कहानी 1: बारिश वाली रात की आखिरी कैब
दिल्ली में उस रात बारिश अचानक शुरू हुई थी। दिनभर उमस थी, हवा बिल्कुल बंद थी, लेकिन रात करीब साढ़े ग्यारह बजे जैसे ही बादल फटे, पूरा शहर पानी में डूबने लगा। सड़कों पर गाड़ियां धीमी हो गईं, मेट्रो स्टेशन के बाहर भीड़ जमा हो गई और ऑफिस से देर से निकलने वाले लोग किसी भी तरह घर पहुंचना चाहते थे। नेहा भी उन्हीं लोगों में थी। वह गुरुग्राम के एक कॉर्पोरेट ऑफिस में काम करती थी और उस दिन क्लाइंट कॉल की वजह से उसे काफी देर हो गई थी। जब वह बिल्डिंग से बाहर निकली, तो सामने सड़क पर सिर्फ पानी, हॉर्न और हेडलाइट्स की चमक दिखाई दे रही थी। Baarish Horror Stories in Hindi

उसने कई बार कैब बुक करने की कोशिश की, लेकिन हर बार ड्राइवर कैंसल कर देता। करीब पंद्रह मिनट बाद एक कैब कन्फर्म हुई। ड्राइवर का नाम स्क्रीन पर “सुरेश” दिख रहा था। गाड़ी पांच मिनट दूर थी। नेहा जल्दी से बिल्डिंग के गेट के नीचे खड़ी हो गई। बारिश इतनी तेज थी कि सामने की सड़क भी धुंधली दिख रही थी। कुछ देर बाद एक सफेद सेडान धीरे-धीरे गेट के सामने आकर रुकी। नंबर प्लेट ऐप में दिख रहे नंबर जैसी ही थी। नेहा ने दरवाजा खोला और पीछे वाली सीट पर बैठ गई।
गाड़ी के अंदर अजीब-सी ठंडक थी। एसी बंद था, फिर भी हवा ठंडी लग रही थी। ड्राइवर ने बिना पीछे देखे पूछा, “मैडम, द्वारका?” नेहा ने हां कहा। उसकी आवाज़ बहुत भारी और धीमी थी, जैसे किसी ने बहुत देर तक बोलना छोड़ दिया हो। गाड़ी धीरे-धीरे आगे बढ़ी। बाहर बारिश शीशे पर लगातार गिर रही थी। नेहा ने फोन देखा, लेकिन नेटवर्क कमजोर था। रास्ता देखने के लिए उसने मैप खोला, पर गाड़ी जिस रास्ते से जा रही थी, वह ऐप पर ठीक से नहीं दिख रहा था।
करीब दस मिनट बाद नेहा को एहसास हुआ कि सड़क बहुत सुनसान हो गई है। न ट्रैफिक, न दुकानें, न कोई पैदल आदमी। उसने थोड़ा घबराकर पूछा, “भैया, आप कौन-से रास्ते से जा रहे हो?” ड्राइवर ने जवाब दिया, “शॉर्टकट है मैडम, बारिश में मेन रोड बंद है।” नेहा चुप हो गई, लेकिन उसका डर बढ़ने लगा। उसने फिर फोन उठाया और अपनी दोस्त को कॉल करने की कोशिश की। कॉल नहीं लगी।
तभी गाड़ी के शीशे पर किसी ने बाहर से हाथ मारा। नेहा बुरी तरह चौंक गई। उसने बाहर देखा, लेकिन वहां कोई नहीं था। सिर्फ बारिश और अंधेरा। उसने ड्राइवर की तरफ देखा, पर उसने जैसे कुछ सुना ही नहीं। कुछ सेकंड बाद फिर वही आवाज आई—इस बार पीछे वाले शीशे पर। नेहा का गला सूख गया। उसने धीरे से कहा, “भैया, गाड़ी रोको।” ड्राइवर ने कोई जवाब नहीं दिया।
अब गाड़ी एक पुराने फ्लाईओवर के नीचे से गुजर रही थी। वहां पूरी तरह अंधेरा था। अचानक गाड़ी के अंदर से एक धीमी आवाज आई, “तुम देर से आई हो।” नेहा ने डरकर चारों तरफ देखा। आवाज ड्राइवर की नहीं थी। वह पीछे वाली सीट से ही आई थी, जबकि वहां नेहा के अलावा कोई नहीं था। उसके हाथ कांपने लगे। उसने दरवाजा खोलने की कोशिश की, लेकिन लॉक बंद था।
