रात के करीब साढ़े आठ बज रहे थे।
पुणे से थोड़ा बाहर स्थित एक प्राइवेट कंपनी से मृणाली देशमुख अभी-अभी बाहर निकली थी।
दिनभर ऑफिस में काम करने के कारण वह पहले ही काफी थक चुकी थी। ऊपर से शाम से हल्की बारिश भी शुरू हो गई थी।
उसने बैग कंधे पर डाला और रोज की तरह बस स्टॉप की तरफ चलने लगी।
लेकिन जैसे ही वह मुख्य सड़क के पास पहुंची, उसके कदम अचानक रुक गए। Hindi Bhoot Ki Kahani
सड़क के एक तरफ लोगों की भीड़ जमा थी।
कुछ गाड़ियां सड़क किनारे खड़ी थीं।
मृणाली ने पास खड़े एक आदमी से पूछा,
“क्या हुआ है?”
उस आदमी ने कहा,
“एक्सीडेंट हुआ है। एक आदमी सड़क पर पड़ा है।”
यह सुनते ही मृणाली भीड़ के बीच से आगे बढ़ी।
कॉलेज के दिनों में उसने लगभग एक साल तक एक सामाजिक संस्था के साथ काम किया था। इसलिए उसे बेसिक फर्स्ट एड की अच्छी जानकारी थी।
सड़क किनारे लगभग चालीस-पैंतालीस साल का एक आदमी पड़ा हुआ था।
उसकी मोटरसाइकिल कुछ दूरी पर गिरी थी।
वह बुरी तरह घायल था, लेकिन अभी होश में था।
“एम्बुलेंस को फोन किया?”
मृणाली ने पूछा।
“किया है मैडम। लेकिन ट्रैफिक की वजह से आने में समय लगेगा।”
मृणाली तुरंत उस आदमी के पास बैठ गई।
“अंकल… मेरी आवाज सुन पा रहे हैं?”
उस आदमी ने धीरे से आंखें खोलीं।
उसकी सांसें बहुत तेज चल रही थीं।
मृणाली ने जितना संभव था, उसे प्राथमिक सहायता देने की कोशिश की।
कुछ देर बाद उस आदमी ने अचानक मृणाली का हाथ कसकर पकड़ लिया।
उसके होंठ हिले।
मृणाली उसके और करीब झुकी।
“क्या कह रहे हैं?”
वह बहुत धीमी आवाज में बोला,
“मेरी… थैली…”
सड़क के किनारे एक छोटी-सी काली थैली पड़ी थी।
“वो?”
मृणाली ने पूछा।
आदमी ने हल्के से सिर हिलाया।
“उसे… घर…”
लेकिन घर कहां था और वह थैली किसे देनी थी, यह बताने से पहले ही उसकी पकड़ ढीली पड़ गई।
“अंकल?”
मृणाली ने दोबारा आवाज लगाई।
कोई जवाब नहीं आया।
कुछ ही देर में एम्बुलेंस वहां पहुंच गई।
लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी।
मृणाली वहीं स्तब्ध खड़ी रही।
उसकी नजर बार-बार उस काली थैली की तरफ जा रही थी।
एक पुलिसवाले ने थैली उठा ली।
“आप इन्हें जानती हैं?”
“नहीं।”
“तो आप घर जाइए। हम देख लेंगे।”
Hindi Bhoot Ki Kahani
मृणाली वहां से चली गई।
लेकिन घर पहुंचने तक उस आदमी की आखिरी आवाज उसके दिमाग में गूंजती रही—
“उसे… घर…”
घर पहुंचते ही उसकी मां ने दरवाजा खोला।
“इतनी देर कैसे हो गई?”
