Bhootiya Kitab | शापित किताब का रहस्य | Part 1

WRITER – DEVGAN KADALI

मैं मुंबई में रहता था। मेरे दादाजी ने कोंकण में एक छोटा-सा घर और जमीन खरीदी थी। मेरे माता-पिता नहीं हैं। मेरी एक गर्लफ्रेंड है, और आने वाली गर्मियों में हम शादी करने वाले हैं।

Bhutiya Kitab

Bhootiya Kitab लेकिन मेरी समस्या यह नहीं है। दादाजी एक लेखक थे। वे बहुत अच्छा लिखते थे और किताबें पढ़ने के बेहद शौकीन थे। शहर की भीड़भाड़ से दूर, किसी शांत जगह पर लिखने और पढ़ने के लिए उन्होंने वह घर खरीदा था।

मेरा आखिरी साल खत्म होने ही वाला था। दादाजी मुझे अक्सर पत्र भेजते थे। एक बार उन्होंने एक अजीब-सा पत्र भेजा। उनकी लिखावट भी थोड़ी बिगड़ी हुई थी। उसमें लिखा था—

“घर में कोई है… मुझे डर लग रहा है… तू कब आएगा?”

दादाजी मेरे लिए और मैं उनके लिए सहारा था। कुछ दिन बीत गए। फिर खबर मिली कि उनकी मौत हो गई है। मेरी परीक्षाएँ भी खत्म हो चुकी थीं, इसलिए मैं सीधे कोंकण चला गया।

वहाँ जाकर मुझे पता चला कि दादाजी की मौत सामान्य नहीं थी। उनकी छाती फटी हुई थी… और दिल गायब था। शरीर पर कई घाव थे।

मुझे नहीं पता कि आप मेरी बातों पर विश्वास करेंगे या नहीं… सब कुछ बहुत अजीब है… मैं आपको कैसे बताऊँ?”

विवेक ने अपनी उंगलियाँ मसलते हुए सिर झुका लिया। उसकी आँखों में आँसू भर आए थे।

“सब ठीक होगा। बता, क्या कहना चाहता है? आगे मैं संभाल लूँगा,” रुद्र ने उसके कंधे पर हाथ रखते हुए कहा।

विवेक बोलने लगा—

“दादाजी की मौत के समय मैं वहाँ गया…”


आग की लपटें “कड़… कड़…” की आवाज़ के साथ उठ रही थीं। विवेक की आँखों से आँसू बह रहे थे, जबकि वह अपने दादाजी को जलते हुए देख रहा था।

भारी कदमों से वह घर के अंदर गया। अंदर एक औरत पहले से बैठी थी। उसकी आँखें भी भरी हुई थीं।

Bhutiya Kitab

विवेक जाकर एक खंभे से टिककर बैठ गया।

“मालिक, सब ठीक हो जाएगा। मैंने उन्हें कहा था उस कमरे में मत जाइए… लेकिन उन्होंने मेरी बात नहीं मानी,” वह औरत बोली।

“काकू… माफ़ कीजिए, लेकिन आपने क्या कहा?” विवेक ने चौंककर पूछा।

“तू शहर का लड़का है… तू विश्वास नहीं करेगा। लेकिन तुझे भी कहती हूँ—उस बंद कमरे में मत जाना।”

इतना कहकर वसंती उठी और रसोई में चली गई।

विवेक की नज़र सीढ़ियों पर टिक गई। ऊपर जाने का रास्ता खुला था। वह ऊपर चढ़ा और दादाजी के कमरे में पहुँचा। मेज पर किताबें करीने से रखी थीं। खिड़की से लाल डूबता सूरज दिखाई दे रहा था।

“मालिक, खाना खा लीजिए… रात होने से पहले मुझे गाँव लौटना है,” पीछे से वसंती की आवाज़ आई।


रात की चाँदनी खिड़की से भीतर आ रही थी। सामने की अलमारी से विवेक ने एक किताब निकाली। वह दादाजी की पसंदीदा किताब थी।

उसमें एक बूढ़ा आदमी जंगल के एक भूतिया घर में फँस जाता है। फिर अपनी हिम्मत और बुद्धि से वह वहाँ की बुरी शक्तियों का सामना करता है और सुरक्षित बाहर निकल आता है।

उसे पढ़ते-पढ़ते विवेक को दादाजी की बात याद आई—

“ज़िंदगी बहुत उबाऊ हो गई है। तेरी दादी भी मुझे छोड़ गई… तेरे माँ-बाप भी चले गए… मुझे भी इस किताब के चंद्रकांत जैसा कोई रोमांच चाहिए। फिर तू कहेगा—तेरा दादा बड़ा बहादुर था।”

टक… टक… टक…

दरवाज़े पर तीन बार किसी ने दस्तक दी।

विवेक चौंक गया।

उसने पीछे मुड़कर देखा। दरवाज़ा बंद था।

फिर भी बाहर किसी की साँसों की आवाज़ आ रही थी…

उसकी नज़र नीचे गई।

दरवाज़े की दरार में कोई परछाई हिल रही थी।

विवेक का दिल ज़ोरों से धड़कने लगा…

विवेक उठ खड़ा हुआ। उसने सामने रखा लकड़ी का डंडा उठा लिया और धीरे-धीरे दरवाज़े की ओर बढ़ने लगा। उसे लगा शायद कोई चोर होगा। परछाई अभी भी वहीं थी।

उसने काँपते हाथों से कुंडी पकड़ी और झटके से दरवाज़ा खोल दिया।

लेकिन सामने जो था, उसे देखकर उसकी आँखें फैल गईं।

वहाँ कोई नहीं था।

चारों तरफ सन्नाटा…

सिर्फ झींगुरों की आवाज़ और हवा की सरसराहट।

उसने घबराई नज़रों से इधर-उधर देखा। तभी उसकी नज़र एक काले हिस्से पर जाकर टिक गई।

वहाँ अंधेरे में जैसे कोई दरवाज़ा छिपा हुआ था।

वह धीरे-धीरे आगे बढ़ा। अब उसे साफ दिखाई दिया—काले रंग का नक्काशीदार ऊँचा दरवाज़ा।

उसी समय वसंती की बात उसके दिमाग में गूँजी—

“उस कमरे की तरफ मत जाना… वो जगह ठीक नहीं है…”

विवेक रुक गया।

“नहीं… नहीं जाना चाहिए…”

वह पीछे मुड़ने लगा, लेकिन अगले ही पल ठिठक गया।

“उस कमरे में ऐसा क्या है? दादाजी की मौत क्यों हुई?”

