Gaon Ki Chaukhat Ka Diya: Ek Darawani Kahani

गांव की चौखट का दिया

रात के करीब साढ़े नौ बज रहे थे।

सतारा से दूर पहाड़ियों के बीच बसे छोटे से गांव कासारवाड़ी में उस रात अलग ही रौनक थी।

Ek Darawani Kahani

गांव के लगभग हर घर की चौखट पर मिट्टी का एक दिया जल रहा था।

किसी के दरवाजे पर रंगोली बनी थी, कहीं आम के पत्तों का तोरण लगा था, तो गांव के बीच से ढोल-नगाड़ों की आवाज सुनाई दे रही थी।

लेकिन सबसे अजीब नजारा गांव की चौखट पर था।

वहां पुराने बरगद के पेड़ के नीचे पत्थर का एक छोटा-सा चबूतरा बना था। उसके सामने सात मिट्टी के दिए एक सीधी कतार में रखे हुए थे।

उन सातों दियों के पीछे सात पत्तलों पर चावल, गुड़ और नारियल का भोग रखा गया था।

गांव का कोई भी व्यक्ति उस चबूतरे के ज्यादा करीब नहीं जा रहा था।

क्योंकि आज गांव के पाटिल परिवार के घर शादी हुई थी।

नितिन पाटिल अपनी नई नवेली पत्नी माधवी को लेकर पहली बार गांव लौट रहा था। Ek Darawani Kahani

गाड़ी गांव की चौखट से कुछ दूरी पर रोक दी गई।

माधवी नीचे उतरी।

उसने सामने देखा।

गांव के भीतर जाने वाला रास्ता दियों की रोशनी से जगमगा रहा था।

वह मुस्कुराकर नितिन से बोली,

“इतनी सारी तैयारी मेरे लिए की गई है?”

नितिन कुछ बोलता, उससे पहले उसकी मां सुलोचना आगे आ गई।

उसके हाथ में पीतल की एक थाली थी।

थाली में एक जलता हुआ दिया और थोड़ा-सा भोग रखा था।

उसने थाली माधवी के हाथ में दे दी।

“ये लो।”

माधवी ने हैरानी से पूछा,

“ये किसलिए?”

सुलोचना का चेहरा गंभीर हो गया।

“हमारे गांव की पुरानी परंपरा है। नई बहू गांव में पहला कदम रखने से पहले चौखट पर रखे सातों दियों को प्रणाम करती है।”

“लेकिन क्यों?”

एक पल के लिए वहां मौजूद सभी लोग शांत हो गए।

माधवी ने नितिन की तरफ देखा।

नितिन ने बात टालते हुए कहा,

“अरे, पुरानी परंपरा है। कर लो ना। दो मिनट की ही तो बात है।”

लेकिन तभी सुलोचना धीमी आवाज में बोली,

“आज की रात गांव में जल रहा एक भी दिया बुझना नहीं चाहिए।”

माधवी हल्का-सा हंस पड़ी।

“और अगर बुझ गया तो?”

इस बार आसपास खड़े गांव वालों के चेहरे भी गंभीर हो गए।

सुलोचना माधवी के करीब आई।

“तो गांव की चौखट खुल जाती है।”

माधवी की मुस्कान गायब हो गई।

“किसके लिए?”

सुलोचना ने जवाब नहीं दिया।

उसने केवल बरगद के पुराने पेड़ की तरफ देखा।

माधवी को सब कुछ थोड़ा अजीब लग रहा था।

लेकिन शादी के पहले ही दिन वह ससुराल वालों की परंपरा का विरोध नहीं करना चाहती थी।

वह थाली लेकर चबूतरे के पास चली गई।

उसके पीछे नितिन और उसके माता-पिता खड़े थे।

माधवी ने आंखें बंद कीं।

सुलोचना ने जैसा बताया था, उसने मन ही मन परिवार के पूर्वजों को याद किया।

उसी समय…

गांव के आखिरी छोर पर मौजूद एक बंद पड़े घर के पीछे से कोई बाहर निकला।

सिर से पांव तक काली शॉल ओढ़े एक बूढ़ी औरत।

उसका चेहरा साफ दिखाई नहीं दे रहा था।

वह धीरे-धीरे गांव के एक घर की चौखट के पास पहुंची।

वहां मिट्टी का एक दिया जल रहा था।

बूढ़ी औरत नीचे झुकी।

उसने अपना चेहरा दिये के करीब किया।

और…

फूऽऽऽ…

Ek Darawani Kahani

दिया बुझ गया।

उसी क्षण गांव की चौखट पर खड़ी माधवी अचानक चौंक गई।

उसके हाथ में मौजूद थाली के दिये की लौ तेजी से कांपने लगी।

“मां…”