“रास्ते में एक एक्सीडेंट हो गया था।”
मृणाली ने पूरी घटना अपनी मां को बता दी।
उसकी मां वंदना कुछ पल शांत रही।
फिर बोली,
“बहुत बुरा हुआ। लेकिन अब इसके बारे में ज्यादा मत सोच।”
मृणाली ने सिर हिला दिया।
खाना खाने के बाद वह अपने कमरे में चली गई।
लेकिन उसे नींद नहीं आ रही थी।
आंखें बंद करते ही वही सड़क…
वही भीड़…
और वह आदमी उसका हाथ पकड़कर कुछ कहने की कोशिश करता हुआ दिखाई देता।
रात करीब दो बजे उसकी आंख लग गई।
कितना समय बीता, उसे पता नहीं चला।
अचानक—
टक… टक… टक…
मृणाली की आंखें खुल गईं।
कमरे में अंधेरा था।
उसने फोन उठाकर समय देखा।
3:17 AM
फिर आवाज आई—
टक… टक… टक…
इस बार आवाज उसके बेडरूम के दरवाजे से आ रही थी।
“मां?”
कोई जवाब नहीं।
मृणाली बिस्तर से उठी।
धीरे-धीरे दरवाजे के पास पहुंची।
“कौन है?”
सन्नाटा।
उसने धीरे से दरवाजा खोला।
बाहर का गलियारा बिल्कुल खाली था।
माता-पिता के कमरे का दरवाजा बंद था।
मृणाली कुछ पल वहीं खड़ी रही।
“शायद मेरा वहम होगा…”
वह वापस कमरे की तरफ मुड़ी।
और वहीं जम गई।
उसके बिस्तर पर एक काली थैली रखी थी।
बिल्कुल वैसी ही…
जैसी उस एक्सीडेंट वाले आदमी के पास पड़ी थी।
मृणाली के पूरे शरीर में सिहरन दौड़ गई।
“ये… यहां कैसे आई?”
वह धीरे-धीरे थैली के करीब गई।
जैसे ही वह उसे छूने वाली थी—
टक… टक…
इस बार आवाज थैली के अंदर से आई।
मृणाली तुरंत दो कदम पीछे हट गई।
अचानक थैली बिस्तर से नीचे गिर गई।
और उसकी जिप धीरे-धीरे अपने आप खुलने लगी।
मृणाली की सांसें थम गईं।
अंदर एक पुराना मोबाइल फोन था।
उसकी स्क्रीन अचानक जल उठी।
स्क्रीन पर केवल एक शब्द दिखाई दे रहा था—
HOME
और उसके नीचे एक पता लिखा था।
कुछ सेकंड बाद स्क्रीन बंद हो गई।
मृणाली ने घबराकर कमरे की लाइट जला दी।
लेकिन लाइट जलते ही—
काली थैली गायब थी।
वहां कुछ भी नहीं था।
अगली सुबह जब मृणाली उठी, उसका सिर बहुत भारी था।
शरीर में बिल्कुल ताकत नहीं थी।
“आज ऑफिस मत जाना।”
मां ने कहा।
“कल की घटना का सदमा होगा।”
लेकिन मृणाली के दिमाग में कुछ और ही चल रहा था।
रात में जो हुआ…
क्या वह सपना था?
या सच?
उसने अपना फोन खोला।
और स्क्रीन देखते ही उसके पूरे शरीर में सिहरन दौड़ गई।
Google Maps की सर्च हिस्ट्री में एक पता था—
विठ्ठलवाड़ी, पुराना कात्रज रोड।
वही पता जो उसने रात को उस अनजान मोबाइल पर देखा था।
मृणाली ने वह पता सर्च नहीं किया था।
वह काफी देर तक फोन को देखती रही।
आखिरकार उसने फैसला किया—
आज ऑफिस के बाद वह उस पते पर जाएगी।
शाम करीब साढ़े छह बजे मृणाली विठ्ठलवाड़ी पहुंची।
पता एक पुराने से मकान का था।
उसने दरवाजा खटखटाया।
करीब साठ साल की एक महिला बाहर आई।
“कौन?”
“यहां… प्रकाश जाधव रहते हैं?”