सवाल उसके दिमाग में घूमने लगे।

आखिरकार वह फिर मुड़ा और धीरे-धीरे उस दरवाज़े के पास पहुँचा। बाहर सिर्फ कुंडी लगी थी, ताला नहीं।

उसने कुंडी पकड़ी।

चर्रर्र…

उसी क्षण पूरे घर की लाइटें टिमटिमाने लगीं।

उसने दरवाज़ा धक्का देकर खोला।

खट्…

और उसी समय बिजली चली गई।

विवेक का दिल जोर से धड़क उठा।

उसे लगा जैसे अंधेरे से कोई उसे देख रहा हो।

उसने तुरंत मोबाइल निकाला और फ्लैश ऑन की।

कमज़ोर रोशनी में कमरा धीरे-धीरे दिखाई देने लगा।

हवा में धूल उड़ रही थी। कमरे में सड़ी हुई बदबू फैली थी।

फिर उसकी नज़र सामने गई…

और वह दंग रह गया।

कमरा बहुत बड़ा था।

अंदर एक विशाल पलंग था। बगल में आरामकुर्सी रखी थी, जिस पर धूल जमी हुई थी। दीवार के पास अलमारी थी जिसमें किताबें रखी थीं। सामने लकड़ी की मेज़ थी और उस पर एक अजीब-सी पेटी रखी थी।

विवेक धीरे-धीरे उसके पास गया।

जैसे ही उसने पेटी को छुआ, उसके शरीर में अजीब-सी सिहरन दौड़ गई।

उसने तुरंत पेटी खोली।

अंदर से सड़ी हुई बदबू निकली।

उसमें एक डायरी रखी थी।

“इसमें क्या है? इसे पेटी में क्यों रखा है?”

वह बुदबुदाया और डायरी हाथ में उठा ली।

खड़ाक्!

अचानक पास रखा ग्लास गिरकर टूट गया।

विवेक डरकर उछल पड़ा।

उसने डायरी उठाई और भागकर अपने कमरे में आ गया।

धड़ाम!

उसने दरवाज़ा बंद कर लिया।


“रात कैसी बीती?” अगले दिन नाश्ता परोसते हुए वसंती ने पूछा।

“अच्छी… लेकिन वो कमरा…”

“तुमने खोला तो नहीं ना?” वसंती डरते हुए बोली।

“न… नहीं… लेकिन उसमें ऐसा क्या है?”

वसंती कुछ पल चुप रही।

फिर धीमे स्वर में बोली—

“साहब… इस गाँव में पूछ लीजिए… यहाँ कोई इस घर में काम करने नहीं आता। क्योंकि ये घर भुतहा है। पहले वाले मालिक इसे छोड़कर चले गए। जो भी यहाँ रहा… वो भयानक तरीके से मरा।”

विवेक ने हल्का हँसने की कोशिश की।

“मुझे तो ऐसा कुछ महसूस नहीं हुआ।”

“मालिक ने भी यही कहा था… लेकिन उन्होंने मना करने के बावजूद दरवाज़ा खोला…”

वसंती की आवाज़ काँप रही थी

विवेक चिंतित चेहरा लिए अपने कमरे में आया। वह डायरी मेज़ पर रखी थी।

वह कुर्सी पर बैठ गया और पहला पन्ना खोला।

लाल अक्षरों में लिखा था—

“स्वागत है…”

उसने अगला पन्ना पलटा।

“दरवाज़ा खुल चुका है… अब खेल शुरू…”

“हर रात दरवाज़ा खुलेगा। मैं तुम्हें ढूँढूँगा। तुम चोर हो… और मैं पुलिस…”

“यह खेल सिर्फ तीन रात चलेगा।”

“तीसरी रात मैं तुम्हें ढूँढकर मार डालूँगा।”

“बचने का सिर्फ एक रास्ता है — बाव्हली…”

“उसे वापस करो… या मर जाओ…”

“आज पहला लेवल शुरू…”

“अगर ज़िंदा रहना है… तो छिप जाओ…”

“अगर नहीं छिपे… तो मर जाओगे…”

“अगर बाव्हली मिल गई… तो जीत जाओगे…”

“खेल सिर्फ एक घंटे चलेगा…”

विवेक के हाथ काँपने लगे।

उसी समय रात के आठ बजे।

टन… टन… टन…

घड़ी की आवाज़ पूरे घर में गूँज उठी।

विवेक के शरीर में डर की लहर दौड़ गई।

“ये सच है क्या?”

“मुझे ढूँढने कौन आएगा?”

“कहाँ से आएगा?”

