BY SCARY CROCODILE TEAM
बिसनखेड़ा का नाम मैंने पहली बार एक पुराने अख़बार की कटिंग में पढ़ा था। कटिंग बहुत छोटी थी। सिर्फ कुछ पंक्तियाँ।
उसमें लिखा था कि मध्य प्रदेश के एक दूरदराज़ गाँव में वर्षों से एक अजीब घटना होती आ रही है। रात के समय जंगल की दिशा से ढोल की आवाज़ सुनाई देती है और उस आवाज़ के बारे में सवाल पूछने वाले लोग अक्सर गाँव छोड़ देते हैं या फिर चुप हो जाते हैं।

आमतौर पर ऐसी खबरें मेरा ध्यान ज़्यादा देर तक नहीं खींचती थीं। लेकिन उस कटिंग के नीचे एक लाइन और थी जिसने मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया।
“गाँव वाले आज भी सूर्यास्त के बाद जंगल की तरफ देखना पसंद नहीं करते।”Gaon Ki Darawani Kahani
मुझे यह बात अजीब लगी।
डरावनी कहानियाँ हर जगह मिल जाती हैं, लेकिन किसी पूरे गाँव का एक ही बात पर इतने सालों तक एक जैसा व्यवहार करना सामान्य नहीं होता।
इसी जिज्ञासा ने मुझे बिसनखेड़ा पहुँचा दिया।
गाँव तक जाने वाली सड़क लंबी और सुनसान थी। बस से उतरने के बाद करीब दो किलोमीटर पैदल चलना पड़ा। रास्ते में सूखे खेत दिखाई देते रहे। कहीं-कहीं पुराने कुएँ थे जिनके आसपास अब कोई नहीं आता था। दूर तक फैले पेड़ों के पीछे घना जंगल दिखाई देता था।
दोपहर का समय था।
धूप तेज थी।
सब कुछ बिल्कुल साधारण लग रहा था।
अगर किसी ने मुझे पहले से उस जगह की कहानी न बताई होती, तो शायद मैं कभी अंदाज़ा भी नहीं लगा पाता कि लोग यहाँ रात से इतना डरते हैं।
गाँव में घुसते ही कुछ बच्चे खेलते दिखाई दिए। एक आदमी बैलगाड़ी ठीक कर रहा था। कुछ महिलाएँ घरों के बाहर बैठकर बातें कर रही थीं।
दृश्य किसी भी सामान्य गाँव जैसा था।
लेकिन जैसे ही मैंने ढोल की आवाज़ का ज़िक्र किया, माहौल बदल गया।
पहले आदमी ने कहा उसे कुछ नहीं पता।
दूसरे ने हँसकर बात टाल दी।
तीसरे ने ऐसा दिखाया जैसे उसने सवाल सुना ही नहीं।
यह प्रतिक्रिया मेरे लिए नई नहीं थी। कई जगह लोग बाहरी लोगों पर भरोसा नहीं करते। लेकिन यहाँ कुछ अलग था।
लोग सिर्फ जवाब देने से नहीं बच रहे थे।
वे उस विषय से दूर भाग रहे थे।
एक किराने की छोटी दुकान पर बैठे बुजुर्ग ने मुझे कुछ देर तक देखा। उनकी आँखों में उम्र के साथ आया हुआ ठहराव था, लेकिन उस समय उनमें बेचैनी भी दिखाई दे रही थी।
उन्होंने पूछा, “कहाँ से आए हो?”
मैंने अपना परिचय दिया।
उन्होंने सिर हिलाया।
“लिखने-पढ़ने का काम करते हो?”
“हाँ।”
“तो फिर दूसरी चीज़ों पर लिखो। यहाँ तुम्हें कुछ नहीं मिलेगा।”
मैंने मुस्कुराकर कहा, “अगर कुछ नहीं मिलेगा तो लोग बात करने से डर क्यों रहे हैं?”
इस बार उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया।
बस उठे और दुकान से बाहर चले गए।
शाम होने लगी थी।
मुझे गाँव के किनारे एक खाली मकान में रुकने की जगह मिल गई। मकान बहुत बड़ा नहीं था। दो कमरे थे, एक टूटा हुआ बरामदा और सामने खुला मैदान।
Gaon Ki Darawani Kahani
मैदान के बाद कुछ दूरी तक खेत थे।
उन खेतों के पार जंगल शुरू हो जाता था।
सामान रखते समय मैंने ध्यान दिया कि गाँव के ज्यादातर लोग अपने घरों के बाहर सामान्य से पहले लौट रहे थे।
कुछ लोग पशुओं को बाँध रहे थे।
कुछ दरवाज़े बंद कर रहे थे।
कहीं कोई जल्दबाज़ी नहीं थी, फिर भी ऐसा लग रहा था जैसे सबके पास कोई तय समय हो जिसे वे मिस नहीं करना चाहते।
सूरज पूरी तरह डूबने से पहले ही गाँव की रफ्तार बदल गई।
बच्चे घरों के अंदर चले गए।
गली में आवाजाही कम हो गई।
दूर कहीं रेडियो बज रहा था, लेकिन थोड़ी देर बाद वह भी बंद हो गया।
मैंने अपनी नोटबुक निकाली और पूरे दिन के अनुभव लिखने लगा।
करीब आठ बजे तक बाहर लगभग सन्नाटा था।
नौ बजे तक तो ऐसा लगा जैसे पूरा गाँव सो चुका हो।
यह बात मुझे अजीब लगी।
भारत के गाँवों में रात जल्दी जरूर होती है, लेकिन इतनी भी नहीं कि हर घर एक साथ चुप हो जाए।
मैं बरामदे में बैठ गया।
ऊपर आसमान साफ था।
हवा हल्की चल रही थी।
कुछ देर बाद मुझे कदमों की आहट सुनाई दी।
मुड़कर देखा तो वही बुजुर्ग खड़े थे जिन्हें मैंने दुकान पर देखा था।
उन्होंने बिना किसी भूमिका के पूछा, “कल सुबह चले जाओगे?”