वह कुछ बोलती, उससे पहले—

थाली का दिया भी बुझ गया।

ढोल-नगाड़ों की आवाज अचानक बंद हो गई।

जैसे पूरे गांव ने एक साथ अपनी सांस रोक ली हो।

सुलोचना के हाथ से अक्षत की कटोरी नीचे गिर गई।

“नहीं…”

नितिन ने घबराकर पूछा,

“क्या हुआ?”

सुलोचना कांपती आवाज में बोली,

“दिया बुझ गया…”

लेकिन माधवी कुछ नहीं बोल रही थी।

वह लगातार बरगद के पेड़ की तरफ देख रही थी।

“माधवी?”

नितिन ने उसके कंधे पर हाथ रखा।

माधवी ने बहुत धीरे अपनी गर्दन उसकी तरफ घुमाई।

उसके चेहरे पर डर नहीं था।

बल्कि एक अजीब-सी शांति थी।

वह नितिन को देखकर धीरे से मुस्कुराई।

“बहुत देर कर दी तुमने।”

नितिन के चेहरे का रंग बदल गया।

“क्या?”

माधवी ने दोबारा बरगद की तरफ देखा।

“मैंने बहुत साल इंतजार किया है।”

सुलोचना घबराकर आगे आई।

“बहू… ये क्या बोल रही हो?”

माधवी ने उसकी तरफ देखा।

एक पल के लिए उसकी आंखों में जबरदस्त गुस्सा दिखाई दिया।

लेकिन अगले ही पल वह बेहोश होकर जमीन पर गिर गई।

गांव में अफरा-तफरी मच गई।

गांव की बुजुर्ग जानकी दादी तेजी से आगे आईं।

उन्होंने माधवी के माथे पर हल्दी-कुमकुम लगाया और सुलोचना की तरफ देखकर कहा,

“इसे तुरंत हवेली में लेकर जाओ।”

“लेकिन हुआ क्या है?”

जानकी दादी ने पूरे गांव की तरफ नजर घुमाई।

“किसी ने जानबूझकर दिया बुझाया है।”

सुलोचना का चेहरा सफेद पड़ गया।

“इसका मतलब…”

“हां।”

जानकी दादी बोलीं,

“वो वापस आ गई है।”


उस रात माधवी को हवेली की ऊपरी मंजिल के एक कमरे में सुला दिया गया।

सुबह तक कुछ नहीं हुआ।

सुबह उठने के बाद माधवी को पिछली रात की घटना ठीक से याद भी नहीं थी।

उसने नितिन से पूछा,

“मैं बेहोश हो गई थी?”

“हां। शायद सफर और शादी की थकान की वजह से।”

नितिन ने उससे झूठ कहा।

लेकिन नीचे सुलोचना और उसके पति दत्तात्रय पाटिल किसी दूसरी ही चिंता में डूबे थे।

दत्तात्रय ने कहा,

“गुरुजी को बुलाना पड़ेगा।”

सुलोचना ने तुरंत हामी भर दी।

दत्तात्रय गांव के मंदिर पहुंच गए।

लेकिन वहां जाकर पता चला कि मंदिर के मुख्य गुरुजी दो दिनों के लिए बाहर गए हैं।

मंदिर में केवल उनका एक युवा शिष्य मौजूद था।

दत्तात्रय ने पिछली रात हुई पूरी घटना उसे बताई।

वह कुछ देर सोचता रहा।

फिर मंदिर से पवित्र भस्म की एक छोटी डिब्बी लाकर उसने दत्तात्रय के हाथ में रख दी।

“इसे अपने घर की मुख्य चौखट पर लगा दीजिए। गुरुजी के लौटने तक रात में कोई भी घर से बाहर मत निकलिएगा।”