सैकड़ों सवाल उसके दिमाग में घूमने लगे।

अचानक घर की लाइटें धीमी होने लगीं।

विवेक के माथे पर ठंडा पसीना आ गया।

फिर कहीं दूर से दरवाज़ा खुलने की भयानक आवाज़ आई—

कर्रर्र…

रात की खामोशी में वह आवाज़ दिल चीर गई।

विवेक धीरे से कुर्सी से उठा।

चारों तरफ अंधेरा था।

लकड़ी के खंभे भी किसी राक्षस जैसे लग रहे थे।

तभी ऊपर से आवाज़ आई—

चर्रर्र…

किसी दरवाज़े के खुलने की आवाज़।

फिर…

टप… टप… खड़…

कदमों की आवाज़…

और साथ में किसी लोहे की चीज़ घिसटने की आवाज़।

दीवार पर एक टेढ़ी-मेढ़ी परछाई दिखाई दी।

विवेक का गला सूख गया।

वह तुरंत डाइनिंग टेबल के पीछे छिप गया।

उसकी नज़र ऊपर जमी थी।

धीरे-धीरे एक काला पैर सीढ़ियों से नीचे आया।

फिर कुछ सफेद चमका…

विवेक की साँस रुक गई।

अचानक पूरे घर की बिजली चली गई।

अब सिर्फ अंधेरा था।

तभी…

दो लाल आँखें चमकीं।

वो सीढ़ियों पर खड़ा था।

उसकी आँखें गोल-गोल घूम रही थीं…

और फिर सीधे विवेक पर टिक गईं।

विवेक की हिम्मत जवाब दे गई।

वो चीज़ धीरे-धीरे हिलने लगी।

ठण्…

लोहे की कोई चीज़ ज़मीन पर टकराई।

वह चीज़ नीचे उतर रही थी…

उसके हाथ में कोई लोहे का हथियार था।

विवेक काँपने लगा।

“मुझे बचना है…”

अचानक उसे डायरी की बात याद आई—

“चोर सिर्फ छिपता नहीं… भागता भी है…”

“मैं… मैं चोर हूँ…”

वो चीज़ धीरे-धीरे उसकी तरफ बढ़ रही थी।

खर्रर्र…

लोहे की चीज़ फर्श पर घिसट रही थी।

साथ में हड्डियों के टूटने जैसी आवाज़ें…

अब विवेक पूरी तरह डर चुका था।

वह इधर-उधर देखने लगा।

तभी उसकी नज़र रसोईघर के दरवाज़े पर पड़ी।

वह उसी तरफ भागा।

लेकिन तभी—

धाड़!!

कुछ ज़ोर से उसके पैर पर आकर लगा।

वह दर्द से चीख पड़ा और ज़मीन पर गिर गया।

उस प्राणी ने लोहे की चीज़ उसके पैर पर फेंकी थी।

वो फिर उसकी तरफ बढ़ने लगा।

विवेक किसी तरह उठकर रसोई में घुस गया और दरवाज़ा बंद कर लिया।

वह कोने में जाकर छिप गया।

धीरे-धीरे दरवाज़ा खुला…

एक दुबला-पतला काला पैर अंदर आया।

उसके हाथ में लोहे का हथियार था।

सिर पर पुरानी पुलिस टोपी।

और नीचे…

लाल चमकती आँखें…

सड़े मांस जैसी बदबू…

बाकी सब अंधेरे में छिपा था।

वो अंदर आ गया।

कट… कट…

उसकी हड्डियाँ बज रही थीं।

विवेक ने मुँह दबा लिया।

उसने खिड़की का पर्दा फाड़कर अपने ऊपर डाल लिया और सामने कुर्सी रख ली।

वो प्राणी कमरे में घूम रहा था।

अचानक उसकी लाल आँखें सीधे विवेक पर टिक गईं…

वो धीरे-धीरे उसकी तरफ आने लगा…

वो धीरे-धीरे विवेक के बिल्कुल पास आ गया।

उसने अपना हाथ आगे बढ़ाया…

उसकी उंगलियों की हड्डियाँ कड़कड़ाईं…

उसकी साँसें विवेक के कानों से टकरा रही थीं।

विवेक डर से पत्थर बन चुका था।

तभी—

खट्!

बाहर कहीं कोई चीज़ गिरने की आवाज़ आई।

वो प्राणी अचानक पीछे मुड़ा…

और धीरे-धीरे कमरे से बाहर चला गया।

विवेक ने राहत की साँस ली।

समय बीतता गया।

बाहर कुत्ते रो रहे थे।

उनकी आवाज़ पूरे शरीर में डर भर रही थी।

धीरे-धीरे विवेक की आँखें भारी होने लगीं।

और वह वहीं बैठे-बैठे सो गया।


खट्!!

अचानक दरवाज़ा ज़ोर से बंद हुआ।

विवेक चौंककर उठ बैठा।

उसने धीरे से पर्दा हटाया।

सामने का दरवाज़ा बंद था।

कमरा खाली लग रहा था।

“शायद वो चला गया…”

उसने राहत की साँस ली।

वह धीरे से मुस्कुराया।

“मैं बच गया…”

लेकिन तभी—

उसकी मुस्कान गायब हो गई।

उसे अपने बिल्कुल पास किसी की साँसों की आवाज़ सुनाई दी।

धीरे-धीरे उसने गर्दन घुमाई…

और उसका खून जम गया।

वहीं उसके बगल में—

वही पुलिस टोपी…

हड्डियों वाला चेहरा…

और फिर—

उसने आँखें खोलीं।

दो जलते हुए लाल गोले…

वो आँखें सीधे विवेक को घूर रही थीं।

“आऽऽऽऽ!!”

विवेक डर से चीख पड़ा।

वो प्राणी उस पर झपट पड़ा।

विवेक कुर्सी हटाकर भागने लगा।

लेकिन उस चीज़ ने उसका पैर पकड़ लिया।

उसके लंबे नाखून उसकी चमड़ी में धँस गए।

विवेक दर्द से चीख उठा।

दरवाज़ा बस थोड़ी दूर था।

वह पूरी ताकत से उसकी ओर भागा।

फटाक्!!

