Haunted Train | Woh Train Jo 20 Saal Pehle Gayab Ho Gayi Thi

BY SCARY CROCODILE TEAM

अगर उस रात मेरी ट्रेन समय पर मिल जाती, तो शायद मैं कभी उस ट्रेन में नहीं चढ़ता।

कई बार जिंदगी की सबसे डरावनी घटनाएं किसी बड़े फैसले से नहीं, बल्कि छोटी-सी देरी से शुरू होती हैं। मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ था। Haunted Train

Haunted Train

उस दिन काम उम्मीद से ज्यादा लंबा खिंच गया था। जब स्टेशन पहुंचा तो मेरी original ट्रेन जा चुकी थी। प्लेटफॉर्म पर खड़े-खड़े मैं कुछ देर तक उस खाली होती पटरी को देखता रहा जहां कुछ मिनट पहले तक लोगों की भीड़ रही होगी। मन में सिर्फ एक ही बात चल रही थी—अब पूरी रात यहीं बितानी पड़ेगी।

मैं टिकट खिड़की तक गया, लेकिन वहां बैठे कर्मचारी ने बिना किसी दिलचस्पी के जवाब दिया कि सुबह से पहले मेरे शहर की कोई सीधी ट्रेन नहीं है। उसके चेहरे पर वही थकान थी जो रात की ड्यूटी करने वाले लोगों के चेहरे पर होती है। उसने मेरी तरफ दोबारा देखा तक नहीं। उसके लिए मैं बस एक और परेशान यात्री था।

मैं वापस मुड़ा ही था कि पास वाली बेंच पर बैठे एक बूढ़े आदमी ने कहा, “अगर जल्दी पहुंचना है तो प्लेटफॉर्म सात पर चले जाओ।”

उसकी आवाज धीमी थी, लेकिन इतनी साफ कि आसपास के शोर के बावजूद सुनाई दे गई। मैंने उसे देखा। सफेद दाढ़ी, पुराना कोट और आंखों में एक अजीब-सी स्थिरता। ऐसा चेहरा जिसे देखकर उम्र का अंदाजा लगाना मुश्किल हो।

“वहां कौन-सी ट्रेन आएगी?” मैंने पूछा।

उसने हल्की मुस्कान के साथ कहा, “जिसकी तुम्हें जरूरत है।”

यह जवाब सुनकर मैं हंस पड़ा। लगा शायद कोई अजीब मजाक कर रहा है। लेकिन जब कुछ मिनट बाद मैं स्टेशन के दूसरे छोर की तरफ बढ़ा, तो पता नहीं क्यों उसके शब्द मेरे दिमाग में घूमते रहे।

प्लेटफॉर्म सात स्टेशन के बाकी हिस्सों से अलग महसूस हो रहा था। यहां भीड़ नहीं थी। कुछ लोग दूर-दूर बैठे थे, लेकिन किसी में भी सामान्य यात्रियों जैसी बेचैनी नहीं दिख रही थी। कोई फोन पर बात नहीं कर रहा था, कोई चाय नहीं पी रहा था, कोई बार-बार घड़ी नहीं देख रहा था। सब बस चुप बैठे थे।

सबसे अजीब बात यह थी कि वहां मौजूद हर व्यक्ति किसी का इंतजार करता हुआ नहीं, बल्कि किसी चीज का इंतजार करता हुआ लग रहा था।

मैंने खुद को समझाया कि शायद मैं जरूरत से ज्यादा सोच रहा हूं।

करीब आधे घंटे बाद दूर अंधेरे में एक रोशनी दिखाई दी। पहले लगा कोई मालगाड़ी होगी, लेकिन जैसे-जैसे वह करीब आई, उसकी शक्ल साफ होती गई। वह एक passenger train थी, मगर वैसी नहीं जैसी आजकल दिखाई देती हैं। उसके डिब्बों का रंग जगह-जगह से उखड़ चुका था। खिड़कियों के किनारों पर जंग जमा था और इंजन की आवाज में एक अजीब भारीपन था, जैसे वह किसी लंबी और थकाऊ यात्रा से लौट रही हो।

ट्रेन बिना किसी announcement के प्लेटफॉर्म पर आकर रुक गई।

जो लोग अब तक बेंचों पर बैठे थे, वे एक-एक करके उठे और शांत कदमों से उसके अंदर चढ़ने लगे। किसी ने जल्दी नहीं दिखाई। किसी ने सीट के लिए दौड़ नहीं लगाई। सब कुछ इतना व्यवस्थित था कि वह सामान्य लगने के बजाय असामान्य लग रहा था।

मैं भी उनके पीछे-पीछे अंदर चला गया।

डिब्बे में घुसते ही मुझे पहली चीज जो महसूस हुई, वह ठंड थी। यह AC वाली ठंड नहीं थी। बल्कि वैसी ठंड जो किसी पुराने बंद कमरे में कदम रखते ही महसूस होती है। मैंने आसपास देखा। लगभग सभी सीटें भरी हुई थीं, लेकिन फिर भी डिब्बे में कोई आवाज नहीं थी।