उसी समय ड्राइवर ने पहली बार रियर व्यू मिरर में देखा। नेहा की सांस अटक गई। शीशे में ड्राइवर का चेहरा साफ नहीं दिख रहा था, बल्कि उसकी जगह एक धुंधला, पीला-सा चेहरा दिखाई दे रहा था, जिसकी आंखें बिल्कुल खाली थीं। नेहा जोर से चिल्लाई। तभी गाड़ी अचानक रुक गई। दरवाजे अपने आप खुल गए। नेहा बिना सोचे बाहर भागी। बारिश में भीगती हुई वह सड़क की तरफ दौड़ी। कुछ दूर जाकर उसने पीछे मुड़कर देखा—गाड़ी वहां नहीं थी।
किसी तरह वह मेन रोड तक पहुंची। वहां एक चाय की दुकान खुली थी। नेहा ने कांपते हुए दुकानदार से मदद मांगी। उसने जब कैब का नंबर बताया, तो दुकानदार का चेहरा उतर गया। उसने धीरे से कहा, “मैडम, इस नंबर की गाड़ी का एक्सीडेंट पिछले साल इसी बारिश वाली रात यहीं हुआ था। ड्राइवर और एक महिला पैसेंजर दोनों की मौत हो गई थी।”
नेहा ने तुरंत अपना फोन खोला। ऐप में राइड अभी भी चल रही थी। ड्राइवर की लोकेशन वहीं फ्लाईओवर के नीचे अटकी हुई थी। कुछ सेकंड बाद स्क्रीन पर मैसेज आया—“Trip Completed.”
उसके बाद नेहा ने कभी रात की बारिश में अकेले कैब नहीं ली। लेकिन सबसे डरावनी बात यह थी कि अगले साल उसी तारीख को, रात साढ़े ग्यारह बजे, उसके फोन पर उसी ड्राइवर की तरफ से नोटिफिकेशन आया—“Your driver Suresh is waiting outside.”
कहानी 2: बारिश में बंद पड़ा ऑफिस
मुंबई में मानसून के दिनों में देर रात ऑफिस में रुकना कोई नई बात नहीं थी। लेकिन उस रात का माहौल अलग था। अंधेरी ईस्ट के एक पुराने कमर्शियल बिल्डिंग में आदित्य अपनी टीम के साथ काम कर रहा था। बाकी लोग शाम सात बजे तक निकल चुके थे, लेकिन आदित्य को एक जरूरी प्रेजेंटेशन पूरा करना था। बाहर बारिश लगातार हो रही थी और बिल्डिंग के शीशों पर पानी की धारें ऐसे बह रही थीं जैसे किसी ने बाहर से पूरी इमारत धो दी हो।
रात करीब 10:45 बजे पूरे फ्लोर पर सिर्फ आदित्य था। सिक्योरिटी गार्ड नीचे बैठा था। ऑफिस की आधी लाइट्स बंद थीं और बाकी में हल्की सफेद रोशनी फैल रही थी। आदित्य ने कॉफी बनाई और अपनी सीट पर वापस आ गया। तभी उसे लगा कि कॉन्फ्रेंस रूम के अंदर कोई बैठा है। उसने शीशे के पार देखा, लेकिन अंदर अंधेरा था। उसे लगा शायद अपनी ही परछाई दिखी होगी।

कुछ देर बाद उसे कीबोर्ड की आवाज सुनाई दी। टक-टक-टक। आवाज उसके सामने वाली खाली सीट से आ रही थी। आदित्य ने सिर उठाया। कंप्यूटर बंद था, कुर्सी खाली थी। उसने खुद को समझाया कि शायद बारिश की आवाज है। लेकिन फिर मॉनिटर अपने आप ऑन हो गया। स्क्रीन पर सिर्फ एक लाइन टाइप थी—“इतनी देर तक मत रुको।”