उसकी पीठ पर ज़ोरदार वार हुआ।

लोहे की रॉड…

वह लड़खड़ाकर गिर पड़ा।

किसी तरह उसने दरवाज़ा पकड़ लिया।

उसकी पीठ में असहनीय दर्द उठ रहा था।

ऐसा लग रहा था जैसे रीढ़ टूट गई हो।

पीछे से कदमों की आवाज़ आ रही थी।

वो चीज़ फिर उसकी ओर बढ़ रही थी।

विवेक काँपते हुए उठा और दरवाज़े से बाहर निकल गया।

वह लंगड़ाते हुए भाग रहा था।

अचानक उसका पैर फिसला और वह ज़मीन पर गिर पड़ा।

पीछे से भयानक हँसी गूँजी—

“ही… ही… ही… ही…”

विवेक लगभग मरने जैसी हालत में था।

उसकी पीठ जल रही थी।

लेकिन फिर भी वह घिसटते हुए आगे बढ़ा।

उसे सिर्फ छिपना था…

तभी उसकी नज़र सीढ़ियों के नीचे की खाली जगह पर पड़ी।

वह किसी तरह वहाँ घुस गया और खुद को सिकोड़कर बैठ गया।

तभी घर में भारी आवाज़ गूँजी—

“छिप गया… छिप गया…”

“कहाँ छिपा है…”

विवेक का दिल जोर-जोर से धड़कने लगा।

वो काली आकृति धीरे-धीरे इधर-उधर घूम रही थी।

फिर अचानक वह हँसने लगी—

“तुम्हारा खून मिल गया…”

“तुम यहीं हो…”

“तुम्हारी गंध आ रही है…”

“सीढ़ियों के नीचे…”

“खी… खी… खी…”

विवेक पूरी तरह टूट चुका था।

उसके अंदर भागने की ताकत भी नहीं बची थी।

वो चीज़ चीखते हुए उसकी तरफ दौड़ी।

“मैं मर गया…”

विवेक ने आँखें बंद कर लीं।

तभी—

टन… टन…

घड़ी ने घंटा बजाया।

उसी पल बिजली वापस आ गई।

विवेक ने काँपते हुए आँखें खोलीं।

उसके सामने हड्डियों का एक सड़ा हुआ ढाँचा खड़ा था।

मांस जगह-जगह से लटक रहा था।

उसने रॉड उठाकर विवेक पर वार किया।

विवेक ने डर से हाथ आगे कर दिए…

लेकिन…

कुछ नहीं हुआ।

चारों तरफ सन्नाटा था।

धीरे-धीरे विवेक ने आँखें खोलीं।

वो ढाँचा गायब था।

वहाँ अब कुछ नहीं था।

विवेक ने लंबी साँस ली और दीवार से टिक गया।

तभी—

किसी ने उसके कंधे पर हाथ रखा।

विवेक डरकर उछला।

उसने पीछे देखा…

और उसकी आँखें फैल गईं।

“द… दादाजी?!”

उसके सामने उसके दादाजी खड़े

“हाँ… मैं ही हूँ…” दादाजी गहरी आवाज़ में बोले।

विवेक स्तब्ध था।

“लेकिन… आप यहाँ कैसे? आप तो मर चुके थे ना? क्या आप… ज़िंदा हैं?”

“उठ… सब बताता हूँ।”

दादाजी ने उसे उठाया और पास की कुर्सी पर बैठ गए।

विवेक अभी भी काँप रहा था।

“दादाजी… ये सब क्या है? वो… वो हड्डियों वाला आदमी कौन था? ये सब मेरे साथ क्या हो रहा है?”

दादाजी कुछ पल चुप रहे।

फिर धीमी आवाज़ में बोले—

“ये एक खेल है…”

“चोर-पुलिस का खेल…”

“आज सिर्फ पहला स्तर था…”

“अभी दो और रातें बाकी हैं…”

विवेक की साँस अटक गई।

“अगर तू ये खेल नहीं खेलेगा… तो मर जाएगा…”

“और अगर खेलेगा… तब भी शायद…”

“तो मैं क्या करूँ?” विवेक लगभग रो पड़ा।

“मैं इससे कैसे बचूँ? कोई रास्ता नहीं है क्या?”

दादाजी ने उसकी तरफ देखा।

फिर धीरे-धीरे बोले—

“एक ही रास्ता है…”

“बाव्हल…”

“बाव्हल?”

“हाँ… उसे बाव्हल दे दे…”

“तभी ये खेल खत्म होगा…”

“अगर नहीं… तो तेरा दिल भी किताबों में सड़ जाएगा…”

विवेक की आँखों में आँसू भर आए।

“लेकिन मैं उसे कहाँ से लाऊँ? मैं बच जाऊँगा ना दादाजी?”

दादाजी ने लंबी साँस ली।

“कल… किसी भी तरह बाव्हल लेकर आ…”

“अगर वो काम कर गया… तो तू बच जाएगा…”

“और अगर नहीं…”

“तो सिर्फ रुद्र ही तुझे बचा सकता है…”

विवेक फूट-फूटकर रोने लगा।

“दादाजी… मुझे बचा लीजिए… मुझे मरना नहीं है…”

“हिम्मत रख…”

“कल रात उसे बाव्हल दे देना…”

“अगर खेल खत्म नहीं हुआ… तो रुद्र से मिलना…”

“और याद रख… कल रात तू…”

इतना कहते-कहते दादाजी अचानक काँपने लगे।

उनका शरीर टेढ़ा-मेढ़ा मरोड़ खाने लगा।

उनका चेहरा बिगड़ने लगा।

“तु… ल… प… ना…”

“तू… ला… प… श…”

उनकी आवाज़ टूटने लगी।

विवेक डर से पीछे हट गया।

अचानक—

धड़ाम!!

