WRITER – Rohit Shinde
देवकुंड गांव में शाम बहुत जल्दी उतरती थी।
सूरज पहाड़ियों के पीछे छिपता और पूरा इलाका नारंगी रंग से भर जाता। खेतों से मिट्टी की खुशबू आती, कहीं दूर मंदिर के loudspeaker पर आरती बजती, और गांव के बच्चे स्कूल बैग घर में फेंककर सीधे मैदान की तरफ भागते।
उस मैदान में हर रोज एक ही आवाज सबसे ज्यादा सुनाई देती थी—

“अबे जल्दी stack बना!”
“Ball दे इधर!”
“Out है तू!”
Lagori.
सात पत्थरों वाला पुराना game।
Lagori Horror Story विनायक पहली बार उस गांव में गर्मियों की छुट्टियों में आया था। उसके पिता की पोस्ट ऑफिस में temporary duty लगी थी, इसलिए पूरा परिवार दो महीने के लिए देवकुंड में रहने आया था।
शहर का लड़का होने की वजह से शुरू में उसे गांव थोड़ा अजीब लगा।
यहां रात को आठ बजे ही सड़कें खाली हो जाती थीं। मोबाइल network कभी आता, कभी गायब हो जाता। और सबसे अजीब बात — गांव के बूढ़े लोग हर छोटी चीज़ को किसी पुरानी घटना से जोड़ देते थे।
“उस रास्ते से रात में मत जाना…”
“पीपल के पेड़ के पास मत बैठना…”
“तालाब में शाम के बाद मत उतरना…”
विनायक इन बातों पर हंसता था।
उसे लगता था गांव वाले बस डरपोक हैं।
लेकिन एक हफ्ते बाद वही गांव उसे सोने नहीं दे रहा था।
उस दिन शाम को बहुत गर्मी थी।
मैदान के किनारे वाली चाय की दुकान पर रेडियो बज रहा था। कुछ आदमी plastic की कुर्सियों पर बैठे क्रिकेट मैच सुन रहे थे।
समीर ने दूर से आवाज लगाई—
“ए शहर वाले! खेलेगा क्या?”
विनायक ने देखा। पांच-छह लड़के मिट्टी में पत्थर जमा रहे थे।
वह धीरे-धीरे उनके पास चला गया।
“कौन सा game?”
समीर हंसा।
“Lagori भी नहीं पता? तू सच में शहर से आया है।”
बाकी लड़के भी हंस पड़े।
एक दुबला सा लड़का बोला, “इसे ball पकड़ना भी आता होगा क्या?”
विनायक मुस्कुराया।
“Try कर ले।”
बस वहीं से दोस्ती शुरू हुई।
समीर सबसे ज्यादा बोलता था। रोहित हमेशा मजाक करता रहता। निलेश बाकी सबसे अलग था। कम बोलता, लेकिन हर चीज़ बहुत ध्यान से देखता।
Game शुरू हुआ।
सात चपटे पत्थर एक के ऊपर एक रखे गए।
समीर ने गेंद विनायक की तरफ फेंकी।
“मार इसे।”
विनायक ने पूरी ताकत से गेंद फेंकी।
धड़ाम!
पत्थर बिखर गए।
“भाग!”
सब जोर से चिल्लाए।
विनायक भी हंसते हुए भागा। मिट्टी उड़ रही थी, लड़के चिल्ला रहे थे, कोई पीछे से गेंद मारने की कोशिश कर रहा था।
उसे मजा आने लगा।
बहुत दिनों बाद।
धीरे-धीरे वह रोज खेलने आने लगा।
लेकिन एक चीज़ उसने notice की।
शाम ढलते ही निलेश बेचैन हो जाता था।
हर दिन लगभग एक ही समय पर वह कहता—
“बस करो अब।”
समीर हमेशा मजाक उड़ाता।
“क्यों? Ghost आएगा?”
निलेश कभी जवाब नहीं देता।
Lagori Horror Story
एक दिन विनायक ने अकेले में पूछा—
“तू इतना डरता क्यों है?”
निलेश ने पहले कुछ नहीं कहा। फिर धीरे से बोला—
“तुम लोग नए हो इसलिए नहीं जानते। इस मैदान में रात को lagori नहीं खेलते।”
“क्यों?”
“क्योंकि यहां पहले भी एक game अधूरा रह गया था।”
विनायक हंसा।
“फिर वही गांव वाली horror story?”