महिला के चेहरे के भाव अचानक बदल गए।
“हां… मेरा बेटा।”
मृणाली कुछ पल कुछ बोल ही नहीं पाई।
“कल उनका एक्सीडेंट हो गया था…”
महिला की आंखें नम हो गईं।
“हमें पुलिस का फोन आया था।”
मृणाली ने उनका हाथ पकड़ लिया।
“उन्होंने आखिरी समय में एक काली थैली के बारे में कहा था। इसलिए मैं…”
महिला ने हैरानी से उसकी तरफ देखा।
“काली थैली?”
“जी।”
महिला कुछ देर शांत रही।
फिर बोली,
“उसके पास ऐसी कोई थैली नहीं थी।”
मृणाली के चेहरे का रंग उड़ गया।
“लेकिन मैंने खुद उसे देखा था।”
“शायद किसी और की रही होगी।”
मृणाली ने बात वहीं छोड़ दी।
वह जाने के लिए मुड़ी ही थी कि उसकी नजर घर की दीवार पर लगी एक तस्वीर पर पड़ी।
तस्वीर में प्रकाश जाधव थे।
लेकिन उनके साथ एक और आदमी खड़ा था।
उस आदमी का चेहरा देखते ही मृणाली स्तब्ध रह गई।
“ये कौन हैं?”
“मेरा बड़ा बेटा… शरद।”
“वो कहां रहते हैं?”
महिला के चेहरे पर दुःख और गहरा हो गया।
“वो अब इस दुनिया में नहीं है।”
“क्या हुआ था?”
“सात साल पहले उसी सड़क पर उसका एक्सीडेंट हुआ था।”
मृणाली के हाथ से फोन लगभग छूट गया।
“उसी… सड़क पर?”
“हां।”
महिला ने आगे कहा,
“प्रकाश को अपने भाई की मौत का बहुत बड़ा सदमा लगा था। क्योंकि उस रात शरद उसे बार-बार फोन कर रहा था। लेकिन दोनों का झगड़ा हुआ था, इसलिए प्रकाश ने उसका एक भी फोन नहीं उठाया।”
मृणाली को तुरंत रात वाला मोबाइल याद आया।
HOME
वह बिना कुछ बोले वहां से निकल गई।
उस रात के बाद चीजें और भी अजीब होने लगीं।
हर रात ठीक 3:17 बजे उसके कमरे के दरवाजे पर तीन दस्तक होतीं।
टक… टक… टक…
दरवाजा खोलने पर बाहर कोई नहीं मिलता।
कभी बाथरूम के शीशे पर भाप के बीच उंगली से लिखा हुआ एक शब्द दिखाई देता—
घर
कभी उसका फोन अपने आप नेविगेशन शुरू कर देता।
Destination हमेशा एक ही होता—
वही सड़क जहां एक्सीडेंट हुआ था।
मृणाली की तबीयत भी दिन-ब-दिन खराब होने लगी।
उसकी आंखों के नीचे काले घेरे पड़ गए।
ऑफिस में बैठे-बैठे अचानक उसकी आंख लग जाती।
लेकिन सबसे डरावनी बात कुछ और थी।
कभी-कभी उसे अपने ही मुंह से किसी आदमी की आवाज सुनाई देती।
सिर्फ कुछ सेकंड के लिए।
मृणाली का दोस्त अभिजीत उसके अंदर हो रहे बदलाव को महसूस कर रहा था।
एक दिन उसने पूछा,
“तुम सच में ठीक हो?”
“हां।”
“झूठ मत बोलो। सिर्फ एक हफ्ते में तुम्हारी हालत कितनी बदल गई है।”
आखिरकार मृणाली ने उसे सब कुछ बता दिया।
एक्सीडेंट…
काली थैली…
रात की दस्तक…
और वह पता।
शुरुआत में अभिजीत को उसकी बातों पर विश्वास नहीं हुआ।
लेकिन उसने मृणाली की मदद करने का फैसला किया।
दोनों दोबारा उस जगह पहुंचे जहां एक्सीडेंट हुआ था।
दिन के समय वह सड़क बिल्कुल सामान्य दिखाई दे रही थी।
सड़क किनारे एक बंद दुकान थी।
उसके सामने एक बूढ़ा आदमी चाय बेच रहा था।
मृणाली ने उसे प्रकाश की तस्वीर दिखाई।
“काका, इनका यहां एक्सीडेंट हुआ था ना?”