फर्श फट गई।

उसमें से एक काला हाथ बाहर निकला।

उस हाथ ने विवेक का पैर पकड़ लिया।

उसके नाखून चमड़ी में धँस गए।

“आऽऽऽ!!”

विवेक दर्द से चीख उठा।

खून बहने लगा।

वो काला हाथ उसके पैर का मांस नोचने लगा।

“आऽऽऽ!!”

विवेक की चीख पूरे कमरे में गूँज गई।

तभी—

“खी… खी… खी…”

वो भयानक हँसी फिर सुनाई दी।

विवेक ने ऊपर देखा…

और उसका दिल थम गया।

दादाजी का चेहरा बदल चुका था।

उनकी चमड़ी फटकर हड्डियों से लटक रही थी।

आँखें गहरी काली हो चुकी थीं…

अंदर लाल आग जल रही थी।

वो अब इंसान नहीं लग रहे थे।

उन्होंने डरावनी आवाज़ में कहा—

“चीटिंग…”

“तू चीटिंग करेगा क्या?”

और उसी पल—

उस काले हाथ ने विवेक का पैर तोड़ दिया।

“आऽऽऽ!!”


विवेक चीखते हुए उठ बैठा।

उसका पूरा शरीर पसीने से भीगा हुआ था।

साँसें तेज चल रही थीं।

उसने अपने पैर को देखा।

घाव अभी भी था…

वो सपना नहीं था।

वह काँपते हुए बुदबुदाया—

“बाव्हल…”

“हाँ… दादाजी ने बाव्हल कहा था…”

और वह डर से दीवार से टिक गया…

“अगं बया… ये चोट कैसी लगी?” सूजे हुए पैर और बैंडेज को देखते हुए वसंती ने पूछा।

“कील चुभ गई थी,” विवेक नाश्ता करते हुए बोला।

“ज़रा संभलकर रहना, घर पुराना है,” कहते हुए वसंती मुड़ गई।

“अरे काकू! आपके पास गुड़िया है क्या?” विवेक ने पूछा।

“गुड़िया?… किसलिए चाहिए?” उसने सोचते हुए पूछा।

विवेक थोड़ा बेचैन हो गया। कुछ सोचकर बोला, “बाहर बहुत पेड़ हैं। उन पर बंदर हैं। घर में घुसकर परेशान करते हैं। सोचा, उन्हें गुड़िया दे दूँ तो साथ खेलेंगे।”

वसंती हँस पड़ी।

“कुछ भी… कल ले आऊँगी। घर में दो-चार पड़ी हैं,” वह हँसते हुए बोली।

“कल नहीं… आज ही ले आओ तो अच्छा होगा,” विवेक जल्दी से बोला।

“ठीक है, शाम को दे दूँगी,” वसंती बोली। तब जाकर विवेक को थोड़ी राहत मिली।

……

विवेक अपने कमरे में चला गया। पैर दुख रहा था। पूरा शरीर टूट रहा था। उसने बिस्तर पर लेटने का सोचा।

फड़… फड़…

तभी हवा से मेज़ पर रखी कॉपी के पन्ने पलट गए। वह कॉपी जैसे विवेक को बुला रही थी। वह धीरे से जाकर बैठा और काँपते हाथों से कॉपी खोली…

पन्ना पलटते ही “WELCOME” शब्द उभर आया। दूसरा पन्ना पलटा तो अक्षर दिखाई दिए—

लेवल दो…

“गुड़िया दे या मर… खेल डेढ़ घंटे चलेगा… सिर्फ एक घंटा और आधा घंटा… खुद को बचा, नहीं तो मर जाएगा… आज तू छिप नहीं पाएगा… आज सिर्फ यह चीज़ तुझे बचा सकती है…”

“हाथ में आती हूँ, पर पकड़ नहीं सकते।
मैं तुम्हारे पेट में रहती हूँ, पर तुम मेरे पेट में नहीं रह सकते।
सबको मैं प्रिय हूँ, पर आग को नहीं।”

तुम्हारा खेल अब शुरू…

“ये क्या? हाथ में आती है… पेट में जाती है… आग को पसंद नहीं… लेकिन मुझे क्या?
मुझे तो गुड़िया मिल गई। अब खेल खत्म,” कहते हुए विवेक ने खुशी से कॉपी पर हाथ मारा।

“मैं जीत गया…” कहकर वह बिस्तर पर लेट गया।

ठक… ठक…

“ये क्या चल रहा है?… ये टब कैसा?… ये कपड़े… ये टोकरी क्या है?” घबराकर वसंती ने पूछा।

“काकू, तुम नहीं समझोगी… गुड़िया लाई क्या?” विवेक ने पूछा।

वसंती ने थैले में हाथ डाला और बड़ी-बड़ी आँखों वाली गुड़िया बाहर निकाली।

“ये क्या? इसे देखकर तो मैं ही डर गया,” विवेक एकटक उसे देखते हुए बोला।

“तुम्हें चाहिए तो रख लो। मुझे रात होने से पहले यहाँ से जाना है,” कहते हुए उसने गुड़िया विवेक के हाथ में दे दी।

विवेक ने गुड़िया को देखा और हल्का मुस्कुराया। जैसे उसने कोई बहुत बड़ी लड़ाई जीत ली हो, उसका चेहरा खुशी से चमक उठा।

सूरज ढलने लगा था। विवेक ने खाना खा लिया। उसने सारी चीज़ें अपनी जगह पर रख दीं।

ऊपरी मंज़िल पर कुछ आवाज़ हुई। विवेक डरकर उधर देखने लगा।

“क्या वो आ गया?
नहीं… वो अपने नियम क्यों तोड़ेगा?
लेकिन कोई मेरी हरकतों पर नज़र रख रहा है…
कोई मुझे देख रहा है…”