निलेश ने उसकी तरफ देखा भी नहीं।
“तू मजाक समझ रहा है। लेकिन मेरे बाबा ने खुद देखा था।”
उस रात गांव में बिजली चली गई थी।
गर्मी की वजह से सब लोग घरों के बाहर बैठे थे। कहीं दूर generator की आवाज आ रही थी।
समीर ने कहा—
“Light नहीं है तो क्या हुआ? Moonlight में खेलते हैं।”
रोहित बोला, “आज final match करते हैं।”
निलेश तुरंत बोला, “नहीं। अंधेरा हो रहा है।”
समीर चिढ़ गया।
“अबे हर बार तू same बात करता है।”
विनायक चुप था। उसे भी हल्का डर लग रहा था, लेकिन वापस जाने का मन नहीं था।
आखिर last round शुरू हुआ।
समीर ने पत्थर जमाए।
एक।
दो।
तीन।
चार।
पांच।
छह।
सात।
फिर उसने गेंद उठाई।
“जो जीता वो कल batting पहले करेगा।”
सब हंस पड़े।
समीर ने गेंद फेंकी।
धड़ाम!
पत्थर चारों तरफ फैल गए।
उसी समय अचानक हवा बंद हो गई।
सचमुच बंद।
मैदान के पास जो सूखे पेड़ हिल रहे थे, वो भी रुक गए।
रेडियो की आवाज भी गायब।
पूरा मैदान अजीब तरीके से शांत हो गया।
“अबे…” रोहित धीरे से बोला।
विनायक नीचे झुका और पत्थर उठाने लगा।
तभी निलेश जोर से चिल्लाया—
“रुको!”
सबने उसकी तरफ देखा।
उसका चेहरा सफेद पड़ चुका था।
“हमने सात पत्थर रखे थे ना?”
समीर चिढ़कर बोला, “हां तो?”
निलेश ने कांपती उंगली जमीन की तरफ की।
विनायक ने नीचे देखा।
मिट्टी में आठ पत्थर पड़े थे।
आठ।
कुछ सेकंड तक कोई कुछ नहीं बोला।
समीर आगे बढ़ा।
“किसी ने extra रखा होगा।”
“मत छू!” निलेश लगभग चिल्लाया।
लेकिन तब तक देर हो चुकी थी।
समीर ने काला पत्थर उठा लिया।
अगले ही पल उसका चेहरा बदल गया।
“साला… ये गरम क्यों है?”
उसने तुरंत पत्थर नीचे फेंक दिया।
टक।
आवाज पत्थर जैसी नहीं थी।
जैसे किसी ने दरवाजे पर नाखून मारा हो।
फिर…
पीछे से किसी बच्चे की हंसी सुनाई दी।
बहुत हल्की।
लेकिन साफ।
सबने एक साथ पीछे देखा।
मैदान खाली था।
उस रात विनायक सो नहीं पाया।
कमरे में पुराना ceiling fan घूम रहा था लेकिन हवा कम थी। बाहर कहीं कुत्ते भौंक रहे थे।
करीब 1 बजे उसे आवाज सुनाई दी।
टक…
टक…
टक…
जैसे कोई पत्थर रख रहा हो।
वह धीरे से उठकर बैठ गया।
आवाज कमरे के कोने से आ रही थी।
उसने मोबाइल flashlight ऑन की।
और उसकी सांस रुक गई।
फर्श पर सात पत्थर रखे थे।
एक के ऊपर एक।
ऊपर वाला पत्थर काला था।
विनायक का गला सूख गया।
तभी ऊपर वाला पत्थर अपने आप नीचे गिरा।
टक।
विनायक चीख पड़ा।
उसके माता-पिता भागकर अंदर आए।
लेकिन तब तक वहां कुछ नहीं था।
सिर्फ खाली फर्श।
पिता ने झुंझलाकर कहा—
“रात-रात भर horror videos देखेगा तो यही होगा।”
लेकिन विनायक जानता था उसने क्या देखा।
और उसी रात उसके फोन पर एक message आया।
UNKNOWN NUMBER.
“LAST ROUND BAAKI HAI.”
अगले दिन समीर स्कूल नहीं आया।
जब विनायक और रोहित उसके घर पहुंचे, तो वह बुखार में तप रहा था।
समीर ने धीरे से कहा—
“वो मेरे कमरे में आया था।”
“कौन?”
