घड़ी की सुइयां दोपहर के तीन बजे पर अटकी थीं, लेकिन पुराने जिला अस्पताल के बेसमेंट में समय जैसे वर्षों पहले ही रुक चुका था।
अनिरुद्ध मल्होत्रा एक फॉरेंसिक फोटोग्राफर था। उसका काम पुलिस के लिए अपराध स्थलों और पोस्टमार्टम से जुड़ी तस्वीरें लेना था। दस वर्षों में उसने ऐसी-ऐसी लाशें देखी थीं जिन्हें देखकर सामान्य इंसान महीनों तक सदमे में रह जाए। लेकिन उसके चेहरे पर कभी डर दिखाई नहीं देता था।
उसे लगता था कि दुनिया में भूत जैसी कोई चीज नहीं होती। Scary Story Hindi

उस दिन अस्पताल के पुराने रिकॉर्ड रूम को खाली किया जा रहा था। सरकार ने नई डिजिटल व्यवस्था लागू कर दी थी, इसलिए दशकों पुराने दस्तावेज, एक्स-रे फिल्में और तस्वीरें हटाई जा रही थीं।
रिकॉर्ड रूम के प्रभारी ने अनिरुद्ध को आवाज दी।
“सर… एक पुराना बॉक्स मिला है। उस पर पुलिस की सील है। शायद आपको देखना चाहिए।”
लोहे का जंग लगा बक्सा मोटी धूल से ढका था।
ऊपर फीकी स्याही से केवल एक लाइन लिखी थी—
“इस फाइल को कभी मत खोलना।”
नीचे कोई तारीख नहीं थी।
कोई केस नंबर भी नहीं।
बस एक लाल रंग की हथेली का निशान बना था।
अनिरुद्ध मुस्कराया।
“लोग भी अजीब-अजीब ड्रामे करते हैं।”
उसने दस्ताने पहने और ताला तोड़ दिया।
अंदर केवल एक कैमरा, कुछ नेगेटिव फिल्में और एक मोटी डायरी रखी थी।
कैमरा लगभग तीस साल पुराना था।
डायरी के पहले पन्ने पर लिखा था—
“अगर यह डायरी तुम्हारे हाथ में है… तो कैमरे की आखिरी फिल्म कभी मत देखना।”
अनिरुद्ध ने हंसते हुए पन्ना पलट दिया।
डायरी किसी फोटोग्राफर की थी।
उसका नाम था शेखर अवस्थी।
वह भी पुलिस विभाग में फॉरेंसिक फोटोग्राफर था।
डायरी में सामान्य केसों का जिक्र था।
फिर अचानक लिखावट बदल गई।
स्याही जगह-जगह फैली हुई थी।
“आज पहली बार ऐसा शव मिला जिसकी तस्वीर हर बार अलग आ रही है।”
अनिरुद्ध की भौंहें सिकुड़ गईं।
अगले पन्ने पर लिखा था—
“मैंने पांच फोटो लिए… लेकिन प्रिंट में शव हर तस्वीर में अलग जगह खड़ा दिखाई दिया।”
“सभी लोग कह रहे हैं कि मैं पागल हो रहा हूं।”
अनिरुद्ध ने इसे मजाक समझा।
उसने कैमरे की फिल्म निकाली।
सोचा कि इसे लैब में डेवलप करवा लेता हूं।
शाम तक तस्वीरें तैयार हो गईं।
पहली फोटो…
एक पोस्टमार्टम टेबल।
दूसरी…
वही टेबल।
तीसरी…
टेबल खाली।
चौथी…
टेबल के पीछे कोई आदमी खड़ा था।
उसका चेहरा पूरी तरह धुंधला था।
अनिरुद्ध ने सोचा शायद डबल एक्सपोजर होगा।
लेकिन पांचवीं फोटो देखते ही उसका गला सूख गया।
अब वही आदमी कैमरे के बिल्कुल पास आ चुका था।
उसकी आंखें दिखाई नहीं दे रही थीं।
केवल काला खालीपन था।
अनिरुद्ध ने सारी तस्वीरें वापस लिफाफे में रख दीं।
उसी समय उसके मोबाइल पर नोटिफिकेशन आया।
“नई फोटो सेव हुई।”
वह चौंक गया।
उसने तो मोबाइल से कोई तस्वीर खींची ही नहीं थी।
गैलरी खोली।
एक नई तस्वीर मौजूद थी।
तस्वीर उसी लैब की थी…
जहां वह अभी बैठा था।
लेकिन तस्वीर में वह खुद अपनी कुर्सी पर बैठा दिखाई दे रहा था।
और उसके पीछे…
वही धुंधला आदमी खड़ा था।
अनिरुद्ध तुरंत पीछे मुड़ा।
वहां कोई नहीं था।
उसने खुद को समझाया—
“कोई एडिटिंग होगी।”
उसने तस्वीर डिलीट कर दी।
दो मिनट बाद…
वही तस्वीर वापस आ गई।