विवेक को बार-बार ऐसा महसूस हो रहा था।

सूरज डूब गया। घर की बत्तियाँ जल उठीं। विवेक काँपता हुआ कुर्सी पर बैठा था… उसका इंतज़ार करते हुए…

कौन था वो खिलाड़ी…
खेल खेलने वाला…
हाँ… खिलाड़ी…

…………

घड़ी में आठ बजे। कुर्सी पर बैठे विवेक को झटका लगा। अब वो आएगा। उसने ऊपर देखा। ऊपर अभी भी भयानक सन्नाटा था।

झींगुर डरावनी आवाज़ें कर रहे थे। गाँव से कुत्तों के रोने और भौंकने की आवाज़ें आ रही थीं। घर जंगल के पास था। वहाँ से सियारों की आवाज़ें सुनाई दे रही थीं।

वह गहरी खामोशी…

और अचानक बत्तियाँ मंद पड़ गईं।

“पापा… पापा… चलो ना, हम चोर-पुलिस खेलते हैं…” किसी छोटे बच्चे की आवाज़ गूँजी।

विवेक कुर्सी से झटके से उठ गया। उसका शरीर काँप रहा था।

“हाँ, मैं आ रहा हूँ…” भारी और डरावनी आवाज़ आई।

अचानक घर की सारी बत्तियाँ बुझ गईं।

विवेक के दिल की धड़कन रुक सी गई। उसने टॉर्च जलाई। घड़ी में साढ़े आठ बजे थे। खेल शुरू होने वाला था।

विवेक अपनी गुड़िया सँभालते हुए आगे बढ़ा। उसका दिल ज़ोरों से धड़क रहा था।

कर्ऽऽऽ…

दरवाज़ा खुलने की आवाज़ आई।

हवा में भारीपन फैल गया। पूरा माहौल जैसे मर गया हो।

“तू चोर… मैं पुलिस…” फिर वही बच्चे की आवाज़ गूँजी।

अचानक कदमों की आवाज़ आई।

टप… टप…

विवेक स्तब्ध रह गया।

दरवाज़े से एक आकृति बाहर आई थी…

“मैं गुड़िया ले आया हूँ… तुम्हारा खेल बंद करो… मुझे जाने दो…” विवेक वहीं से बोला।

वो आकृति आधे रास्ते में ही रुक गई।

विवेक सीढ़ियाँ चढ़कर ऊपर आया। उसके हाथ की टॉर्च बंद हो चुकी थी। सामने पीली आँखों वाली आकृति चमक रही थी। जगह-जगह चिंगारियाँ चिपकी हुई थीं। उसका शरीर जैसे जला हुआ था। उससे धुएँ की बदबू आ रही थी। हाथ में तपता हुआ लोहे का डंडा चमक रहा था।

“ये लो तुम्हारी गुड़िया…” कहते हुए विवेक ने गुड़िया उसकी तरफ फेंक दी।

उस खिलाड़ी की नज़र नीचे गई। वह बिल्कुल स्थिर खड़ा रहा।

“ही… ही… ही… ही…” वह भयानक तरीके से हँसा।

विवेक काँपते हुए पीछे हट गया। उसकी साँस गले में अटक गई।

“ये मेरी गुड़िया नहीं… तू मुझे धोखा दे रहा है क्या?” कहते ही वह अचानक उसकी तरफ दौड़ा।

उसकी रफ्तार देखकर विवेक काँप उठा। वह भागने के लिए मुड़ा ही था कि—

ठण्!

उसी पल उस आकृति ने लोहे की चीज़ उसके पैर पर दे मारी। विवेक पलटियाँ खाते हुए नीचे गिर पड़ा।

“खी… खी… खी…”

वह ऊपर से हँसता हुआ नीचे उतरने लगा। अचानक हॉल में आकर रुक गया। उसकी जलती आँखें चारों ओर घूमने लगीं।

सब कुछ खाली और शांत था। इतने समय में विवेक कहीं छिप चुका था।

उस साए ने हवा सूँघी।

“आहाहा… तू यहीं है विवेक… मैंने तुझे ढूँढ लिया!
अब तू मरेगा… ही… ही… ही…” वह खुशी से आगे बढ़ा।

उसकी नज़र सीढ़ियों के पास रखे एक बड़े बक्से पर गई।

“मिल गया तू… अब तू मर गया…” वह बक्से के पास आया।

“भागेगा नहीं क्या?” कहते हुए वह वहीं खड़ा रहा। एकदम शांत।

“आऽऽऽ!”

अचानक चीखते हुए उसने बक्से पर हमला कर दिया। बक्सा फट गया। अंदर कोई था जो नीचे गिर पड़ा। उसने फिर उसके सिर पर वार किया।

“मर गया… मर गया… आऽऽ… चीटिंग… चीटिंग…” वह पूरी ताकत से चीखा।

लेकिन सामने सिर्फ कपड़े का पुतला था, जिसे विवेक ने अपनी शर्ट पहनाई थी।

“तुझे नहीं छोड़ूँगा मैं… कहाँ है तू?” वह डरावनी आवाज़ में चिल्लाता हुआ चीज़ें तोड़ने लगा।

तभी उसे किसी चीज़ के घिसटने की आवाज़ सुनाई दी। एक बड़ी टोकरी रसोई की ओर सरक रही थी।

“अब तू मर गया!” चिल्लाते हुए वह उसकी तरफ दौड़ा।

विवेक टोकरी से बाहर निकला और तुरंत रसोई में घुस गया।

“अब क्या करूँ? ये तो बहुत ताकतवर हो गया है…” सोचते हुए वह भागा।

तभी रसोई का दरवाज़ा ज़ोर से खुला।

वो दरवाज़े पर खड़ा था।

अंदर सिर्फ सन्नाटा था।

विवेक की आँखें फैल गईं।

मौत जैसा वह दूत अंदर आ गया।

उसने चारों तरफ देखा। फिर उसे कुर्सी और पर्दा दिखाई दिया।

वह तेज़ी से आगे बढ़ा और कुर्सी पर वार कर उसे तोड़ दिया। फिर उसने पर्दा खींचा।

वहाँ भी कपड़े का पुतला था।

“क्या तू मुझसे बच पाएगा?” वह गुर्राया।

कट्!

