BY SCARY CROCODILE TEAM
महाराष्ट्र के पहाड़ों के बीच बसा एक छोटा सा गांव था — सोनवाड़ी। दिन में यह गांव बाकी गांवों जैसा ही दिखता था। खेतों में लोग काम करते, बच्चे स्कूल से लौटते समय धूल उड़ाते हुए गलियों से भागते, और चाय की दुकान पर बैठे बुजुर्ग हर आने-जाने वाले को पहचान लेते थे।
लेकिन सोनवाड़ी की असली शक्ल दिन में नहीं दिखती थी।

वह सिर्फ अमावस्या की रात सामने आती थी।
उस रात सूरज ढलने से पहले ही गांव बदलने लगता था। दुकानें जल्दी बंद हो जातीं। औरतें बच्चों को आवाज देकर घरों में बुला लेतीं। बुजुर्ग आंगन में रखी चारपाइयां अंदर खींच लेते। दरवाजों पर सिर्फ कुंडी नहीं लगती थी, बल्कि ऊपर से लकड़ी का पट्टा भी अटका दिया जाता था। Amavasya Horror Story
गांव के बाहर एक पुराना श्मशान था।
कई साल पहले उसका इस्तेमाल बंद हो चुका था, लेकिन गांव वालों के मन से उसका डर कभी नहीं गया। लोग कहते थे कि अमावस्या की रात वहां एक मशाल दिखाई देती है।
काली मशाल।
उसकी लौ पीली या लाल नहीं दिखती थी। वह अजीब तरह से धुंधली, काली और भारी लगती थी, जैसे आग नहीं, जली हुई राख जल रही हो।
सबसे डरावनी बात यह थी कि उस मशाल को पकड़ने वाला कोई दिखाई नहीं देता था।
और जिसने भी उसके बारे में ज्यादा जानने की कोशिश की, वह या तो गांव छोड़कर चला गया, या फिर कुछ ही दिनों में गायब हो गया।
मैं, मेरा दोस्त करण और हमारा कैमरा मैन रोहित उस समय horror exploration videos बनाते थे। हमारा छोटा YouTube channel था। बहुत बड़ा नहीं, लेकिन इतना जरूर कि किसी डरावनी जगह का नाम सुनते ही रोहित की आंखों में चमक आ जाती थी।
सोनवाड़ी की कहानी हमें एक पुराने blog comment से मिली थी। किसी ने लिखा था—
“Amavasya night, Sonwadi cremation ground, black torch. Don’t go alone.”
रोहित ने comment पढ़ते ही कहा, “भाई, ये वीडियो viral जाएगा।”
करण हमेशा की तरह हंसा।
“गांव वाले हर चीज को भूत बना देते हैं। कोई drunk आदमी होगा, मशाल लेकर घूमता होगा।”
मुझे भी शुरुआत में ऐसा ही लगा था। लेकिन जब हम सोनवाड़ी पहुंचे, तब पहली बार लगा कि शायद कहानी इतनी साधारण नहीं है।
गांव के बाहर हमें एक चाय की छोटी दुकान मिली। हमने वहीं रुककर लोगों से बात करने की कोशिश की। जैसे ही हमने श्मशान और काली मशाल का नाम लिया, दुकान पर बैठे लोग चुप हो गए।
एक बुजुर्ग ने हमारी तरफ देखा और कहा, “रात को उधर मत जाना।”
रोहित ने कैमरा नीचे कर दिया।
“काका, हम बस recording करेंगे। किसी चीज को छेड़ेंगे नहीं।”
बुजुर्ग ने गर्दन हिलाई।
“वो चीज छेड़ने से नहीं आती। देखने से आती है।”
करण ने हल्के मजाक में कहा, “अगर भूत होगा तो camera में capture हो जाएगा।”
बुजुर्ग ने उसकी बात सुनकर कोई जवाब नहीं दिया। बस कुछ देर बाद धीमी आवाज में बोला—
“कैमरा जो दिखाता है, उससे ज्यादा छुपाता है।”