आदित्य का दिल तेज धड़कने लगा। उसने तुरंत उठकर मॉनिटर बंद किया। तभी पीछे से प्रिंटर चलने की आवाज आई। वह धीरे-धीरे प्रिंटर के पास गया। मशीन से एक सफेद पेपर निकला। उस पर सिर्फ एक CCTV फुटेज जैसा ब्लैक-एंड-व्हाइट फोटो था। फोटो में वही ऑफिस दिख रहा था, वही रात, वही खाली फ्लोर। लेकिन आदित्य की सीट के पीछे एक औरत खड़ी थी। उसके बाल गीले थे और चेहरा नीचे झुका हुआ था।
आदित्य ने डरकर पीछे देखा। वहां कोई नहीं था।
उसने तुरंत अपना बैग उठाया और बाहर निकलने लगा। लिफ्ट के पास पहुंचकर उसने बटन दबाया। लिफ्ट ऊपर आ रही थी। 5… 6… 7… 8… फिर अचानक 13 पर रुक गई, जबकि बिल्डिंग में सिर्फ 12 फ्लोर थे। आदित्य ने स्क्रीन को घूरकर देखा। नंबर कुछ सेकंड तक 13 पर चमकता रहा, फिर लिफ्ट नीचे आने लगी। दरवाजा खुला। अंदर पानी भरा हुआ था। लिफ्ट की दीवारों से बारिश का पानी बह रहा था, जबकि वह पूरी तरह बंद जगह थी।
आदित्य पीछे हट गया। उसने सीढ़ियों से उतरने का फैसला किया। जैसे ही वह सीढ़ियों में पहुंचा, नीचे से किसी के कदमों की आवाज आने लगी। कोई धीरे-धीरे ऊपर आ रहा था। हर कदम के साथ पानी टपकने की आवाज आ रही थी। आदित्य वहीं रुक गया। उसने मोबाइल की फ्लैशलाइट ऑन की। सीढ़ियों के मोड़ पर एक गीला हाथ रेलिंग पकड़ते हुए दिखाई दिया। फिर लंबे गीले बाल।
आदित्य बिना कुछ सोचे वापस ऑफिस की तरफ भागा। दरवाजा बंद करने की कोशिश की, लेकिन दरवाजा अपने आप धीरे-धीरे खुल गया। अंदर सभी कंप्यूटर एक साथ ऑन हो चुके थे। हर स्क्रीन पर वही लाइन लिखी थी—“तुमने मुझे यहां अकेला छोड़ा था।”
आदित्य को अचानक याद आया कि उसके ऑफिस में एक साल पहले एक महिला कर्मचारी की मौत हुई थी। भारी बारिश की रात वह देर तक काम कर रही थी। बिल्डिंग में पानी भर गया था, बिजली चली गई थी और वह लिफ्ट में फंस गई थी। सुबह जब लिफ्ट खोली गई, तो वह मृत मिली। ऑफिस ने बात दबा दी थी। किसी ने उस घटना का जिक्र नए कर्मचारियों से नहीं किया।
तभी आदित्य के सामने रखी कुर्सी अपने आप घूमी। उस पर कोई नहीं था, लेकिन सीट पूरी तरह भीगी हुई थी। पानी फर्श पर फैलने लगा। आदित्य ने आंखें बंद कर लीं। उसे अपने कान के पास धीमी आवाज सुनाई दी—“आज तुम भी देर तक रुके हो।”
सुबह सिक्योरिटी गार्ड ने आदित्य को ऑफिस के बाहर बेहोश पाया। वह पूरी तरह भीगा हुआ था, जबकि ऑफिस के अंदर कहीं से पानी आने का कोई रास्ता नहीं था। जब CCTV चेक किया गया, तो रात 11:13 बजे के बाद फुटेज ब्लैक हो गई थी। सिर्फ आखिरी फ्रेम में आदित्य अपनी सीट पर बैठा दिखाई दे रहा था, और उसके पीछे वही गीली औरत खड़ी थी।
उस दिन के बाद कंपनी ने वह फ्लोर बंद कर दिया। लेकिन मानसून की रातों में नीचे वाले गार्ड आज भी कहते हैं कि 11:13 बजे 8वें फ्लोर की लाइट अपने आप जल जाती है, प्रिंटर चलने लगता है, और खाली ऑफिस से कीबोर्ड की आवाज आती है।