बूढ़े ने तस्वीर देखी।
“हां।”
“आपने देखा था?”
“एक्सीडेंट नहीं देखा। लेकिन बाद में भीड़ देखी थी।”
मृणाली ने पूछा,
“उनके पास कोई काली थैली थी?”
बूढ़ा अचानक शांत हो गया।
“तुम क्यों पूछ रही हो?”
“क्योंकि मैंने उसे देखा था।”
बूढ़े ने कुछ पल मृणाली को ध्यान से देखा।
फिर बोला,
“सात साल पहले भी यहां एक एक्सीडेंट हुआ था।”
“शरद का?”
बूढ़े के चेहरे पर हैरानी दिखाई दी।
“तुम्हें उसका नाम कैसे पता?”
मृणाली ने कोई जवाब नहीं दिया।
वह आगे बोला,
“उस रात मैं यहीं था। शरद के पास एक काली ऑफिस बैग थी। एक्सीडेंट के बाद वह बैग कभी नहीं मिली।”
मृणाली और अभिजीत ने एक-दूसरे की तरफ देखा।
“उस बैग में क्या था?”
“पता नहीं। लेकिन मरने से पहले वह बार-बार सिर्फ एक बात कह रहा था…”
मृणाली की सांस थम गई।
“क्या?”
बूढ़ा बोला,
“मेरी बैग घर पहुंचा देना।”
उस रात मृणाली ने तय किया कि वह सोएगी नहीं।
अभिजीत भी उसके घर पर रुक गया।
रात के तीन बज गए।
दोनों कमरे में शांत बैठे थे।
3:16…
मृणाली लगातार घड़ी देख रही थी।
फिर—
3:17
टक… टक… टक…
दोनों के चेहरे का रंग उड़ गया।
अभिजीत उठा।
“मैं देखता हूं।”
उसने दरवाजा खोला।
गलियारा खाली था।
लेकिन उसी समय मृणाली के पीछे से आवाज आई—
झ्झ्झ्झ…
उसका फोन अपने आप चालू हो गया था।
स्क्रीन पर कैमरा खुला था।
मृणाली ने फोन उठाया।
कैमरे में पूरा कमरा दिखाई दे रहा था।
अभिजीत दिखाई दे रहा था।
वह खुद दिखाई दे रही थी।
और उसके बिल्कुल पीछे—
एक लंबी काली आकृति खड़ी थी।
मृणाली ने डरकर तुरंत पीछे देखा।
वहां कोई नहीं था।
उसने फिर फोन की स्क्रीन देखी।
आकृति अब पहले से ज्यादा करीब थी।
फोन उसके हाथ से नीचे गिर गया।
उसी क्षण कमरे की लाइट बंद हो गई।
अंधेरे से एक आवाज आई—
“थैली…”
मृणाली चीख पड़ी।
अभिजीत ने मोबाइल की फ्लैशलाइट जलाई।
कमरे के कोने में वही काली थैली पड़ी थी।
इस बार अभिजीत भी उसे देख सकता था।
इसका मतलब…
मृणाली को कोई वहम नहीं हो रहा था।
अभिजीत धीरे-धीरे उसके पास गया।
उसने थैली खोली।
अंदर एक पुराना मोबाइल था…
कुछ कागजात…
और एक छोटा-सा गिफ्ट बॉक्स।
कागजात पर नाम लिखा था—
शरद जाधव।
मृणाली ने कांपते हाथों से गिफ्ट बॉक्स खोला।
अंदर एक साधारण घड़ी थी।
साथ में एक छोटी-सी पर्ची रखी थी।
उस पर लिखा था—
“प्रकाश के लिए।”
अब पूरी कहानी साफ होने लगी थी।
सात साल पहले शरद वह थैली प्रकाश के लिए घर लेकर जा रहा था।