उसकी बात सुनकर मेरे अंदर हल्की बेचैनी हुई, लेकिन रोहित पहले से ज्यादा excited हो चुका था।
रात करीब ग्यारह बजे हम तीनों टॉर्च, कैमरा और extra batteries लेकर निकले। गांव की आखिरी गली पार करते ही घरों की रोशनी पीछे छूट गई। आगे सिर्फ कच्चा रास्ता था, दोनों तरफ सूखे पेड़ और बीच-बीच में झाड़ियां।
सन्नाटा ऐसा था कि कदमों के नीचे टूटती सूखी टहनियों की आवाज भी बहुत तेज लग रही थी।
रोहित कैमरा चलाते हुए धीरे-धीरे बोल रहा था, “हम अभी सोनवाड़ी गांव के बाहर हैं। कहा जाता है कि इस रास्ते के अंत में एक haunted cremation ground है, जहां अमावस्या की रात काली मशाल दिखाई देती है…”
मैंने उसे धीरे बोलने को कहा।
पता नहीं क्यों, मुझे लग रहा था कि हमारी आवाज इस जगह पर जरूरत से ज्यादा दूर तक जा रही है।
कुछ दूर चलने के बाद हवा ठंडी होने लगी। अजीब बात यह थी कि गांव में मौसम सामान्य था, लेकिन श्मशान वाले रास्ते पर ठंड अलग थी। जैसे हवा जंगल से नहीं, किसी बंद जगह से आ रही हो।
तभी रोहित रुक गया।
“सुनो।”
हम भी रुक गए।
दूर से घंटी जैसी आवाज आ रही थी।
टन… टन… टन…
आवाज बहुत धीमी थी, लेकिन साफ थी। जैसे कोई छोटी घंटी हवा में खुद-ब-खुद हिल रही हो।
करण ने आसपास देखा।
“यहां कोई मंदिर है?”
मैंने सिर हिलाया। गांव वालों ने रास्ते में किसी मंदिर का जिक्र नहीं किया था।
कुछ सेकंड बाद घंटी बंद हो गई।
और उसी खामोशी में हमें पहली बार वह रोशनी दिखाई दी।
दूर पेड़ों के बीच एक छोटी सी लौ जल रही थी।
पहले लगा कोई आदमी होगा।
लेकिन जब हमने ध्यान से देखा, तो उसके नीचे कोई शरीर नहीं था।
मशाल हवा में नहीं उड़ रही थी, लेकिन जमीन पर भी नहीं थी। वह एक अजीब ऊंचाई पर स्थिर थी, जैसे कोई अदृश्य हाथ उसे पकड़े खड़ा हो।
रोहित ने तुरंत कैमरा zoom किया।
“मिल गई… यही है…”
उसकी आवाज में डर कम और excitement ज्यादा था।
मुझे यह बात अच्छी नहीं लगी।
काली मशाल धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगी।
हम रुके रहे।
Amavasya Horror Story
लेकिन फिर पता नहीं क्यों, हमारे कदम खुद-ब-खुद उसके पीछे चल पड़े। ऐसा नहीं था कि कोई हमें खींच रहा था। बस मन में एक अजीब जिज्ञासा उठ रही थी — देखना है कि यह जाती कहां है।
रास्ता हमें पुराने श्मशान तक ले आया।
वह जगह उम्मीद से ज्यादा बड़ी थी। टूटी हुई पत्थर की समाधियां, जली हुई लकड़ियों के पुराने निशान, राख से ढकी जमीन और कुछ पेड़ जिनकी टेढ़ी शाखाएं अंधेरे में हाथों जैसी लग रही थीं।
मशाल श्मशान के बीच जाकर रुक गई।
रोहित धीरे-धीरे आगे बढ़ा।
“इतना cinematic shot है भाई…”
मैंने उसका हाथ पकड़कर रोका।
“ज्यादा पास मत जा।”
वह मेरी बात सुनता, उससे पहले कैमरे की screen अचानक झिलमिलाने लगी।
रोहित ने camera नीचे किया, फिर दोबारा screen देखी।
उसका चेहरा बदल गया।
“ये क्या है?”