इस बार आदमी थोड़ा और करीब था।
अब उसका हाथ अनिरुद्ध के कंधे पर रखा हुआ था।
अनिरुद्ध की सांसें तेज हो गईं।
उसने मोबाइल बंद कर दिया।
घर पहुंचते-पहुंचते वह बात भूलने की कोशिश करने लगा।
लेकिन घर का दरवाजा खोलते ही उसे कुछ अजीब महसूस हुआ।
कमरे की सभी दीवारों पर लगी उसकी पुरानी तस्वीरें तिरछी हो चुकी थीं।
जैसे किसी ने एक-एक फ्रेम को छूकर घुमाया हो।
उसने पहली तस्वीर सीधी की।
पीछे लिखा था—
“अब मेरी बारी खत्म… तुम्हारी शुरू।”
उसने घबराकर दूसरी तस्वीर उतारी।
पीछे भी वही लाइन।
तीसरी।
चौथी।
हर फ्रेम के पीछे वही वाक्य लिखा था।
उसने कभी ऐसा नहीं लिखा था।
उस रात उसे नींद नहीं आई।
सुबह आंख खुली तो बिस्तर के पास कैमरा रखा था।
वही पुराना कैमरा।
जिसे उसने अस्पताल में छोड़ दिया था।
उसने अस्पताल फोन किया।
प्रभारी बोला—
“सर… कैमरा तो यहीं रखा है।”
अनिरुद्ध ने नीचे देखा।
कैमरा गायब था।
उसे लगा शायद वह भ्रम देख रहा है।
लेकिन उसी समय उसके लैपटॉप में अपने-आप एक फोल्डर बन गया।
नाम था—
FINAL FRAME
उसने खोला।
अंदर केवल एक फोटो थी।
उसकी।
लेकिन फोटो आज की नहीं थी।
तस्वीर में वह लगभग साठ साल का बूढ़ा दिखाई दे रहा था।
आंखों के नीचे गहरे काले घेरे।
सफेद बाल।
डर से भरा चेहरा।
पीछे वही धुंधला आदमी।
फोटो के नीचे तारीख लिखी थी।
आज से ठीक तीस साल बाद।
अनिरुद्ध ने तुरंत पूरा फोल्डर डिलीट कर दिया।
कुछ नहीं हुआ।
फोल्डर फिर वापस आ गया।
इस बार उसमें दो तस्वीरें थीं।
दूसरी तस्वीर…
खाली कुर्सी।
और कुर्सी के पीछे दीवार पर टंगी उसकी तस्वीर।
जिस पर काली पट्टी लगी हुई थी।
अब वह डर चुका था।
उसने डायरी फिर पढ़नी शुरू की।
आखिरी पन्ने पर लिखा था—
“अगर तुमने आखिरी फिल्म देख ली है… तो वह तुम्हारी तस्वीरें बनाना शुरू कर देगा।”
“हर दिन एक नई तस्वीर आएगी।”
“आखिरी तस्वीर जिस दिन पूरी होगी… उस दिन कोई तुम्हें जीवित नहीं देख पाएगा।”
नीचे लिखा था—
“मैंने कैमरा जला दिया… लेकिन वह फिर वापस आ गया।”
“मैंने नदी में फेंका… फिर भी वापस आ गया।”
“अब शायद अगला फोटोग्राफर ही इसे रोकेगा…”
डायरी यहीं खत्म हो गई।
अनिरुद्ध ने पुलिस रिकॉर्ड निकलवाए।
उसे पता चला…
शेखर अवस्थी कभी मिला ही नहीं।
उसकी लाश भी नहीं मिली।
केवल कैमरा मिला था।
उसी कैमरे के साथ यह डायरी बंद कर दी गई थी।
अनिरुद्ध ने तय किया कि कैमरे को हमेशा के लिए खत्म करेगा।
वह उसे लेकर एक स्टील फैक्ट्री पहुंचा।
हजारों डिग्री तापमान वाली भट्टी में कैमरा फेंक दिया।
कुछ सेकंड बाद कैमरा पिघल गया।
अनिरुद्ध ने राहत की सांस ली।
पीछे से किसी कर्मचारी ने आवाज दी—
“सर… आपका कैमरा नीचे गिर गया।”
अनिरुद्ध पलटा।
वही पुराना कैमरा उसके पैरों के पास रखा था।
बिल्कुल ठंडा।
जैसे कभी आग में गया ही न हो।
उसने उसे हाथ भी नहीं लगाया।
भागकर कार में बैठ गया।
घर पहुंचा।
दरवाजा खोला।
दीवार पर एक नई तस्वीर टंगी थी।
इस बार तस्वीर में वह नहीं था।
उसकी जगह…
आप बैठे हुए थे।
हाथ में यही कहानी थी।
और आपके पीछे…
कोई खड़ा था।
चेहरा दिखाई नहीं दे रहा था।
सिर्फ दो काली आंखें…
जो इस समय भी आपकी तरफ देख रही हैं।
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