लेकिन वह कभी घर नहीं पहुंची।
और सात साल बाद उसी जगह प्रकाश की भी मौत हो गई।
मृणाली ने कहा,
“हमें ये बैग उनके घर पहुंचानी होगी।”
सुबह होने का इंतजार किए बिना दोनों प्रकाश के घर पहुंचे।
दरवाजा उसकी मां ने खोला।
मृणाली ने काली थैली उनके सामने रख दी।
थैली देखते ही महिला ने अपने मुंह पर हाथ रख लिया।
“ये…”
उनकी आंखों में आंसू आ गए।
“ये शरद की है।”
उन्होंने कांपते हाथों से गिफ्ट बॉक्स खोला।
घड़ी देखते ही उनकी आंखों से आंसू बहने लगे।
“उस दिन प्रकाश का जन्मदिन था।”
मृणाली स्तब्ध रह गई।
महिला बोली,
“दोनों का झगड़ा हुआ था। लेकिन शरद ने मुझसे कहा था कि आज वह प्रकाश से अपना झगड़ा खत्म कर देगा। उसने उसके लिए ये गिफ्ट खरीदा था।”
उस रात शरद अपने भाई से सुलह करने के लिए निकला था।
लेकिन वह घर पहुंच ही नहीं पाया।
और प्रकाश पूरी जिंदगी इसी गलतफहमी में रहा कि उसका भाई आखिरी समय तक उससे नाराज था।
मृणाली की आंखें भी नम हो गईं।
उसी समय कमरे में लगी पुरानी दीवार घड़ी अचानक बंद हो गई।
समय था—
3:17
और तभी मृणाली के कान के पास बहुत धीमी आवाज आई—
“पहुंच गई…”
उसने तुरंत पीछे देखा।
वहां कोई नहीं था।
उस दिन के बाद मृणाली के कमरे के दरवाजे पर होने वाली दस्तक हमेशा के लिए बंद हो गई।
उसकी तबीयत भी धीरे-धीरे ठीक होने लगी।
न काली थैली दोबारा दिखाई दी…
न उसके फोन में वह पता आया।
मृणाली को लगा—
सब कुछ खत्म हो गया।
करीब दो महीने बीत गए।
एक रात वह ऑफिस से घर लौट रही थी।
एक सिग्नल पर उसकी कैब रुकी।
मृणाली ने यूं ही खिड़की से बाहर देखा।
फुटपाथ पर एक काली थैली पड़ी थी।
मृणाली के दिल की धड़कन अचानक तेज हो गई।
“ड्राइवर… गाड़ी आगे बढ़ाइए।”
सिग्नल हरा हुआ।
गाड़ी आगे निकल गई।
मृणाली ने पीछे मुड़कर देखा।
थैली वहीं पड़ी थी।
उसने खुद को समझाया—
“कोई साधारण बैग होगी…”
तभी उसके फोन की स्क्रीन अपने आप जल उठी।
Google Maps खुल गया।
एक नया destination दिखाई दे रहा था।
शहर के दूसरे छोर का कोई अनजान पता।
नीचे केवल दो शब्द लिखे थे—
DELIVER HOME
मृणाली के हाथ से फोन लगभग छूट गया।
और तभी…
उसके बगल की खाली सीट धीरे-धीरे नीचे दबने लगी।
जैसे उसी पल कोई अदृश्य व्यक्ति वहां आकर बैठ गया हो।
उसके कान के पास फिर वही तीन धीमी आवाजें आईं—
टक… टक… टक…
और फिर एक अनजान आवाज फुसफुसाई—
“एक… और है…”
Google Maps — कहानी में Google Maps/navigation का संदर्भ है।