मैं और करण उसके पास गए।
Camera screen पर वही मशाल दिख रही थी, लेकिन उसके पीछे कुछ और भी था।
एक चेहरा।
जला हुआ।
राख से ढका।
आंखों की जगह सफेदी नहीं, बल्कि खालीपन था। जैसे आंखें कभी थीं ही नहीं।
मैंने तुरंत असली दिशा में देखा।
वहां कोई चेहरा नहीं था।
सिर्फ मशाल थी।
करण पहली बार चुप हुआ।
तभी हमारे पीछे से आवाज आई—
“वापस चले जाओ।”
हम तीनों एक साथ पलटे।
अंधेरे में एक बूढ़ी औरत खड़ी थी। उसके हाथ में पुरानी लालटेन थी, जिसकी रोशनी बहुत कमजोर थी। उसका चेहरा झुर्रियों से भरा था, लेकिन आंखें साफ थीं। उनमें डर भी था और गुस्सा भी।
मैंने पूछा, “आप यहां क्या कर रही हैं?”
वह बोली, “तुम्हें रोकने आई हूं।”
रोहित ने camera उसकी तरफ घुमाया।
बुढ़िया ने तेज आवाज में कहा, “इसे बंद करो।”
उसकी आवाज ऐसी थी कि रोहित ने बिना बहस camera नीचे कर दिया।
करण ने कहा, “हमें गांव वालों ने डराने के लिए भेजा है क्या?”
बुढ़िया ने करण की तरफ देखा।
“डराना होता तो गांव में रोक लेते। यहां तो बचाने आई हूं।”
उसने मशाल की तरफ इशारा किया।
“यह मशाल रास्ता नहीं दिखाती। यह आदमी चुनती है।”
मैंने पूछा, “किसलिए?”
बुढ़िया की नजर रोहित पर टिक गई।
“नया रखवाला बनाने के लिए।”
उसने बताया कि बहुत साल पहले इस श्मशान में लगातार अजीब घटनाएं होने लगी थीं। अंतिम संस्कार के बाद राख बिखर जाती थी। रात में चिताओं की जगह से आवाजें आती थीं। गांव वालों को लगता था कि मृत आत्माएं शांत नहीं हो रहीं।
तब किसी तांत्रिक को बुलाया गया। उसने श्मशान के बीच एक समाधि बनवाई और कहा कि यहां की आत्माओं को बांध दिया गया है, लेकिन बंधन कायम रखने के लिए हर कुछ वर्षों में एक जीवित रखवाला चाहिए होगा।
पहला रखवाला कौन बना, यह किसी को पता नहीं चला।
लेकिन उसके बाद से हर दस साल में अमावस्या की रात कोई न कोई गायब होता रहा।
मैंने पूछा, “अगर यह सच है तो गांव वालों ने यह जगह तोड़ी क्यों नहीं?”
बुढ़िया बोली, “क्योंकि डर सिर्फ मरने वालों से नहीं था। डर इस बात का था कि अगर बंधन टूटा तो जो अंदर है, वह बाहर आ जाएगा।”
तभी रोहित ने बहुत धीमी आवाज में कहा—
“वो मुझे बुला रही है।”
मैंने उसकी तरफ देखा।
उसकी आंखें मशाल पर टिकी थीं।
“कौन?”