दत्तात्रय डिब्बी लेकर वहां से निकल गए।

लेकिन मंदिर के पीछे…

काली शॉल ओढ़े वही बूढ़ी औरत छिपकर उन्हें देख रही थी।

दत्तात्रय गांव की संकरी गली से अपने घर की तरफ जा रहे थे।

एक मोड़ पर वही बूढ़ी औरत अचानक सामने आ गई।

दोनों की टक्कर हुई।

दत्तात्रय के हाथ से भस्म की डिब्बी नीचे गिर गई।

“माफ कीजिए।”

बूढ़ी औरत तुरंत नीचे झुकी।

उसने डिब्बी उठाकर दत्तात्रय के हाथ में दे दी।

“कोई बात नहीं।”

दत्तात्रय आगे निकल गए।

लेकिन उन्हें पता नहीं चला…

उनके हाथ में जो डिब्बी वापस आई थी…

वह उनकी डिब्बी थी ही नहीं।


उस दिन माधवी की पहली रसोई थी।

दोपहर में वह रसोई की तरफ जाने लगी तो सुलोचना ने कहा,

“नितिन को पूरनपोली बहुत पसंद है। बाकी कुछ बनाओ या ना बनाओ, लेकिन पूरनपोली जरूर बनाना।”

माधवी मुस्कुराई।

“ठीक है मां।”

वह रसोई में चली गई।

कुछ देर तक सब सामान्य रहा।

फिर अचानक…

छन… छन… छन…

पायल की आवाज।

माधवी के हाथ रुक गए।

उसने पीछे देखा।

वहां कोई नहीं था।

उसने फिर काम शुरू किया।

छन… छन…

इस बार आवाज बिल्कुल उसके पीछे से आई।

माधवी ने तुरंत पलटकर देखा।

रसोई खाली थी।

वह खुद से बोली,

“कल से मुझे क्या हो रहा है?”

उसने पानी का गिलास उठाया।

तभी सामने रखी एक पुरानी पीतल की थाली में उसे कुछ दिखाई दिया।

थाली के प्रतिबिंब में…

उसके पीछे एक औरत खड़ी थी।

फीकी हरी साड़ी।

लंबे बाल।

और नीचे झुका हुआ चेहरा।

माधवी ने डरकर पीछे देखा।

कोई नहीं था।

उसने दोबारा थाली की तरफ देखा।

अब वहां भी कुछ नहीं था।

उसने थाली एक तरफ रख दी।

“भ्रम है… सिर्फ भ्रम।”

तभी उसके कान के बिल्कुल पास एक महिला की धीमी आवाज सुनाई दी—

“ये मेरा भी घर था।”

माधवी वहीं जम गई।

“क… कौन?”

कोई जवाब नहीं आया।

अचानक रसोई का दरवाजा अपने आप बंद हो गया।

माधवी दौड़कर दरवाजे के पास पहुंची।

लेकिन दरवाजा खुल नहीं रहा था।

पीछे से फिर वही आवाज आई—

“मेरी जगह तुमने ले ली।”

माधवी की आंखों में आंसू आ गए।

“तुम कौन हो?”

कुछ पल तक सन्नाटा रहा।

फिर एक नाम सुनाई दिया—

“शारदा।”

माधवी को अचानक चक्कर आने लगा।

वह नीचे बैठ गई।

कुछ सेकंड बाद दरवाजा अपने आप खुल गया।

सुलोचना अंदर आई।

“क्या हुआ?”

“यहां… कोई था।”

“कौन?”

“शारदा नाम की कोई औरत।”

सुलोचना के चेहरे का रंग उड़ गया।

उसके हाथ में मौजूद कटोरी नीचे गिर गई।

माधवी ने उसकी हालत देख ली।

“आप उसे जानती हैं?”

“नहीं।”

सुलोचना ने तुरंत जवाब दिया।

लेकिन उसकी आवाज कांप रही थी।


उस रात खाना खाने के बाद सभी अपने कमरों में चले गए।

दत्तात्रय ने मंदिर से लाया हुआ समझकर वह भस्म घर की चौखट पर लगा दिया था।

उन्हें विश्वास था कि अब कुछ नहीं होगा।

रात करीब ग्यारह बजे नितिन सो गया।

लेकिन माधवी की आंखों में नींद नहीं थी।

ठीक बारह बजकर सत्रह मिनट पर…

छन… छन… छन…

पायल की आवाज फिर सुनाई दी।

माधवी उठकर बैठ गई।

आवाज बाहर जिने की तरफ से आ रही थी।

वह कमरे से बाहर निकली।

“कौन है?”