“अभी तो आया हूँ।”
“जितना जल्दी जाओगे, उतना अच्छा रहेगा।”
“क्यों?”
उन्होंने सीधे जवाब नहीं दिया।
कुछ पल चुप रहने के बाद बोले, “हर चीज़ को जानना जरूरी नहीं होता।”
मैंने पूछा, “क्या आपने खुद वह आवाज़ सुनी है?”
उन्होंने मेरी तरफ देखा।
फिर बहुत धीमे स्वर में कहा, “इतनी बार सुनी है कि अब गिनती याद नहीं।”
यह कहकर वे जाने लगे।
मैंने उन्हें रोका।
“अगर वह सिर्फ आवाज़ है तो लोग उससे इतना डरते क्यों हैं?”
इस बार उनके कदम रुक गए।
उन्होंने पीछे मुड़कर देखा।
“डर आवाज़ से नहीं है।”
“फिर?”
“जो उसके बाद होता है, उससे है।”
यह कहकर वे अंधेरे में गायब हो गए।
उनके जाने के बाद मेरे मन में पहले से ज्यादा सवाल थे।
मैंने घड़ी देखी।
साढ़े दस।
फिर ग्यारह।
फिर साढ़े ग्यारह।
धीरे-धीरे रात गहरी होने लगी।
उस समय तक मैं लगभग तय कर चुका था कि शायद यह पूरी कहानी किसी पुरानी लोककथा से ज्यादा कुछ नहीं।
फिर एक बदलाव आया।
बहुत छोटा सा।
लेकिन इतना कि मैं तुरंत सतर्क हो गया।
झींगुरों की आवाज़ बंद हो गई।
मैंने पहले कभी इस बात पर ध्यान नहीं दिया था कि रात की खामोशी भी अलग-अलग तरह की होती है।
कुछ खामोशियों में जीवन छिपा रहता है।
कुछ में नहीं।
उस समय जो सन्नाटा फैल रहा था, उसमें कुछ भी जीवित महसूस नहीं हो रहा था।
मैं कुर्सी से उठा और मैदान की तरफ देखने लगा।
घड़ी में बारह बजने में कुछ सेकंड बाकी थे।
मुझे खुद पर हँसी आने लगी।
मैं एक पत्रकार था।
फिर भी किसी लोककथा की वजह से समय देखकर खड़ा था।
जैसे ही घड़ी ने बारह बजाए…
दूर कहीं से एक आवाज़ आई।
बहुत हल्की।
इतनी कि अगर हवा थोड़ा तेज चल रही होती तो शायद सुनाई भी न देती।
मैंने साँस रोक ली।
कुछ सेकंड बाद वही ध्वनि फिर सुनाई दी।
इस बार साफ।
ढोल।
कोई लयबद्ध ताल नहीं।
कोई उत्सव जैसा संगीत नहीं।
बस एक अकेली थाप।
फिर कुछ पल का अंतराल।
फिर दूसरी।
ऐसा लग रहा था जैसे कोई बहुत दूर खड़ा होकर अंधेरे में संकेत भेज रहा हो।
मैं बरामदे से नीचे उतर आया।
आवाज़ जंगल की दिशा से आ रही थी।
उसमें एक अजीब स्थिरता थी।
न जल्दबाज़ी।
न उतावलापन।
बस लगातार मौजूद रहने वाला एहसास।
उसी समय मेरी नजर गाँव के दूसरे छोर पर गई।
एक घर की खिड़की खुली।
अंदर से किसी ने बाहर झाँका।
कुछ क्षण तक जंगल की तरफ देखा।
फिर तुरंत खिड़की बंद कर ली।
थोड़ी देर बाद दूसरी तरफ भी वही हुआ।
फिर तीसरी जगह।
ऐसा लग रहा था जैसे पूरे गाँव को पता हो कि यह समय किस चीज़ का है।
और कोई भी उसे देखने की गलती नहीं करना चाहता।
मैंने वापस जंगल की तरफ देखा।
आवाज़ अब भी आ रही थी।
लेकिन अब मुझे एक और बात महसूस हुई।
वह पहले जैसी दूर नहीं लग रही थी।
मानो हर गुजरते मिनट के साथ उसके और गाँव के बीच की दूरी कम हो रही हो।
मेरे हाथ अपने आप नोटबुक की तरफ बढ़े।
मैंने जल्दी से एक लाइन लिखी—
“अगर यह किसी इंसान का काम है, तो वह हर रात एक ही समय पर एक ही रास्ते से आता है।”
लाइन पूरी करने के बाद मैंने सिर उठाया।
और उसी क्षण मुझे लगा कि जंगल के किनारे किसी पेड़ के पास कोई खड़ा है।
मैंने ध्यान से देखने की कोशिश की।
अंधेरा बहुत घना था।
चेहरा दिखाई नहीं दे रहा था।
शरीर भी साफ नहीं दिख रहा था।
लेकिन एक बात निश्चित थी।
वहाँ कुछ था।
और वह मेरी तरफ देख रहा था।
Conclusion
“Aadhi Raat Ko Gaon Me Dhol Kyun Bajta Hai?” सिर्फ एक डरावनी कहानी नहीं, बल्कि लालच, पाप और श्राप की कहानी है। कई रहस्य ऐसे होते हैं जिन्हें जानने की कोशिश इंसान को मौत के करीब ले जाती है। कुछ दरवाजे बंद ही अच्छे लगते हैं… क्योंकि उनके पीछे सिर्फ अंधेरा होता है।