उसने जवाब नहीं दिया।
उसका चेहरा खाली हो गया था। जैसे वह हमारी आवाज सुन तो रहा है, लेकिन समझ नहीं पा रहा।
“रोहित!” करण ने उसका कंधा पकड़ा।
रोहित ने करण का हाथ झटक दिया और मशाल की तरफ बढ़ने लगा।
हम दोनों उसके पीछे भागे, लेकिन श्मशान की जमीन अचानक भारी लगने लगी। हर कदम ऐसा लग रहा था जैसे कीचड़ में धंस रहा हो, जबकि जमीन सूखी थी।
मशाल के पीछे अंधेरे में दूसरी रोशनी जली।
फिर तीसरी।
फिर चौथी।
कुछ ही पलों में पूरा जंगल छोटी-छोटी काली लपटों से भर गया।
उन मशालों के बीच आकृतियां दिखाई देने लगीं।
वे साफ नहीं थीं। बस धुएं और राख से बनी परछाइयां जैसी। कुछ खड़ी थीं, कुछ झुकी हुई, कुछ पेड़ों के पीछे आधी छुपी हुई।
उनमें से किसी ने हमारे पास आकर हमला नहीं किया।
लेकिन उनका खामोश खड़ा रहना ही ज्यादा डरावना था।
फिर आवाजें उठीं।
धीमी, टूटी हुई, अलग-अलग दिशाओं से आती हुई—
“नया रखवाला…”
“नया रखवाला…”
“नया रखवाला…”
रोहित अब मशाल के बिल्कुल पास था।
उसने अपना camera उठाया और हमारी तरफ घुमा दिया।
Camera की screen देखकर मेरे पैर जम गए।
Screen पर मैं और करण दिख रहे थे।
लेकिन हमारे पीछे दो जली हुई आकृतियां खड़ी थीं।
वे असली आंखों से दिखाई नहीं दे रही थीं।
सिर्फ camera में।
करण ने screen देखी और उसकी आवाज टूट गई।
“भाग…”
हम पीछे हटे ही थे कि जमीन के नीचे से काले हाथ बाहर आए। वे हाथ इंसानी जैसे थे, लेकिन बहुत पतले और राख से ढके हुए।
उन्होंने रोहित के पैरों को पकड़ लिया।
रोहित पहली बार होश में आया।
“मुझे बचाओ!”
उसकी चीख ने मेरी हिम्मत वापस ला दी।
मैं उसकी तरफ दौड़ा और उसका हाथ पकड़ लिया। उसका शरीर बर्फ जैसा ठंडा था। करण ने भी उसे खींचने की कोशिश की, लेकिन नीचे से पकड़ इतनी मजबूत थी कि रोहित एक इंच भी नहीं हिला।
बुढ़िया दूर से चिल्लाई—
“बीच वाली समाधि तोड़ो!”
मैंने उसकी तरफ देखा।
“क्या?”
“वही बंधन है! उसे तोड़ो, वरना यह चला जाएगा!”
श्मशान के बीच एक पुरानी पत्थर की समाधि थी। पहले हमने उस पर ध्यान नहीं दिया था। वह बाकी समाधियों से बड़ी थी और उस पर राख से कुछ लिखा था।
मैं और करण वहां भागे।
लिखा था—
“रखवाला कभी नहीं मरता।”
करण ने पास पड़ा बड़ा पत्थर उठाया और पूरी ताकत से समाधि पर मारा।
धड़ाम!