पायल की आवाज ऊपरी मंजिल की तरफ बढ़ गई।

हवेली की सबसे ऊपरी मंजिल पर एक पुराना कमरा था।

उस पर हमेशा ताला लगा रहता था।

माधवी उस कमरे के सामने पहुंची।

लेकिन आज ताला जमीन पर पड़ा था।

दरवाजा थोड़ा खुला था।

उसने धीरे से दरवाजा धकेला।

अंदर पुराना सामान और धूल थी।

दीवारों पर कई पुराने फोटो लगे थे।

माधवी ने मोबाइल की टॉर्च चालू की और तस्वीरें देखने लगी।

अचानक उसकी नजर एक तस्वीर पर रुक गई।

तस्वीर में नितिन बहुत छोटा था।

उसके साथ युवा सुलोचना और दत्तात्रय खड़े थे।

लेकिन उनके पीछे…

फीकी हरी साड़ी में एक जवान लड़की खड़ी थी।

माधवी ने तस्वीर पलटकर देखी।

पीछे लिखा था—

“शारदा – 1998”

माधवी के हाथ कांपने लगे।

“मतलब… वो सच में थी।”

पीछे से आवाज आई—

“हां।”

माधवी ने तुरंत पलटकर देखा।

दरवाजे पर सुलोचना खड़ी थी।

उसके चेहरे पर डर साफ दिखाई दे रहा था।

“मां… शारदा कौन थी?”

सुलोचना चुप रही।

“मुझे सच बताइए।”

आखिरकार सुलोचना कमरे के अंदर आई।

“वो इस हवेली में काम करने वाली पार्वती की बेटी थी।”

करीब अट्ठाईस साल पहले शारदा अपनी मां के साथ रोज हवेली में आया करती थी।

दत्तात्रय का छोटा भाई महेश और शारदा धीरे-धीरे एक-दूसरे के करीब आ गए।

महेश ने उससे शादी करने का वादा किया।

लेकिन परिवार को उनका रिश्ता मंजूर नहीं था।

क्योंकि शारदा गरीब परिवार की लड़की थी।

जब शारदा ने शादी की बात सबके सामने रखने की जिद की, तो परिवार ने अपनी प्रतिष्ठा बचाने के लिए उसे हमेशा के लिए गांव से दूर भेजने का फैसला किया।

एक बरसाती रात उसे बैलगाड़ी में बैठाकर गांव से बाहर ले जाया गया।

लेकिन अगले दिन…

वह दूसरे गांव पहुंची ही नहीं।

पुरानी कुएं के पास उसका कुछ सामान मिला।

उसके बाद शारदा कहां गई, इसका जवाब किसी को नहीं मिला।

माधवी ने पूछा,

“और महेश?”

सुलोचना ने नजरें झुका लीं।

“कुछ साल बाद उसने भी गांव छोड़ दिया।”

“तो आप लोगों को लगता है कि शारदा मर गई?”

सुलोचना कुछ बोलती, उससे पहले बाहर से आवाज आई—

“वो उस रात गांव से गई ही नहीं थी।”

दोनों ने पीछे देखा।

जानकी दादी दरवाजे पर खड़ी थीं।

“जानकी काकी?”

वह अंदर आईं।

“शारदा उस रात गांव के बाहर नहीं गई थी।”

सुलोचना ने हैरानी से पूछा,

“आपको कैसे पता?”

जानकी दादी ने जवाब दिया,

“क्योंकि उस रात मैंने उसे देखा था।”

शारदा हवेली से भागकर गांव की चौखट तक पहुंची थी।

उसने गांव वालों से मदद मांगी थी।

लेकिन पाटिल परिवार के डर से कोई उसके साथ खड़ा नहीं हुआ।

अगली सुबह से शारदा गायब थी।

कुछ महीनों बाद गांव की चौखट के बरगद के पास रात में किसी औरत के रोने की आवाज आने लगी।

फिर जिस साल पाटिल परिवार में अगली शादी तय हुई…

शादी की रात गांव के सात घरों के दिए अचानक बुझ गए।

उस घटना के बाद गांव में एक नई परंपरा शुरू हुई।

जब भी गांव में शादी होती, हर घर की चौखट पर दिया जलाया जाता।

क्योंकि गांव वालों का विश्वास था—

जब तक गांव के सभी दिए जल रहे हैं…

शारदा गांव की चौखट पार नहीं कर सकती।

माधवी के पूरे शरीर में सिहरन दौड़ गई।

“तो कल किसी ने दिया जानबूझकर बुझाया?”

