughts on “Kala Jadu Horror Story”

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