पत्थर में दरार आई।
पीछे रोहित चीख रहा था।
मशालों की लपटें तेज होने लगीं।
काली आकृतियां हमारी तरफ मुड़ गईं।
करण ने दूसरा वार किया।
दरार गहरी हो गई।
मैंने भी एक पत्थर उठाया और उसके साथ मारना शुरू कर दिया।
तीसरे वार पर समाधि का ऊपरी हिस्सा टूट गया।
उसी पल श्मशान के अंदर से ऐसी चीख उठी जैसे कई लोग एक साथ दर्द में चिल्ला रहे हों।
हवा में राख भर गई।
मशालें बेकाबू होकर जलने लगीं।
रोहित के पैरों को पकड़े हाथ धीरे-धीरे कमजोर पड़ने लगे।
लेकिन उसी समय मुख्य काली मशाल हवा में ऊपर उठी।
उसकी लौ के अंदर वही जला हुआ चेहरा दिखाई दिया।
इस बार वह camera में नहीं, हमारी आंखों के सामने था।
चेहरा गुस्से से कांप रहा था।
उसकी आवाज पूरे श्मशान में गूंजी—
“बंधन तोड़ा है… कीमत दोगे…”
अगले ही पल जोरदार धमाका हुआ।
हवा ने हमें जमीन पर गिरा दिया।
काली मशाल की लौ कई हिस्सों में टूटकर चारों तरफ फैल गई। पेड़ों के पीछे खड़ी आकृतियां एक-एक करके धुएं में बदलने लगीं।
मैंने रोहित को उठाया।
वह बेहोश था, लेकिन जिंदा था।
करण ने camera उठाया और हम तीनों किसी तरह गांव की तरफ भागे।
पीछे से घंटियों की आवाज फिर आने लगी।
लेकिन इस बार वह पास नहीं आ रही थी।
दूर जा रही थी।
गांव पहुंचते ही कुछ घरों के दरवाजे खुले। शायद लोगों को पहले से अंदाजा था कि हम वापस आएंगे या नहीं।
वही बुजुर्ग चाय वाला बाहर खड़ा था।
उसने रोहित को देखा, फिर हमारी तरफ।
“तुमने समाधि तोड़ दी?”
मैंने कुछ नहीं कहा।
उसके चेहरे पर डर और राहत दोनों थे।
रोहित कई दिनों तक बोल नहीं पाया। डॉक्टरों ने कहा कि वह shock में है। उसके बालों में सफेदी आ गई थी। उसकी आंखों के नीचे गहरे काले घेरे बन गए थे।
हमने उस रात की recording देखनी चाही।
Video में रास्ता दिख रहा था।
हमारी बातें सुनाई दे रही थीं।
घंटी की आवाज भी थी।
लेकिन जहां काली मशाल थी, वहां सिर्फ अंधेरा था।
जहां आकृतियां थीं, वहां सिर्फ पेड़ थे।
और जिस पल रोहित चीखा था, वहां video कुछ सेकंड के लिए black हो गया था।
हमने वह video कभी upload नहीं किया।
उस घटना के बाद हमने horror exploration बंद कर दिया।
करण ने इस बारे में बात करना छोड़ दिया।
रोहित धीरे-धीरे सामान्य दिखने लगा, लेकिन अमावस्या की रात वह कभी अकेला नहीं सोता।
सबसे अजीब बात कुछ महीनों बाद शुरू हुई।
रोहित का वही camera, जो उस रात हमारे साथ था, अपने आप चालू होने लगा।
पहली बार हमने सोचा battery issue होगा।
लेकिन एक रात battery निकालकर भी camera की screen जल उठी।
Screen पर सिर्फ अंधेरा था।
फिर उस अंधेरे में एक छोटी सी लौ दिखाई दी।
काली मशाल।
वह बहुत दूर थी।
अगले महीने वह थोड़ी पास दिखी।
फिर अगले महीने और पास।
आज उस घटना को कई साल हो चुके हैं।
हम सोनवाड़ी कभी वापस नहीं गए।
लेकिन हर अमावस्या की रात रोहित मुझे phone करता है।
कुछ नहीं बोलता।
सिर्फ camera की screen दिखाता है।
और हर बार वह काली मशाल पहले से ज्यादा करीब होती है।
पिछली अमावस्या को पहली बार screen पर सिर्फ मशाल नहीं दिखी।
उसके पीछे एक चेहरा भी था।
जला हुआ।
राख से ढका।
और इस बार वह चेहरा रोहित जैसा लग रहा था।