जानकी दादी बोलीं,

“हां।”

“लेकिन किसने?”

जानकी दादी जवाब देतीं, उससे पहले…

नीचे मुख्य दरवाजे पर तीन बार दस्तक हुई।

ठक… ठक… ठक…

रात का एक बज चुका था।

सभी नीचे पहुंचे।

दत्तात्रय ने दरवाजे के पास जाकर पूछा,

“कौन है?”

बाहर से एक बूढ़ी औरत की आवाज आई—

“दरवाजा खोलो।”

आवाज सुनते ही जानकी दादी ने दत्तात्रय का हाथ पकड़ लिया।

“दरवाजा मत खोलना।”

“क्यों?”

जानकी दादी की नजर दरवाजे पर थी।

“क्योंकि बाहर खड़ी औरत शारदा नहीं है।”

सबने उनकी तरफ देखा।

“फिर कौन है?”

जानकी दादी ने धीरे से कहा—

“उसकी मां… पार्वती।”

सुलोचना के चेहरे का रंग उड़ गया।

“पार्वती? लेकिन वो तो कई साल पहले गांव छोड़कर चली गई थी।”

“वो वापस आ गई है।”

बाहर से फिर आवाज आई—

“दरवाजा खोलो।”

दत्तात्रय ने ऊंची आवाज में पूछा,

“क्यों आई हो?”

बाहर से जवाब आया—

“अपनी बेटी को इंसाफ दिलाने।”

माधवी ने खिड़की से बाहर देखा।

काली शॉल ओढ़े वही बूढ़ी औरत दरवाजे के सामने खड़ी थी।

वही औरत जो मंदिर के पास दत्तात्रय से टकराई थी।

जानकी दादी की नजर अचानक चौखट पर लगाए गए भस्म पर पड़ी।

उन्होंने उंगली से थोड़ा-सा भस्म उठाया।

उसे ध्यान से देखा।

फिर तुरंत बोलीं,

“ये मंदिर का भस्म नहीं है।”

दत्तात्रय चौंक गए।

“क्या?”

“तुम्हारी डिब्बी बदल दी गई थी।”

तभी…

पूरी हवेली की रोशनी एक साथ बंद हो गई।

चारों तरफ घना अंधेरा छा गया।

और ऊपर की मंजिल से पायल की आवाज आने लगी।

छन… छन… छन…

नितिन ने मोबाइल की टॉर्च जलाई।

लेकिन माधवी उसके पास नहीं थी।

“माधवी?”

ऊपर से उसकी आवाज आई—

“नितिन…”

सभी भागकर ऊपर पहुंचे।

माधवी पुराने कमरे के सामने खड़ी थी।

उसके हाथ में शारदा की तस्वीर थी।

वह धीमी आवाज में बोली,

“उसे बदला नहीं चाहिए।”

सुलोचना ने कहा,

“माधवी?”

“उसे सच चाहिए।”

माधवी ने धीरे से सिर उठाया।

“आप सभी ने उसके बारे में झूठ बोला था।”

दत्तात्रय का चेहरा उतर गया।

जानकी दादी ने उनकी तरफ देखा।

“अब तो सच बता दो।”

दत्तात्रय की आंखें भर आईं।

कुछ देर चुप रहने के बाद आखिरकार उन्होंने अट्ठाईस साल पुराना सच बताना शुरू किया।

उस रात शारदा को केवल गांव से बाहर भेजने की कोशिश नहीं की गई थी।

जब उसे जबरदस्ती ले जाया जा रहा था, वह भाग निकली थी।

वह बरगद के पेड़ तक पहुंच गई।

वहां उसे रोकने की कोशिश में धक्का-मुक्की हुई।

और उसी दौरान शारदा पुराने पत्थरीले ढलान से नीचे गिर गई।

परिवार घबरा गया।

अगर सच्चाई बाहर आती तो पाटिल परिवार की प्रतिष्ठा खत्म हो जाती।

इसलिए पूरी घटना छिपा दी गई।

गांव वालों को बताया गया कि शारदा खुद गांव छोड़कर चली गई है।

लेकिन उसकी मां पार्वती को भी कभी सच नहीं बताया गया।

नीचे दरवाजे के बाहर खड़ी पार्वती सब कुछ सुन रही थी।

उसकी आंखों से आंसू बहने लगे।

“अट्ठाईस साल…”