कहीं लकड़ी की आवाज़ आई।

उसने चारों ओर देखा।

अंदर विवेक पसीने से तर बैठा था। उसे उसके कदम अपनी तरफ आते दिखाई दिए।

“मर गया…” विवेक धीरे से पीछे सरका।

ठक्!

उसने वार किया। सामने की लकड़ी टूट गई। ऊपर का कपड़ा धीरे से गिरा।

वह एक छोटी-सी जगह थी जिसे विवेक ने छिपने के लिए बनाया था। सामने मेज़ और दीवार के फर्नीचर के बीच लकड़ियाँ जोड़कर ऊपर कपड़ा डाला था।

लेकिन अब कपड़ा गिर चुका था।

नीचे विवेक जैसा शरीर पड़ा था।

उस साए को उसकी गंध भी आ रही थी। वह हँस रहा था।

उसने कपड़ा हटाया—

फिर एक पुतला!

विवेक ने अपनी शर्ट उसे पहनाई थी, इसलिए उसकी गंध आ रही थी।

“आऽऽऽ!”

अब वह सचमुच पागलों की तरह गुस्से में चिल्लाने लगा। आसपास की चीज़ें तोड़ने लगा। उसने सिंक तक तोड़ डाला।

कट्…

तभी दरवाज़े की लकड़ी हिली।

उस खिलाड़ी ने आग जैसी नज़र घुमाई। उसे विवेक की पीठ दिखाई दी, जो बाहर भाग रहा था।

असल में विवेक इतने समय से मेज़ के पीछे छिपा हुआ था… जान हथेली पर लेकर… काँपता हुआ…

खिलाड़ी तेज़ी से उसके पीछे भागा।

विवेक लड़खड़ाता हुआ भाग रहा था। पैर दुख रहा था। गला सूख चुका था। सीने में दर्द उठ रहा था।

अब उससे न भागा जा रहा था, न छिपा जा रहा था।

अब आख़िरी सहारा बचा था—
आधा कटा हुआ टब…

विवेक बिना समय गँवाए उस टब के अंदर घुस गया। उसने वहाँ पर सेंट की बोतल छिड़क दी और अपनी टॉर्च बंद कर दी। सामने बने दो छोटे छेदों से वह बाहर देखने लगा।

वो साया अंधेरे में सूँघता हुआ वहाँ तक आ पहुँचा।

…ठक… ठक…

उसने हाथ से टब बजाया।

विवेक का दिल जैसे रुक गया।
“क्या इसे पता चल गया कि मैं यहीं हूँ?” सोचते ही उसका शरीर काँप उठा।

लेकिन वह वहाँ से हटकर दूसरी ओर चला गया। तब जाकर विवेक ने राहत की साँस ली। उसने फिर छेद से बाहर झाँका।

बाहर सब खाली था।

वो कहाँ गया, कुछ पता नहीं था। उसके कदमों की आवाज़ भी गायब हो चुकी थी।

अचानक एक चेहरा छेद के सामने आ गया!

विवेक डरकर पीछे हट गया। उसकी लाल जलती आँख एक पल को दिखी और फिर गायब हो गई।

विवेक काँपते हुए पीछे गिर पड़ा।

धीरे-धीरे कदमों की आवाज़ दूर जाने लगी। विवेक ने राहत की साँस ली। वह खुद ही हल्का-सा हँस पड़ा।

“सच में यकीन नहीं हो रहा… हम बच गए…” कहते हुए वह सिकुड़कर बैठ गया।

चारों तरफ फिर से शांति फैल गई थी…

खड़ाक्!

अचानक टब के अंदर लाल तपती लोहे की रॉड घुस गई।

विवेक डरकर उछल पड़ा। उसने टूटे हुए टब से बाहर देखा।

उस साए के होंठ फैल गए। उसकी आँखें फैल गईं। वह विवेक को देखकर पागलों की तरह हँसने लगा।

खाड्!

एक और वार में उसने पूरा टब तोड़ डाला।

विवेक काँपते हुए पीछे सरका। अब तो उसकी मौत तय थी।

वह ज़ोर-ज़ोर से हँसता हुआ उसकी तरफ बढ़ा।

“मिल गया… मिल गया…
बहुत अच्छा खेला तू…
उस बूढ़े से भी ज़्यादा…” कहते हुए उसने लोहे की रॉड विवेक पर दे मारी।

ठण्!

पूरा हॉल उस भयानक आवाज़ से गूँज उठा।

विवेक के हाथ में एक ढाल थी। उसने पहले से ही उसे तैयार कर रखा था। उसी ने उसके सिर को बचा लिया।

वह लोहे का वार झटकते हुए दरवाज़े से बाहर भागा। उसने टब जानबूझकर दरवाज़े के पास रखा था ताकि मौका मिलते ही बाहर निकल सके।

वह लंगड़ाता हुआ बाहर आया।

हवा बहुत तेज़ चल रही थी। पत्ते उड़कर उसके भीगे चेहरे से चिपक रहे थे। सामने के पेड़ और नारियल के पेड़ ज़ोर-ज़ोर से हिल रहे थे।