“एक लड़का… पूरा मिट्टी से भरा हुआ… उसने कहा team अधूरी है।”
रोहित डर गया।
“अबे बंद कर ना।”
समीर की आंखें लाल थीं।
“मैं झूठ नहीं बोल रहा।”
तभी बाहर गली में गेंद लुढ़कने की आवाज आई।
धप्प…
धप्प…
जैसे कोई अकेले खेल रहा हो।
लेकिन बाहर कोई नहीं था।
शाम को चारों निलेश की आजी के पास गए।
आजी गांव की सबसे बूढ़ी औरत थीं। उनका छोटा सा घर कपूर और पुराने तेल की smell से भरा रहता था।
उन्होंने सब सुनने के बाद लंबी सांस ली।
फिर बोलीं—
“बहुत साल पहले यहां बालू नाम का लड़का रहता था।”
उन्होंने बताया कि बालू गांव में सबसे अच्छा lagori player था।
एक रात बड़े लड़कों ने उसे challenge दिया।
रात में game हुआ।
Last round के दौरान गेंद उसके सिर पर लगी। वह गिर गया।
बाकी लड़के डर गए।
उन्हें लगा वह मर गया है।
इस डर में उन्होंने बालू को पीपल के पीछे वाले पुराने कुएं में फेंक दिया।
लेकिन…
आजी की आवाज धीमी हो गई।
“वो जिंदा था।”
कमरे में सन्नाटा छा गया।
“पूरी रात कुएं से आवाज आती रही… ‘मेरा round पूरा करवाओ…’”
विनायक के हाथ ठंडे पड़ गए।
आजी बोलीं—
“तब से जो भी अंधेरे में lagori खेलता है… उसके game में आठवां पत्थर आ जाता है।”
उस रात उन्होंने तय किया कि सब खत्म करना होगा।
आजी ने बताया कि उन लड़कों में से एक आदमी अभी भी जिंदा है।
दत्तू काका।
गांव का पुराना सरपंच।
जब वे उनके घर पहुंचे और बालू का नाम लिया, तो बूढ़े आदमी के हाथ कांपने लगे।
कुछ देर बाद उन्होंने रोते हुए सच मान लिया।
“हम डर गए थे… हमें लगा गांव वाले हमें मार देंगे…”
दत्तू काका की आंखों में सच्चा डर था।
जैसे वह इतने सालों से ठीक से सोए ही न हों।
रात 12 बजे सब फिर उसी मैदान में पहुंचे।
आसमान बादलों से भरा था।
पीपल का पेड़ अंधेरे में और भी बड़ा लग रहा था।
अचानक पुरानी गेंद खुद-ब-खुद मैदान के बीच आकर रुक गई।
फिर मिट्टी में पत्थर अपने आप जमने लगे।
एक।
दो।
तीन।
चार।
पांच।
छह।
सात।
और फिर…
आठवां काला पत्थर ऊपर आकर टिक गया।
हवा बर्फ जैसी ठंडी हो गई।
अंधेरे से बच्चे की आवाज आई—
“Round shuru.”
समीर का हाथ कांप रहा था।
विनायक ने गेंद उठाई।
“मैं करूंगा।”
उसने पूरी ताकत से गेंद फेंकी।
धड़ाम!
पत्थर बिखर गए।
उसी पल मैदान में जैसे पुरानी आवाजें लौट आईं।
बच्चों की चीखें।
दौड़ते कदम।
हंसी।
और फिर रोने की आवाज।
विनायक तेजी से पत्थर उठाने लगा।
लेकिन इस बार उन्हें महसूस हो रहा था कि कोई और भी मैदान में दौड़ रहा है।
कोई दिखाई नहीं दे रहा था।
सिर्फ मिट्टी में छोटे-छोटे footprints बन रहे थे।
दत्तू काका अचानक रोने लगे।
“बालू… माफ कर दे…”
अंधेरे से एक छोटा लड़का बाहर आया।
उसका चेहरा मिट्टी से ढका था।
आंखों की जगह सिर्फ काला अंधेरा था।
रोहित पीछे हट गया।
निलेश जम गया।
बालू धीरे-धीरे दत्तू काका के सामने जाकर खड़ा हो गया।
“मेरा पत्थर…”
दत्तू काका कांपते हुए जेब से छोटा काला पत्थर निकालने लगे।
“मैंने छुपा दिया था… मुझे डर था…”
बालू ने पत्थर लिया।
कुछ सेकंड तक मैदान बिल्कुल शांत रहा।
फिर उसने पत्थर पीपल की जड़ के पास रख दिया।
“अब game पूरा हुआ।”
इतना कहते ही हवा सामान्य हो गई।
मंदिर की घंटी फिर सुनाई देने लगी।
दूर कहीं कुत्ता भौंका।
और बालू धीरे-धीरे अंधेरे में गायब हो गया।
उसके बाद गांव में किसी ने रात में lagori नहीं खेली।
मैदान आज भी वहीं है।
दिन में बच्चे वहां खेलते हैं।
हंसते हैं।
चिल्लाते हैं।
लेकिन सूरज ढलने से पहले सब घर लौट जाते हैं।
और कभी-कभी…
गर्मी की बिल्कुल शांत रातों में…
पीपल के पेड़ के पास से हल्की सी आवाज आती है—
टक…
टक…
टक…
जैसे कोई आज भी पत्थर जमा रहा हो।
बस फर्क इतना है…
अब वो game जीतने के लिए नहीं खेला जाता।
किसी अधूरे round को याद रखने के लिए खेला जाता है।
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