एक भी नहीं।

ना बातचीत।

ना बच्चों का शोर।

ना फोन की ringtone।

सिर्फ पहियों की लगातार चलती आवाज।

मैं खिड़की के पास वाली सीट पर बैठ गया। कुछ मिनट तक सब सामान्य लगा, लेकिन धीरे-धीरे एक अजीब बात समझ आने लगी। डिब्बे में बैठे लोग हिल तो रहे थे, मगर बात कोई नहीं कर रहा था। यहां तक कि दो लोग जो आमने-सामने बैठे थे, वे भी एक-दूसरे की तरफ नहीं देख रहे थे।

सामने बैठे आदमी की उम्र लगभग पचास साल होगी। मैंने उससे रास्ते के बारे में पूछना चाहा।

“भाईसाहब, यह ट्रेन किस रूट पर जाती है?”

उसने मेरी तरफ देखा।

बस देखा।

कोई जवाब नहीं दिया।

उसकी आंखों में ऐसी खालीपन थी जिसे शब्दों में समझाना मुश्किल है। ऐसा नहीं कि वह नाराज था या बात नहीं करना चाहता था। बल्कि ऐसा लगा जैसे उसने मेरा सवाल सुना ही नहीं। जैसे मेरी आवाज उसके लिए मौजूद ही नहीं थी।

मैंने बात वहीं खत्म कर दी।

समय धीरे-धीरे गुजरता रहा। बाहर सिर्फ अंधेरा था। बीच-बीच में मुझे लगा कि कोई स्टेशन आने वाला है, लेकिन हर बार खिड़की के बाहर सिर्फ खाली मैदान या घना कोहरा दिखाई देता।

फिर मेरी नजर सामने बैठी एक महिला पर गई।

वह शायद शुरू से वहीं थी, लेकिन मैंने ध्यान नहीं दिया था। उसके कपड़े इतने पुराने डिजाइन के थे कि किसी पुराने फोटो एलबम से निकले हुए लग रहे थे। उसकी गोद में रखा टिकट भी अलग था। आज के printed ticket जैसा नहीं, बल्कि मोटे पीले कागज का।

कुछ देर बाद उसने अचानक सिर उठाया।

हमारी नजरें मिलीं।

और उसी क्षण मेरे शरीर में एक अजीब सिहरन दौड़ गई।

उसकी मुस्कान सामान्य थी, लेकिन आंखें नहीं।

उन आंखों में कुछ ऐसा था जो जीवित इंसानों में नहीं दिखता।

मैंने तुरंत दूसरी तरफ देखना बेहतर समझा।

तभी ट्रेन अचानक धीमी होने लगी।

पहियों की घर्षण वाली आवाज पूरे डिब्बे में गूंज गई। मुझे लगा शायद स्टेशन आ गया है। लेकिन जब खिड़की से बाहर देखा तो वहां कोई स्टेशन नहीं था। सिर्फ कोहरा था और उसके बीच एक टूटा हुआ बोर्ड।

मैंने कांच के करीब जाकर नाम पढ़ने की कोशिश की।

कुछ अक्षर मिट चुके थे, फिर भी इतना समझ आ गया कि यह वही जगह थी जिसके बारे में मैंने महीनों पहले एक पुरानी खबर पढ़ी थी।

वह स्टेशन कई साल पहले बंद हो चुका था।

एक भयानक रेल दुर्घटना के बाद।

मेरे दिमाग में अचानक वह खबर घूम गई। सैकड़ों यात्रियों से भरी ट्रेन पटरी से उतर गई थी। मरने वालों की संख्या इतनी ज्यादा थी कि कई शवों की पहचान तक नहीं हो पाई थी।

लेकिन यह असंभव था।

अगर स्टेशन बंद हो चुका था, तो हम यहां कैसे रुक सकते थे?

और तभी मेरे कानों में एक आवाज आई।

“तुम्हें इस ट्रेन में नहीं होना चाहिए था।”

आवाज बिल्कुल मेरे पीछे से आई थी।

मैंने मुड़कर देखा।

और मेरे पूरे शरीर का खून जैसे जम गया।

वह वही बूढ़ा आदमी था जिसने मुझे प्लेटफॉर्म सात पर भेजा था।

लेकिन मुझे साफ याद था कि वह ट्रेन में चढ़ा ही नहीं था।

वह कुछ सेकंड तक मेरी तरफ देखता रहा, फिर बेहद शांत स्वर में बोला—

“अगले स्टेशन से पहले उतर जाओ।”

“क्यों?”