भागने का कोई रास्ता नहीं था।

बाहर क्या है, विवेक को कुछ समझ नहीं आ रहा था।

वह कुएँ के पास पहुँच गया। एक पुरानी सीमेंट की टंकी के सहारे रुक गया।

उसने पीछे देखा—

वो साया भी बाहर आ चुका था।

विवेक के दिल में डर समा गया। वह धीरे से टंकी के पीछे छिप गया।

वो सूँघता हुआ धीरे-धीरे टंकी की तरफ बढ़ रहा था।

इधर विवेक बुरी तरह काँप रहा था। डर से उसकी आँखें बंद हो रही थीं। अब बचने का कोई रास्ता नहीं था।

वो और पास आया।

अब उसकी आकृति साफ दिखाई दे रही थी।

उसके शरीर पर दरारें थीं, जिनमें से आग जैसी रोशनी निकल रही थी। उसका मांस जला हुआ था। उसमें से धुआँ उठ रहा था। चेहरा पूरी तरह विकृत था।

उसकी आँखें आग उगल रही थीं।

जैसे ही उसका पैर नीचे पड़ता, सूखे पत्ते जल उठते।

अब वो सिर्फ दस-पंद्रह कदम दूर था।

विवेक रोते हुए हाथ जोड़कर प्रार्थना करने लगा।

तभी उसे नीचे एक पाइप जैसी चीज़ दिखाई दी। पतली, डंडी जैसी लेकिन लंबी।

“ये क्या है?” उसने सोचा।

अचानक उसके दिमाग में बिजली-सी कौंधी—

“हाथ में आती हूँ, पर पकड़ नहीं सकते।
मैं तुम्हारे पेट में रहती हूँ, पर तुम मेरे पेट में नहीं रह सकते।
सबको मैं प्रिय हूँ, पर आग को नहीं…”

विवेक काँपते हुए वह पाइप उठा लिया।

“पानी…
कोड्ये का जवाब पानी है!
पानी हाथ में आता है लेकिन पकड़ा नहीं जा सकता।
हमारे शरीर में पानी होता है।
हम पानी पीते हैं, वो पेट में रहता है।
लेकिन हम पानी के अंदर नहीं रह सकते।
और आग पानी से बुझ जाती है!”

विवेक की आँखें चमक उठीं।

“पानी…
आज पानी ही मुझे बचा सकता है…
ये पाइप दादाजी ने ही रखा होगा!”

टप… टप…

कदमों की आवाज़ पास आ गई।

विवेक ने झाँककर देखा—

वो साया बिल्कुल पास पहुँच चुका था।

टंकी में पानी था, लेकिन उसमें छिपे कैसे?

सोचते-सोचते विवेक काँपने लगा।

तभी उसकी नज़र अपनी ढाल पर गई।

उसने गहरी साँस ली और ढाल दूर झाड़ियों में फेंक दी।

स्स्स…

ढाल झाड़ियों में जाकर गिरी।

वो साया तुरंत उधर मुड़ा और धीरे-धीरे झाड़ियों की ओर बढ़ने लगा।

उसी पल विवेक तुरंत उठकर पानी की टंकी में कूद गया।

उसने पाइप अपने मुँह में दबा ली और नीचे डूब गया।

फिर भी उसका शरीर ऊपर उठने लगा।

अचानक वो साया वापस टंकी के पास आ गया।

विवेक का दिल बैठ गया।

तभी उसके हाथ किसी भारी चीज़ से टकराए।

दोनों तरफ डम्बल पड़े थे।

विवेक ने उन्हें कसकर पकड़ लिया और खुद को नीचे दबा लिया।

उसने पैर दीवार पर जमा दिए।

ऊपर से उसे उस साए का चेहरा दिखाई दे रहा था।

वो गुस्से में इधर-उधर घूम रहा था। लोहे की रॉड पटक रहा था।

अचानक वो शांत हो गया।

उसने टंकी में झाँका।

विवेक अंदर ही अंदर काँप उठा।

वो साया एकटक पानी को घूर रहा था।

फिर उसने अपना हाथ पानी में डाला—

च्श्श्श्श्…

जैसे तपता लोहा पानी में डाल दिया गया हो।

पानी में बुलबुले उठे। उसके हाथ से धुआँ निकलने लगा। उसका हाथ काला पड़ गया।

वो तुरंत पीछे हट गया।

“आऽऽऽ!” वह दर्द से भयानक चीखा।

वो गुस्से से विवेक को घूरने लगा।

इधर विवेक डर से आधा मरा जा रहा था।

“ये मुझे कभी भी मार देगा…
मैं सिर्फ पानी में ही सुरक्षित हूँ…”

लेकिन तभी वो साया फिर हँसने लगा… शैतानी हँसी…

उसने पानी से बाहर निकली पाइप पकड़ ली और झटके से खींच दी।

पानी विवेक के मुँह में घुस गया। वह तड़प उठा।

“आ… आ… बाहर आ…
मैं तेरा इंतज़ार कर रहा हूँ…
ही… ही… ही…” वो दानवी हँसी हँस रहा था।

विवेक के नाक-मुँह में पानी भरने लगा। उसकी साँस फूल गई। शरीर काँपने लगा।

और अगले ही पल—

उसने डम्बल छोड़ दिए।

वो तेजी से ऊपर आया।

उसका सिर पानी से बाहर निकला—

और सामने का दृश्य देखकर उसका खून जम गया।

लोहे की रॉड सीधे उसके सिर पर गिरने वाली थी—

टण्… टण्…

तभी घर के अंदर से एक अजीब-सी घंटी जैसी आवाज़ आई।

घर की बत्तियाँ जल उठीं।

लोहे की रॉड उसके सिर से बस एक इंच दूर रुक गई।

विवेक की साँस रुक गई।

उसने सामने देखा—

वो खिलाड़ी गायब हो चुका था।

“आँ… हाँ… हाँ…” रोते-चिल्लाते हुए विवेक टंकी से बाहर निकला। खाँसते हुए वो ज़मीन पर गिर

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