उसकी कांपती आवाज आई।

“अट्ठाईस साल मैं अपनी बेटी को खोजती रही।”

माधवी के पीछे अचानक ठंडी हवा चलने लगी।

पुराने कमरे का पर्दा अपने आप हिलने लगा।

फिर पायल की आवाज पहले से ज्यादा करीब सुनाई दी।

जानकी दादी ने शांत आवाज में कहा,

“आज दिया बुझने की वजह से शारदा वापस नहीं आई।”

सभी उनकी तरफ देखने लगे।

“तो फिर?”

जानकी दादी ने बरगद की दिशा में देखा।

“वो इतने सालों से यहीं थी।”

सभी के चेहरे पर डर फैल गया।

जानकी दादी बोलीं,

“दियों ने उसे गांव के बाहर नहीं रोका था…

दियों ने इस गांव के लोगों को उसके सच से दूर रखा था।”


सुबह होने से पहले गांव के सभी लोगों को बरगद के पेड़ के पास बुलाया गया।

दत्तात्रय सबके सामने खड़े हुए।

और पहली बार उन्होंने अट्ठाईस साल पहले हुई घटना का पूरा सच गांव वालों के सामने स्वीकार कर लिया।

पार्वती बरगद के नीचे बैठी रो रही थी।

माधवी उसके पास गई।

उसने शारदा की पुरानी तस्वीर पार्वती के हाथ में रख दी।

पार्वती तस्वीर को अपने सीने से लगाकर रोने लगी।

धीरे-धीरे पूर्व दिशा में सूरज की पहली किरण दिखाई देने लगी।

उसी समय…

बरगद के नीचे जल रहे सातों दिए एक-एक करके बुझने लगे।

पहला…

दूसरा…

तीसरा…

और फिर सातवां दिया भी बुझ गया।

लेकिन इस बार कोई नहीं डरा।

बरगद के पेड़ के पास से पायल की बहुत हल्की आवाज आई—

छन… छन…

पार्वती ने आंखें बंद कर लीं।

उसकी आंखों से आंसू बह रहे थे।

वह धीमी आवाज में बोली,

“जा बेटी…

अब शांत हो जा।”

और उसी के साथ पायल की आवाज हमेशा के लिए बंद हो गई।

उस दिन के बाद कासारवाड़ी में शादियां होती रहीं।

लेकिन शादी की रात हर घर की चौखट पर दिया जलाने की पुरानी परंपरा बंद कर दी गई।

अब केवल गांव की चौखट पर मौजूद पुराने बरगद के नीचे एक दिया जलाया जाता था।

डर की वजह से नहीं…

शारदा की याद में।

लेकिन गांव के कुछ बुजुर्ग आज भी एक बात कहते हैं।

अगर किसी शादी की रात…

बरगद के नीचे रखा वह अकेला दिया ठीक आधी रात को अपने आप बुझ जाए…

तो उसे दोबारा जलाने की कोशिश मत करना।

क्योंकि कुछ साल बाद गांव से गुजरने वाले एक मुसाफिर ने दावा किया था कि उसने आधी रात को उस बरगद के नीचे दो औरतों को खड़े देखा था।

एक बूढ़ी औरत…

और उसके बगल में फीकी हरी साड़ी पहने एक जवान लड़की।

दोनों बिल्कुल शांत खड़ी थीं।

और दोनों की नजरें पाटिल परिवार की पुरानी हवेली की तरफ थीं।

सबसे अजीब बात यह थी कि उस रात हवेली पूरी तरह खाली थी।

फिर भी…

रात के ठीक बारह बजकर सत्रह मिनट पर…

हवेली की सबसे ऊपरी मंजिल के उस बंद कमरे से एक बार फिर पायल की आवाज सुनाई दी थी—

छन… छन… छन…

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