उसने बिना पलक झपकाए जवाब दिया—

“क्योंकि इस डिब्बे में बैठा एक भी यात्री अब ज़िंदा नहीं है…”

Haunted Train

उसके इतना कहते ही डिब्बे में बैठे सभी लोगों ने एक साथ अपनी गर्दन मेरी तरफ घुमा ली।

और पहली बार मुझे समझ आया कि वे पूरे सफर में चुप क्यों थे।

घबराहट धीरे-धीरे डर में बदल रही थी। शायद इसी वजह से मैंने जेब से फोन निकाला, जैसे उसकी स्क्रीन पर कुछ ऐसा मिल जाएगा जो यह साबित कर दे कि मेरे साथ जो हो रहा है वह सिर्फ गलतफहमी है। लेकिन स्क्रीन देखते ही बेचैनी और बढ़ गई। बैटरी मुश्किल से पांच प्रतिशत बची थी। नेटवर्क पूरी तरह गायब था और सबसे अजीब बात यह थी कि फोन समय तक नहीं दिखा रहा था। जहां घड़ी दिखाई देनी चाहिए थी, वहां सिर्फ खाली निशान थे। कुछ सेकंड तक मैं उसे घूरता रहा, फिर बिना किसी कारण के उसे वापस जेब में रख लिया। ऐसा लग रहा था जैसे इस ट्रेन में तकनीक भी बाहर की दुनिया की तरह काम नहीं कर रही थी।

मैंने खुद को दूसरी तरफ देखने पर मजबूर किया। सामने बैठी वही महिला अब भी अपनी सीट पर थी। कुछ देर पहले तक उसके चेहरे पर जो हल्की मुस्कान थी, वह गायब हो चुकी थी। उसकी जगह एक अजीब-सी उदासी ने ले ली थी। वह मुझे नहीं, बल्कि मेरे पीछे किसी चीज को देख रही थी। पहले लगा शायद मेरा भ्रम हो, लेकिन फिर उसने धीरे-धीरे नजरें मेरी तरफ घुमाईं। उन आंखों में डर नहीं था। दया भी नहीं थी। बल्कि ऐसा लग रहा था जैसे उसे पहले से पता हो कि आगे क्या होने वाला है।

काफी देर तक वह चुप रही। पूरे डिब्बे में पहियों की आवाज के अलावा कुछ सुनाई नहीं दे रहा था। फिर अचानक नहीं, बल्कि बहुत स्वाभाविक ढंग से उसने बोलना शुरू किया, जैसे हम दोनों काफी देर से बातचीत कर रहे हों और वह बस बीच की खामोशी तोड़ रही हो।

“तुम्हें यहां नहीं होना चाहिए था।”

उसकी आवाज इतनी धीमी थी कि अगर डिब्बे में थोड़ा भी शोर होता तो शायद मैं सुन ही नहीं पाता। लेकिन उस समय पूरा माहौल इतना शांत था कि उसके शब्द सीधे दिमाग में उतर गए।

“यह ट्रेन आखिर है क्या?” मैंने पूछा।

वह कुछ पल तक मुझे देखती रही। ऐसा लगा जैसे जवाब देने से पहले वह यह तय कर रही हो कि मैं सच जानने के लायक हूं या नहीं। फिर उसने खिड़की के बाहर फैलते अंधेरे की तरफ देखा और बोली, “ज्यादातर लोगों को पता ही नहीं चलता कि वे कब आखिरी सफर पर निकल चुके हैं। वे बस बैठे रहते हैं… ठीक वैसे ही जैसे बाकी यात्री बैठे हैं।”

उसका जवाब सुनकर मेरे शरीर में एक ठंडी लहर दौड़ गई। मैं तुरंत डिब्बे के दूसरे छोर की तरफ देखने लगा। पहली नजर में सब सामान्य लग रहा था, लेकिन अब जब ध्यान से देखा तो छोटी-छोटी बातें परेशान करने लगीं। किसी के कपड़े ऐसे थे जैसे किसी दूसरे दशक के हों। एक आदमी के हाथ में रखा अखबार इतना पुराना लग रहा था कि उसका कागज पीला पड़ चुका था। एक बुजुर्ग महिला की गोद में रखा बैग उस डिजाइन का था जो मैंने सिर्फ पुरानी तस्वीरों में देखा था।

और सबसे डरावनी बात यह थी कि उनमें से कोई भी बेचैन नहीं था।

जैसे उन्हें कहीं पहुंचने की जल्दी नहीं थी।

जैसे वे पहले ही अपनी मंजिल तक पहुंच चुके हों।

उसी समय डिब्बे की छत पर लगा पुराना स्पीकर खड़खड़ाया। आवाज इतनी अचानक नहीं थी कि मैं उछल पड़ूं, लेकिन इतनी असामान्य जरूर थी कि पूरे शरीर का ध्यान उसकी तरफ चला गया।

“अगला स्टेशन… अंतिम स्टेशन…”

बस इतना ही सुनाई दिया।

फिर स्पीकर चुप हो गया।

लेकिन उस एक वाक्य ने पूरे डिब्बे का माहौल बदल दिया।

अब पहली बार मुझे लगा कि मैं अकेला नहीं डर रहा था।

बाकी यात्री भी उस घोषणा को सुन चुके थे।

और उनके चेहरों पर उभरती बेचैनी देखकर साफ लग रहा था कि वे भी उस अंतिम स्टेशन का इंतजार नहीं कर रहे थे… बल्कि उससे डर रहे थे।

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